संदीप मील लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
संदीप मील लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

संदीप मील के लेखन का जादू : कोकिलाशास्त्र



संदीप मील के लेखन का जादू : कोकिलाशास्त्र
---------------------------------------------------------

न चिड़ियों की आवाज रही और न हवा की सनसनाहट। अब न फूल खिलते हैं और न ही आंधियों में पीपल की टहनियां झुककर जमीन को सलाम करती हैं। लोगों के कानों को मोर की आवाज़ और पपीहे की किलकारी में फर्क भी पता नहीं रहा।

संदीप मील की कहानी कोकिलाशास्त्रमें यह एक गाँव की व्यथा-कथा की आरंभिक पंक्तियाँ हैं। पर, व्यापक अर्थ में यह गाँव की नहीं बल्कि पूंजीवादी सत्ता द्वारा तैयार की जा रही उस दुनिया का सच है, जहां मानव प्रकृति एवं संवेदना से बिछुड़ता जा रहा है। उसकी आत्मसत्ता इस बाहरी सत्ता के समक्ष घुटने टेकती जा रही है या उसके लिए मजबूर की जा रही हैं। 

जब कोई सत्ता मनुष्य को प्राप्त नैसर्गिक अधिकारों से वंचित करने लगे तो एक विवेकशील मनुष्य में इसका प्रतिकार करने का भाव जागता है और समानांतर सत्ता का आविर्भाव होता है। अपने स्वतन्त्रता संग्राम के आन्दोलनों पर दृष्टिपात करें तो हमें उन कालखंडों में कई जगहों पर देशवासियों द्वारा समानांतर सता चलाने की जानकारी मिलती है। वे लोग आज आजाद राष्ट्र के गौरव हैं तथा उनसे हमें प्रेरणा मिलती है, किसी अन्यायपूर्ण व्यवस्था के प्रतिकार करने की...जूझने की...लड़ने-भिड़ने की। पर, आज के परिप्रेक्ष्य में वैसी ही अन्यायपूर्ण व्यवस्था से जूझने वाली समानांतर सत्ता को क्या हमारे लोकतंत्र में वही गौरव मिल पाता है?

संदीप मील की कहानियों से गुजरते हुए जो एक बात पकड़ में आती है कि इस कथाकार की मनुष्य-मात्र में आस्था है...तभी तो उसकी सार्वभौम सत्ता की रक्षा के लिये वे अपनी कहानी में अन्यायी व्यवस्था के खिलाफ समांतर सत्ता की कल्पना करते हैं, जो उत्पीड़क के सामने घुटने नहीं टेकता, बल्कि दृढ-संकल्पित होकर खुलेआम संघर्ष की घोषणा करता है।

जब सत्ता आवारा पूँजी के उड़नखटोले पर सवार होकर सभी संसाधनों पर अपना कब्ज़ा जमाना चाहती है तो परिणाम होता है संसाधनों का अन्यायपूर्ण बंटवारा। यह नीति धीरे-धीरे मानव की गरिमा को क्षति पहुंचाने लगती है। अपनी गरिमा एवं अस्तित्व को विस्मृत करने को मजबूर होता मनुष्य संख्या में बदलता चला जाता है, जो पूंजीवादी सत्ता चाहती है। ऐसी ही परिस्थियों में समांतर सत्ता भीड़ में तब्दील होते मनुष्य की आवाज बनती है। 

कोकिलाशास्त्रकहानी के गाँव को देखें तो वह पूंजीवादी नगरीय व्यवस्था का एक तस्वीर पेश करती है। यह व्यवस्था सत्ता के सहयोग से फल-फूल रही है, जहां साधारण मनुष्य का स्वामित्व उसके अपने ही संसाधनों पर से ख़त्म किया जा रहा है तथा वे चीजें जो उन्हें सहज सुलभ थीं, पैसे पर मिलने लगती हैं या सरकार की लोक-कल्याणकारी योजनाओं के नाम पर।

ऐसा ही कुछ हाल था कहानी की नायिका सरिता के गाँव नीमागढ़ का, जहां वह ब्याह कर आयी थी। आप उस गाँव की जगह अपना गाँव, शहर, महानगर या देश को रखके भी सोच सकते हैं। बहुआयामी एवं बहुस्तरीय कहानियों की यही तो विशेषता होती है। गाँव की स्थिति देखिये – “हाँ, बिल्कुल बिना पेड़ का गांव था। करीब दस साल पहले गांव के दो फौजी रिटार्यड होकर आये और उन्होंने हिसाब लगाया कि एक पेड़ को पालने में दस हजार का खर्चा होता है। आमदनी कुछ नहीं। ऐसा करें कि सारे पेड़ों को काटकर बेच दिया जाये और उन पैसों को ब्याज पर दे दिया जायेगा तो हर महीने गांव के प्रत्येक परिवार को दो हजार रुपये ब्याज के मिलेंगे। पूरे गांव में घने पेड़ थे। सारे काटे गये और अब हर घर को दो हजार रुपये ब्याज के मिलते हैं।

पूँजीवादी सत्ता की हमेशा यह कोशिश होती है कि पहले आमलोगों के आश्रय और जीवनयापन के साधन छीन लो...वे अपनेआप घुटने टेक देंगे और उन्हीं के इशारों पर चलने लगेंगे। आज नगरों-महानगरों का यही हाल है। बिल्डर एवं व्यवसायी समूह आम लोगों की जमीन पर अपार्टमेन्ट और शॉपिंग कॉम्प्लेक्स बनाकर उन्हें नियत आमदनी पर जीने को मजबूर कर देते हैं। सामान्य लोग भी मेन रोड की अपनी जमीन पर अपना बढ़िया आवास और दूकानें बना सकते थे, पर उनकी आर्थिक स्थिति बाधा बन जाती है। फिर क्या, ये लोग उनके चंगुल में फंसते चले जाते हैं और जिन्दगी भर उबर नहीं पाते।

कुछ ऐसी ही स्थिति नीमा गाँव की है, जहाँ के लोग अपने आश्रयदाता पेड़ों को काटकर बेच चुके हैं तथा उनसे प्राप्त पैसों के ब्याज पर आश्रित हो जाते हैं। उन पेड़ों पर रहनेवाली बड़ी आबादी विस्थापित हो जाती है, सो अलग। यानी कहानी दो  स्तरों पर आगे बढ़ती है...आर्थिक गुलामी एवं निराश्रय होकर पलायन कर गए लोगों की कहानी। यहाँ से हम गाँव वाली आबादी और पेड़ों के कट जाने से विस्थापित हुए लोगों की समस्याओं को साथ लेकर चलते हैं। इनकी बदतर स्थिति के लिए जिम्मेवार पूँजीवादी सत्ता अर्थात गाँव के पटेलों की कहानी भी इनसे जुड़ी है।

तो, कहानी आगे बढ़ती है एक अजनबी आवाज से, जो रात के एक बजे गाँव के लोगों को सुनाई देती है और सभी मर्द-औरत पूर्व की और दौड़ पड़ते हैं। वहाँ अंतिम छोर पर कानाराम का मकान है, जिसके आगे अथाह रेगिस्तान शुरू होता है। इस आवाज के दहशत में लोग आगे नहीं जा पाते और गाँव में तरह-तरह की अफवाहें उडती जाती हैं। कोई इसे पक्षी की आवाज बताता है तो कोई सांप की आशंका जताता है, जो आवाज देकर बिल में घुस जाता है। पर, किसी को कोई निशान नहीं मिलता और लोग उसे अलबेला कहने लगते हैं।

सभी का ध्यान कानाराम की तरफ जाता है, क्योंकि उसके घर के पास ही आवाज आती है। यूं तो उसका परिवार गाँव का एक उपेक्षित परिवार था, पर बला की खूबसूरत बहू आने की वजह से लोग उसे पूछने लगे थे। इस पूछ में भी मर्दों की कुंठा छुपी होती है।

होता ऐसा है कि एक दिन पूरी तैयारी से सारा गाँव कानाराम के घर की बगल में आ जुटा। बसंत की लाठी, प्रमोद की बन्दूक और अन्य लोगों के पास भी कोई-न-कोई हथियार था ही। दिल में जोश, पर जहन में डर !

ऐसा नहीं था कि उस गाँव के लोगों ने कभी पेड़ लगाने की नहीं सोची थी...जरूर सोचा था, पर समझाने और धमकाने पर आगे बढ़ नहीं पाये। कुछ ऐसा ही है न हमारा नगरीय जीवन, जहाँ पूंजी और सत्ता ने मनुष्य को मशीनी जीवन जीने को मजबूर कर दिया है...सोचने का अवकाश तक छीन लिया है।

कहानीकार को यह यथास्थिति मंजूर नहीं। स्थितियों में परिवर्तन को लेकर वे संकेत देते हैं। कानाराम का मकान पूर्व दिशा के अंतिम छोर पर है और पूर्व दिशा आशा-उम्मीद का सूचक है यानी स्थिति में बदलाव यहीं से होना है। कानाराम भी गांववालों की तरह चारे की कमी के चलते अपनी बकरी कसाई के हाथों बेच देना चाहता है, पर बहू उसे रोक देती है। परिवर्तन की आहट मिलने लगती है। समाज का प्रभु वर्ग यथास्थिति बनाए रखना चाहता है, पर क्या उपेक्षित वर्ग हाथ पर हाथ देकर बैठा रहे। नहीं ! आवाजें तो उठेंगी और ये आवाज समाज के उपेक्षित तबकों से उठेंगी...कमजोर वर्गों से उठेंगी। कहानी में परिवर्तन की सुगबुगाहट एक उपेक्षित दलित परिवार के यहाँ से उठती है और इसे स्वर देती है एक स्त्री।     

कहानी आगे बढ़ती है। उस रात की सारी तैयारियों के बावजूद अलबेला पकड़ में नहीं आता है। उस रात की चर्चा में ही कहानी की नायिका सरिता की सास शारदा घोषणा कर देती है कि सरिता अगली बारिश में नीम भी लगाएगी आँगन में, गाँव वाले चाहें तो दो हजार बंद कर दें। रात की कहानी को लेखक ने बड़ी ही ख़ूबसूरती से साधा है...रहस्य-रोमांच, हँसी मजाक की बातों के साथ भय का वातावरण ! लोग घेरे के बाहर जाकर पेशाब करने की हिम्मत भी नहीं जुटा पाते, पर सरिता घेरे से बाहर पेशाब करने चली जाती है कि तभी आवाज आती है --- गिलगिलगिलगिलगिल...! आवाज को सुनते ही सभी की आवाज पतली हो जाती है। लोग घर जाने की हिम्मत भी जुटा नहीं पाते, पर सरिता घर आकर मजे से सो गयी थी। उसके बाद पूरा गाँव दहशत में जीने लगता है। क्या इसी तरह चुनौती देनेवाली किसी अजनबी आवाज पर पूरा नगर सन्नाटे में नहीं आ जाता है ?

सरिता के सास की नीम का पेड़ लगाने की घोषणा के गाँव के पटेल कानाराम को समझाने तथा मना करने गए। उनलोगों की धमकी पर सरिता घोषणा करती है कि नीम तो इसी बरसात में लगेगा चाहे दो हजार रुपये बंद कर दिये जांय। एक साथ आर्थिक गुलामी के विरुद्ध बगावत एवं निराश्रित लोगों की वापसी की उम्मीद ! गाँव के पटेल उसे गाँव से अलग करने की साजिश में लग जाते हैं, पर कानाराम का परिवार डटा रहता है। यहीं पर पटेलों की सत्ता के विरुद्ध एक अलग समानांतर सत्ता उठ खड़ी होती है। 

इसके बाद तो एक दिन अलबेला दिन में भी बोला और गाँव के दैनिक कार्यकलाप भी खामोशी में होने लगे। वहीं कानाराम दिन में हारमोनियम पर भजन गाता जिसमें उन पक्षियों के नाम आते जो आश्रयहीन होने के कारण सदा के लिए चले गए थे। कभी-कभी तो अलबेला बोलता और कानाराम का भजन भी चलता रहता। कानाराम को अलबेला से डर नहीं लगता और उसकी आवाज उसे अपनी-सी और दिल के करीब भी लगती है। अलबेला ने कभी इंसान तो क्या बकरी के बच्चे को भी नुकसान नहीं पहुंचाया। वह यह भी विश्वास नहीं कर पाता कि यह किसी पक्षी की आवाज है क्योंकि पिछले सात सालों से उसने किसी पक्षी को तो देखा तक नहीं है। कुछ पटेल सोचते कि कहीं कानाराम अलबेला को जानता तो नहीं है और उनकी शिकायत कर सकता है, सो उससे माफी भी मांगना चाहते पर उनकी अकड उन्हें रोक लेती। गाँव के और लोग कानाराम के पास आना चाहते, पर पटेलों के आदेश के कारण पास आने की हिम्मत नहीं जुटा पाते। आज जहां कहीं भी अन्याय और उत्पीडन है...क्या वहाँ का दृश्य ऐसा ही नहीं है ?

संदीप कहानी को आगे बढाते हैं, एक सूत्र से...वह है धर्मेन्द्र, सरिता का पति जो अपने दोस्त बसंत से नशे में कह उठता है कि उसकी बीबी रात के ग्यारह बजे कहीं जाती है और एक बजे वापस आती है। यूँ तो वह शादी के बाद से ही खामोश रहने लगा है। कानाराम के बहुत पूछने पर भी कुछ नहीं बताता। उसकी चेतना आम युवक की तरह स्वतंत्र स्त्री या स्त्री के स्वतंत्र विचार एवं निर्णय को स्वीकार नहीं करती। वह गाँव की आर्थिक गुलामी वाली जिन्दगी का आदी होता जाता युवक है तथा इसीके कारण परिवर्तनों को स्वीकार करने का माद्दा उसमें नहीं है। परिवार द्वारा उठाया गया कोई कदम इस कारण उसे प्रभावित नहीं कर पाता है। वह पटेलों द्वारा लगाये गये प्रतिबंधो के कारण और परेशान हो जाता है। इस सन्दर्भ में मुझे वे क्लीव भारतीय नरेश याद आते हैं, जो अंग्रेजों के नियत किये गये पैसों पर ही ऐशो-आराम की जिन्दगी गुजार रहे थे। देश के अपने लोग ही क्रांति में भाग ले रहे थे, पर इनका संवाद तक उनसे नहीं हो पाता था। कुछ हद तक धर्मेन्द्र और सरिता की संवादहीनता भी मुझे ऐसी ही लगती है। पर, कानाराम और शारदा जो वर्षों से शोषण को महसूस कर रहे हैं, सरिता में विश्वास करते हैं। यहाँ तक कि कानाराम अपने चरित्र पर लगाया गया लांछन बर्दाश्त कर लेता है। जब कानाराम तमाम बन्धनों के आगे झुक नहीं रहा था तो गाँव के पटेलों ने उसका गाँव के कुएं से पानी बंद कर दिया। कोई भी सत्ता एक व्यक्ति के जीवन और गरिमा को तो इसी तरह नष्ट करने की कोशिश करती है। अब सरिता अपने गहने बेचकर कुआँ बनवाने का ऐलान करती है।

अगले दिन कानाराम के घर कुआँ खुदवाने के लिए मशीन आती है। यह पटेलों के मुँह पर तमाचे की तरह पड़ता है क्योंकि बड़े-बड़े पटेलों के घर भी कुएँ नहीं थे। गाँव में कुआँ खोदनेवाली मशीन का आना बड़े परिवर्तन की और ईशारा करता है। यह गाँव की जड़ता को तोड़ने का काम करती है। उसके बाद तो घटायें उमड़ी, तेज हवा चली और साल की पहले बारिश हुई। संकेत में लेखक उस तथ्य की और इशारा कर जाते हैं कि प्रकृति के साहचर्य के साथ ही जीवन-धारा बहती है। कानाराम का कबीर के भजन गाना भी रूढ़ होते गाँव में प्रगतिशीलता के बयार की ओर संकेत करता है। उस रात में ही आँगन में नीम लगा। पलायन कर गये लोगों की वापसी की उम्मीद का संकेत मिला।

तो एक रात बसंत सरिता के पति धर्मेन्द्र के साथ चल पड़ता है सरिता के पीछे। अब देखिये संदीप मील की कहानी में जादू यानी जादुई यथार्थवाद! रेगिस्तान के बीच उन्हें कलकलाहट और सरसराहट सुनाई पड़ती है। फिर तो पेड़ के पत्तों के हिलने की आवाज, चिड़ियों की चहचहाहट भी। घने पेड़ों का बाग़, झरने, तालाब सभी दिखने लगे। सरिता के पहुँचते ही पक्षियों का झुंड मंडराने लगा। कौए, कोयल, कुत्ते सभी घेरकर बैठे थे।

रात है, पर पक्षियों, बिल्लियों एवं कुत्तों की आवाजें आ रही हैं। सरिता पक्षियों की बोली बोलती है...उनसे बात करती है...उनके साथ नाचती-गाती है। यह रात दरअसल हमारे समय का अन्धेरा है। इस अँधेरे में पक्षियों, बिल्लियों आदि का जागे रहना हमारे आश्रयहीन और साधनहीन लोगों की जिजीविषा ही तो है। सरिता पूंजीवादी सत्ता के विरुद्ध उनके संघर्ष एवं विद्रोह की प्रतिनिधि आवाज है। अब देखिये, इन बाहर कर दिए गये लोगों के ‘समानांतर सत्ता’ की झलक – उसके कंधे पर कोयल बैठी थी, घुटने पर कौआ था और बगल में इतने पक्षी और कुत्ते बैठे थे जैसे कि संसद की कार्यवाही चल रही हो। फिर सरिता ने अलबेला की आवाज निकाली तो बसंत को पैंट में पेशाब निकल आया

फिर क्या था, राज खुल गया। गोविन्द पटेल सच ही कह देता है अनजाने में कि पक्षी की भाषा समझने और बोलने के लिये एक शास्त्र पढ़ना पड़ता है जिसका नाम ‘कोकिलाशास्त्र’ है। इसको पढने के बाद इंसान किसी भी जानवर की बोली बोल लेता है।” यह पक्षी की भाषा आश्रयहीन हो रहे उत्पीड़ित लोगों की भाषा ही तो है। पटेलों की तरफ से हुक्म आया कि गाँव छोड़ दो। सरिता ने कानाराम और शारदा को हौंसला बंधाया। अब लड़ाई आर-पार की होनी थी। भोर होते ही सारा गाँव लट्ठ लेकर हमले के लिए आया तो कानाराम के घर पर मोर्चा संभाले मोर, कबूतर, कौए, कुत्ते, बिल्ली आदि उनपर टूट पड़े। भगदड़ मच गयी और सभी दौड़कर अपने घरों में घुस गये। फिर से अपनी दुनिया बनाने की शुरुआत हो चुकी थी...खुला विद्रोह! इसके साथ उम्मीद की पहली किरण सूरज की पहली किरण के साथ फूटती है...कानाराम के आँगन में भी नीम की पहली कोंपल फूटी।

इस कहानी को पढ़कर कुछ को यह कहानी पर्यावरण केन्द्रित लगी तो कुछ को दलित, शोषितों के उत्पीड़न एवं संघर्ष की गाथा। पर इन मूल्यांकनों ने संदीप मील की कहानी के जादुई यथार्थ के जादू को शायद नहीं पकड़ा। इस कहानी के विस्तृत फलक को पकड़ने की कोशिश में पता नहीं मैं कितना सफल हुआ हूँ...या अभी भी कुछ गुत्थियों का सुलझना बाक़ी रह गया है।

कुल मिलाकर कहानी में संदीप का जादू हमें कई बार उलझा देता है, पर जैसे ही हम उसके पार जाकर यथार्थ का साक्षात्कार करते है तो हमें अपनी ही दुनिया का विद्रूप चेहरा दिखायी देता है और इस स्थिति से लड़ते हमारे लोग नजर आते हैं। वाकई यह कहानी इस समय की बेहतरीन रचना है।  

कहानी कोकिलाशास्त्र की - 1





“न चिड़ियों की आवाज रही और न हवा की सनसनाहट। अब न फूल खिलते हैं और न ही आंधियों में पीपल की टहनियां झुककर जमीन को सलाम करती हैं। लोगों के कानों को मोर की आवाज़ और पपीहे की किलकारी में फर्क भी पता नहीं रहा।”

संदीप मील की कहानी ‘कोकिलाशास्त्र’ में यह एक गाँव की व्यथा-कथा की आरंभिक पंक्तियाँ हैं। पर, व्यापक अर्थ में यह गाँव की नहीं बल्कि पूंजीवादी सत्ता द्वारा तैयार की जा रही उस दुनिया का सच है, जहां मानव प्रकृति एवं संवेदना से बिछुड़ता जा रहा है। उसकी आत्मसत्ता इस बाहरी सत्ता के समक्ष घुटने टेकती जा रही है या उसके लिए मजबूर की जा रही हैं। 

जब कोई सत्ता मनुष्य को प्राप्त नैसर्गिक अधिकारों से वंचित करने लगे तो एक विवेकशील मनुष्य में इसका प्रतिकार करने का भाव जागता है और समांतर सत्ता का आविर्भाव होता है। अपने स्वतन्त्रता संग्राम के आन्दोलनों पर दृष्टिपात करें तो हमें उन कालखंडों में कई जगहों पर देशवासियों द्वारा समांतर सता चलाने की जानकारी मिलती है। वे लोग आज आजाद राष्ट्र के गौरव हैं तथा उनसे हमें प्रेरणा मिलती है, किसी अन्यायपूर्ण व्यवस्था के प्रतिकार करने की...जूझने की...लड़ने-भिड़ने की। पर, आज के परिप्रेक्ष्य में वैसी ही अन्यायपूर्ण व्यवस्था से जूझने वाली समांतर सत्ता को क्या हमारे लोकतंत्र में वही गौरव मिल पाता है?

संदीप मील की कहानियों से गुजरते हुए जो एक बात पकड़ में आती है कि इस कथाकार की मनुष्य-मात्र में आस्था है...तभी तो उसकी सार्वभौम सत्ता की रक्षा के लिये वे अपनी कहानी में अन्यायी व्यवस्था के खिलाफ समांतर सत्ता की कल्पना करते हैं, जो उत्पीड़क के सामने घुटने नहीं टेकता, बल्कि दृढ-संकल्पित होकर खुलेआम संघर्ष की घोषणा करता है।

जब सत्ता आवारा पूँजी के उड़नखटोले पर सवार होकर सभी संसाधनों पर अपना कब्ज़ा जमाना चाहती है तो परिणाम होता है – संसाधनों का अन्यायपूर्ण बंटवारा। यह नीति धीरे-धीरे मानव की गरिमा को क्षति पहुंचाने लगती है। अपनी गरिमा एवं अस्तित्व को विस्मृत करने को मजबूर होता मनुष्य संख्या में बदलता चला जाता है, जो पूंजीवादी सत्ता चाहती है। ऐसी ही परिस्थियों में समांतर सत्ता भीड़ में तब्दील होते मनुष्य की आवाज बनती है। 

‘कोकिलाशास्त्र’ कहानी के गाँव को देखें तो वह पूंजीवादी नगरीय व्यवस्था का एक तस्वीर पेश करती है। यह व्यवस्था सत्ता के सहयोग से फल-फूल रही है, जहां साधारण मनुष्य का स्वामित्व उसके अपने ही संसाधनों पर से ख़त्म किया जा रहा है तथा वे चीजें जो उन्हें सहज सुलभ थीं, पैसे पर मिलने लगती हैं या सरकार की लोक-कल्याणकारी योजनाओं के नाम पर।

ऐसा ही कुछ हाल था कहानी की नायिका सरिता के गाँव नीमागढ़ का, जहां वह ब्याह कर आयी थी। आप उस गाँव की जगह अपना गाँव, शहर, महानगर या देश को रखके भी सोच सकते हैं। बहुआयामी एवं बहुस्तरीय कहानियों की यही तो विशेषता होती है। गाँव की स्थिति देखिये – “हाँ, बिल्कुल बिना पेड़ का गांव था। करीब दस साल पहले गांव के दो फौजी रिटार्यड होकर आये और उन्होंने हिसाब लगाया कि एक पेड़ को पालने में दस हजार का खर्चा होता है। आमदनी कुछ नहीं। ऐसा करें कि सारे पेड़ों को काटकर बेच दिया जाये और उन पैसों को ब्याज पर दे दिया जायेगा तो हर महीने गांव के प्रत्येक परिवार को दो हजार रुपये ब्याज के मिलेंगे। पूरे गांव में घने पेड़ थे। सारे काटे गये और अब हर घर को दो हजार रुपये ब्याज के मिलते हैं।” ( जारी...) 

संकटों से उपजी कोकिलाशास्त्र : संदीप मील


किसी रचनाकार की कृतियों से परिचित होने के पश्चात पाठकों में एक सहज कुतूहल जगता है कि इस कृति के पीछे यानी इसकी सृजन-प्रक्रिया में रचनाकार किन परिस्थितियों से रूबरू था...उन हालातों ने उसे कैसे रचना के लिए प्रेरित किया। किसी मौलिक रचनाकार के पास इन सब सवालों के स्पष्ट जवाब होते हैं। ऐसे ही रचनाकार की रचना-प्रक्रिया को जानने का अवसर मिला...खुद रचनाकार की जुबानी। तो अवगत होते हैं...कहानीकार संदीप मील की लंबी कहानी 'कोकिलाशास्त्र' की रचना प्रक्रिया से। 

संकटों से उपजी कोकिलाशास्त्र



'कोकिलाशास्त्र' मेरी दूसरी लंबी कहानी थी, इससे पूर्व मैं 'दूजी मीरा' नामक एक लंबी कहानी लिख चुका था। इनके अलावा अभी तक मेरा छोटी कहानियाँ लिखने का ही अभ्यास था। इस स्तर पर कहानी की संरचना को व्यवस्थित गति से / धैर्यपूर्वक निभाना मेरे लिये एक चुनौती थी। लेकिन अभी तक मैंने यह तय नहीं किया था कि कोई बड़ी कहानी लिखकर इस चुनौती का मुकाबला करुं।

जब 'कोकिलाशास्त्र' के लिखने की शुरुआत हुई, तब मैं जयपुर में एक किराये के कमरे में रहता था। आर्थिक तंगी का दौर था, उस दिन जेब भी खाली थी और रसोई भी। यह तो मैंने बाद में तय किया था कि पैसा आते ही सबसे पहले पर्याप्त मात्र में आटा खरीद लिया जाए और मकान मालिक को किराया दे दिया जाए। उसके बाद का महीना खाली जेब के निकालने में संघर्ष की एक उम्मीद तो बनती ही है। कमरे में देखा तो सारी रद्दी पहले ही बेची जा चुकी थी। किताबें बेचकर आटा लाना कोई नई बात नहीं थी क्योंकि मेरी कुल चल–अचल संपत्ति किताबें ही हुआ करती थीं। वैसे भी एक रचनाकार के पास मिल ही क्या सकता है इनके सिवा।

अब दूसरे विकल्प के तौर पर यह बचा था कि किसी से उधार ले लिया जाये। इस पर बहुत देर तक चिंतन करने की जरूरत भी नहीं थी क्योंकि इस इलाके के जितने परिचित थे उन सबका पहले से ही कर्ज़दार था। वे इंतज़ार करते थे कि कब करार पर मेरी जेब में पैसे हों और उनका नसीब खुले।

जब कहीं कोई आशा ना दिखी, तब पिछले दिनों खरीदकर लाई पत्रिकाओं को पलटने लगा। हाँ, यह जरूर तय था कि शाम तक कुछ न कुछ व्यवस्था हो जायेगी। अगर कुछ भी नहीं हुआ, तो घर जाना पड़ेगा। वहाँ से आटा ले आयेंगे। पत्रिकाओं को पलटने के दौरान मेरी नज़र एक इश्तिहार पर पड़ी जो 'कथादेश' नामक पत्रिका में प्रकाशित था। इश्तिहार ऐसा था कि कोई विदेशी कम्पनी कथादेश के साथ मिलकर एक 'रहस्य–रोमांस कहानी प्रतियोगिता' का आयोजन कर रहे हैं। इस प्रतियोगिता की एक विशेष बात यह थी कि विजेताओं को पच्चीस हजार रुपये भी मिलने तय थे। यह बात मैं पहले बता चुका हूँ कि इस वक़्त मुझे पैसे की सख़्त ज़रूरत थी। इश्तिहार पढ़ते ही पत्रिका को बिस्तर के एक किनारे पर रखा और कहानी लिखना शुरु कर दिया।

चूंकि लिखने बैठ ही गया था, तो किसी किस्से की छोटी–सी डोर पकड़कर पार उतरना था। किस्से अपने पास जो थे, सारे के सारे स्मृतियों के खजाने में बंद थे। सबसे पहले यादों के दरवाज़े खोले, कई किस्सों ने अपनी उपस्थिति दर्ज़ कराई। लेकिन कोई किस्सा जम ही नहीं रहा था क्योंकि मेरे दिमाग पर प्रतियोगिता की एक शर्त सवार थी, किस्से में ‘रहस्य और रोमांस’ होना चाहिए। स्मृतियाँ लगातार कई ऐसे किस्से खोजकर ला रही थी जिनमें बहुतायत में ‘रहस्य’ थे। सिर्फ उन कहानियों में ‘रोमांस’ भरना था। मेरी सारी स्मृतियाँ लोक पर आधारित थी। यह काम बड़ा आसान होता है किसी भी रचनाकार के लिए कि वे लोक की कोई कहानी उठाकर उसके ढ़ाँचे में नये भावों की अभिव्यक्ति करे। ऐसा काफी लोगों ने किया भी है और बाद में उसी को अपना ‘सृजन’ घोषित किया जाता है ।

मैं ऐसा नहीं कर सकता था क्योंकि मेरे लिये कोई भी ‘रहस्य’ यथार्थ से दूर नहीं हो सकता। मुझे लगा कि जो मेरी स्मृतियों में ‘रहस्य’ के नाम पर जमा है, असल में वे चीजे़ं रहस्य ना होकर संसार का ‘अमूर्तीकरण’ है। इनका किसी प्रकार का तार्किक विवेचन नहीं किया जा सकता। तो फिर ये स्मृतियाँ आयी कहाँ से हैं ?

मुझे यह समझ में आया कि ये स्मृतियाँ मेरे बचपन की हैं, जब परिवार के लोग ऐसे ‘रहस्यों’ से मेरे दिमाग को व्यस्त कर देते थे जिन पर तर्क करना एक गुनाह माना जाता। इसलिये आप इन ‘रहस्यों’ को मानवीय स्वभाव पर पाबंदी लगाने के रूप में देख सकते हैं जो भय और भौतिक जगत के प्रति विरक्ति पैदा करते हों। यही इन रहस्यों की राजनीति है।

तो साब, मुझे ‘रहस्य और रोमांस’ पर एक कहानी लिखनी थी, जिससे कुछ पैसे मिलने थे और आप तो जानते ही हैं कि पैसों की मुझे सख़्त जरूरत रहती है। मैंने यह सोचना शुरु कर दिया था कि क्या कोई ‘वैज्ञानिक रहस्य’ भी होते हैं या फिर इन तथाकथित रहस्यों का कोई वैज्ञानिक अवलोकन किया जा सकता है। आप यह सोच रहे होंगे कि जो आदमी ज़िंदगी के हर मसले पर इतना उतावला हो, वह कहानी लिखने के दौरान इतना सोच कैसे सकता है ? आपका सवाल बिल्कुल ठीक है। लेकिन सच्चाई यह है कि मैं फुर्सत और सुकून में कहानी लिखने के दौरान ही होता हूँ। इस समय कोई चोर मेरा पूरा घर, जिस घर में आटा ना सही, किताबें तो होती हैं, उसको भी समेटकर ले जाये, तब भी कहानी को बीच में छोड़ना मुमकिन नहीं हो सकता।

एक स्मृति बार–बार चेतना के दरवाज़े पर दस्तक दे रही थी जो इतनी धुंधली थी कि उसका एक ही तार समझ में आ रहा था। वह तार यह था कि इंसान कभी जानवरों की भाषा समझता था। यह एक पुरानी लोक कथा का हिस्सा था जो सिर्फ इतनी लाइन में याद था। मुझे इस सूत्र में बहुत ताकत लगी। इस कहानी को जानने का प्रयास करना बहुत जरूरी था। गांव के दो–चार बुजुर्गों को फोन करके यह लोक कथा जाननी चाही लेकिन वे इससे अपरिचित थे। फिर मुझे अचानक यह याद आया कि किस्सा तो मेरी परनानी सुनाया करती थी और उस पीढ़ी का कोई बचा ही नहीं है। उसके बाद वाली पीढ़ी के कुछ लोग जरूर हैं लेकिन वे उम्र के इस पड़ाव पर हैं कि उनकी स्मृतियां साथ नहीं दे रही हैं।

इसी उधेड़बुन में शाम को जयपुर के रचनाकारों से मुलाकात हुई तो मालूम हुआ कि उस इश्तिहार की बात तो यहां के रचनाकारों की पूरी ज़मात में फैली हुई है। कई इस प्रतियोगिता के लिए कहानियाँ लिखने का मन बना चुके हैं और कइयों ने तो कथ्य भी तय कर लिए थे। वे अपने कथ्यों को ऐसे छुपा रहे थे जैसे कि उनकी जबां से एक लाइन फिसली कि सामने वाला उनके ज़हन में घुसकर पूरा किस्सा निकाल ले जायेगा। जबकि वे यह भी जानना चाह रहे थे बाकी लोगों के ख़्याल क्या हैं क्योंकि उन्हें ख़्याल टकराने का भी डर था। तो सारे लोग बातों को घूमा फिराकर कुछ तलाश कर रहे थे।

चूँकि मेरे पास कोई मुक़्कमल ख़्याल था ही नहीं तो चुराये जाने का सवाल ही नहींं उठता। वैसे भी, मेरा यकीन है कि वो ख़्याल किस काम का जो चोरी हो जाये। मैंने सबके साथ साझा किया लेकिन इस पर कोई सार्थक बात नहीं हो पाई क्योंकि एक तो मैं ख़ुद भी स्पष्ट नहीं था कि आख़िर यह ख़्याल है क्या। दूसरा यह था कि मेरे ज़हन में जो चल रहा था, वो अभी इस हालत में था कि उसे ठीक से बयां भी नहीं किया जा सकता।

रात को घर आ गया और आपको यह बताते हुये बड़ी खुशी हो रही है कि उस रोज़ यूँ ही बेमतलब एटीएम चैक किया, यह जानते हुये कि यह अपनी आदत के मुताबिक पन्द्रह रुपये बैलेंस होने की जानकारी देकर मेरा मज़ाक उड़ायेगा। लेकिन अफसोस तो तब हुआ जब उस एटीएम ने मुझे एक हज़ार रुपये बैलेंस बताया और खुशी-खुशी दो पाँच सौ के नोट पकड़ा दिये । जीवन में पहली बार इस मशीन के प्रति मोहब्बत जैसा कुछ अहसास हुआ। एटीएम से बाहर आया तो एक बार अमीरी जैसा भाव मन में आया क्योंकि जेब में एक हज़ार रुपये थे और ज़हन में एक बिना लिखी हुई कहानी थी।
मैं यह सोच रहा था कि ये पैसे कहाँ से आये होंगे ? अब ऐसा नेक दिल कोई दोस्त ही नहीं था जो कहते ही खाते में धन डाल दे, इसलिये दोस्तों से कहना ही बंद कर दिया था। ऐसा याद आ रहा था कि पिछले दिनों एक पत्रिका के लिये कहानी लिखी थी, हो न हो पैसे उसे ही भेजे हों।

रात गहरा चुकी थी और इस समय आटा अगर खरीद भी लिया जाता तो भी ज़ाहिर तौर पर मेरे से रोटियाँ तो बनने से रहीं। खाना होटल पर ही खाया। बिस्तर पर सोकर वापस कहानी बुनने में लग गया। यह तो दिमाग ने अब तय कर लिया था कि इसी कथ्य पर कहानी लिखनी है। भरा पेट बहुत जल्दी निर्णय ले पाता है, भूखे पेट की बजाय। मसला यहाँ फंस रहा था कि क्या इंसान ने कभी जानवरों की भाषा की डिकोडिंग की है ?

सुबह उठते ही इसी सवाल को लेकर विश्वविद्यालय जाकर एक विज्ञान के विद्यार्थी से सलाह मांगी। उसने यह बताया कि एक बार ऐसे ही किसी काम पर एक नोबल पुरस्कार मिला था। मेरे दिल को कुछ राहत मिली। वह विद्यार्थी यह वादा करके गया कि आप कैंटिन में दोपहर तक इंतज़ार कीजिए, मैं पूरी जानकारी लेकर आता हूँ ।

कैंटीन में कुछ साथी हरदम वहाँ बैठ रहते हैं और बेमतलब वाली गप्पें हाँकते रहते हैं जिनका भी कोई मतलब होता है। मैं आज उनके साथ नहीं बैठना चाहता था, कहानी के लिए एकांत की जरूरत महसूस की गई। कैंटीन के पीछे एक पानी की टंकी है जिसके बगल में पेड़ की गहरी छाँव रहती है। मैं वहीं बैठकर सोचने लगा। अब मुझे यह लग रहा था कि जिस समय में मैं जी रहा हूँ उसके क्या–क्या सवाल हैं ? हिंसा, भेदभाव, बेइंतिहा पर्यावरण के दोहन जैसे कई सवाल उभरे। सोचा कि इनमें से किसी एक को केंद्र बनाकर कहानी लिखी जायेगी लेकिन इन सबको अलग करके देखना मेरे लिये मुश्किल काम लग रहा था। सारे अंतर्गूंफित थे। यह तय किया गया कि किस्सा अपने हिसाब से ही चले तो ज्यादा बेहतर हैै उसे किन्हीं खाँचों में कैद कर दिया जायेगा तो वह किस्सा कम, भाषण ज्यादा हो जायेगा।

एक एक्टिविस्ट होेने के नाते यह भाषण वाला संकट भी कई कहानियों की रचना प्रक्रिया में आता रहता है। पता ही नहीं चलता कि कब कथाकार की जगह एक राजनीतिक कार्यकर्ता ने ले ली। यह अंतर्द्वंद्व बड़ा ही मुश्किल होता है लेकिन फायदेमंद भी होता है। मुश्किल इन अर्थों में होता है कि हर पल सर्तक रहना पड़ता है कि एक लेखक के तौर पर ही किरदारों से सलूक किया जाये, राजनीतिक कार्यकर्ता कई बार किरदारों से संवाद खुद बेालने लगता है। यह नहीं समझ में आता कि कौन–सा संवाद किरदार का है और कौन–सा लेखक के हमजाद एक्टिविस्ट का।

फायदेमंद इन अर्थों में होता है कि यह एक्टिविस्ट की चेतना हमेशा लेखक को राजनीतिक रूप से सही करती रहती है। जब भी लेखक फंतासी के भंवर में फंसकर कोई तर्कहीन बात करता है तो उसके अंदर का एक्टिविस्ट कॉलर पकड़कर धड़ाम से यथार्थ के धरातल पर पटक देता है। थोड़े दिनों बाद में ये एक दूसरे के दोस्त भी हो जाते हैं। जैसे कि लेखक कोई कहानी लिखते वक्त पेंच में फँस गया, वह तुरंत उस एक्टिविस्ट को याद करेगा। कुछ देर तो वह नखरे दिखायेगा कि नहीं चला न मेरे बिना काम। बहुत अकड़ते थे। अंततः वह सुलह कर लेता और लेखक को राजनीतिक तौर पर बजा लेता। ठीक ऐसे ही उस एक्टिविस्ट के लेखक भी काम आता है। सृजनात्मक स्तर पर इतना काम आता है कि उसके हर भाषण की भाषा लेखक ही होती है।

इतने में वह विज्ञान का विद्यार्थी आता दिखाई दिया जिसके हाथ में एक किताब थी । बहुत मोटी किताब थी जो नोबल पुरस्कार प्राप्त वैज्ञानिकों के शोधों के बारे में थी। उसने एक पन्ना मोड़ रखाा था, वहीं से किताब खोलकर मुझे पकड़ा दी।

वैज्ञानिक का नाम था कार्ल वॉन फ्रिस्च और वह ऑस्टिया का निवासी था। फ्रिस्च को सन् 1973 में नोबल पुरस्कार मिला था। उन्होंने मधुमक्खियों के संवेदी धारणा पर शोध किया था और इन संवेदी धारणाओं को उन्होंने डिकोड करके अर्थ निकाले थे जोे उनकी किताब 'द डांसिंग बीस' में दर्ज़ हैं। अब मुझे एक ठोस प्रमाण मिल गया था कि एक वैज्ञानिक ने मधुमक्खियों की भाषा समझी है तो इंसान ऐसा कर सकता है।

शाम को कमरे पर आते ही कहानी शुरु हो गई थी। कहानी में एक चुनौती पात्रों के नामकरण की आती है। मेरी कहानियों के पात्रों के नाम बड़े आर्कषक नहीं होते, ऐसा कुछ मित्रों का मानना है। मुझे भी लगता है कि जब भी किसी पात्र का नाम रखना होता है तो मेरे ज़हन से नामों की फेहरिस्त ही ग़ायब हो जाती है। कोशिश के बाद भी मित्रों की भाषा में कहुँ तो ‘कोई ढ़ंग का नाम’ ना मिलता है तो कोई भी सामान्य नाम रख दिया जाता है। इसलिये पात्रों के नामों में एक तरह का रुखापन जरूर रहता है लेकिन क्या करुँ मेरे आसपास कोई तड़क–भड़क वाले नाम के लोग ही नहीं रहते हैं, वही मुरारी, शकील, सरिता, फातिमा नामों को जानता हूँ।

तो कहानी की मुख्य किरकार जो थी उसका नाम सरिता रखा गया। आधी कहानी लिखने के बाद वो प्रतियोगिता वाली शर्त याद आयी कि कहानी में रोमांस और रहस्य होना चाहिए। अचानक कलम रुक गई और सोचने लगा कि रहस्य तो इसमें हो जायेगा लेकिन रोमांस नहीं हो पायेगा। तब एक बार कहानी को वापस पड़ने लगा, अहसास हुआ कि कहानी बन रही है अब इसके साथ रहस्य–रोमांस करना छोड़ देना चाहिए। और वैसे भी, आज आटा आ चुका था तो निर्णय लेने में बहुत देर नहीं लगी।

हालांकि यह कहानी उस प्रतियोगिता में भेजी गई थी जहां इसे कुछ नहीं मिल पाया जबकि उसी दौरान जयपुर के एक मित्र द्वारा लिखी गई कहानी पच्चीस हज़ार रुपये हासिल करने में सफल रही। अब यह कहानी प्रतियोगिता के दायरे से बाहर जा चुकी थी। दूसरे दिन दोपहर तक इसका पहला ख़ाका खींचा जा चुका था। फिर काफी दिनों तक इसके साथ कोई मुलाकात नहीं हुई, मैं दूसरे अफसानों में मशगूल हो गया। एक दिन 'बया' पत्रिका के संपादक ने कहानी माँगी तो याद आई कि घर में एक कहानी तो पड़ी है। उस दिन कहानी को छपने के लिए भेजने से पूर्व एक बार पढ़ा तो अंत में इत्मिनान की सांस ली कि इतने दिनों बाद भी मुझे इसमें कुछ भी जोड़ने–घटाने की जरूरत महसूस नहीं हुई। बस, इतना लगा कि इसने मेरे अंदर कुछ जगह खाली कर दी है, जहाँ अब बरसात का पानी ठहरता है जिसमें बारह मास पक्षी बोलते हैं और मैं चुपचाप कलम लिए उनकी भाषा को डिकोड करता रहता हूँ। यही रोजग़ार चल रहा है।

संपर्क :
संदीप मील
मोबाइल – 09636036561
ईमेल –skmeel@gmail.com
ग्रा. पो. – पोसानी, 
वाया – कूदन, 
जिला – सीकर, 
राजस्थान - 302031

संदीप मील की कहानी ' कोकिलाशास्त्र '


पिछली बार कब आपने कोई कहानी कहानीकार की ज़ुबानी सुनी है? अगर सुनी है तो क्या उनकी कहानी में 'किस्सागोई' अथवा 'कहन' अस्तित्व में थी। मुझसे अगर पूछेंगे तो कहूंगा―हां, मैंने सुनी है...वो भी पहली बार, लोकविमर्श के बांदा शिविर में संदीप मील की कहानी 'कोकिलाशास्त्र' का उनके द्वारा प्रवाहमय वाचन ! यह शिविर की प्रमुख उपलब्धियों में थी। अब आगे आप खुद सोचिये–एक पाठक होने के नाते आप क्या करेंगे? आप ठीक सोच रहे हैं, वही मैंने भी किया। तुरंत 'लोकोदय प्रकाशन' के स्टॉल से संदीप मील का कहानी-संग्रह 'कोकिलाशास्त्र' खरीदा। पटना में उनका पहला संग्रह 'दूजी मीरा' भी उपलब्ध हो गया जो 'ज्योतिपर्व प्रकाशन', गाजियाबाद से प्रकाशित है।

हमारे यहां की कहानियों में किस्सागोई प्राचीन काल से चली आ रही है। विष्णु शर्मा का 'पंचतंत्र', देवकीनंदन खत्री की 'चंद्रकांता संतति' एवं कथा-सम्राट प्रेमचन्द, अमरकांत आदि की कहानियों से होती हुई यह धीरे-धीरे कमजोर पड़ती जा रही है। ऐसे में संदीप मील अपने यहाँ के ही महान कथाकार विजयदान देथा की तरह कहानियों में अपनी बोली एवं किस्सागोई के अंदाज़ में रोचकता एवं कुतूहल बनाये रखते हुए अपनी जमीन से जुड़ी जीवंत कहानियां सामने लाते हैं जिनमें समय की विद्रूपता है तो वैचारिक प्रतिबद्धता भी...टूटती हुई रूढियां हैं तो भविष्य के संकटों की आहट भी साफ-साफ सुनाई देती है। ये क्या ! मैं ही कहता जा रहा हूं। आप खुद ही पढिये मील की कहानी 'कोकिलाशास्त्र' और अपने अनुभव बताइये क्योंकि कहानी अब बाकी बातें कहेगी




न चिड़ियों की आवाज रही और न हवा की सनसनाहट। अब न फूल खिलते हैं और न ही आंधियों में पीपल की टहनियां झुककर जमीन को सलाम करती हैं। लोगों के कानों को मोर की आवाज़ और पपीहे की किलकारी में फर्क भी पता नहीं रहा। यह भी मालूम नहीं कि वह आवाज़ किस जानवर की है लेकिन जब रात के करीब एक बजे गांव के पूर्व में एक पक्षी जैसी आवाज सुनती है तो पूरा गांव आवाज़ की दिशा में दौड़ पड़ता। पक्षी की आवाज़ का अंदाजा भी इसलिये लगाया जाता है क्योंकि यह आवाज़ इंसानों जैसी नहीं थी। गांव की सीमा पर लोगों की भीड़ लग जाती लेकिन पक्षी का अता-पता नहीं लगता। कहां गया होगा वह आवाज़ निकालने वाला ? 

आप सोच रहे होगें कि किसी पेड़ पर बैठ गया होगा, घने बरगद की टहनियों में छुप गया होगा ? लेकिन ऐसा किसी भी कीमत पर संभव नहीं था क्योंकि बरगद की तो छोड़िये, उस गांव में झाड़ी तक का दरख़्त नहीं था। हां, बिल्कुल बिना पेड़ का गांव था। करीब दस साल पहले गांव के दो फौजी रिटार्यड होकर आये और उन्होंने हिसाब लगाया कि एक पेड़ को पालने में दस हजार का खर्चा होता है। आमदनी कुछ नहीं। ऐसा करें कि सारे पेड़ों को काटकर बेच दिया जाये और उन पैसों को ब्याज पर दे दिया जायेगा तो हर महीने गांव के प्रत्येक परिवार को दो हजार रुपये ब्याज के मिलेंगे। पूरे गांव में घने पेड़ थे। सारे काटे गये और अब हर घर को दो हजार रुपये ब्याज के मिलते हैं। 

जब पेड़ नहीं रहे तो पक्षियों को इंसानों के घरों में कौन रहने देता ? हालांकि उस समय कुछ कबूतर के बच्चों ने इंसानों के घरों में घुसकर शरण जरुर ली थी लेकिन जब घरवालों ने देखा तो झाड़ू लेकर भगा दिया और इस प्रकार गांव से अंतिम परिंदों की भी विदाई हो गई। गावं के लोग जब किसी रिश्तेदारी में बाहर जाते हैं तो बड़े चाव से पक्षियों को देखते हैं। जो बच्चे गांव से बाहर नहीं गये, वे सिर्फ किताबों में तोता-मैना देख पाते हैं। 

तो साहब, रात को एक बजे वह आवाज़ सुनते ही गांव के मर्द-औरत सब के सब दौड़ पड़ते पूर्व की ओर। गांव के अंतिम छोर पर कानाराम का मकान था, वहां आकर भीड़ जमा हो जाती। इससे आगे अथाह रेगिस्तान शुरु हो जाता है। कौन जाये उन रेत के पहाड़ों पर इन अंधेरी रातों में। पूर्णिमा के दिन कुछ लोगों ने रेगिस्तान में जाने की कोशिश की लेकिन मुश्किल से दो किलोमीटर गये होंगे कि फिर उसी आवाज़ ने दस्तक दे दी और लोग दबे पांव वापस गांव की ओर...। गांव वालों के सामने सबसे बड़ा सवाल तो यह था कि यह आवाज़ किस पक्षी की है और वह इतनी तेजी से चला कहां जाता है? किसी ने नहीं देखा लेकिन लोग अपने अंदाज से उसकी रुपरेखा बना लेते। 

बसंत का कहना है कि भैंस जितना पड़ा पक्षी है और प्लेन जितनी तीव्रता से उड़ता है। एक रात उसे छत पर सोते हुये थोड़ी-सी झलक मिली थी। जबकि प्रमोद उसकी बात को सीरे से नकारता है क्योंकि उसका मानना था कि सांप जैसा कोई जीव है और आवाज़ देकर बिल में घुस जाता है। कई लोग जाहिर नहीं करते अपनी राय मगर उनकी भी एक छवि है इस अलबेले जीव की। सुमित्रा जो अतिंम बार अपने पीहर में पक्षियों को देखकर आई थी उसके दिमाग में है कि यह अलबेला हरियल जैसा होगा और बोलते ही भागकर किसी औरत की गोद में छुप जाता होगा। जब उसने यह शंका अपने पति को बताई तो उसने गांव वालों से सलाह-मशविरा करके पूरे गांव के हर घर के हर कमरे की तलाशी ली गई। लेकिन न हरियल मिली, न हरियल का कोई निशान। 

कानाराम से भी सारा गांव पूछता है कि यार, तेरे घर के पास जब बोले है तो तेरे को तो मालूम होना ही चाहिये। 

‘‘बोले तो मेरे घर के आस-पास ही है लेकिन उठकर देखता हूं तो नज़र नहीं आता। कई बार रात को जगकर भी देख लिया। पकड़ में नहीं आ रहा है।’’ कानाराम भी निराश ही था। 

पहले तो कोई उसे रास्ता तक नहीं पूछता था लेकिन बेटे की शादी के बाद हर कोई उसे पूछने लगा। एक कारण तो यह था कि बहू बला की खूबसुरत आयी थी। घूंघट के अंदर से भी चांद की तरह चमकती दिखाई देती। औरतें कहती हैं कि काना के छोरा तो घरवाली को देखकर ही जी लेगा। बुड्ढ़े बुजुर्ग भी कानाराम से मजाक के लहजे में कहते, ‘‘भाया, इस माटी की ओर छोरी है तो हम भी बुढ़ापा खराब करने को तैयार हैं ?’’

कानाराम का भी एक ही रटा-रटाया जवाब था, ‘‘इस माटी की तो यही बनी थी। अब बुढ़ापा बिगड़ने का मुझे तो कोई रास्ता नहीं दिख रहा।’’ 

बहू के कारण कानाराम की पूछ हुई लेकिन बहू के आने के कुछ समय बाद ही यह आवाज़ शुरु हुई और तब से कानाराम की बात को प्रमाणिक माना जाने लगा। गांव की सीमा पर घर उसी का था और आवाज़ भी वहीं से आ रही थी। 

एक दिन गांव वालों ने तय किया कि शाम के समय से ही लालटनें लेकर कानाराम के घर के बगल में डेरा डाल लेते हैं, आवाज़ आयेगी तो देखेंगे कि आखिर क्या बला है ? सारे गांव में इसकी जानकारी दे दी गई। बसंत ने बांस वाली लाठी ले ली थी कि देखते ही एक में ही आवाज़ बंद कर देगा। पक्षी हो या फिर कोई बला। उधर से प्रमोद ने अपने दादा की पुरानी बंदूक निकाल ली और उसमें बजरी के छर्रे भरकर चलाकर भी चैक कर लिया था। वह सोच रहा था कि बसंत की लाठी से पहले उसके दादा की बंदूक आवाज़ की बोलती बंद कर देगी। सारा गांव शाम को जल्दी ही खाना बना चुका था और दिन में लालटनों में तेल और बाती डालकर तैयार कर दिया गया था। 

यूं तो हर कोई बहादुर बन रहा था लेकिन सबके मन में यह डर भी बैठा हुआ था कि कहीं आवाज़ वाला अलबेला भैंस जितना बड़ा हुआ और प्लेन जितना तेज उड़ता होगा तो क्या किया जायेगा ? लेकिन अब तो गांव में अकेला रहना भी ठीक नहीं था। कहीं अलबेला इधर आ जायेगा तो क्या होगा ? करीब पांच बजे सारा गांव खाना खाकर चौक में आ गया था। बच्चे, बुड्ढ़े और औरतें घर में अकेले कैसे रह सकते थे। सभी आ गये। तभी बसंत ने तेज आवाज़ में कहा, ‘‘हर कोई लाठी, कुल्हाड़ी आदि हथियार ले लो। पता नहीं अलबेला क्या हो ?’’

हालांकि बसंत के कहने की ही देर थी लोगों ने पहले से ही हथियार छुपा रखे थे, तुरंत बाहर निकाल लिये। अब प्रमोद उससे पीछे कैसे रह सकता था, उसने कहा, ‘‘सब अपनी-अपनी लालटनों को भी जलाकर देखो एक बार।’’

लोगों ने दिन के उजाले में ही लालटनें जलाकर चैक की। सारी जल रही थीं क्योंकि वे पहले से ही कई बार चैक करके लाई गईं थीं। हो गये रवाना, गावं की सीमा की तरफ कह लीजिये या फिर कानाराम के घर की तरफ। ऐसा लग रहा था कि पूरा गांव उजड़कर कहीं पलायन कर रहा हो। हाथों में हथियार, दिल में जोश और जहन में डर वाली यह भीड़ आज अलबेले को देखने के लिये जा रही थी। औरतों की गोद में नन्हे बच्चे अपने रोने की आवाज़ से ही भीड़ के ज़िन्दा होने का सबूत दे रहे थे। बाकी तो सारे लोग सहमे से जा रहे थे। 

ऐसा नहीं था कि उस गांव में फिर किसी ने पेड़ लगाने की सोची भी नहीं होगी। कई लोगों ने खूब कोशिश की लेकिन सारा गांव उसे पहले तो समझाता कि देख भई, दस हजार रुपये क्यों बरबाद कर रहा है, इससे अच्छा तो यह है कि कुछ बाॅण्ड खरीद लो। या तो वह इस समझाने से मान जाता और अगर नहीं मानता तो गांव वाले तुरंत धमकी देते कि तेरे घर के दो हजार बंद कर दिये जायेंगे। इस धमकी को लांघने की कोशिश किसी ने नहीं की। पिछले दस सालों में भेड़-बकरी गांव में आधे हो गये हैं। बरसात के समय हरी घास मिल जाती है लेकिन बचे आठ महिनों की मुश्किल नहीं कटती है। खरीदकर चारा डालने से सस्ता तो यह है कि शहर से सूखे दूध का डिब्बा ले आते हैं और आजकल अधिकांश घर सूखे दूध पर ही जीते हैं। 

कानाराम भी एक दिन बकरी बेचने के लिये कसाई को बुलवा लिया था लेकिन बहू ने मनाकर दिया। वह बोली, ‘‘आपके ज्यादा ही भूख आ गई है तो मैं कुछ काम कर लूंगी लेकिन चाय घर में बकरी के दूध की ही बनेगी।’’

पहले तो कानाराम को बहू की यह बात अजीब लगी लेकिन फिर उसे भी बकरी के दूध की चाय का स्वाद याद आ गया। 

सूर्य अस्त होने से पहले तो गांव की सीमा पर खूब आवाजें आ रहीं थीं लेकिन अंधेरा होते ही लोगों ने लब बंद करना शुरु कर दिया। सारे लोग एक-दूसरे से चिपककर बैठ रहे थे। बसंत ने खड़े होकर कहा, ‘‘डरने की बात नहीं है। अलबेला गांव में घुसकर भी तो खा सकता है। सारा गांव है, पछाड़ लेंगे।’’ उसकी बात से लोगों में कुछ विश्वास का संचार हुआ कि तभी प्रमोद ने भी ऐलान कर दिया, ‘‘बंदूक देख रहे हो, लग जाती है तो पत्थर में भी छेद कर सकती है।’’

‘‘अबे! बजरी के छर्रे से कभी पत्थर में छेद हुआ है। मूर्ख बनाता है।’’ बसंत से रहा नहीं गया। 

‘‘ले तेरे को अभी बताता हूं।’’ प्रमोद उसकी तरफ लपका कि लोगों ने पकड़ लिया। 

फिर बुजुर्गों ने समझाया, ‘‘यह लड़ाई का वक्त नहीं है, पूरे गांव पर संकट है। मिलकर लड़ना होगा और प्रमोद की बंदूक से पत्थर में छेद तो नहीं हो सकता लेकिन जानवर तो मर ही जायेगा।’’ 

औरतों ने डर को दूर करने के लिये कुछ बातें शुरु कर दी क्योंकि गांव वालों की हिदायत थी कि दस बजे के बाद कोई आवाज़ नहीं निकालेगा। हर इंसान चैकन्ना रहेगा और चारों तरफ नजरें रखो। लालटनें जल रही थीं और सहमे चेहरे दिल बहलाने को कुछ होठ हिला रहे थे। क्या बात की जाये ऐसी स्थिति में। कोई बात उपज ही नहीं रही थी, फिर भी कुछ बोलने से ध्यान बंटता है और डर कम होता है। इसी सोच से लोग बिना मतलब की बातें ही कर रहे थे। पानी की तीन टंकियां रखी गईं थीं और लालटनों में डालने के लिये तेल की दो टंकियां भी थीं। 

औरतों के पास बात करने का एक ही मजेदार टाॅपिक था और वह थी कानाराम के बेटी की बहू सरिता। वह भी अपनी सास के साथ आ गई थी। जब सारा गांव सीमा पर था तो सरिता घर में अकेली कैसे रह सकती थी। औरतें उसके हुस्न की तारीफ करती थक नहीं रही थीं। अब नई बहू थी तो सरिता तो कम ही बोल रही थी, गर्दन हिलाकर या मुस्कान से काम निकालती। उसकी सास शारदा बड़ा सीना चौड़ा करके बहू की तारीफ कर रही थी और चैलेंज भी कर रही थी कि इतनी सुन्दर बहू सारे जिले में नहीं आयी होगी। गांव की औरतों को मानना भी पड़ रहा था क्योंकि उनके पास इस बात को काटने का कोई उदाहरण नहीं था। हालांकि अधिकांश औरतें मन ही मन में जल भी रही थीं। शारदा ने उन्हें यह भी बताया कि एक दिन उसका पति कसाई को बकरी देने के लिये ले आया था लेकिन सरिता ने मना कर दिया। वह बकरी के दूध की चाय ही पीती है। यहां तक तो ठीक था लेकिन जब शारदा ने जोश में आकर यह कहा, ‘‘सरिता अगली बारिश में नीम भी लगायेगी आंगन में, गांव वाले चाहे तो दो हजार बंद कर दें।’’

ज्यों ही ये शब्द शारदा के मुंह से निकले तो औरतों की सांस गले में आ गई। एक के मुहं से तो अचानक ‘ओ...’ निकल गया। 

पास में बैठे मर्द यह ‘ओ....’ सुनते ही तुरंत लाठी-कुल्हाड़ी लेकर खड़े हो गये, ‘‘किधर है.....किधर है....।’’

‘‘अरे भाई, यह अलबेले के बोली नहीं है। रोज सुनते हो, भूल गये।’’ कानाराम ने हंसते हुये कहा। 

सारे लोग तुरंत शांत हो गये। उन्हें कानाराम की बात बिल्कुल लाख टके की लगी। वैसे भी आजकल उसकी बात का खूब सम्मान किया जाता है। लगभग छोटे बच्चे सो गये थे और जो कुछ समझदार थे वे डर के मारे मांओं की गोद में दुबककर सोने का नाटक करने लगे। 

उधर मर्दों के खेमे में भी कुछ खास बातें नहीं हो रही थी। कुछ नौजवान सरिता के पति धर्मेंद्र से मजाक कर रहे थे। उसकी पत्नी को लेकर छोरे बड़े ही उत्साहित थे। कोई पूछ रहा था कि चेहरा कैसा है, कोई गर्दन का नाप और लम्बाई जानने की कोशिश में था। जो धर्मेंद्र के ज्यादा नजदीक थे वे कमर तक या उससे नीचे की जानकारियां भी लेने की फिराक में थे। लेकिन वह कोई भी उत्तर नहीं दे रहा था। बिल्कुल डरा हुआ-सा लग रहा था। कुछ छोरों ने सोचा कि शायद अलबेले के कारण डर रहा है। सच्चाई यह है कि वह शादी के बाद यूं ही रहने लगा है। कई दोस्तों ने पूछा कि यार, इतनी सुन्दर पत्नी के बाद भी उदास रहोगे तो कैसे काम चलेगा। वह किसी को अपना दुख नहीं बता सका। 

अब रात के दस बजने वाले थे और उसी के साथ शुरु होना था चुप्पी का वह दौर जो अंदाज ही नहीं था कि कब टूटेगा। जब दस बजने में करीब दस मिनट रहे तब प्रमोद ने ऐलान कर दिया कि सारे लोग पानी पीकर तैयार हो जायें। अलबेला बोलेगा तो एक बजे लेकिन हमें अभी से उसकी निगरानी रखनी होगी। बसंत भी कहां पीछे रहने वाला था, उसने भी लालटनों का तेल संभालने और हथियारों को हाथ के नीचे करने की सलाह दे डाली। 

लालटनों में तेल शाम को ही भरा गया था लेकिन जो बूंदे इस दौरान जली, वे भी दोबारा भर दी गईं। अपने लाठी-कुल्हाड़ी तो लोग पहले से ही हाथ में लिये हुये थे। पानी भी बिना प्यास के ही दो-दो घूंट सबने पिया क्योंकि डर के मारे लोगों के कंठ सूख रहे थे। और यह लो बज गये दस!

किसी ने एक आवाज दी, ‘‘तैयार....।’’

चारों और खामोशी थी। हवा चल रही थी या नहीं, इसका तो पता नहीं क्योंकि इस गांव में दरख़्त तो थे नहीं कि पत्ते हिलें और लोग हवा की तीव्रता का अंदाज़ा लगायें। वैसे सबको गर्मी लग रही थी। डर के कारण या हवा बंद थी, कौन जाने! 

लालटेन की रौशनी में अंधेरी रात में सैंकड़ों सिर नज़र आ रहे थे और कुछ लोगों की अंधरे में चमकती हुई आंखें भी दिखाई दे रही थी। कभी किसी औरत की चूड़ी खनकने की आहट होती तो लोगों की सांसे थम-सी जातीं। पूरे परिवेश पर अलबेला छाया हुआ था। ज्यों-ज्यों घड़ी की सूईयां घूम रही थी, लोगों की सांसें भी तेज हो रही थी। सब पसीने से तर-ब-तर। कंठ सबके सूख गये थे लेकिन पहले जाकर टंकी से पानी पीने की हिम्मत किसी की नहीं हो रही थी। होठों पर जीभ फेरकर कुछ नमी लेने की कोशिश कर रहे थे। 

तभी एक बच्चे के रोने की आवाज़ ने इस खामोशी को तोड़ा। उसे शायद भूख लगी थी। बच्चे के मुंह से एक किलकारी ही निकली थी कि तुरंत उसकी मां ने मुंह में स्तन दे दिया। वह दूध पीने लगा और लोग अपनी धड़कनों को ठिकाने पर लाने की बेमतलब कोशिश कर रहे थे क्योंकि आज ये धड़कने ठिकाना छोड़ चुकी थीं। 

अब करीब ग्यारह बज चुके थे। लोगों का गला और धीरज जवाब दे चुका था। तभी प्रमोद ने अगला आदेश दिया, ‘‘पांच मिनट में सब लोग पानी पीकर वापस अपने स्थान पर आ जायें। हो-हल्ला नहीं करना है।’’

‘‘सारे लोग एक साथ पानी नहीं पीयें। कुछ लोग रखवाली पर रहें।’’ बसंत ने अगला आदेश देना जरुरी समझा। 

औरतें और मर्द पानी पीने के लिये उठे। वे कुछ बातें भी करना चाहते थे लेकिन दिल और ज़बान दोनों साथ नहीं दे रहे थे। फिर भी हल्का होने के लिये कुछ खुसर-पुसर शुरु कर दी। पानी गले से नीचे उतरा तो गला तो गिला हुआ लेकिन दिल का चैन तो उस अलबेले की आवाज़ के नीचे दबा था। कुछ औरतों ने अपने बच्चों के होठ भी गिले किये। लोग वापस आकर अपने स्थान पर जम गये थे। वैसे ही सन्नाटा छा गया था। कुछ लोग आंखों के इशारों से कुछ बातें जरुर कर रहे थे। इस पूरे हुजूम में सरिता के चेहरे पर किसी प्रकार की सिकन नहीं थी। हालांकि प्रसन्नता का भाव फिर भी नहीं झलक रहा था। 

आज वक्त जैसे रुक-सा गया हो। एक मिनट सदियों जितनी लम्बी हो रही है। बुजुर्गों को थकान महसूस हो रही थी और वे लोगों की नज़रें चुराकर झपकियां मार लेते क्योंकि उनका मानना था कि अब जीवन के अंतिम छोर पर अलबेला से डरने का मतलब नहीं है, यूं ही किसी रोज चुपके से चले जाना है। गांव वालों के साथ आने का इतना-सा मकसद था कि घर में रुक गये और बीमार हो गये तो कोई सम्भालने वाला ही नहीं होगा। अलबेला पकड़ में आ जायेगा तो उसका परिवार भी सुरक्षित रहेगा। 

कानाराम को भी डर नहीं लग रहा था क्योंकि अलबेला रोज़ ही उसके घर के बगल में बोलता है। आज तक इंसान की तो छोड़िये, बकरी के बच्चे तक का नुकसान नहीं किया। फिर डर किस बात का! उसे तो जब भी अलबेला बोलता है तो ऐसा लगता है कि यह आवाज़ बहुत जानी पहचानी है और उसके दिल के करीब है। फिर वह सोचता है कि उसने तो करीबन सात सालों से किसी पक्षी को बहुत नज़दीक से देखा तक नहीं है, आवाज़ दिल के करीब कैसे हो सकती है ? यूं ही इसे बेहुदा ख्याल मानकर नज़रअंदाज़ कर देता है। 

अंतिम बार वह जब शहर गया था तो वहां पर एक मोर देखा था। बहुत खूबसूरत था। वैस ही था जैसी उसने अपने घर में मोर की तस्वीर लगा रखी थी। काफी देर तक कानाराम मोर को निहारता रहा, इतनी देर तक निहारा कि गांव जाने वाली बस निकल गई और फिर शहर से जीप किराये करके आना पड़ा। जीप वाले को घर आकर कानाराम ने पांच सौ रुपये किराये के दिये तो सारा घर उस पर पिल पड़ा और तभी से उसका शहर जाना बंद कर दिया गया। खरीददारी अधिकांश तो गांव में ही हो जाती थी लेकिन कुछ सामान के लिये शहर जाना होता था। उस दिन के बाद धर्मेंद्र शहर की खरीददारी के लिये जाने लगा और कानाराम ने सात साल से कोई पक्षी नहीं देखा। वह तो चाहता था कि यह अलबेला कैसा भी हो, एक बार सामने आये तो कम से कम पक्षी को तो देखा जा सके। 

पता नहीं ऐसा भी क्या हुआ कि पेड़ काटे जाने के दो तीन साल बाद बारिश में आने वाले पतंगें भी बंद हो गये। आसमान में कभी कुछ उड़ता हुआ नहीं देखा गया सिवाय प्लेन और कुछ पोलथिनों के। आप गांव का नाम भी पूछ सकते हैं जो अभी तक नहीं बताया गया है। गांव का नाम नीमागढ़ था और यह नाम भी इसलिये रखा गया था कि किसी जमाने में यहां बहुतायत में नीम के विशाल पेड़ थे। अब नीम की एक पत्ती भी नहीं है यहां। गांव के नाम में और पुराने लोगों की यादों में नीम है। 

यह लो ! बारह भी बज गये और आवाज़ नहीं आयी। कुछ लोगों ने घर चलने की बात कही तो खामोशी फिर टूटी। कई लोग इसके पक्ष में थे कि थक चुके हैं, घर चलना ही मुनासिब है। बहुत से लोगों ने कहा कि जब रात बर्बाद कर ही चुके हैं तो अब एक बजे का इंतजार करना ही चाहिये। रोज-रोज का झंझट हो गया है, जो बला है आज देख लेंगे। 

सरिता बैठी-बैठी थक चुकी थी और पेशाब भी लग चुका था। हालांकि पेशाब तो बहुत से मर्दों और औरतों को लगा था लेकिन डर के मारे किसी की अकेले जाने की हिम्मत नहीं हो रही थी। पेशाब दबाकर बैठे थे सारे लोग। सरिता अकेली ही पेशाब करने के लिये भीड़ की उत्तर दिशा में निकली। उसकी सास को एक बार तो अजीब-सा लगा की बहू सबके सामने अकेले ही पेशाब करने जा रही है। लेकिन फिर उसे फक्र हुआ कि बहू इतनी निडर है कि जिस समये तीसमार खां भी पेशाब दबाये बैठे हैं, वह अकेली जा रही है। 

‘‘गिलगिलगिलगिलगिलगिल...........।’’

‘‘अरे...बोल गया अलबेला...देखो किधर है।’’ भीड़ में आवाज़ सुनते ही भगदड़ मच गई थी। लोग इधर-उधर अलबेला को खोजने की बजाय एक दूसरे से चिपक रहे थे। सरिता भी भागकर भीड़ में शामिल हो गई। प्रमोद ने चुपके से बंदूक फैंक दी थी। बसंत की लाठी भी मालूम नहीं कहां गायब हो गई! लोगों की हड़बड़ाहट से लालटनों को ठोकरें लगीं और वे बूझ गईं। स्याह अंधेरा था और भयानक चुप्पी थी। लोगों की सांसों की आवाजें भी बगल वाले को नहीं सुन रही थीं। 

रातभर लोग वैसे ही दुबके रहे। इस अंधेरे में न घर जा सकते थे और अलबेले को पकड़ने का इरादा तो लोगों के मन से गायब भी हो चुका था। पेशाब सरिता के अलावा लगभग लोगों ने जहां बैठे थे वहीं किया। अचानक किसी के खांसने आवाज़ आ जाती तो लोगों की जान निकल जाती। हालांकि खांसने वाला, खांसी को खूब दबाता लेकिन जब बात काबू में नहीं रहती तो अंततः दो-चार आवाजें निकल ही जातीं। सरिता घर आकर मजे से सो गई थी। 

भोर को जब कुछ उजास हुआ तो लोग अपने घरों की तरफ रवाना हुये। शाम को जो भीड़ दुनिया फतह करने निकली थी, सुबह कुछ हारे हुये सिपाहियों की तरह मुंह लटकाये आ रही थी। दोपहर तक गांव में सन्नाटा रहा। सारा गांव सो रहा था क्योंकि रात की नींद और थकान से लोग टूट चुके थे। इस वाकये के बाद गांव के लोग शाम होते ही अपने-अपने घरों में कुंडी लगाकर सो जाते हैं और उसी वक्त करीब एक बजे अलबेले की वही आवाज़ आती है। डर के मारे बिस्तर में दुबके लोगों की फिर कभी हिम्मत नहीं हुई की अलबेले को देखा या पकड़ा जाये। दिन में भी किसी चर्चा में उसका जिक्र तक नहीं करते। अब कानाराम को भी कोई पूछता नहीं है कि आपके घर के ही पास बोलता है, आपने तो देखा ही होगा। कैसा है अलबेला ? 

कानाराम की उदासी भी लगातार बढ़ने लगी है। एक तो लोगों में पूछ कम होने के कारण और दूसरा बेटे की वजह से। वैसे धर्मेंद्र को हुआ कुछ नहीं है लेकिन वह शादी के बाद से बिल्कुल खामोश हो गया है। दुनिया से विरक्ति का भाव छा गया है उसके जहन में। न किसी काम में मन लगता है और न कभी हंसता-खेलता है। कानाराम ने कई बार पूछने की कोशिश की, ‘‘बहू से नहीं बनती है क्या ?’’

‘‘नहीं, ऐसी कोई बात नहीं है।’’ धर्मेंद्र का एक ही जवाब होता था। 

गांव में एक नया बवाल भी हो गया है। उस दिन जब अलबेले के लिये गांव की सीमा पर डेरा डाला गया था तो शारदा ने जोश में आकर कह दिया था ना, ‘‘सरिता कहती है कि इस बारिश में आंगन में एक नीम जरुर लगायेंगे। चाहे दो हजार बंद कर दें गांव वाले।’’ 

यह बात उस दिन तो डर के माहौल के कारण औरतों के खेमे से मर्दों के पाले में जा नहीं पाई थी। कई दिनों तक अलबेले का डर इतना था कि लोगों के पास एक-दूसरे की बातें करने का साहस ही नहीं रहा। अब यह बात मर्दों के पाले में भी चली गई। फिर क्या था, सारे गांव में चर्चा होने लगी और सरिता पर तरह-तरह के ताने कसे गये। 

गांव के प्रमुख लोग इकट्ठा होकर कानाराम के घर गये। दिन के करीब बारह बजे का समय रहा होगा। ये लोग उस रात के बाद गांव की सीमा की तरफ पहली बार जा रहे थे, इसलिये मन में अलबेले का डर भी किसी न किसी कोने से बार-बार बाहर निकलने की कोशिश कर रहा था। लेकिन गांव वाले जानते हैं कि यह जानवर नियम का इतना पक्का है कि दिन में नहीं बालेगा। 

कानाराम दरवाजे में बैठा चिलम पी रहा था। गांव के पटेलों का आते देखकर उसने सहज ही अंदाजा लगा लिया था कि कोई न कोई खतरा जरुर है। उसे तो यह भी जानकारी नहीं थी कि शारदा ने औरतों को नीम वाली बात बता दी है। 

‘‘राम-राम काना।’’ गोविंद पटेल ने शुरुआत की। 

कानाराम ने भी अभिवादन करके पटेलों को बैठने के लिये खाट दी। फिर उसने सरिता को आवाज दी, ‘‘बेटा, चाय बनाना। दूध वाली।’’

पटेलों ने राजी-खुशी के सामाचार पूछकर मुद्दे की बात शुरु की। उन्होंने समझाया कि काना गांव के नियमों को तो मानना ही पड़ेगा। किसी ने दस सालों में एक गुलाब नहीं लगाया और तू नीम लगाने की सोच रहा है। भई, एक नीम को पालने में दस हजार रुपये खर्च हो जाते हैं। तेरे कौन-सी आसामी लुटती है। किसी तरह अपना गुजर-बसर कर रहा है। बता, नीम से क्या फायदा होगा?

कानाराम पहले तो चुप रहा। फिर उसने कहा, ‘‘सरिता की जिद है। हमने शादी के बाद उसकी कोई बात टाली नहीं।’’

‘‘सरिता’’ का नाम सुनते ही सारे पंचों को जैसे सौ वाॅल्ट का झटका लगा हो। उन्होंने एक-दूसरे की तरफ आश्चर्यजनक भाव से देखा। उन्हें तो यह विश्वास ही नहीं हो रहा था कि इस गांव का कोई मर्द, वह भी रिश्ते में ससुर लगता हो, औरत के बारे में ऐसी बात कह सकता था। 

गोविन्द ने गहरी सांस ली और एक फिर समझाया, ‘‘देख काना, ठीक है तू बहू की बात नहीं टालता है लेकिन इस मामले में तेरा ही नुकसान है। यार, तू मर्द है और घर की सारी जिम्मेदारी तेरी है। औरतों को सर पर नहीं चढ़ाया जाता है।’’

सरिता चाय लेकर आ गई थी। सारे पटेलों को चाय दी। कानाराम ने जब कोई जवाब नहीं दिया तो गोविन्द ने कड़े लहजे में कहा, ‘‘देख काना, दो हजार रुपये बंद कर दिये जायेंगे अगर नीम लगाने के बारे में सोचा भी तो।’’

‘‘कर दो पटेलों!’’
‘‘तुम्हारे दो हजार के रहम पर जिंदा नहीं हैं। नीम तो लगेगा और इसी बरसात में लगेगा।’’ सरिता ने एक झटके में घूंघट हटाकर पटेलों को चेतावनी थी। 

घूंघट से जब चांद-सा चेहरा निकला तो पटेलों के होश उड़ गये। सरिता की सुन्दरता की उन्होंने तारीफ तो जरुर सुनी थी लेकिन बला की खूबसूरत हो सकती है, यह सपने में भी नहीं सोचा था। उनकी नजरें सरिता के चहरे से हट ही नहीं रही थीं। वे यह भी सोच रहे थे कि कानाराम उसे जोरे से डांटेगा और अन्दर जाने की हिदायत देगा लेकिन ऐसा नहीं हुआ। वह मन ही मन में बहू की बात से खुश हो रहा था। 

चंद पलों की पटेलों की चुप्पी के बाद उनकी नज़रें सरिता के चेहरे से हटी और एक-दूसरे के चेहरे पर गईं। नज़रों से कुछ बातें हुई और फिर गोविन्द ने पहल की, ‘‘ठीक है तू नीम लगायेगा तो हमारा भी फैसला सुन ले! गांव से तेरा रिश्ता खत्म।’’

‘‘हां, बिल्कुल।’’ अन्य पटेलों ने भी समर्थन किया। 

कानाराम जो अब तक चुप था और किसी प्रकार का झंझट करने के मूड में नहीं था, उसने एक गहरी सांस ली और कहा, ‘‘वैसे भी मैं कमाकर खाता हूं, गांव वाले मेरे घर अनाज की बोरी नहीं डालकर जाते हैं। नीम तो इसी बारिश में लगेगा।’’

‘‘तू काना इस छोरी का गुलाम हो गया है। बहू की तरह रख। हमें तो कुछ गड़बड़ लग रही है।’’ गोविन्द ने गुस्से से कहा। 

‘‘सारी ही गड़बड़ है भाई। चलो अब इसके घर में बैठने तक का मतलब नहीं है।’’ सारे पटेल उठकर चल पड़े। 

कानाराम चुपचाप बैठा रहा और उन पटेलों के जाने के लिये तैयार होने पर खाट से उठा तक नहीं। इससे पटेलों का गुस्सा चरम पर पहुंच गया और उन्होंने जाते वक्त कह दिया, ‘‘नीच जात को गांव में रहने देने से यही होता है। बहुत पछतायेगा।’’

इसके बाद गांव में कानाराम के खिलाफ कई साजिश रची गईं। उससे लोगों ने बात करना तक बंद कर दिया और गांव के दुकानदारों ने सामन देना भी बंद कर दिया। हालांकि कानाराम नीम लगाने के फैसले से पहले इन खतरों के बारे में सोच चुका था। लोगों ने सरिता और कानाराम के रिश्तों के बारे में कई कहानियां बनाई। शारदा ने भी बहू का साथ दिया और अपने पीहर जाकर एक सूखी निम्बोली भी ले आई नीम लगाने के लिये। 

धर्मेंद्र अब ज्यादा खामोश रहने लगा। उसे लगातार सामान लाने के लिये गांव के बाहर शहर जाना पड़ता था। खर्चा भी ज्यादा होता और परेशानी भी। बसंत भी शहर जाता था। उसने धर्मेंद्र से दोस्ती शुरू कर दी। हालांकि इसकी भनक गांव वालों को किसी को नहीं थी। इसी दोस्ती में धर्मेंद्र को शराब पीना भी सीखा दिया। अवसाद में धर्मेंद्र को नशे की लत लग गई। 

अलबेला एक बार दिन में भी बोला। 

वही रात वाली आवाज़ और वही दिशा लेकिन इस बार आवाज़ में दर्द कुछ ज्यादा था। दिन में इसके बोलने से सारा गांव फिर डर में डूब गया क्योंकि गांव वालों के अनुसार इस जानवर ने अपना नियम तोड़ा है। कभी भी गांव में भी घुस सकता है। गांव वाले दिन में भी घरों में कुंडी लगाकर रहने लगे। सुबह दस बजे के बाद गांव में कोई नहीं दिखता है, दुकानें भी बंद हो जाती हैं। रात के खामोशी जब दिन में उतर आये तो उजाले और अंधेरे का भेद मिट जाता है। यहां भी ऐसा ही हुआ। बच्चों के स्कूल तक के गेट दिन में बंद रहने लगे। ऐसी स्थिति हो गई थी कि यहां के लोग हंसना और ठहाका लगाना भूल चुके थे। कहीं कोई आवाज़ नहीं। एक मुर्दा शांति छा गई थी। 

दिन में एक ही आवाज़ सुनती थी। कानाराम के गाने की। वह अपने दरवाजे में हारमोनियम पर भजन गाता था। बहुत सुरीली आवाज थी। गांव के कई बुजुर्गों का दिल करता था कि कानाराम के दरवाजे में जाकर भजन सुन लें लेकिन पटेलों का आदेश था कि उससे बात भी नहीं करनी है। उसके भजनों में भी मोर, पीपल, नीम और कोयल का कई बार हवाला आता तो लोग अपने जहनों में इनकी तस्वीरें बनाने लगते। 

अब धर्मेंद्र और बसंत की दोस्ती प्रगाढ़ हो चुकी थी। वे रोज शाम को कानाराम के घर के पीछे बैठकर शराब पीते। एक दिन नशे में धर्मेंद्र ने बसंत को अपना दुख सुना डाला। वैसे तो बसंत ने कई बार पूछने की कोशिश की लेकिन वह हमेशा खामोश ही रहा। 

आज कहा, ‘‘इस ब्याह ने मेरा जीवन बरबाद कर दिया।’’

‘‘क्या हुआ भाई ? इतनी सुन्दर बीवी है यार।’’ बसंत ने उसके कंधे पर हाथ रखकर दिलासा दिया।

‘‘दूर से ऐसा ही लगता है। ऐसी सुन्दरता मेरे क्या काम की। बाप समझता ही नहीं मेरा दर्द। उस हूर की परी पर ही फिदा रहता है।’’ धमेंद्र ने पैग खत्म करते हुये कहा। 

‘‘यार बुरा मानो तो कहुंगा कि तेरे बाप के इरादे मुझे ठीक नहीं लगते हैं। अपनी बीवी को समझाओ।’’ बसंत मन ही मन में उछल रहा था। 

‘‘समझाना तो तब हो जब मेरी उससे बातें हों!’’

‘‘यार बीवी से बात ही नहीं होती है! ते फिर बाकी काम......।’’

‘‘मैं डरता हूं उससे। वह रात को कहीं जाती है।’’ धर्मेंद्र इतना कहकर घर चला गया। 

आज बसंत को सारे झंझटों का एक सूत्र मिला था - वह रात को कहीं जाती है। उसने खूब सोचा कि कहां जाती होगी? पहले पहल उसे लगा कि कानाराम के पास जाती होगी लेकिन फिर उसने सोचा कि वहां जाती तो धर्मेंद्र देख लेता और डरता क्यों ? वह दूसरे दिन पूरी बोतल लेकर आया और तय समय पर कानाराम के घर के पीछे। धर्मेंद्र आज थोड़ा हल्का था क्योंकि उसने अपने दिल की बात बसंत को कह दी थी। उस बात को कह डाला था जिसे कहने की हिम्मत पांच सालों से नहीं जुटा पाया था, मां को भी नहीं बता पाया था। जबकि शारदा और कानाराम ने कई बार उसकी उदासी का सबब जाने की कोशिश की थी लेकिन धर्मेंद्र आत्मविश्वास नहीं जुटा पाया था। और उस दिन शराब की दो बूंद गटकी और उगल दिया सारा राज। दोनों ने पीना शुरु किया। दो पैग होने तक चुप्पी ही रही। चुप्पी इस गांव का चरित्र बन चुकी है, वह शराब की महफिलों से लेकर उत्सवों तक देखी जा सकती है। अगर किसी के घर में मेहमान आ जाये और वह जोर से बोल, हंसने लगे तो गांव वाले उसे आश्चर्य से देखते हैं। कई लोगों ने हंसने की कोशिश भी की लेकिन वे मात्र दांत दिखाकर रह जाते हैं, दिल और चेहरे ने हंसने की तरकीब खो दी। बच्चे भी हंसने के लिये बाथरूम का सहारा लेते हैं क्योंकि बाहर हंसने पर घरवाले डांटते हैं क्योंकि अलबेला आजकल दिन में बोलने लग गया है। 

तो साहब, बसंत ने दो पैगों के बाद चुप्पी को अलविदा कहा, ‘‘कहां जाती होगी रात को यार ?’’

‘‘पता नहीं !’’ धर्मेंद्र कोई ओर बात करना चाहता था ताकि दिल बहले। 

‘‘कितने बजे जाती है ?’’ बसंत को तो यही बात करनी थी।

‘‘करीब ग्यारह बजे और एक बजे आती है।’’ धर्मेंद्र ने अगले सवाल का जवाब भी पहले ही दे दिया। 

हालांकि शाम होने के बाद कोई घर से बाहर नहीं निकलता है लेकिन फिर भी बसंत को हमेशा डर लगता है कि कोई उसे धर्मेंद्र के साथ देख लेगा तो हंगामा हो जायेगा। आज भी उसने जल्दी ही शराब खत्म की और घर की तरफ रवाना हो गया। 
कानाराम तमाम बंधनों के बाद भी गांव वालों के सामने झुक नहीं रहा था। पटेलों ने नई तरकीब निकाली और उसका गांव के कुएं से पानी बंद कर दिया। 

‘‘अब कैसे जियेगा ? हमारे कुएं के पानी से नीम लगायेगा!’’ पटेल मन ही मन में खुश हो रहे थे। 

हालांकि यह बहुत बड़ी समस्या थी और कानाराम की आर्थिक स्थिति भी इतनी मजबूत नहीं थी कि घर में कुंआ बनवा सके। अब तो बेटा अवसाद के साथ शराब भी अपना चुका था, इससे कानाराम कुछ कमजोर हो गया था लेकिन नीम वाली बात पर अब पक्का था। और सरिता इस विश्वास में उसके साथ थी। आज जब वह पानी लाने गई तो पटेलों ने कहा, ‘‘इस कुएं से पानी नहीं भर सकती। अपना कुआं बनवाओ। बहुत अकड़ रही थी नीम लगाने के लिये।’’

और सरिता को खाली घड़ा लेकर घर आना पड़ा। जब वह दरवाजे में घुसी तो कानाराम भजन गा रहा था। सरिता उसे पूरी कहानी बताने ही वाली थी लेकिन वह खाली घड़ा देखकर सब समझ गया। 

‘‘अब तो गांव छोड़ना पड़ेगा बेटा।’’ पहली बार कानाराम आंखें डबडबाई।

‘‘गांव तो नहीं छोड़ेंगे बापू।’’ सरिता ने घड़ा कानाराम के सामने रखकर उसे दिलासा दिया।

‘‘पानी बिना कैसे जियेंगे ?’’

‘‘कुआं बनायेंगे बापू।’’

‘‘पैसा ?’’

‘‘मैं अपने गहने बेच दूंगी। आप चिंता मत कीजिये।’’ सरिता ने समाधान कर दिया। 

सरिता के इस निर्णय ने कानाराम की आंखों की सरहदे तोड़ दीं। आंसुओं की धार बही और चंद बूंद सामने रखे घड़े में भी गिरी। धर्मेंद्र का नशा नहीं उतरा था, वह सो रहा था। जाग भी रहा होता तो नीम लगाने के इस संघर्ष में उसकी कोई भूमिका नहीं होती। वह तो पूरे घर को अपना दुश्मन समझ रहा था और सरिता को एक डरावनी औरत जो पता नहीं रोज रात को कहां जाती है। 

शारदा भी दरवाजे में आ गई थी। कानाराम आंखें खाली हुई तो उसने सारी कहानी सुनाई। शारदा को आज फिर एक बार सरिता पर बेइंतिहा मोहब्बत आयी और कुएं के ख्याल से तो वह गदगद हो गई। वह सोचने लगी कि नीम का पेड़ जब बड़ा होगा तो कुएं की मुंडेर के सहारे छांव में बैठकर पोते को अफसाने सुनायेगी। 

‘‘कहां बनवायें कुआं ?’’ सरिता ने सवाल किया। 

अचानक सामने आये इस सवाल का जवाब न तो शारदा के पास था और न ही कानाराम के पास क्योंकि उन्होंने इस घर में कभी कुआ बनाने की सोची भी नहीं थी। आगे दरवाजा था, पीछे चार कमरे थे और बीच में बड़ा-सा आंगन था। आंगन के बायीं तरफ एक कच्ची टपरी थी जिसमें वह गांव की एकमात्र बकरी बंधती थी। तीनों आंगन में खड़े थे और सोच रहे थे कि कुआं कहां खुदवाया जाये?

‘‘सबसे पहले नीम की जगह तय करो।’’ शारदा ने कहा। 

यह बात उन दोनों को भी अच्छी लगी क्योंकि सारा बवंडर तो नीम के लिये ही हो रहा था। तीनों ने न जाने कितनी बार इस आंगन को देखा है लेकिन अब आंगन कुछ अलग ही नजर आ रहा है। सरिता को तो ऐसा लग रहा था कि आंगन का हर कोना कह रहा हो कि उसकी कोख में नीम लगाओ। मिट्टी का कण-कण नीम की जड़ों को संजोने के लिये लालायित हो जैसे। कानाराम को  भी पूरा आंगन हंसता हुआ नजर आया। एक बैखोफ हंसी उसकी कानों में गूंज रही थी। बायें कोने में बंधी बकरी भी मिमयाने लगी। 

‘‘नीम तो बीच में अच्छा रहेगा।’’ सरिता ने राय रखी। 

कानाराम और शारदा कुछ देर चुप रहे। उनके ज़हन में आंगन के बीच में लगे नीम की तस्वीर घूम रही थी। शारदा ने उस तस्वीर को एडिट करना शुरु किया और बकरी वाली टपरी के ठीक सामने, नीम से करीब दस फीट दूर एक कुआं बनाया। वह तेज कदमों से उस जगह जाकर खड़ी हुई जहां पर तस्वीर में अभी उसने कुआं बनाया था, ‘‘यहां बनायेंगे कुआं।’’

ख्यालों में खोये हुये सरिता और कानाराम का ध्यान अचानक शारदा की तरफ गया। कानाराम ने जूती से नीम लगाने के लिये तय स्थान पर मिट्टी पर एक गोल घेरा बनाया और फिर शारदा के पास गया। वहां कुएं के स्थान पर भी एक वैसा ही घेरा बनाया। सरिता भी पास आ चुकी थी। तीनों ने उन दोनों घेरों को काफी देर तक निहारा और फिर एक स्वर में कहा, ‘‘ये जगहें ठीक हैं।’’

कानाराम दरवाजे में आकर हारमोनियम पर वापस भजन गाना शुरु कर दिया था। आज उसकी आवाज़ में ग़म और खुशी के मिश्रित भाव थे। शारदा अन्दर अपने कमरे में गई और एक बक्सा खोला। पुराना-सा लोहे का बक्सा था। एक लाल रंग के कपड़े की छोटी-सी गठरी निकाली। गठरी में लगी हुई गांठ जकड़ गई थी, नाखूनों की कोशिश से नहीं खुल पाई तो दांतों का सहारा लिया। कितनी ही जकड़ी हो, आखिर थी तो गांठ ही। खुल गई। गांठ खुलते ही उसके सामने वे गहने थे जो उसे अपनी शादी में मिले थे और बेटे की शादी में शारदा को दे दिये थे। चंद पलों तक वह उन्हें निहारती रही। यादों के पुराने भंवर में वह जा चुकी थी जब जवानी में ये गहने पहनकर निकलती थी तो जमीं डगमगाने का अहसास होता था। धीरे-धीरे उसकी अंगुलियां उन गहनों पर फिर रही थी और फिर कुएं के पानी जैसा गीलापन महसूस होने लगा। पसीने से अंगुलियां गिली हो गई थी और आंसुओं से गाल। फिर उसने गांठ वापस दी और गठरी को वापस बक्से में रखा। चूनरी के पल्लू को गिले गालों पर फिरा रही थी कि उसे फिर एक ख्याल आया। बक्से के दूसरे कोने में हाथ डालकर एक बहुत छोटी गठरी निकाली जिसका रंग भी लाल था। गंठरी तो नहीं थी, एक गांठ दिख रही थी और यह गांठ आसानी से खुल गई। एक सूखी निम्बोली निकली जिससे नीम लगाया जाना था। सरिता चाय के लिये बकरी का दूध निकालने गई थी। उसने फिर एक बार जमीन पर बने उन गोलों को देखा। 

आज जब दिन में अलबेला बोला तो उसकी आवाज़ में ग़म और खुशी का सम्मलित भाव था। 

गांव के पटेलों को अब विश्वास हो गया था कि बिना पानी के कानाराम नहीं रह सकता है और गांव तो छोड़ना ही पड़ेगा। हेकड़ी टूटकर गले में फंस जायेगी। नीम की छांव में तो सपने में ही बैठेगा। इसी ख्याल से उनका मन किया कि जोर से हंसी का ठहाका लगाया जाये। खूब कोशिश की। दांत निकाल, होठ हिलाये और आवाज़ भी निकाली लेकिन हंसी नहीं बन पाई। 

आज जब दिन में कानाराम भजन गा रहा था, तभी अलबेला की आवाज़ सुनाई दी। सारे लोग हमेशा की भांति डरे लेकिन कानाराम का सुर वैसी ही गति से जारी रहा। पटेलों को कुछ शक हुआ कि कहीं कानाराम अलबेला को जानता होगा तो ? वह उससे पटेलों की शिकायत करे देगा तो मुश्किल हो जायेगी। दो पटेलों की राय तो यह थी कि चलकर कानाराम के पैर पकड़ लेते हैं, इस अलबेले के खतरे से बच जायेंगे। लेकिन गोविंद पटेल ने कहा कि एक नीच जाति वाले के पैरों में पड़ने की सोच भी कैसे सकते हो! चाहे अलबेला मार दे लेकिन कानाराम की अक्ल ठिकाने लाकर रहेंगे। 

अगले ही दिन कानाराम और सरिता दोनों शहर गये। गहने बेचे और कुएं खोदने वाली मशीन को साथ लिया। जब मशीन गांव में घुसी तो चारों तरफ हड़कंप मच गया। कानाराम का कुआं खुदवाना सबके लिये आश्चर्य का काम था क्योंकि गांव में मात्र एक सार्वजनिक कुआं था। बड़े-बड़े पटेलों के घर भी कुएं नहीं थे। जब गोविंद पटेल को खबर मिली तो वह इतना दुखी हुआ कि कमरा बंद करके सो गया। अन्य पटेल भी घरों में ही दुबके रहे। कुछ देर अलबेला का डर भूलकर लोग चर्चा करने लगे कि यह कानाराम तो सारे गांव के ही काबू में नहीं आ रहा है। मशीन लगी और रातभर में कुआं तैयार। गांव के बच्चों का बड़ा चाव था कि वे जाकर मशीन देखें लेकिन कानाराम के घर पर जाना तो पाबंद था। वे छतों पर चढ़कर मशीन को देख रहे थे। 

जिस दिन कानाराम के कुएं से पानी निकला, उसी दिन घटायें भी उमड़ी। तेज हवा चली और साल की पहली बारिश हुई। शाम को कानाराम दरवाजे के बाहर खाट डालकर अकेला ही बैठा और कबीर का एक भजन शुरु किया। तेज तपन के बाद पानी पी हुई धरती से एक ऐसी खुशबू आ रही थी जो रोम-रोम पुलकित कर देती है। मंद-मंद हवा भी चल रही थी, सारे बादल आसमान से जमीन पर उतर चुके थे। अनगिनत तारे दिख रहे थे और एक चांद भी। धीमी हवा की बयार में गूंजते बोल सुनने वालों की नींद उड़ा रखी थी। आज आवाज़ में कुछ ऐसा था कि गांव के कई लोगों की मोहब्बत उमड़ पड़ी थी कानाराम पर। आपको तो मालूम ही है कि पटेलों के फैसलों के आगे मोहब्बत की धज्जियां उड़ती हैं। इश्क की कद्र कातिलों के यहां नहीं होती। मन मसोस के रह गये। यूं कह सकते हैं कि कुछ गांव वाले बोलना तो ‘वाह’ चाह रहे थे लेकिन ‘आह’ भरकर रह गये। उसी समय अलबेला भी बोला। उसकी आवाज़ में भी मस्ती थी आज। 

कानाराम ने भजन गाते हुये उतना गहराई में चला गया था कि आंखें भी बंद कर ली थी। अचानक उसे अहसास हुआ कि कोई उसकी चारपाई पर आकर बैठा है। 

कौन हो सकता है ? 

क्योंकि पटेलों के हुक्म के बाद तो कोई उसके घर आता ही नहीं है। आंखें खोलकर देखा तो सरिता थी। रात के ग्यारह बजे उसे देखकर एक बार तो कानाराम का दिल दहल गया था। तभी सरिता ने कहा, ‘‘बापू बारिश तो हो गई, नीम लगायें।’’

कानाराम ने यह भी नहीं कहा कि इतनी रात को नीम लगाने की क्या जरूरत है, सुबह लगा देंगे। वह खड़ा हुआ और आंगन की तरफ चल पड़ा। आंगन के बीच में शारदा खड़ी थी निम्बोली लिये। चांद की गवाही में तीनों ने नीम लगाया।

बसंत अपने मिशन पर लग गया। एक शाम को धर्मेंद्र के साथ खूब शराब पी और उसे भी रात के लिये तैयार कर लिया। बसंत कानाराम के घर के पीछ बैठा ग्यारह बजे का इंतजार करने लगा। धर्मेंद्र रोज की तरह कमरे में जाकर चारपाई पर सो गया। सरिता भी घर का काम निपटाकर कमरे में आयी और रोज की तरह अलग चारपाई पर सो गई। धर्मेंद्र ने खर्राटे मारकर सोने का नाटक किया। करीब ग्यारह बजे होंगे कि सरिता उठकर चल पड़ी। धर्मेंद्र तो चुपके से देख ही रहा था, वह भी पीछे हो गया। घर के पिछवाड़े से निकली थी वह। बंसत भी धर्मेंद्र के साथ हो लिया। 

आगे सरिता थी और पीछे ये दोनों। वह गांव की सीमा से बाहर रेगिस्तान में घुस चुकी थी। हालांकि इन दोनों को खूब डर लग रहा था लेकिन कुछ शराब के कारण आत्मविश्वास था और कुछ सरिता के रहस्य को जानने की उत्सुकता थी। चांदनी रात थी और वे तीनों लगातार चले जा रहे थे। सरिता को मालूम नहीं था कि कोई उसका पीछा कर रहा है। 

बसंत मन ही मन में धर्मेंद्र की हिम्मत को दाद दे रहा था कि बंदा तो दिलदार है जो इतनी खतरनाक औरत के साथ रह रहा है। यह दुबला ही हुआ है, ज़िन्दा रहना मुश्किल है। रेत के टीलों पर चढ़ रहे थे, उतर रहे थे। उनके पैरों के निशान चांद की रोशनी में साफ नज़र आ रहे थे। कहीं कोई दरख़्त नहीं था और उन दोनों को तो समझ ही नहीं आ रहा था कि यह जा कहां रही है ! 

अचानक उन्हें कलकलाहट और सरसराहट सुनाई दी। कलकलाहट ऐसी थी जैसे नदी की हो और सरसराहट बिल्कुल सैंकड़ों पेड़ों के पत्ते हिलने जैसी थी। लेकिन इस रेगिस्तान के भंवर में नदी होने की तो वे सोच भी नहीं सकते थे और पेड़ बिना पानी कैसे हो पाते। तभी अचानक उन्हें चिड़ियों की चहचाहट भी सुनी। दोनों के पांव थरथराने लगे। सामने नज़र उठाकर देखा तो पहाड़-सा रेत का टिला था। वे थक भी चुके थे। हांपते हुये चढ़ने लगे। आवाजें लगातार तेज होती जा रहीं थीं। पक्षियों के साथ कुत्ते और बिल्लियों की भी आवाज़ें थीं। टीले की चोटी पर पहुंचे और सामने देखा तो पैरों तले की जमीन किसक गई हो जैसे। चारों तरफ रेत की टीले थे और बीच में घने पेड़ों का बाग। एक झरना फूट रहा था और पानी से छोटा तालाब भी बना हुआ था। उन्हें ऐसा लग रहा था कि वे किसी अज़ीब दुनिया में आ गये हैं या फिर ख्वाब देख रहे हैं। बसंत ने धर्मेंद्र को छुकर देखा तो अहसास हुआ कि ख्वाब नहीं, हकीकत है। 

सरिता के पहुंचते ही उसके चारों और पक्षियों का झुण्ड मंडराने लगा। कुत्ते भी पास आ गये। वह जाकर तालाब के किनारे बैठ गई। ये दोनों जासूस भी पेड़ों के पीछे छुपते हुये सरिता के बीस कदम दूर ओट में बैठ गये। उसके कंधे पर कोयल बैठ थी, घुटने पर कौआ था और बगल में इतने पक्षी और कुत्ते बैठे थे जैसे की संसद की कार्यवाही चल रही हो। हालांकि आज बसंत और धर्मेंद्र को कई आश्चर्य हुए लेकिन सबसे बड़ा आश्चर्य तो यह था कि सरिता पक्षियों की बोली बोलती है। वह उनसे बात कर रही थी। बसंत की पेंट में तो तब पेशाब ही निकल गये थे जब सरिता ने अलबेला वाली आवाज़ निकाली। फिर वह पक्षियों की भाषा में ही गाने लगी और मोर के साथ नाची भी। सारे कारनामे देखकर वे उसके पीछे-पीछे घर आये। 

सुबह गांव में अलबेला का राज खुल गया था। पूरे गांव में सरिता की चर्चा थी। कोई उसे ‘डायन’ कह रहा था और कोई उसे ‘भूतनी’। गोविंद पटेल ने अपना ज्ञान बघारा कि पक्षी की भाषा समझने और बोलने के लिये एक शास्त्र पढ़ना पड़ता है जिसका नाम ‘कोकिलाशास्त्र’ है। इसको पढ़ने के बाद इंसान किसी भी जानवर भी बोली बोल लेता है। कानाराम की बहू ने भी यह शास्त्र पढ़ा होगा। अब तो भाई लोगो इस परिवार को गांव के बाहर खदेड़ना ही पड़ेगा। सालों तक अलबेला बनकर हमारा जीवन गंध कर दिया इस औरत ने। पता नहीं कल क्या कर दे। सारे पटेलों सहित गांव ने इस प्रस्ताव का समर्थन किया। तय यह हुआ कि आज उन्हें गांव छोड़ने की चेतावनी दे देंगे और कल सुबह तक अगर गांव नहीं छोड़ा तो पूरा गांव उन्हें नहीं छोड़ेगा। 

शाम को प्रमोद जाकर कानाराम के घर कह दिया था कि ज़िन्दा रहना है तो सुबह तक गांव छोड़ दो। पटेलों का हुक्म है। 

अब क्या करें! कानाराम और शारदा खूब रोये। कहां जायेंगे!

सरिता ने हौसला बंधाया कि इसी गांव में रहेंगे और डरने की कोई बात नहीं है। हालांकि उन्हें गांव में रहना नामुमकिन-सा लग रहा था लेकिन उसकी बात पर यकीन था। खाना खाकर सब लोग सो गये। धर्मेंद्र आज भी पीकर सोया। रात के उसी वक्त सरिता उठकर चली गई और एक बजे आई। 

भोर को ही सारा गांव लट्ठ लेकर कानाराम के घर पर हमले के लिये चल पड़ेे लेकिन घर के पास पहुंचे तो गजब हो गया। कानाराम के घर पर मोर, कबूतर, कौआ, कुत्ता, बिल्ली मोर्चा संभाले हुये थे। वे गांव वालों पर टूट पड़े। अब कौए को उड़कर तो मार नहीं सकते थे और उसने चोंच से कई लोगों की आंखें फोड़ दी। भगदड़ मच गई। लोग दौड़कर अपने घरों में घुस गये। सुबह का सूरज निकला और उसी के साथ कानाराम के आंगन में नीम की पहली कोंपल भी फूटी।

संपर्क :
संदीप मील
मोबाइल – 09636036561
ईमेल –skmeel@gmail.com
ग्रा. पो. – पोसानी, 
वाया – कूदन, 
जिला – सीकर, 
राजस्थान - 302031