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मेरे अंदर का पाठक : नरेन्द्र कुमार


मेरे अंदर का पाठक : नरेन्द्र कुमार

लेखक जिस तरह आगे बढ़ता है... आगे की सोचता है, वह तो दर्ज होता रहता है। पर, पाठक ! मैं अपनी बात करूं तो जितना शुरू से सोच सकता हूं... बता रहा हूँ। अगर मैं उस दौर में साहित्य नहीं पढ़ता तो क्या सात-आठ साल की उम्र की उतनी स्मृतियां साथ होतीं !

पहली और दूसरी कक्षा में अपनी किताबों से इतर कुछ नहीं पढ़ पाया था, बस तितली, चन्दा मामा, बंदर, चिड़ियों को देखता-पढ़ता। यह समय ननिहाल का था और वहां कथा-कहानी पढ़ने का कोई माहौल नहीं था। लेकिन माँ ने हिंदी में पढ़ने-लिखने लायक जरूर बना दिया था। कहानी भी वही सुनाती और कविता पढ़ने का ढंग भी उसीसे मेरे पास आया। उसके बाद बाबा (दादाजी) के घर आया और वहाँ के मिडिल स्कूल में कक्षा तीन में मेरा दाखिला करवा दिया गया। सबसे पहले किन पुस्तकों के सान्निध्य में आया, इसका निर्धारण तो मुश्किल है। चाहे वह रामायण होगी या मनोज पॉकेट बुक्स के उपन्यास। लेखक का नाम भी मनोज। जो भी हो... दोनों लोकप्रिय। रामायण पढ़ने में दादाजी का आग्रह भले रहा हो, पर बाकी में मेरी रुचि अपनेआप बढ़ने लगी। बाबा नित्य हारमोनियम बजाते और उसमें मेरा शामिल होना भी एक रूटीन हो गया था। गाने-बजाने के कारण सूर, तुलसी, कबीर, नानक, मीरा आदि के रचनाओं के पास आने का मौका मिला। रेडियो के कारण फिल्मों से गहरा जुड़ाव हुआ।

तो, अब अपनी जिज्ञासाओं की बात करता हूँ। अधिक-से-अधिक पढ़ने की धुन में मैं घर की सारी किताबों को पलटने लगा। चचेरे भाई-बहनों की बदौलत मैं मनोज, कर्नल रंजीत, ओमप्रकाश शर्मा, रानू, गुलशन नंदा, वेद प्रकाश शर्मा, केशव पंडित आदि को पढ़ता चला गया। कहिए कि एक व्यसन की तरह इनका आदी होता गया। छोटी कक्षाओं में आज भी माता-पिता इस तरह से ऐसी किताबें पढ़ने नहीं दे सकते। कभी विष्णुपुराण, महाभारत और कल्याण की पत्रिकाओं से भी जुड़ जाता।

यूँ तो पूरा परिवार ही कम्युनिस्ट था, पर वामपंथी साहित्य बड़े पापा के कारण ही आ पाता था। आज भी लेनिन-मार्क्स की कई किताबें वहां पड़ी होंगी। उसे लाने का उद्देश्य मुझे नहीं लगता कि केवल पढ़ना रहा होगा... उसका एक उद्देश्य पार्टी को मजबूत करना भी रहा होगा। वे मार्क्स की तरह ही दाढ़ी-बाल रखने लगे थे और समर्पित हो गए थे। उस दौर में ही नवादा से प्रेम प्रदीप और प्रेमचंद राम कम्युनिस्ट पार्टी से सांसद बने थे। वामपंथी साहित्य को छोटा बच्चा पढ़ता कम, तस्वीरें अधिक देखता… बोल्शेविक आंदोलन के, द्वितीय विश्वयुद्ध के, लेनिन को कई मुद्राओं में बैठे हुए।


लोकप्रिय साहित्य से अलग कक्षा के पाठ्यक्रम के सहारे ही हिंदी के गंभीर साहित्यकारों से जुड़ता। घर में प्रेमचंद के मानसरोवर के एक-दो भाग पढ़ा होऊंगा, उनका कोई उपन्यास मेरे संपर्क में नहीं आया। वह दौर दिनकर और मैथिलीशरण गुप्त की कविताओं के ओज-भरे पाठ का था। केदारनाथ अग्रवाल, गोपाल सिंह नेपाली, पंत, महादेवी वर्मा की कविताएं भी पढ़ता। पढ़ने का जुनून यह होता कि अगली कक्षाओं के हिंदी साहित्य को पढ़ लेता। रेणु, जयशंकर प्रसाद, जैनेन्द्र, महादेवी, नलिन विलोचन शर्मा आदि के गद्य पढ़ गया, लेकिन उनकी कोई व्यवस्थित पुस्तक पढ़ने को नहीं मिल पाई।


सातवीं कक्षा में फिर से वापस ननिहाल आ गया। अमूमन बच्चे पहले कॉमिक्स पढ़ते हैं, तब कोई साहित्य की पुस्तकें। लेकिन मेरे साथ उल्टा हुआ था। मैंने पहले उपन्यास, वो भी पाकेट बुक्स वाली पढ़ रखी थी। अब यहाँ हाई स्कूल में दोस्तों के साथ कॉमिक्स पढ़ने का सिलसिला शुरू हुआ। चाचा चौधरी, नागराज, सुपर कमांडो ध्रुव, बांकेलाल, हवलदार बहादुर आदि न जाने कितने किरदार हर समय घेरे-से रहते। लेकिन इसका मतलब यह नहीं था कि उपन्यासों से पीछा छूट गया था। मेरे मौसेरे भाई के कारण वह प्रचुर मात्रा में उपलब्ध रहती। नब्बे के दशक में फ़िल्मी डायलॉग वाली किताबें भी खूब पढ़ी जाती थीं, सो उसे भी पूरी तन्मयता से पढ़ जाता। इसी मध्य देवकीनंदन खत्री की प्रसिद्ध रचना ‘चंद्रकांता’ भी पढ़ा। लेकिन इस स्थिति में बदलाव तो आना ही था।


तो इसमें बदलाव आया, जब मैं आठवीं कक्षा में था। हाई स्कूल में अंग्रेजी के नए शिक्षक आए, राजेन्द्र बाबू। अंग्रेजी तो अच्छा पढ़ाते ही थे, हिंदी साहित्य से भी जुड़ाव था। अब ऐसे में वे साहित्य के मेरे लगाव को कैसे न जान पाते? उन दिनों अधिकांश शिक्षक स्कूल में ही रहते भी थे। वे मुझे हिंदी साहित्य की पुस्तकें पढ़ने के लिए देने लगे। इसी क्रम में गोदान को पढ़ने का अवसर मिला। फिर जब दूसरी बार पटना आया तो यहाँ मेरे मित्र बने – अश्विनी जी। उनके पास हिंदी साहित्य की पुस्तकें विपुल मात्रा में थीं। फिर तो जैनेन्द्र, अज्ञेय, निर्मल, राजेन्द्र यादव, यशपाल, कमलेश्वर, मृदुला गर्ग, उषा प्रियंवदा, इलाचन्द्र जोशी, मनोहर श्याम जोशी, सुरेन्द्र वर्मा, मुक्तिबोध, निराला, केदारनाथ सिंह आदि को पढ़ने का सिलसिला चल निकला। उसके बाद वरीय कवि योगेन्द्र कृष्णा से जुड़ने के पश्चात तो और पढ़ता चला गया। पवित्र गीता से लेकर अश्लीलता के लिए आरोपित पुस्तकों तक पहुंचा हूँ और पढ़ने की यह भूख बढ़ती ही जा रही है। जितनी किताबें खरीद रहा हूँ… कम पड़ती जा रही है।


अब सोचता हूँ...आज के साहित्यिक परिवेश पर, तो कुछ निराशा होती है, वहीं कुछ लोग उम्मीद भी बँधाते हैं। आज के अधिकांश रचनाकार अकादमिक आलोचना तो क्या पाठकीय प्रतिक्रिया तक बर्दाश्त नहीं कर पा रहे हैं। सोचता हूँ, कैसे दिनकर और जयशंकर प्रसाद ने मुक्तिबोध की आलोचना बर्दाश्त की होगी या बच्चन ने अज्ञेय की… या इसी तरह किसी ने किसी की। मैं तो समझता हूँ कि खुशकिस्मत हैं वे रचनाकार, जिनकी रचनाओं पर पाठकों की प्रतिक्रिया मिलती हैं… वरना आज तो अधिकांश रचनाएँ उपेक्षाओं की परत तले दबकर ही रह जाती हैं। मेरा खुद का अनुभव कुछ अच्छा नहीं रहा है। प्रतिक्रिया देने से कई बार अपने को रोक नहीं पाता हूं और उसके बदले रचनाकारों की नसीहत भी सुननी पड़ती है कि अभी और पढ़िए। अनुगूँज सुनाई पड़ती है कि मुझे पढ़िए और मेरे मानकों के अनुसार पढ़िए। ऐसे में आपके गंभीर हिंदी साहित्य को पढ़कर कौन प्रतिक्रिया देना चाहेगा? अब मेरी ही बात लीजिए, बड़े रचनाकारों की उत्कृष्ट कहानियों को पढ़ने के बाद साधारण-सी कहानी में मुझे क्या वह तृप्ति मिल पाएगी? नहीं न। ऐसे में मेरी शंका रचनाकारों पर जाती है कि शायद वे ही अपने वरीय साहित्यकारों को पढ़ने से वंचित रह गए होंगे, जिसके कारण उनसे आगे की लिखने में सक्षम नहीं हो पाए होंगे।

यादें जो भुलाये न बने : अरुण नारायण



वे दिन समीक्षक एवं पत्रकार अरुण नारायण के फ्रीलांसिंग जीवन के संघर्ष के थे, जब उनकी जान-पहचान हिंदी साहित्य के अद्भुत रचनाकार मनोहर श्याम जोशी से हुई। उनके सान्निध्य में अरुण जी को साहित्य की बारीकियां समझने में मदद मिली तो दिल्ली की साहित्यिक दुनिया की राजनीति को भी करीब से देखने-समझने का मौका मिला। पर सबसे बेहतरीन चीज जो निकल कर आयी, वह थी अपने को जानना एवं मूल्यांकन करना। अपने संस्मरण में उन्होंने जितनी बेबाकी से मनोहर श्याम जोशी की खूबियों-खामियों का उल्लेख किया है उतनी ही ईमानदारी से अपने बारे में लिखा है। 


यादें जो भुलाये न बने

मनोहर श्याम जोशी से दिल्ली में संघर्ष के दिनों जान-पहचान हुई। वे मेरी फ्रीलांसिंग जीवन के बेहद कटु दौर थे और उतने ही दिलचस्प भी। इस पहचान के माध्यम पंकज बिष्ट थे। बिष्ट जी से मेरी बेहद अंतरंगता थी। मासिक ‘समयांतर’ के वैश्वीकरण विशेषांक की उन दिनों तैयारी चल रही थी। इसके लिए मनोहर श्याम जोशी से भी एक लेख लिखवाने का निर्णय लिया गया था और इसके लिए उन्होंने अपनी सहमति भी दे रखी थी। ‘ग्लोबल गांव का सांस्कृतिक संकट’ नाम से उक्त अंक में जोशी जी का वह लेख छपा। इस लेख के डिक्टेशन लेने के दौरान ही जोशी जी से मेरी पहली भेंट हुई। यह पहचान आने वाले दिनों में और प्रगाढ़तर हुई। पहली बार इस सिलसिले में पंकज बिष्ट के अनुरोध पर ही जनवरी 2005 में उनके घर गया था। तब वह साकेत में डी.डी.ए-53 के फलैट में रहते थे। उस समय दिल्ली में भयंकर ठंढी थी। पंकज बिष्ट और रामशरण जोशी की सख्त हिदायत थी कि हर हाल में हमें जोशीजी से वह आलेख लिखवा कर ही दम लेना है। उस दिन मैं कनाट प्लेस की बस से साकेत स्थित उनके आवास पर पहुंचा था। उनका आवास खोजने में कोई खास परेशानी नहीं हुई थी। फोन पर हुई वार्ता में जोशी जी ने बतलाया था कि उनके घर के सामने कपड़े पर आयरन करने वाला ठेला लगाता है। उनके घर पहुंचने के रास्ते उस ठेले वाले पर नजर गई तो मैंने जोशी जी के बारे में उससे पूछा। उनके घर की ओर इंगित करते हुए इशारों में उसने रास्ता बतला दिया। मकान की बाहरी ओर से पतली-सी सीढ़ियां थी जो प्रथम तल पर जाती थी। इसी प्रथम तल्ले पर रहते थे जोशी जी और ठीक सीढ़ी के पास ही उनके नाम का एक बड़ा-सा लेटर बाॅक्स टंगा रहता जिसमें देश भर से आयी बेशुमार पत्रिकाएं और पत्रों की बाढ़ लगी रहती। बेल बजाई तो उन्होंने स्वयं दरवाजा खोला। मेरे आगमन और औपचारिक अभिवादन बाद वे मुझे बालकनी की ओर ले आये। वहां पहले से ही तीन कुर्सियां लगीं थीं। जिसमें एक पर उनकी पत्नी बैठी थीं। वह नाटे कद की थीं। उस समय स्वेटर या अन्य कोई ऊनी पोशाक बुनने में अपनी रफ्तार में मगन थीं। जोशी जी ने बैठने का इशारा किया और एक सक्षिप्त-सी जानकारी मुझसे ही मेरे बारे ली। फिर लेख लिखवाने के लिए पैड और कलम मुझे थमा दिया। उस दिन वह लेख पूरा नहीं हो पाया। उन्होंने अगले दिन बुलाया। दूसरे दिन भी पूरे दिन उनका बोला हुआ लिखता रहा, लेकिन उस दिन भी वह लेख पूरा नहीं हो पाया। दरअसल जोशी जी जैसा चाहते थे, वह लेख, वैसा बन नहीं पा रहा था। वे बार-बार लिखवाते, काटते और कभी-कभी पूरा लेख ही काट देते और नए सिरे से फिर शुरू करवाते। यह सब करते-कराते तीसरा दिन भी गुजर गया। और तब भी बात नहीं बनती दिखी। उधर ‘समयांतर’ का अंक फाइनल होकर बेसब्री से उस लेख की प्रतीक्षा में था। बार-बार पंकज बिष्ट और रामशरण जोशी जी का फोन आता। लेकिन मनोहर श्याम जोशी जी की दुविधा यह थी कि वह लेख जैसा वह चाह रहे थे बन नहीं पाया था। अंततः उन्होंने लगातार प्रेशर के कारण असंतुष्ट भाव से वह लेख दिया जो ‘समयांतर’ के फरवरी, 2005 वाले वैश्वीकरण विशेषांक में छपा। उस विशेषांक का अतिथि संपादन रामशरण जोशी ने किया था और संपादन सहयोग में मेरा भी नाम था। संपादन से जुड़ाव और पंकज बिष्ट की घनिष्ठता के कारण यह लाजिमी ही था कि जोशी से से उक्त आलेख को पाने के लिए मैं इतनी मशक्कत करता। 

मनोहर श्याम जोशी के साथ तीन-चार दिनों तक काम करने का यह अनुभव काफी उबाऊ और नीरस था। यह बात तब मेरी समझ से परे थी कि कोई व्यक्ति इस हद तक यातनामय होकर भी लिखने में रत रह सकता है। इस लेख को लिखवाने में वे जबर्दस्त मानसिक यातना और उलझन से रू-ब-रू हुए थे। और मैं बार-बार उनके लिखे हुए को काटे जाने से खीझ उठता था। लेकिन जब उन्होंने अपने लिखे हुए का डिक्टेशन लेने का अनुरोध मुझसे किया तो उनके प्रति अपनी इन तमाम आरंभिक नकारात्मक बातों के बावजूद पता नहीं क्यों, इतनी जल्दी उनके बोले हुए को लिखने के उनके प्रस्ताव को सहर्ष स्वीकार भी कर लिया था। इसके पीछे कहीं न कहीं मेरा यह मनोविज्ञान काम काम कर रहा था कि हिंदी के इतने महत्वपूर्ण लेखक की सदिच्छा का सम्मान किया जाना चाहिए। शायद यही वह दायित्वबोध था जिसके दवाब मैंने हामी भरी थी। फिर यह जिजीविषा भी कहीं न कहीं रही थी यह जानने की कि इतने बड़े लेखक की सृजन प्रक्रिया की बारीकियों को समझूं...कि वह किन-किन प्रक्रियाओं से होकर किसी रचना को उसकी परिणतियों तक पहुंचाता है। उस समय मैंने यही तय किया था कि फिलहाल फ्रीलांसिंग को थोड़ा विराम दूंगा और कायदे से लेखन की बारीकियों का जोशी जी से क, ख, ग, घ सीखूंगा। मैंने अपने मन को समझाया था कि लेख लिखवाने की जोशी जी की मनःस्थिति नहीं रही होगी इसलिए शायद उन्हें उस समय इतनी मशक्कत करनी पड़ी होगी। लेकिन बाद में मैंने पाया कि वे ‘आउटलुक’ वाले साप्ताहिक स्तंभ लिखवाने और और उपन्यासों में भी इसी तरह कई-कई बार काट-छांट करवाते हैं। मैंने डेढ़-दो महीने लगातार उनके साथ काम किया। उस समय वे ब्रिटिशकाल के चर्चित ‘भुवाल स्टेट कांड’ पर अपने उपन्यास ‘मैं कौन हूं’ का दूसरा ड्राफ्ट तैयार कर रहे थे और चाहते थे कि होली के बाद अपने बेटे के अमेरिका स्थित घर जाने के पहले ही पूरा कर लें और इसे वाणी प्रकाशन को शीघ्र सौंप दें ताकि उनके अमेरिका से लौटते-लौटते वह साया हो जाए। हालांकि उस अवधि में उनकी यह योजना पूरी नहीं हुई और होली आ जाने के कारण मैं भी घर लौटने का बहाना कर एक अखबार में डेस्क पर अपनी नौकरी तय कर ली। यह नौकरी मुझे पहले भी मिल रही थी, लेकिन मैं द्वंद्व में था कि आखिर रास्ता कौन-सा चुनूं? अखबार की नौकरी के अपने बहुत सारे खतरे थे। वहां पैसे बहुत कम मिलते और काम का दबाव इतना ज्यादा होता कि पढ़ने का समय ही नहीं मिलता था। जोशी जी के साथ काम करने का अनुभव आर्थिक रूप से काफी घाटे वाला प्रतीत हो रहा था। वे इतना भी पैसा नहीं दे पा रहे थे जिससे मैं रहने-खाने के खर्च की चिंता से मुक्त हो सकूं। हालांकि वे आश्वासन खूब देते थे। उस दरम्यान वाणी प्रकाशन में मेरी नौकरी की बाबत अरुण माहेश्वरी से बात भी की थी। उस समय वे अपने प्रकाशन गृह से एक लघु पत्रिका लाना चाहते थे। इसके लिए मैं माहेश्वरी से उनके दरियागंज स्थित कार्यालय में मिला भी। लेकिन अंततः कोई बात नहीं बनी।

मैं गहरे पशोपेश में था। जोशीजी को छोड़ना भी नहीं चाहता था और उनके साथ काम करते हुए अपना मासिक खर्च भी पूरा नहीं जुटा पा रहा था। समझ में नहीं आता था कि हमारा भविष्य क्या होगा। उनके संपर्क में आने के बाद साहित्य की एक और खेमेबाजी को मैं बहुत करीब से जान पाया। पहले राजेंद्र यादव, कमलेश्वर, अशोक वाजपेयी, नामवर सिंह, विष्णु खरे, सुधीश पचौरी, रवींद्र कालिया आदि ग्रुप मुझे दिखलाई पड़ते थे। इसके अलावा जलेस, प्रलेस और जसम की सक्रियता भी कमतर न थी और इनके भी अपने-अपने मंच थे। इसमें अच्छी बात यह थी कि ये सभी साहित्य की केंद्रीय धुरी थे और सभी तमाम तरह की भिन्नता के बावजूद वामपंथी थे। इसके अलावे भी मठ और गढ़ कम नहीं थे। दलित साहित्यकार भी उन्हीं दिनों एक बैनर तले एकजुट होने शुरू हुए थे। मनोहर श्याम जोशी के पास आया तो पहली बार यह अहसास हुआ कि सफलता जोड़-तोड़ से भी हासिल की जा सकती है और जिनपर इनकी कृपा होगी उसे ये कुछ भी करवा सकते हैं। जहां तक मुझे याद पड़ता है जोशी जी वाम रंग में रंगे नौजवानों को मूर्ख समझते लेकिन वामपंथी मठों से अपना संबंध मधुर बनाए रखते थे। इसका गणित उन्हें मालूम था। शायद वे इस चीज को भांपते थे कि ये वाम संगठन अलग-अलग क्षेत्रों में उनके अनुकूल वातवरण की सृष्टि कर सकते हैं इसीलिए उनकी यह रणनीति रही हो शायद। उनकी बात से भी लगता था कि उन्हें इस बात का इलहाम था कि सभी दलों और विचारधाराओं को अस्वीकार करने के कारण लोग उन्हें ‘सिनिक’ ठहराते हैं। मीडिया और प्रकाशन की दुनिया में वे किसी को भी सम्मानजनक नौकरी दिलवाने का सामर्थ रखते थे। वे नेशनल बुक ट्रस्ट से लेकर कई महत्वपूर्ण कमिटियों के भी सदस्य और उसके सलाहकार थे। इसकी वजह से भी उनसे जुड़े रहने में ही मेरा हित दिखता था। वे कहते भी कि मैं पंकज बिष्ट से जुड़ा हूं जो सबसे विरोध ही मोल लेते हैं। ऐसे में उन्हें नहीं लगता था कि मेरे बारे में कोई सोचेेगा भी। वह कहते मैं कुछ दिनों तक उनका साथ दूं ताकि वे अपने अधूरे उपन्यास को पूरा कर लें फिर वे मुझे कहीं अच्छी जगह सेट करवा देंगे। उस दौरान उन्होंने अपने ‘आउटलुक’ में लिखे जा रहे स्तंभ संग्रह का फोटो स्टेट करवाया और मुझे उसको विषयवार समेटकर उसका समायोजन करने का भी काम सौंपा था और कहा था कि इससे भी मुझे कुछ पैसे मिल जाएंगे। उन्होंने अपने साक्षात्कार की सामग्री किताब रूप में लाने हेतु अपने शिष्य प्रभात रंजन को दे रखी थी, लेकिन वे उसे संयोजित करने का अवकाश नहीं निकाल पा रहे थे। इसको लेकर वह उनसे मन ही मन उनसे बहुत रंज चल रहे थे। कहते थे–बहुत ही कुटिल प्राणी है। मिलेगा इस तरह जैसे आपकी बड़ी चिंता करने वाला हो। उस दिन उन्होंने यह भी बतलाया था किस तरह ‘सहारा समय’ की कथा प्रतियोगिता में उन्होंने उनकी कहानी को पुरस्कृत करवाया। उस साक्षात्कार को भी मुझे ही संयोजित करने को कहा था उन्होंने और आश्वस्त किया था कि उससे भी मुझे चार-पांच हजार रुपए मिल जाएंगे। लेकिन दुर्योग से इन दोनों ही काम का वक्त नहीं निकला। उनके लेखन डिक्टेशन में ही इतना समय चला जाता कि उसके लिए अलग से समय ही कहां मिलता। उनका ‘आउटलुक’ का स्तंभ भी बीच में ही छूट गया। इसमें उन्होंने आधुनिकता, इस्लाम और अमेरिका–इन तीन विषयों पर अपने विचार अभिव्यक्त किए थे। स्वाधीनता संग्राम में वकीलों के योगदान पर भी ‘आउटलुक’ में उन्होंने एक महत्वपूर्ण लेख लिखा था।

उपन्यास लिखवाने के दौरान वह उसकी पृष्ठभूमि के बारे में लगातार पढ़ते-गुनते रहे। मैंने यह नोट किया कि वह उस उपन्यास को लिखवाते वक्त अपनी साहित्यिक कल्पना का भरपूर उपयोग करते। कई मौके तो ऐसे आते जब वह दस-दस, बीस-बीस और पचास पेज तक काट-छांट डालते। इस समय उनकी मनःस्थिति बड़ी पीड़ादायी हो उठतीं। कभी-कभी खीझभरे स्वर में माथे की ललाट पर हथेलियां रखते हुए पत्नी की ओर मुखातिब होते और कहते–भगवती, इसमें गोबर भर गया है। यह बड़ी दारूण घड़ी होती। ऐसे मौके पर उनकी पत्नी अपने कर रहे काम को वहीं छोड़ देतीं और उनकी हर क्रिया को बहुत गौर से फौलो करतीं। इस उपन्यास को लिखते समय भुवेश सान्याल और स्वाधीनता आंदोलन में बंगाल और उन विषयों पर वह गूढ़ से गूढ़ पुस्तकें पढ़ते रहे। एक अंग्रेजी पुस्तक उस दौरान बराबर संदर्भ के लिए उलटते। वह किताब अगर भूल नहीं रहा तो संभवतः अंग्रेजी लेखक अमिताभ घोष की थी। ‘प्रिंसली इंपोस्टर’ यही नाम था उस पुस्तक का। उस किताब में स्टीकरों का ढेर लगाए रखते और लिखवाने के क्रम में उलट-फेरकर उसका अवलोकन करते। मैंने ऐसा महसूस किया कि शाम छह बजे मेरे जाने के बाद वह रात में पढ़ते थे और एक बांग्ला भाषी सज्जन से भी सलाह मशविरा लेते थे। सुबह मेरे दस बजे आने के पहले आगे क्या लिखवाना है इस तरह से अपना माइंड सेट रखते थे। उनके घर से रूख्सत होते कभी-कभी सात बज जाते। उनके घर से निकलते ही मैं सार्वजनिक परिवहन की बस आउटर मुंद्रिका पर सवार होता जो दिल्ली की कई काॅलोनियों का चक्कर लगाती हुई मुझे आनंद विहार बस अड़डे पर उतारती। आनंद विहार पहुंचते-पहुंचते लगभग ढाई घंटा लग जाता था और वहां से वसुंधरा के सेक्टर 11 पहुंचने में आधे घंटे। हर दिन मैं नौ-दस बजे घर पहुंचते-पहुंचते अपने को टूटा निचुड़ा हुआ-सा महसूस करता।

अपने बारे में तटस्थ होकर सोचना, अपना मूल्यांकन स्वयं करना मैंने पहली बार जोशी जी की इस सोहबत में ही जाना। वह भी उनके द्वारा अहसास करवाये जाने के बाद। मेरे लिखे हुए को वे खुद देखते। वर्तनी संबंधी भूलों को दूर करने के गुर बतलाते। अक्सर मैं उसका फाॅलो नहीं कर पाता। बावजूद इसके वह पुनः बड़े धैर्य के साथ मुझे मेरी गलतियों की ओर ध्यान खींचते। अगर उसके बाद भी मैं गलतियां करता ही जाता तो उनका गुस्सा सातवें आसमान पर तैर रहा होता। वह बहुत जोर फटकार लगाते। कहते ‘यह हिंदी का दुर्भाग्य है कि तुम अपने को लेखक कहते हो और तुम्हें भाषा को कहां और किस तरह बरतना चाहिए, यह भी नहीं आता।’ उनके बार-बार की कांट-छांट से अत्यधिक चिड़चिड़ा हो जाने के कारण यह गलतियां मुझसे ज्यादा होतीं। सोचता पता नहीं कब ऐसे भंवर से पार पाउंगा। पार कर पाउंगा भी या नहीं। कभी-कभी उनकी तिक्तता मुझे भीतर से झुंझला कर रख देती। इस तरह की नौबत तब आती जब वे लिखना कुछ चाहते और उनसे लिखा कुछ जाता। कभी-कभी यह प्रक्रिया उनके साथ दो-तीन दिन अवाध गति से चलती। ऐसे मौकों पर वे मेरी अच्छी-खासी धुलाई कर देते। ऐसे विकट समय में उनकी पत्नी मुझे पुत्रवत स्नेह और ढाढ़स देतीं। मिष्ठान खिलातीं। उन दिनों जोशी जी के एक और व्यवहार ने मुझे उनके प्रति रंज किया। आता तो सीधे उनके डिक्टेशन शुरू हो जाते। जैसे ही डेढ़-दो बजे का समय होता वे मुझे ताकीद करते कि घर से बाहर जाइए और आधे घंटे में कुछ खाकर आ जाइए। मुझे उनका यह व्यवहार उनके प्रति वितृष्णा पैदा करता था। मेरी अपेक्षा रहती थी कि मेरे साथ घरैया की तरह व्यवहार करें। जब कभी ऐसा व्यवहार उनका दिखता भी था। कोई उनके घर आता तो वे उससे मेरा परिचय साहित्यकार के रूप में कराते। एक बार सुभाष धूलिया उनके घर आये हुए थे। तो उन्होंने उनसे भी मेरा परिचय अच्छे से करवाया। उनके चले जाने के बाद बतलाया कि वे उनके पड़ोस में आ गए हैं। लेकिन खाने के मोर्चे पर वे बहुत निर्मम मालूम पड़ते। मैं हर दिन उनके घर से निकलता और बगल में पी.भी.आर. के पास तीन रुपया का छोला और दो रुपया का कुल्चा खरीदता लेकिन इससे पूरी तरह भूख मिटती नहीं थी बल्कि इसे खाने के बाद भूख और प्रबल हो उठती थी। किसी तरह अतृप्त-सा होकर ही संतोष करता। सच तो यह है कि मुझ-सा फटेहाल फ्रीलांसर के जीवन का यह बहुत ही नाजुक दौर था किसी किसी दिन तो ऐसी स्थिति आ जाती कि मेरी जेब में आनंद विहार से वसंधुरा लौटने के आॅटो के ही पैसे रहते। उसके अलावे एक पैसे नहीं रहते। वह तो शुक्र था कि परिवहन निगम से मासिक पास बनवा लिया था इस कारण वहां आने-जाने की चिंता न थी। लेकिन भूख में अंदर से कमजोरी कुछ ज्यादा ही पीड़ादायी हो जाती। आंखों के आगे अंधेरा छा जाता और दिमाग चक्कर काटता। बहुत जोर से उंघाई आती, लेटने की तलब होती लेकिन जोशी जी के लेखन के समय वह आराम कहां? वह तो अविराम भाव से गतिमान रहते थे। हमारी इस दुविधा को वे कितने समझते थे यह तो मैं नहीं कह सकता लेकिन मेरे संघर्ष का इलहाम उन्हें था। उनके साथ काम करते हुए बराबर यह महसूस हुआ कि उनके मन में मेरे प्रति एक हमदर्दी थी। इसकी वजह यह भी रही हो कि मुसीबतों में घिरे रहने की वेदनापूर्ण स्थिति में भी मैंने कभी उनके समक्ष अभाव का रोना नहीं रोया। वह तब तक के मेरे जीवन के सबसे बुरे दिन थे। उतना विकटपूर्ण आर्थिक हालत पटना में एकाध बार हुई थी जब एक सर्वे करने वाली कंपनी में उसके तीन दिन दिनों के लंबे-चौड़े प्रवचन के बाद कंपनी के सिगरेट सर्वे के लिए दीघा गया था एक सप्ताह। और वहां भी अंततः एक पैसा हाथ नहीं आया था। हम जैसे मध्यवर्गीय बेकार नौजवान उन दिनों घर से भी उपेक्षा का दंश झेल रहे थे और दैनंदिन जीवन भी पहाड़ की मानिंद दुरूह और अभेद्य जान पड़ता था। जीवन और मौत का फासला ऐसे ही करुण क्षणों में मिट जाता है। और लोग आत्महत्या का रास्ता अख्तियार करते हैं। यहां हर अभाव के बाद भी मन को एक संतोष था कि हिंदी के एक बड़े लेखक से जुड़ा हुआ हूं। हमारे यहां सामंतवाद ने यही तो सीखाया है कि कुछ नहीं के बाबजूद गर्विली दर्पोक्ति में अपना यह खोखलापन हम नहीं छोड़ पाते। फिर मन को एक रचनात्मक सुकून भी तो इन्हीं स्थितियों में मिलता था। एक दिन उन्होंने कहा कि उनके पास बहुत सारे वस्त्र हैं अगर मैं चाहूं तो वे मुझे दे सकते हैं। उस दिन मुझे उनका यह व्यवहार बहुत बुरा लगा था। लेकिन अपना प्रतिरोध दर्ज करने का साहस नहीं हुआ था। मन ही मन कई दिनों तक मैं घुटता रहा था। बाद में मुझे अपनी इस प्रश्नाकुलता पर गहरा अफसोस हुआ। जिस तत्परता से मैं उनके घर से पत्रिकाएं और किताबें ले जाता था शायद उन्होंने सोचा हो इसे वस्त्र भी दिया जाए। इसीलिए उन्होंने पूछा होगा। मुझे तब उनका यह पूछना बुरा लगा था। उस दिन मेरे स्वाभिमान को गहरा आघात लगा था, लेकिन तब मन ही मन मैंने इसे बिसार दिया था। उनके घर हर दिन काम खत्म करते वक्त जो चाय मिलती वह दिन भर की थकान को सोख लेती। मैंने अब तक के जीवन में इतना सुस्वादु चाय कभी नहीं पिया। उस चाय में गोल मिर्च का स्वाद भी समाहित था जो पूरे दिल्ली में मुझे कहीं नहीं मिली। युवा कवि आर.चेतन क्रांति दंपति के घर की चाय बहुत अच्छी लगती थी, लेकिन भगवती आंटी वाली चाय के आगे वह भी फीका ही मालूम पड़ती। जोशी जी से जुड़ी कई और बातें याद आती हैं। लेकिन स्पेस का अभाव है इसलिए उसपर आगे कभी। 

आज जब जोशी जी हमारे बीच नहीं हैं, अपनी अकर्मण्यता पर मुझे गहरा पश्चाताप हो रहा है। उन्होंने जो सौ रुपये होली से घर से लौटने के बाद पटना से मखाना लाने के लिए दिए थे, वह मखाना मैं उन तक नहीं पहुंचा पाया। एक तो संयोग ऐसा रहा कि उनसे छूटते ही मैं दिल्ली छोड़ गुवाहाटी चला गया और बाद के दिनों में दिल्ली पहुंचा भी तो जल्द ही बिहार विधान परिषद में नौकरी लग गई। यह सब जाबिर हुसेन साहब की सदाशयता थी कि बगैर परिचय के भी उन्होंने मुझे इस लायक समझा। फरवरी, 2006 में विश्व पुस्तक मेले में जब दिल्ली जाना हुआ तो इच्छा थी कि उनके दिए गए सौ रुपय उन्हें चुकता करता चलूं किंतु वहां मेला और मित्रों परिचितों से मिलने-जुलने में ही इतना वक्त निकल गया कि उनके पास नहीं जा पाया। अब जबकि वे नहीं हैं सोचता हूं उनके घर जाउंगा तो कैसा लगेगा? उनकी पत्नी भगवती जोशी मुझे बहुत आदर देती थीं, लेकिन जोशी जी की अनुपस्थिति में मिलते हुए मैं उन्हें सांत्वना का कौन-सा शब्द कहूंगा। मैं तो खुद ही शुरू से ही संकोची और अंतर्मुखी स्वभाव का रहा हूं। मेरा संशयग्रस्त मन इस समय अजीब उहापोह में है। उसे समझ में नहीं आ रहा कि वह मनोहर श्याम जोशी के इस रुपये का का कर्ज इस जन्म में चुका पाएगा भी या नहीं।

संपर्क :
अरुण नारायण 
मोबाइल : 8292253306
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एल सी टी घाट, पटना की एक दोपहर


शहर की व्यस्तता सहज ही अपनी ओर हमारा ध्यान आकर्षित करती है, पर उस व्यस्तता के पार पड़ा मौन ! उसका ख़याल किसे है ? कौन करना चाहता है साक्षात्कार उसके मौन का जो रिरिया रहा है। कई बार तो ऐसा होता है कि पूरी ज़िंदग़ी शहर में खपा देने के बावजूद भी शहर हमसे अपरिचित ही रह जाता है। क्यों हम उसे दिलोजां से चाह नहीं सके ? क्यूँ हमने उसे भींचकर गले नहीं लगाया ? क्या इसकी वजह हम सही-सही बता पाने में सक्षम होते हैं, नहीं न। क्या इसके पीछे भी वही कारण विद्यमान हैं जो हमारे पारिवारिक विघटन का है। शहर बाँहें फैलाये पितृवत हमारा आलिंगन करने को तैयार रहता है और हम मुंह फेरे उसकी उपेक्षा कर जाते हैं, आगे बढ़ जाते हैं। पर कभी-कभी संयोग से ही सही...हम आमने–सामने टकरा ही जाते हैं। ऐसे में भला आँखें कैसे चुरायें। 

तो एक दुपहरी मेरा सामना अपने शहर से हो ही गया। हमने एक-दूसरे का कुशल–क्षेम पूछा। हालांकि शहर को तो मेरी हर एक बात की जानकारी थी। दरअसल मैं अपने एक संबंधी की मिजाजपुर्सी में दानापुर–गाँधी मैदान रोड पर स्थित महावीर वात्सल्य अस्पताल गया हुआ था। मित्र रजनीश साथ में थे। हॉस्पिटल से निकलते ही मेरी दृष्टि सामने फैली गंगा के विशाल सूखे पाट पर पड़ी। पता चला कि सामने जो द्वार है, वह एल सी टी घाट का प्रवेश द्वार है। पोस्टरों से ढंके उस द्वार पर घाट का नाम लिखा होगा या नहीं...नहीं पता। मित्र से ही पता चला कि हमारे ऑफिस के सहदेव भैया का घर इधर ही है। मोहल्ला का नाम है–मैनपुरा। ऐसी जानकारी हमें थी कि छुट्टी के दिनों में वे एल सी टी घाट की तरफ ही घूमते पाये जाते हैं। उनकी सुबह की शुरुआत तो नित्य गंगा–दर्शन से ही होती है। 

खैर, हमें निराश नहीं होना पड़ा। अनुमान के मुताबिक हमारी नजर उन पर पड़ ही गयी। हम सड़क पार कर उनसे मिले, वे कुछ देर पहले ही पहुंचे थे। तय हुआ कि एल सी टी घाट पर गंगा का दर्शन करते चलें। अब आपका सवाल यह हो सकता है कि जब हम घाट पर थे ही तो आगे जाने की क्या आवश्यकता थी। तो सुनिये दुःख-भरी सच्चाई―गंगा घाट के प्रवेश-द्वार से दो किलोमीटर दूर चली गयी है, गर्मियों में तीन किलोमीटर दूर चली जाती है।

जी हाँ, आपकी तरह मेरे मन में पहला सवाल यही घुमड़ रहा था कि एल सी टी घाट का पूरा नाम क्या है। सहदेव भैया एवं उनके एक मित्र द्वारा यह जानकारी मिली कि पूरा नाम तो उन्हें भी नहीं मालूम। हाँ, इतना तो पता है कि घाट को यह नाम पहलेजा घाट से पटना तक चलनेवाले स्टीमर से मिला― बच्चा बाबू का एल सी टी जहाज। पहलेजा ( सोनपुर ) के बच्चा बाबू के जहाज़ पूरे बिहार में चलते थे। साहेबगंज और मनिहारी के बीच तो यह आज भी चल रही है। बातचीत के क्रम में ही पता चला कि एल सी टी जहाज का उपयोग ज्यादातर माल लदे ट्रक ढोने में होता था। यानी एल सी टी घाट एक नदी बंदरगाह का काम करता था। यात्रियों की आवाजाही भी इसके द्वारा होती थी। लोग अपनी गाड़ियों सहित पटना की यात्रा कर आते थे। पर महात्मा गाँधी सेतु बनने के पश्चात एल सी टी घाट सहित पटना के अन्य घाटों का महत्व परिवहन हेतु कम होता गया। भैया ने बताया कि 1991 के बाद से कभी गंगा एल सी टी घाट को छू नहीं पाई सिवा बरसाती बाढ़ के। एल सी टी जहाज इस घाट से भले ही दूर हो गया हो, पर उसकी स्मृति शहर को है एवं उसके निवासियों को भी―वह अपना नाम जो छोड़ गया है।

ओह! मैं तो परिचय में ही आगे बढ़ता जा रहा हूं। आखिर एल सी टी का पूरा नाम भी तो बताना है। इसका पूरा नाम है―लैंडेड क्राफ्ट टैंक। इसे पहले टैंक लैंडिंग क्राफ्ट ( टी एल सी ) के नाम से भी जाना जाता था। द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान इसका निर्माण टैंकों को समुद्र या नदी के तट पर उतारने के लिए ब्रिटिश रॉयल नेवी द्वारा किया गया था। युद्ध के पश्चात् इसका उपयोग बदला, लेकिन नाम रह गया। इसका उपयोग माल ढुलाई एवं यात्रियों की आवाजाही के लिए होने लगा।


अब फिर से अपने सफ़ऱ पर लौटा जाय। घाट का प्रवेश–द्वार पार करते ही हमारा सामना एक स्टीमर के जीर्ण–शीर्ण होते जाते अवशेष से होता है जो मिट्टी में आधा धंसा आज भी वहां के वाशिंदों को अपनी पुरानी स्मृतियों में खिंच ले जाता है। अगल–बगल दो-चार गुमटियां खड़ी हैं जहाँ से आप बिस्किट, नमकीन, कोल्ड ड्रिंक, पानी आदि चीजें खरीद सकते हैं। वहाँ फैली गंदगी को देखकर हो सकता है कि आप आगे बढ़ने का विचार त्याग दें, पर गंगा का चुम्बकीय आकर्षण कदमों को आगे बढ़ने पर मजबूर कर देता है। आगे नहरनुमा  नाला पड़ता है जहाँ सीवरेज की गंदगी आकर जमा होती रहती है। नाला में प्रवाह नहीं है जैसा कि दिल्ली के नालों का प्रवाह होता है। यहाँ रुका हुआ पानी सड़ता ही जा रहा है...अनवरत!



आगे बढ़ने पर हमारा सामना गंगा एक्सप्रेस-वे के निर्माण कार्य से होता है। गंगा की छाती पर अनवरत कील ठोंकने का काम चल रहा है और गंगा यीशु की तरह कराहकर कहती है―हे ईश्वर! इन्हें माफ़ कर देना। ये नहीं जानते, ये क्या कर रहे हैं। इन्हीं सोच में आगे बढ़ रहा था कि  फर्राटे मारती मोटरसाईकिल धूल उड़ाती निकल गयी। आगे का रास्ता हरियाली से भरा था। दोनों तरफ सब्जियों के खेत दिखने लगे। यह दियारा है जो खूब उपजाऊ क्षेत्र है। बैंगन, टमाटर, करेला, नेनुआ, कद्दू इत्यादि सब्जियां यहाँ उगाई जा रही हैं। परवल की लतायें नई अंगड़ाई ले रही हैं। खेतों में टमाटर ज्यादा पक कर सड़ रहे हैं, सूख रहे हैं। पता चलता है कि मंडियों तक पहुँचाने का खर्च लागत से अधिक पड़ रहा है और मंडी में दाम भी कम मिल रहे हैं। इस साल पैदावार अधिक होने के कारण वैसे भी सब्जियों की कीमतें कम रही हैं।


दियारा क्षेत्र पर किसानों का अधिकार परंपरागत रूप से कायम है, पर इस जमीन के स्वामित्व का कोई लिखित प्रमाण इनके पास नहीं है जिसके कारण निर्माण-कार्य में चली गयी जमीनों का कोई मुआवजा इन्हें नहीं मिल पाता है। खेतों के बीच से गुजरते हुए आखिर हम वहाँ पहुँचते हैं जहाँ एल सी टी घाट का बोर्ड लगा हुआ है। वहीं रास्ते के दोनों तरफ़ कुछ झोंपड़ीनुमा घर हैं, कुछ मचान बने हुए हैं। ज्ञात हुआ कि खेतों में काम करनेवाले लोग यहीं बस गए हैं। ये लोग खेती के साथ-साथ मवेशी भी पाले हुए हैं। पिछली बरसात में जब गंगा का पानी एल सी टी घाट पर खतरे के निशान से खतरनाक ढंग से ऊपर बह रहा था तो ये लोग मचान पर अपना डेरा जमाये हुए रहे। और तो और...नाव पर सवारी करते शहर में दूध भी बेच आते थे। खेतों में सूखी जमीन पर उनकी नावें भी पड़ी थीं।


हम आगे चले। यह क्या! गंगा की धारा तो थिर हो चली थी। दियारा की मुख्य भूमि से 10–15 फ़ीट नीचे जाने पर हमने गंगा का स्पर्श किया। पटना के अन्य घाटों की तरह यहाँ का जल भी प्रदूषित था। बोतल पास होने के बावजूद जल भरने की हिम्मत नहीं कर सका। अब भी यहाँ से पहलेजा के लिए नावें चलती हैं, पर यह धंधा अब फायदेमंद नहीं रह गया है।


वापस होते समय मन में एक ही बात आ रही थी कि आखिर हम कब रुकेंगे...रुकेंगे भी या नहीं। क्या हम गंगा की धारा को पूरी तरह रुक जाने का इंतज़ार करेंगे। वैसे हम कर तो यही रहे हैं। बड़े बाँध बनाकर रास्ते में गाद जाम कर रहे हैं तथा शहर का कचरा सीधे इसमें प्रवाहित कर रहे हैं। एक समय साहिर ने लिखा था―
" गंगा तेरा पानी अमृत झर-झर बहता जाए
युग-युग से इस देश की धरती तुझसे जीवन पाए "

आज गंगा के प्रति हमारी उपेक्षा से तो यही जाहिर होता है कि हमारा प्रयोजन अब इससे नहीं रहा। तभी तो भूपेन हजारिका गा  उठते हैं―
" ओ गंगा तुम, बहती हो क्यूँ..."


जीवन क्या जिया : प्रस्थान

प्रभात झा, केदार कानन, सुभाष चंद्र यादव, रमण कुमार के साथ तारानंद वियोगी

राजकमल चौधरी की प्रासंगिकता इस कारण और बढ़ जाती है कि उन्होंने उपेक्षित लोगों के संसार को एक अलग नजरिये से देखा जो समाज के लिए गाली बनता जा रहा था...बिना किसी पूर्वाग्रह और लाग–लपेट के। सभ्यता एवं जीवन के उन वर्जित इलाकों में उन्होंने प्रवेश किया जहाँ बहुतेरों की हिम्मत आज भी नहीं होती। उन्होंने अपनी शर्तों एवं सिद्धांतों पर जीवन जिया। उनके जीवन की बहुत-सी बातें एवं प्रसंग जो छूट रहे थे, बहुत सी कड़ियाँ जो जोड़ी जानी थीं, का विषद वर्णन तारानंद वियोगी की रचना 'जीवन क्या जिया : राजकमल चौधरी के उत्तर–प्रसंग' में हुआ है। विश्व पुस्तक मेला , नई दिल्ली में इस पुस्तक के आ जाने की उम्मीद है जिसमें आप जान पाएंगे कि फूल बाबू का गांव उनके बारे में क्या राय रखता है, परिवार एवं बिरादरी की कौन-सी परंपराओं को उन्होंने झटके से तोड़ डाला जो रूढ बनती जा रही थी एवं साहित्य जगत में क्यों आज भी उनपर सभी एकमत नहीं हो पाते हैं। धूमिल कहते हैं―"वह एक ऐसा आदमी था जिसका मरना / कविता से बाहर नहीं है।" जीवन क्या जिया के प्रस्थान भाग में हम वहाँ पहुँच गए हैं जिसका उल्लेख रचना के शुरू में है तो अंत में भी वही जगह समाज के लिए सवाल खड़ा करती है यानी कि फूल बाबू का घर। तस्वीर में राजकमल के घर के आगे कुछ लेखक खड़े हैं। वहाँ पर लेखकों का जत्था आखिर क्या महसूस कर रहा था, क्या सब याद आ रहा था उन्हें...क्या देखा उन्होंने कि वे बेचैन हो गए थे। सुनिए स्वयं 'जीवन क्या जिया' के रचनाकार तारानंद वियोगी की जुबानी।


–––तो, मैं बता रहा था कि उस दिन केदार और सुभाष भाई आए थे। बरसों बरस के बाद हम राजकमल का घर देखने गए थे। घर देखकर हमारी आंखें भर आई थीं। वापस आकर हम ‘बदरिकाश्रम’ में बैठ गए थे और हजार तरह की चिंताओं में मुखर हो गए थे। केंद्र में राजकमल थे। केदार को ‘फूलबाबू का बंगला’ बेहद याद आ रहा था। उसका इस तरह नहीं होना उन्हें सदमे में डाल गया था। वह नहीं रहा तो उसके बदले में कुछ और होता! जैसे कोई स्मारक। वह नहीं तो कोई घर ही, जो उनका होता। कुछ भी नहीं होना यानी कि जंगल झाड़ फूस होना वाकई दुखी करता था। एक बार का जयंती समारोह हमने उसी बंगले पर मनाया था। वह केदार को याद था। देर तक हम उस बारे में चर्चा करते रहे। उन्होंने पूछा–उस बंगले का कोई फोटो है ? फोटो था। मैंने उन्हें दिखाया। उन्हें याद आया कि उस बंगले पर एक सरकारी साइनबोर्ड लगा रहता था, जिस पर लिखा था–पशुपालन विभाग, कृत्रिम प्रजनन केंद्र। मैंने उन्हें बताया कि उस बंगले के बारे में बनगांव के एक कवि रमेश चंद्र खां ‘किशोर’ ने एक कविता भी लिखी थी–राजकमल के देहांत के एक दो बरस बाद। केदार को कविता मालूम थी, फिर भी उसका एक बार फिर पाठ किया गया― " पत्थर पर दूब / कठिन है अथवा / असंभव, यह तो माटी का संयोग / या फिर तृप्ति का आकर्षण / या फिर वासना का योग! भखड़ी हुई चिकनी माटी पर / सुस्पष्ट है तुलसी के सिर पान की जड़ / जैसे आपरेशन टेबुल पर चिथड़े–चिथड़े हुआ उसका शरीर–––सचमुच, इसीलिए तो भूल गई / वह बेशरम उग्रतारा / उस भंगीबे को / निर्लज्जी को आज भी लाज नहीं कि खड़ी है अब तक / कचहरी में पुरुषों के बीच / डाइवोर्स के कठघरे में–––इसीलिए तो / महिषी का काटेज नुमा घर / माहिष्मती का दरिद्र ‘राज मंदिर’ / स्वार्थ की आंधी में / ढह गया/ बन गया भैंसों बैलों का बथान / टंग गया प्लेट मवेशी अस्पताल का / जिसमें कोष्ठित हुआ–कृत्रिम प्रजनन केंद्र / नन्हें नन्हें अक्षरों में–––‘कृत्रिम’ और ‘स्वतः' के मध्य की यह रेखा / दरअसल विरोध की रेखा / बहुत गहरी हो गई है अब / जैसे कि फूलबाबू की यही हो वसीयत / और जिसका साक्षी हो महिषी गांव / और यहां वाली उग्रतारा–––वह तो भूल ही गई बेटखौकी / निस्पृह हुई डायन / तभी तो उसी के लिए खिला गुलाब / उसी के निमित्त अर्पित गेंदा / बन गया पीला कपीस / उजला सफेद / जैसे मरीज श्वेत कुष्ठ का / कि जैसे गोबर के ढेर पर / भादो की बदली में जनमा कोई कुकुरमुत्ता–––" कविता ने हमें और भी उदास कर दिया।

–जानते हो केदार, वह जमीन जिस पर उन्होंने बंगला बनवाया, उन्हें आराम से मिल गया हो, ऐसा भी नहीं था। वह जब 1966 में गांव आए तो इसी जमीन को उन्होंने घर बनाने के लिए पसंद किया। पुराने खतियान में वह उनके पुरखों की थी भी। लेकिन नया सर्वे चालू था। और यह जमीन दबंगों के कब्जे में थी। दबंग भी उन्हीं के गोतिया थे। स्थानीय प्रशासन और राजनीति पर दबंगों की पक्की पकड़ थी। मधुसूदन बाबू से तो यह सात जनम में नहीं होनेवाला था। राजकमल ने इसे लड़कर हासिल किया था। यानी कि देह के स्तर पर लड़कर–––

–लेकिन आज यह जमीन नीलू के कब्जे से कैसे निकल गई ?

–नहीं। निकली नहीं। निकाल दी गई। दरअसल यह प्लॉट राजकमल तीनों भाइयों के ही हिस्से में आया था। लेकिन केदार, शरम की बात है लेकिन सच है कि उस स्थल को बुधवारय परिवार घोर अशुभ मानता था। पंडितों के विधान के मुताबिक उस पर शौच कर्म के अतिरिक्त कुछ भी नहीं किया जा सकता था। सभी तो चाहते थे कि वह नीलू ही ले, लेकिन शशिकांता जी अड़ गर्इं। उन्होंने यहां तक कह दिया कि नीलू को हिस्सा न दें सो ठीक, लेकिन वह जमीन नहीं चाहिए! तुमने देखा न, नीलू के चचेरे भाई को वह जमीन मिली है, लेकिन उस जगह उसने घर नहीं बनाया, हटकर बनाया। वहां जंगल है–––

–ओह! वहां कोई स्मारक होता!

–हम तो बीस बरस से यह चाहत लेकर बूढ़े हो रहे हैं केदार! जानते हो, 1978 में हरिमोहन बाबू (प्रख्यात लेखक) हमारे गांव आए थे। उग्रतारा के दर्शन के बाद खासतौर पर वह उस बंगला को देखने पहुंचे थे, और उस क्षण की अनुभूति को उन्होंने एक मार्मिक कविता में उतारा था–" मन में आया–रहता यदि यहां उनका कोई स्मारक / छोटी सी भी कोई प्रस्तर मूर्ति / फूल मैं चढ़ाता उनके सम्मान में/ लेकिन वहां कीचड़ मात्र कीचड़ था ठेहुने भर तक / कमल जा चुका था, कीचड़ ही कीचड़ था अब शेष। ऐसी ठेस लगी हृदय में कि जैसे / वहां बहुमूल्य अपना कुछ खो आया हूं–––"

–ओह!

–बहुत बोझ महसूस करते हैं यार! लेकिन उससे क्या होगा ? वे तैयार हों तभी तो!

फिर हम बात करने लगे कि राजकमल का परिवार उस घर, उस जगह को अशुभ क्यों मानता था। उसमें रहते हुए राजकमल मरे, केवल इतनी सी बात नहीं थी। रेणुजी के धरमपुर इलाके से माहिर कलाकारों को बुलवाकर राजकमल ने फूस के बने उस बंगले का सुरुचिपूर्ण निर्माण कराया था। इसका उपयोग वह अपने ऑफिस के रूप में करते थे, जिसमें शयनकक्ष और अतिथिकक्ष भी अलग अलग थे। शशिकांता जी पुराने आंगन में रहती थीं, जिसे हम ‘फूलबाबू का आंगन’ कहते थे, और वह मधुसूदन बाबू के आंगन से लगा हुआ था। केवल खाना खाने के लिए राजकमल आंगन जाते थे। बाकी सारा समय यहीं बिताते थे। उस जमाने के पारिवारिक बच्चों से पूछो तो वे यही बताते हैं कि जब भी कभी चाय पहुंचाने या किसी दूसरी बात के लिए वे वहां जाते तो उन्हें हमेशा लिखते हुए ही पाते थे। लेकिन, यह सच का केवल एक पहलू था। दूसरा यह था कि पड़ोस की एक विधवा युवती लगभग हमेशा उनके आस पास पाई जाती थी। गांव में फूलबाबू का रुतबा लगभग वैसा ही था, जैसा ‘पाथर फूल’ के फूलबाबू का हम देखते हैं। यानी कि कोई भी विरोध उन्हें मंजूर नहीं था। उस विधवा के बारे में समूचा गांव ‘जानता’ था कि बड़े बड़े अघोरियों से उसकी सांठ–गांठ है और यह कि वह ‘हक्कल डायन’ (विनाशक तांत्रिक अभिचारों में निष्णात) है। यह प्रसिद्धि थी कि राजकमल उस स्त्री का केवल दैहिक भोग ही नहीं करते बल्कि उससे ‘डायन’ सीख रहे थे। प्रख्यात लेखक सोमदेव, जो तंत्र विद्या के भी पारंगत हैं और राजकमल के मित्र भी रहे हैं, ने बताया था कि हां, राजकमल की मौत साधारण मृत्यु नहीं थी, तांत्रिक अभिचार में ही उनकी जान गई थी। उनका कथन था कि उच्चाटन प्रक्रिया सीखते हुए उनका संतुलन बिगड़ा और उन्हें जान गवांनी पड़ी थी। दूसरी ओर, यह भी कहा जाता था कि उस स्त्री की नकेल उन दबंगों के हाथ में थी, जिनसे लड़कर राजकमल ने वह जमीन हासिल की थी। विश्वास किया जाता था कि उस समूची जमीन को इस तरह ‘बांध’ दिया गया है कि उस पर बसकर सुखी जीवन बिताना असंभव है। शशिकांता जी का इस बात पर अटल विश्वास था। और, उस बंगले में एक और बात यह थी कि इलाके भर के मुफ्तखोर नशेड़ी दिन दिन भर वहां बैठकर फूलबाबू का दरबार करते, उनकी चिलम भरते रहते थे, या फिर मांस मछली भांग दारू का इंतजाम करते थे। और इन सबके बीच, राजकमल जीवन में आखिरी बार प्रेम की तलाश में थे। वह अलकनंदा दासगुप्त थीं, जो बनारस में रहती थीं। हर दिन उन्हें पत्र लिखते। उनके लिए कविताएं लिखते। इन दिनों तो वह गजलें और शेरो शायरी लिखने लगे थे, जो शायद जरा भी जमती नहीं थी। लेकिन वह हमारे आपके लिए शायद थी भी नहीं। वह जिसके लिए थी, उस पर जमती हो! मृत्यु से सिर्फ 126 दिन पहले, 12 फरवरी 1967 को इसी बंगला में बैठकर राजकमल ने अपने मित्र शंभुनाथ मिश्र को लिखा था–‘अलका को बीवी बनाकर रख लेना होगा, चाहे धर्म से, या कानून से, सहमति लेकर नहीं, सिर्फ उसे हमेशा के लिए साथ रख लिया जाए, मगर मुझे तो गांव में ही रहना होगा–और, गांव की अपनी सीमाएं होती हैं। क्या वह एक किसान लेखक की बीबी या प्रेमिका या रखैल बनकर स्थायी रूप से रह सकेगी ? वह कहती है, मगर, मुझे यकीन नहीं होता है।’

वह बंगला अब नहीं बचा था। लेकिन, उधर ‘फूलबाबू का आंगन’ भी नहीं बचा था–वह आंगन जहां हम अतिथियों के लिए भोजन बनवाते थे। पर, वह नीलू के दखल में था। चारों ओर से घेरकर नीलू ने लोहे का ग्रिल लगवा दिया था, जिस पर लिखा था–राजकमल निवास। ग्रिल की छेद से झांककर देखो अंदर जंगल झाड़ उगा दिखता था। और मधुसूदन बाबू का वह मकान–जिसमें 1934 का भूकंप आया, और जिसमें बंगालन संन्यासिन आर्इं, और जिसके कोठे पर प्रवेश की अनुमति मधुसूदन चैधरी और त्रिवेणी देवी को छोड़कर किसी को भी नहीं थी, और जहां राजकमल ने अपनी अनंत यात्रा का पहला कदम उठाया, और जहां नागार्जुन किसुन जैसे कितने ही दिग्गजों की ‘पानी पीढ़ी’ लगी थी, और जिसके बरामदे पर बैठाकर हम अपने अतिथियों को भोजन कराते थे–वह जर्जर हवेली, सुनसान वीराने में चीत्कार कर रही थी। टूटा ही सही, लेकिन किवाड़ अब तक मौजूद था। दीवारें ढह रही थीं। ऊपर चढ़ने की सीढ़ियां ध्वस्त हो चुकी थीं। नीचे आंगन में विशाल ‘झाड़ झंखाड़’ उग आए थे। वहां अब कोई आदमी नहीं रहता था। वहां रहने वाले अंतिम आदमी सरोज बाबू थे। उनकी मृतात्मा के प्रति हमने कृतज्ञता ज्ञापित की कि जब तक वह जीवित रहे, इस घर को घर की गरिमा मिलती रही। केदार बोले–लेकिन मित्र, उस आंगन में जाकर तो तुम बिल्कुल से बेचैन आत्मा दिख रहे थे! कुछ ज्यादा ही विचलित नहीं थे ?

मैं झेंप गया। अब मैं केदार को कैसे समझाता कि उस वक्त मेरे साथ क्या हुआ था! हुआ यह था कि दो वीर बांकुरे मेरी आंखों में आकर खड़े हो गए थे। वे दोनों लालकाका और फूलबाबू थे। और, मैं एक ही साथ दोनों की ‘उचिती’ कर रहा था–आप दोनों ही गलती पर थे महाराज! दोनों ही कुपंथ चढ़े थे! बाप बेटे भी कहीं इस तरह लड़ते हैं! ज्ञानी बाप बेटे!

संपर्क :
तारानंद वियोगी
मोबाइल – 09431413125
ईमेल – tara.viyogi@gmail.com

मेरी आप–बीती...मेरी कहानी

समय का पहिया कभी भी रुकता नहीं है। उसके साथ कभी हम कदमताल करते हैं तो कभी बहुत पीछे छूट जाते हैं। आगे जाने की तो हमसे सोचा ही नहीं जाता। परन्तु इस धरा के इतिहास को अगर पलट कर देखें तो समय के आगे चलना भी संभव जान पड़ता है। तो क्या हम गलत होते हैं उन क्षणों में, जब समय दूर खड़ा मुंह चिढाता है। शायद नहीं, तो वे कौन से कारण हैं जिसके चलते हमारे कदम ही हमारा साथ छोड़ने लगते हैं?

हम अपने समाज के अतीत-आख्यान पर नजर डालें तो हमें उन कारणों का पता चलता है, जिसके चलते हमारे कदम समय के आगे चलने से इंकार कर देते हैं। मेरी समझ से जब हम समाज में अपनी स्थिति को रूढ मानने लगते हैं, तभी हम समय से होड़ करने में अपने को अक्षम बनाने की ओर एक और कदम बढा लेते हैं। ऐसी ही एक रूढि हमारी जाति-व्यवस्था है जो अबतक के समाजिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक बदलाव के बावजूद अपने वीभत्स रूप में हमारे सम्मुख विराजमान है।

मेरी कहानी एक ऐसे परिवार के बीच से शुरू होती है, जिसे मैंने होश संभालते ही जात-पाँत के मामले में उदार बने देखा। ननिहाल में भी ऐसा ही माहौल था। उस समय खेतों में काम करनेवाले मजदूरों के हित सीधे-सीधे किसानों के हित से जुड़े होते थे। उनके अपनत्व के पीछे यही कारण था कि दोनों ही वर्ग बहुत समय से जमींदारी व्यवस्था में पीसे जा रहे थे। मेरा बचपन माँ ,दादी, नानी आदि की गोद में तो बीता ही, साथ ही कुछ माँझी परिवारों की गोद में भी। आज भी वे मुझपर वही अधिकार जताते हैं और मैं उनके स्नेह-वत्सल रूप के सामने सर झुका देता हूँ। ऐसे परिवेश में भला जातीय कट्टरता के अंकुर कैसे फूट पाते।

बात 1990 की है। मैं छठी क्लास में था। मुझे राष्टीय ग्रामीण प्रतिभा खोज परीक्षा में सम्मिलित होने हेतु अपने जिला मुख्यालय नवादा जाना था। साथ में बड़े पापा को चलना था। सुबह अचानक पता चला कि आज कुछ पार्टियों द्वारा बंद का आयोजन किया गया है। बड़े पापा ने साइकिल से चलने का निर्णय लिया। पच्चीस-तीस किलोमीटर का सफर शुरू हुआ। जैसे ही हमलोग स्थानीय बाजार हिसुआ पहुंचे, चारों तरफ सन्नाटा छाया हुआ था। इतने में कुछ गाड़ियां पर्चे गिराती हुई आगे निकल गई। सबकुछ अजीब लग रहा था। खैर, हमलोग आगे चल पड़े। अभी पन्द्रह किलोमीटर की दूरी और तय करना था। हमलोग जब परीक्षा केंद्र पर पहुंचे तो पता चला कि परीक्षा रद्द कर दी गई है। लोगों के चेहरे पर चिंता की लकीरें साफ दिखाई पड़ रही थी। लेकिन उस समय मुझे कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था। हमलोग वापस घर की ओर चल पड़े। रास्ते में अचानक पुलिस गाड़ियों की आवाजाही बढ गई। हिसुआ बाजार पहुंचने के पहले मृतकों एवं घायलों को लिए एंबुलेंस गाड़ियां आती दिखी। मन में किसी अनहोनी की आशंका घिरने लगी। बाजार से कुछ पहले भीड़ खड़ी थी। उन्होंने बताया कि हिसुआ में गोलीबारी हुई है और जातीय दंगे शुरू हो गए हैं, आगे मत जाइये। हमलोग अपने एक निकट संबंधी के यहाँ रुके, जहाँ एक सप्ताह से अधिक रहना पड़ा। मार-काट की घटनाओं की सूचना छिटपुट रूप से मिलती रही। बाद में पता चला कि मंडल कमीशन की अनुशंसा को लागू करने के पश्चात पूरा देश इसी तरह जल रहा था। इस तरह पहली बार अंदर सोये जातीय कट्टरता के बीज पर जैसे पानी का छींटा पड़ गया। बाल-मन में अबतक ग्रहण किए गये विचारों पर इसकी धुंधली छाया-सी पड़ने लगी। 

यह तो संयोग कहिए कि वे छींटे जल्दी ही सूख गए जब सातवीं कक्षा में पढने के दौरान मुझे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की सात दिवसीय शिविर में भाग लेने वारिसलीगंज जाना पड़ा। वे सात दिन मेरे लिए अहम थे। वहाँ पहुंचते ही हमें एक अलग तरह के अनुशासन का सामना करना पड़ा यानि स्वयंसेवक बनने की प्रक्रिया शुरू हुई। रात में वहाँ उपस्थित संघ परिवार के सभी सदस्य खाने के लिए एक ही पंगत में बैठे। यह एक नया अनुभव था। अभी तक गांव में अलग-अलग जातियों को अलग पंगत में खाते देखा था। आज भी कमोबेश कई जगह यह व्यवस्था कायम है। शायद अभी और भी बहुत कुछ सीखना बाकी था। अगले दिन शाम की खेलकूद के बाद सभी को अलग-अलग पत्तल में भुना हुआ चुड़ा और मूंगफली खाने को दिया गया। अचानक हमारे वर्ग-प्रशिक्षक ने हमें रोका। हम सब उनकी ओर देखने लगे। उन्होंने सभी के पत्तलों पर रखे चुड़ा और मूंगफली को एक जगह मिला दिया और बोले,"अब सभी साथ खाओ।" थोड़े-से संकोच के साथ खाना शुरू होते ही सभी के दिमाग में पल रही कई गाँठें खुल गई। संघ जात-पाँत के बंधन तोड़ने में वाकई एक हद तक सफल हुआ है। काश! यह संगठन सभी समुदायों को इसी तरह जोड़ पाता।

बीसवीं सदी के अंतिम दशक में बिहार जाति के आधार पर हुए नरसंहारों के कारण चर्चित रहा। यही समय युवावस्था में प्रवेश का समय था। जातीय उन्माद चरम पर था, परन्तु इसके मूल कारणों पर ध्यान देने की बजाय लोग इसे बढावा देने में जुटे हुए थे। मीडिया की भूमिका भी सकारात्मक नहीं थी। युवा-मन भटकने लगता था। यह उम्र ही भावुकता की होती है, पर कुछ रचनात्मक करने का भी यही वक्त होता है। यह षड्यंत्रों को समझने का भी समय होता है। दरअसल कुछ बड़े माफिया इसकी आड़ में अपना हित साध रहे थे। आज ये लोग सदनों की शोभा बढा रहे हैं। वहाँ ये अपने हित के लिए कट्टर विरोधियों से भी हाथ मिला लेते हैं और हम सामान्य जनता मन में भेदभाव रखे रह जाते हैं। यही स्थिति समाज को समय के साथ होड़ कर चलने में बाधा पहुंचाती है। बस भावुकता की अंधी गलियों में नहीं भटक, परिस्थिति का यथार्थपरक मूल्यांकन कर आगे बढें तो संभावनाएं स्वतः अपना द्वार खोले खड़ी मिलेगी।