ललन चतुर्वेदी का साहित्यिक दखल कविता एवं व्यंग्य के क्षेत्र में है। इस तरह उनकी यात्रा गद्य और पद्य की राह से होकर चलती रहती है। उनकी कविताओं में रोजमर्रा के साधारण दृश्य अपने वैशिष्ट्य के साथ प्रकट होते हैं। संवेदना के पुष्पों से सजी ये कविताएँ अपनी प्रगतिशील विचारों की सुगंध के साथ विचरती रहती हैं। आइये, उनकी कविताओं का आस्वाद लिया जाए।
1. मैं कांटे गिनता रहा
मन का क्या है
तमाम दुश्वारियों के बीच दुनिया अच्छी लगने लगती है
लगता है कि इतने अच्छे लोग हैं दुनिया में
बहुत-से अच्छे काम कर रहे हैं
मैं ही तो पीछे रह गया हूं
शिकायतों का पुलिंदा लेकर
भला यह भी मिलने का कोई सलीका है कि
मिले भी बहुत दिनों के बाद तो खाली हाथ
यह जानते हुए कि खाली हाथ तो आदमी एक ही बार लौटता है
कम से कम रूठी हुई प्रेयसी के लिए एक गुलाब तो ले लेते
और गिरते हुए रुपये पर विचार करते हुए मंदिर के पास बैठे भिखारी की कटोरी में डाल देते दस रुपए का एक सिक्का
यह कहां संभव हो सका
मैंने तो 'आगे बढ़ो' कहकर ले ली छुट्टी
मन तो इतना कृपण निकला कि
स्कूल जाते बच्चों ने जब हाथ हिलाकर किया टाटा
हम उजबक की तरह मुंह सी कर देखते रहें
वह अकेला बूढ़ा जो बैठकर कर रहा था किसी का इंतजार
कि उम्र के इस पड़ाव पर कोई उससे भी बोले-बतियाए
उसको नजरअंदाज कर उड़ गए बाइक पर
ये चौबीस घंटे क्या मेरा बिलकुल निजी समय है
यह जानते हुए भी कि प्यार के दो पल बहुत हैं
हम अपने में लिथड़े रहें
और अंत में सद्बुद्धि के सात्विक पलों में जब शुरु किया स्वयं का आकलन
बहुत शर्मिन्दा हुआ
इतने सारे फूलों के बीच
मैं केवल कांटे गिनता रहा।
2. पिता की तस्वीर
उस दिन बड़ी बहन ने पिता की तस्वीर दिखाई
पासपोर्ट साइज में वह विराजमान थे मां के साथ
वे दोनों किसकी ओर देख रहे थे
यह प्रश्न अचानक मन में आया
वह तस्वीर आधी थी
बहुत जतन से बहन ने उसे फ्रेम करवाया था
मेरे पास पिता की कोई तस्वीर नहीं है
मैंने बनवाने की कोई कोशिश भी नहीं की
बचपन में देखी थी उनकी एक तस्वीर
जो उन्होंने काॅपरेटिव सोसाइटी से लोन लेने के लिए खिंचवाई थी
वह भी कहीं गुम हो गई जमीन के कागजात की फाइलों में
हो सकता है वह पीली पड़ गई हो या सड़-गल गई हो
मैं पिता की तस्वीरों के प्रति कभी संजीदा नहीं रहा
बहन आज भी पिता की तस्वीर को सभी भाई-बहनों को दिखाती है
पिता की तस्वीर देखते हुए
मैं मौन हो जाता हूं।
3. सुखाड़
सूख रही हैं नदियां
लुप्त हो रहीं हैं पौधों की प्रजातियां
किसान अपने ही उपजाए हुए अन्न से हो रहे हैं विमुख
खैरात का उत्सव मना रहे हैं
खरीद रहे हैं बाजार से निर्मित बेस्वाद अनाज
सुविधाओं से हार रहा है श्रम
भ्रम में जीने की सदी है हमारे सामने
देखते-देखते कितना कुछ बदल गया
अब कुछ भी नहीं चीन्हा रहा है
उम्मीद नहीं थी कि इतना जल्द बच्चे हो जायेंगे जवान
वे हमें पहचान ही नहीं पायेंगे
दोस्त केवल फेसबुक पर ही मिलेंगे
सब कुछ ऑनलाइन हो जाएगा
मिलना-जुलना, झगड़े-फसाद सब आभासी दुनिया की चीजें हो जायेंगी
ओह, आंखें भी सूख गईं हैं
यह कैसा सुखाड़ है कि सब कुछ कुम्हला गया है
एक हरी टिक की बाट जोहते
कितना बेचैन हो रहा है मन
कब से रिंग हो रहा है
क्यों मोबाइल नहीं उठा रहा है बेटा
जो पुकारते ही दौड़ कर पकड़ लेता था मां का आंचल।
4. स्त्री शाम की प्रतीक्षा करती है
खिड़की से बाट जोह रही है एक जोड़ी आंखें
इसमें प्रेयसी वाली प्रतीक्षा का चुलबुलापन नहीं है
वह बिलकुल एकटक देख रही है सड़क की ओर
जो उसके घर की तरफ आती है
दिन भर की थकन के बाद वह सुस्ताने के लिए नहीं बैठी है
वह इसलिए बैठी है कि साथ में बैठकर पिए एक कप चाय
वह जानती है उस पुरुष की थकान
जो लौट रहा है दिन भर झेलकर तमाम तरह के झंझावात
जैसे ही मुड़ते हैं उस पुरुष के पांव
उसके मन की आंखें मुस्करा उठती हैं
खोलकर झट से किवाड़
नज़रें उठाए बिना
वह सीधे करती है रसोई का रुख़
छू मंतर हो जाती है
दिन भर की उसकी थकान
प्रतीक्षा की पावनता में वह इस तरह मेज पर रखती है चाय
जैसे गंगा से निकली हो कोई सद्यस्नाता।
5. साइकिल की चेन
यह साइकिल की चेन
वर्षों से वजन ढोते-ढोते लमर गई है
हर दस क़दम पर उतर जाती है
कभी-कभी तो फंस जाती है बुरी तरह से
इसे चढ़ाते हुए छूट जाता है पसीना
कालिख से पुत जाते हैं दोनों हाथ
ऐन मौके पर जब कहीं पहुंचना हो जरूरी
इसका बार-बार उतरना भयानक यातना है
कितनी बार तो टूटी भी है
जिसे मिस्त्री ने ताकीद देते हुए आखिरी बार
जोड़ दिया है अपने हुनर से
मैंने खेलावन को यह दर्द झेलते हुए देखा है
जो गांव-गांव घूमकर खरीदता था अनाज
और ढोता था उसे अपनी खटारा साइकिल पर
उसे देखते ही मोहल्ले भर के लड़के एक सुर में गाने लगते-
घंटी ना ब्रेक जनता एक्सप्रेस
आज भी जब कभी किसी की साइकिल की चेन उतर जाती है
सहसा खेलावन की याद आ जाती है
दुआ करता हूं बीच सफर में किसी की साइकिल की चेन नहीं उतरे
इसके बिना असहाय से थिर दिखते हैं पहिए।
6. सब लौटता है
जैसे रात के बाद लौटता है दिन
रवि के बाद सोम, आषाढ़ के बाद सावन
दुःख के बाद सुख या सुख के बाद दु:ख
वैसे नहीं लौटता है मान, अपमान
मान लौटता है मान की शक्ल में
अपमान लौटता है बनकर और वीभत्स
मृत्यु अमंगल नहीं है
यह लौटती है जीवन बनकर
मत समझो कि कोई चल जाता है
सदा-सर्वदा के लिए
जो गया है, वह निश्चित रूप से लौटेगा
यह दीगर बात है कि वह तुम्हें पहचान नहीं पाएगा
और तुम भी नहीं पहचान पाओगे उसे।
7. आखिर,उसकी गलती क्या है?
पता चला
सोलह तारीख को वह सगुन का चूल्हा उठाएगी
करेगी सोलहों श्रृंगार
सत्रह को कराएगी रुद्राभिषेक
अठारह को मेंहदी रचाएगी
उन्नीस को करेगी पूजा मटकोर
हल्दी-संगीत भी करवाएगी धूमधाम से
वह नहीं मानेगी किसी की सलाह
दुल्हे के गले में डालेगी जयमाल
सोने की अंगूठी पहनाएगी
बोलती है ससुराल में यदि मारेगा कोई ताना
तो धरेगी लक्ष्मीबाई का बाना
सबको खिलवाएगी जेल का खाना
कहती है - नहीं पढ़ाओ मुझे सादगी का पाठ
अपनी मेहनत की कमाई पर करती हूं ठाठ
मां-बाप के मरने से सपने नहीं मरते
अनाथ हूं तो क्या रोती रहूं माथ पर रख हाथ
गांव की औरतें मुंहामुंही करतीं हैं एक ही बात
इतना मुंहजोर किसी को बेटी न दे भोलानाथ !
8. बहुत देर तक
बहुत देर तक नहीं पढ़ी जा सकती किताबें
ब्रेक में आंखें ख्वाब देखना चाहती हैं
तीन घंटे की फिल्म देखते हुए बोरियत बहुत हुई
बीच-बीच में कई बार तुम्हारी हथेलियों को हाथ में लिया
इच्छा तो चुंबन तक की हो रही थी
लेकिन बीच में कितनी दीवारें खड़ी थीं
बहुत देर तक कमरे में बैठना तकलीफदेह लगा
बाहर निकल कर निहारता रहा आकाश को
चांद उस दिन बेहद खूबसूरत नज़र आ रहा था
इतना कि असंख्य तारे उसे अपलक निहार रहे थे
इस बीच मैं भूल ही गया कि तुम इंतजार कर रही थी अकेले कमरे में
और मैं केवल चांद ही नहीं निहार रहा था
मेरी आंखों में कुछ पूर्व प्रेमिकाएं उतर गईं थी
यह सब सोचते हुए बिस्तर पर न जाने कब लग गई आंखें
सुबह मां ने दरवाज़ा पीटते हुए जगाया
कब तक सोए रहोगे, छूट जाएगी ट्रेन
आज ही है न तुम्हारी परीक्षा !
कब तक बैठे रहोगे बाप के कपार पर ?
9. डरो
आदमी!
डरो, पानी से
डरो, हवा से
डरो, धरती से
जिस दिन खराब हो जाएगी पानी की प्रकृति
घूंट भर पानी के बिना मर जाओगे
हो सकता है इसके गुस्से में आ जाए सुनामी
जिस दिन हो जाएगी हवा विपरीत, विषैली
एक पल में सदा-सर्वदा के लिए सो जाओगे
जिस दिन फट जाएगी धरती
निगल लेगा आकाश
डरो
डरना जरूरी है
जिस तरह ज़रूरी है प्रेम करना
डरो
आदमी से नहीं
धरती, पवन, पानी से।
10. चुप होने का मतलब
चुप होने का मतलब
सब कुछ आंखें मूंद कर स्वीकार करना नहीं है
चुप होने में छुपी होती है अस्वीकृति की ध्वनि
जिसे लोग सुन नहीं पाते हैं
चुप होने के बावजूद
चुप नहीं रह पातीं आंखें
वह अस्वीकृति को जब्त कर लेती हैं
और ऐन मौके पर एक दिन
जब आंखें बोलने लगती हैं
सब चुप हो जाते हैं
सुनकर चश्मदीद का बयान ।
11. अनुपस्थिति
ऐसा बहुत से लोग नहीं मानते कि
वह आदमी काबिलेगौर है
और एक दिन वह बन गया काबिलेतारीफ
अनुपस्थिति व्यापक स्वीकार्यता भी देती है
यह सिद्ध हुआ उसके जाने के बाद ।
लेखक परिचय :
ललन चतुर्वेदी (मूल नाम-ललन कुमार चौबे)
जन्म तिथि : 10 मई, 1966
मुजफ्फरपुर (बिहार) के पश्चिमी इलाके में नारायणी नदी के तट पर स्थित बैजलपुर ग्राम में
शिक्षा: एम.ए.(हिन्दी), बी एड., विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की नेट जेआरएफ परीक्षा उत्तीर्ण
प्रकाशित कृतियाँ : प्रश्नकाल का दौर, बुद्धिजीवी और गधे (दो व्यंग्य संकलन), ईश्वर की डायरी, यह देवताओं का सोने का समय है एवं आवाज घर (तीन कविता संग्रह) तथा साहित्य की स्तरीय पत्रिकाओं तथा प्रतिष्ठित वेब पोर्टलों पर कविताएं एवं व्यंग्य प्रकाशित।
संपर्क:
ललन चतुर्वेदी
202,असीमलता अपार्टमेंट
मानसरोवर एन्क्लेव,हटिया
रांची-834003
मोबाइल न. 9431582801
ईमेल: lalancsb@gmail.com
