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अंतिम अरण्य - आंतरिक दुनियाओं का पारदर्शी यथार्थ : योगेंद्र कृष्णा



निर्मल वर्मा का उपन्यास ‘अंतिम अरण्य’ बीसवीं सदी की तरफ से इक्कीसवीं सदी की किवाड़ पर एक आत्मीय दस्तक की तरह था, जिसे हिंदी साहित्य के बड़े ही आत्मीय पाठकों ने उतनी ही आत्मीयता से पढ़ा। आज भी इस उपन्यास के पाठक इसकी ओर फिर-फिर लौटते हैं। योगेंद्र कृष्णा हमारे बीच के ऐसे ही आत्मीय कवि, गद्यकार एवं गंभीर पाठक हैं जिन्होंने इस रचना की गहराइयों में जाकर निर्मल की अनिभूतियों को संजीदगी से महसूस किया और वागर्थ के जूलाई 2001 अंक में यह पुस्तक-समीक्षा के रूप में सामने आई। अब आपके लिए अक्षरछाया पर उपलब्ध है।


अंतिम अरण्य : आंतरिक दुनियाओं का पारदर्शी यथार्थ
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कुछ समीक्षकों ने निर्मल वर्मा की औपन्यासिक कृति अंतिम अरण्य को मृत्यु का आख्यान कहा है। यह मान लेना समकालीन समीक्षा के परिदृश्य में पनप रही अतिसरलीकरण की सुविधाजनक प्रवृत्ति को स्वीकार कर लेना होगा। वास्तविकता यह है कि यह सिर्फ मृत्यु के आख्यान तक सीमित नहीं है। किसी की मृत्यु उसके जीवन की सत्ता का कितना सच्चा और कितना जीवंत दस्तावेज हो सकती है, इस सत्य का सूक्ष्म एवं संवेदनात्मक उद्घाटन भी है। यह जीवन और मृत्यु के व्यापक संदर्भों को व्यक्ति के नैतिक और आत्मिक संघर्षों के बीच परत-दर-परत खोलता है।

यहां पात्रों के जीवन का एक संपूर्ण कालखंड उनकी गहनतम संवेदना की परती भावभूमि पर उनके जीवन में एक बार पुनः घटित होता दिखता है। पात्रों के भीतर जीवन के एक खास समय तक जो कुछ घटित हो चुका है और जो कुछ अब तक अघटित रह गया है उसका इतना जीवंत और सशक्त चित्रण हमें इस औपन्यासिक कृति में मिलता है कि शब्दों को पढ़ते हुए अहसास होता है कि हम पढ़ नहीं रहे घटनाओं को घटित होते हुए, जीवंत दृश्यों की तरह देख रहे हैं… पात्रों के अन्तःस्वरों को सुन रहे हैं।

सारे चरित्र एक धुरी पर घूमते हुए… जीवन के एक खास मुकाम पर आकर जैसे ठहर-से गए हों… बावजूद इसके वे जितना ठहर-से गए हैं, उससे कहीं अधिक अपने भीतर की यात्रा पर निकल पड़े जान पड़ते हैं… अपने आत्मा की तलाश में अपने जिए क्षणों, न जी सके क्षणों के सुख-दुख, पछतावों, निर्णीत-अनिर्णीत क्षणों के बीच के शाश्वत द्वंद्व और यंत्रणाओं को एक बार फिर से अपने ही भीतर, अपने से दूर छिटककर देखते हुए।

उपन्यास के केंद्रीय चरित्र मेहरा साहब का, मृत्यु के हाशिए पर, जीवन की तमाम अर्जित-संचित क्लांति के साथ, नैतिक और आत्मिक संशयों के बीच विचरता जीवन इसका जीवंत प्रमाण है। मृत्यु के हाशिए पर जब हम अपने संपूर्ण जिए हुए जीवन की ओर एक बार पुनः लौटते हैं तो हम अपने उन पड़ावों को सिर्फ छूकर नहीं निकल पाते जिन्हें अपने चुने रास्ते जीने की अनिवार्यता में सिर्फ छूकर निकल जाना हमारी विवशता थी। उन छूटे हुए पड़ावों का संपूर्ण सच इस पलट-यात्रा में परत-दर-परत खुलता नजर आता है और कहीं हमारे चुने रास्तों के बारे में इन अंतिम क्षणों में हमें अनुत्तरित प्रश्नाकुलताओं से भर देता है। अपनी प्रश्नाकुल मनःस्थितियों से बार-बार टकराकर भी हम कुछ नहीं कर पाने की यंत्रणा झेलने को विवश होते हैं।

“हमारी जिंदगी में ऐसे मौके आते हैं, जब हम अपने को ही बाहर से देखने लगते हैं… हम जैसे खुद अपने ही दर्शक बन जाते हैं… अपनी देह के–जो मुझसे अलग होकर मुझे हिला रही थी–अपने रोने में जिसे मैं अपने से बाहर सुन रही थी।” (पृष्ठ - 148)

“कैसे कोई आदमी अपनी देह को छोड़कर अलग विचरता रहता है, किसी अजाने प्रदेश में, जहाँ हर पीड़ा की अपनी गली है, हर स्मृति का अपना आंगन, हर पछतावे का अपना पिछवाड़ा…” (पृष्ठ - 174)

कई-कई जिंदगियां जीने के क्रम में हम वह जिंदगी जीने का अवसर गंवा चुके होते हैं जिसे हम नितांत अपनी जिंदगी कह सकें। यह अहसास भी हमें तब होता है जब हम कुछ कर नहीं सकते।

“कितना अजीब है, जो रास्ता मुझे यहां तक लाया था, वह मुझे अपने से इतना दूर ले गया है कि वहां खुद मैं अपने को नहीं ढूंढ़ पाता।” (पृष्ठ - 170)

“जानते हो, इस दुनिया में कितनी दुनियाएं खाली पड़ी रहती हैं, जबकि लोग गलत जगह पर रहकर सारी जिंदगी गंवा देते हैं…” (पृष्ठ - 179)

“कभी-कभी तो उनकी बातें सुनते हुए लगता है कि वह अपनी नहीं, किसी दूसरे की जिंदगी के बारे में बता रहे हैं” (पृष्ठ - 43)

“जब (ज्ञान) आता है, तब तक बहुत देर हो चुकी होती है… तब आदमी उसके काबिल नहीं रहता। वह अपने चिमटे से सुख नहीं, उसकी राख उठाने आता है…” (पृष्ठ - 79)

उपन्यास के प्रारंभ में उद्धृत मार्सेल प्रूस्त के ये शब्द “हममें से किसी के पास समय नहीं था कि हम अपने जीवन के असली नाटकों को जी सकें, जो हमारी नियति में लिखे थे। यही चीज़ हमें बूढ़ा बनाती है–सिर्फ यह, और कोई नहीं। हमारे चेहरों की झुर्रियां और सलवटें उन विराट उन्मादों, व्यसनों और अंतर्दृष्टियों की ओर संकेत करती हैं, जो हमसे मिलने आए थे और हम घर पर नहीं थे।” इस उपन्यास के पात्रों के संदर्भ में विशेष अर्थवत्ता ग्रहण कर लेते हैं, और मेहरा साहब, निरंजन बाबू, अन्ना जी, तिया आदि के मन-प्रांतर में घटित हो रही दुनियाओं को समझने के लिए हमें आवश्यक उपकरणों से लैस करते हैं।

मेहरा साहब के मन की परतों से अंधेरे में, अपने स्वाभाविक रंगों में टिमटिमाते भरा-पूरा एक संपूर्ण आकाश उमगता है जो अंततः उन्हीं की बनाई सीमाओं या वर्जनाओं में, उनके एकांत कमरे की दीवारों और छतों से टकराकर, लहुलुहान, मन की उन्हीं परतों में लौट जाता है। यह ‘उमगना’ और ‘लौटना’ हम तिया के साथ अथवा तिया या दीवा के संदर्भ में उनके संवाद में, और संवादों के बीच तिरते सन्नाटे में, अकसर सुन सकते हैं।

सीधे किसी पात्र की मृत्यु (या जीवन ही) कोई अर्थ नहीं रखती। रचनाकार किसी पात्र को कई रास्तों में से किस रास्ते से मृत्यु तक– मृत्यु के स्वीकार या अस्वीकार तक या जीवन तक ही, उसे किन प्रयोजनों से ले जाता है, यह महत्वपूर्ण है। सांसारिक जीवन में, सामाजिक, पारिवारिक दवाबों से असंपृक्त जीवन का कोई रास्ता चुन लेना प्रायः कल्पनातीत है। वैराग्य संभव है पर वह सांसारिक जीवन का रास्ता नहीं है। सांसारिक जीवन की भाग-दौड़ में समाज और दुनिया को अप्रत्याशित सदमों, झटकों से मुक्त रखने की विवशता में, हमें अपने जीवन के कई रास्तों के विकल्प में से किन्हीं ‘व्यावहारिक’ रास्तों का चुनाव कर लेना होता है।

इन कई विकल्पों के सत्य को निर्मल वर्मा ने अपने एक महत्वपूर्ण व्याख्यान में इस प्रकार व्यक्त किया है : ...चौराहे की विशेषता यह है कि वहां से अनेक रास्ते अलग-अलग दिशाओं में जाते हैं। हर दिशा का अपना सत्य है… हमारे जीवन की दुखद बाध्यता यह है कि हमें अपने जीवन काल में एक दिशा चुननी पड़ती है… बाकी रास्ते छोड़ देने पड़ते हैं।… जीवन में हम एक राह चुनकर बाकी विकल्पों से मुंह मोड़ लेते हैं… किंतु वे वहां हैं, हमारे जीवन के अंडरग्राउंड अंधेरे में उनकी प्रेत छायाएं उतनी ही जीवित हैं, जितनी दिन की रौशनी में चमकते वे स्टेशन जो हमारी राह में आते हैं। उपन्यास के यथार्थ और जीवन के यथार्थ के बीच यह एक भारी अंतर है… उसमें छूटे हुए रास्तों की विरह वेदना उतनी ही तीव्र होती है, जितना जिए हुए अनुभवों की सघन सांद्रता। न किए का पश्चात्ताप उतना ही गहरा जितना किए हुए कर्मों की बीहड़ और बदहवास चेतना”... (साहित्य की परती परिकथा, साक्ष्य – 10, साहित्य अंक, पृष्ठ 17)

निर्मल वर्मा के उपन्यास ‘अंतिम अरण्य’ या विश्व की किसी भी महान औपन्यासिक कृति (चाहे वह टालस्टाय की ‘अन्ना कैरेनिना’ हो, या ‘मादाम बावेरी’ या शेक्सपियर के नाटक ‘हेलमेट’) के विशिष्ट संसार में प्रवेश करने के लिए हमें जीवन के यथार्थ और उपन्यास के बीच इस महत्वपूर्ण और अपरिहार्य (किंतु हिंदी के मनोविश्लेषणात्मक उपन्यासों में भी अज्ञेय, जैनेन्द्र और यशपाल के बाहर प्रायः अलक्षित) अंतर की महीन परतों से गुजरना होगा।

निर्मल वर्मा के उपन्यास ‘अंतिम अरण्य’ में इन परतों से गुजरना इसलिए भी सार्थक है कि इस अंतर का यथार्थ यहां इतना शाश्वत और इतना पारदर्शी होकर उद्घाटित हुआ है कि हमें महसूस होने लग जाता है कि हम अपने या आस-पास के जीवन के ही कोने-अंतरों से गुजर रहे हैं।

संवेदनशील पात्रों के अन्तरप्रदेशों का यह आंतरिक यथार्थ निर्मल वर्मा की कलम से इतना अनुशासित और संयमित ढंग से ‘अंतिम अरण्य’ के पात्रों की अन्तःक्रियाओं में विन्यस्त है कि यह उसे एक ऐसी गरिमा और विश्वसनीयता प्रदान करता है जो मनोविज्ञान की स्थापित विश्लेषणात्मक दृष्टि से भी पूरी तरह अप्रश्नेय रहती है।

हमारे वर्तमान सृजन परिदृश्य की सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि हमें जीवन के भौतिक यथार्थ ने इतना आक्रांत कर रखा है कि हम इस आंतरिक यथार्थ के बिना जीवन की कल्पना करने की भूल कर बैठे हैं। किसी उत्कृष्ट कृति से हमें एक जीवन ऊर्जा या आंतरिक आस्था की अपेक्षा होती है, जिसके अभाव में आज हमारा भौतिकवादी वैश्विक समाज स्वयं को निपट वैचारिकता और वादों के ऐसे जंगल में भटकता, बढ़ता, ठिठकता और लौटता पाता है जहां आगे बढ़ने के लिए आवश्यक जीवन ऊर्जा का क्षरण हो चुका है। हम जहाँ से चले थे, वहीं बार-बार लौट आते हैं- जैसे कोई चीज यात्रा पर निकलने के पहले कहीं छोड़ दी हो, हमें पता नहीं चलता वह कौन-सी चीज थी, और जिसके बिना हमारी कोई भी वैचारिक यात्रा अर्थहीन होगी। यह चीज वह आंतरिक ऊर्जा है जो विश्व की किसी भी उत्कृष्ट कृति के आंतरिक जगत में उसी तरह मौजूद रहती है जिस तरह किसी जीव की आत्मा, जिसके बिना वह जीवित नहीं रह सकता।

साहित्य को उसकी आत्मा से निर्वासित, असंपृक्त कर देने का ही एक नतीजा यह है कि समाज से आज साहित्य और कला भी निर्वासित होते जान पड़ते हैं। प्राकारांतर से, ‘अंतिम अरण्य’ को इस चुनौतीपूर्ण साहित्यिक परिदृश्य में, साहित्य को उसकी मूल संवेदना, उसकी आंतरिक ऊर्जा के स्रोतों की ओर लौटाने की दिशा में एक बीहड़ उपक्रम के रूप में भी देखा जा सकता है।

इस संदर्भ में निर्मल वर्मा ने अपने एक व्याख्यान में अपनी गहरी चिंता इन शब्दों में व्यक्त की है : ‘क्या यह अजीब विडंबना नहीं है कि पिछले वर्षों से हमारा अधिकांश कथा-साहित्य उन प्रश्नों को अप्रासंगिक मानता रहा है, जिनके बिना स्वयं मनुष्य का ‘मनुष्यत्व’ एकांगी, अधूरा और बंजर पड़ा रहता है? यथार्थवाद के नाम पर हमने मनुष्य को उस यथार्थ से विलगित कर दिया जो उसके जीवन और मृत्यु के प्रश्नों को अर्थ प्रदान करता है।’ (साहित्य के प्रासंगिक प्रश्न : कसौटी-4, पृष्ठ - 78)

‘अंतिम अरण्य’ के पात्रों की आंतरिक दुनियाओं को सही-सही समझने में मनुष्य जीवन के संपूर्ण सच के बारे में निर्मल वर्मा की यह व्याख्या भी अत्यंत प्रासंगिक है : ‘असली जीवन में हमारे भीतर के अनेक कपाट बंद पड़े रहते हैं, जिन्हें हम खोलने का साहस नहीं कर पाते। साहित्य जब अपनी चाबी से उनके बंद ताले खोलता है, तो हमें एक अजीब आश्चर्य होता है, कि जब हम अपनी दबी-छिपी आकांक्षाओं को उनसे बाहर निकलता हुआ पाते हैं। वे हमारे जिए हुए, भोगे हुए अनुभव न भी हों, तो भी हमारे अनुभूति क्षेत्र में उनका अस्तित्व उतना ही ठोस और जीवंत है, जितना हमारे नींद के स्वप्न, जो हमारी जागृतावस्था की ही उपज है। आइसबर्ग की तरह मनुष्य का एक छोटा अंश ही हमें पानी के ऊपर उजाले में दिखाई देता है, बाकी हिस्से चूंकि सतह के नीचे डूबे रहते हैं, उससे उनका अस्तित्व नकारा नहीं जा सकता। वे अदृश्य होते हुए भी हमारी दृश्य जीवन-लीला में हस्तक्षेप करते हैं। ये हमारे अनुभूत यथार्थ की सीमाओं पर प्रश्नचिह्न लगाते हैं, मानो पूछ रहे हों, क्या इसमें मनुष्य का पूरा सत्य समा सकता है? (‘साहित्य के प्रासंगिक प्रश्न’ : कसौटी-4, पृष्ठ - 78)

‘अंतिम अरण्य’ के हर पात्र के सृजन में, विशेषकर मेहरा साहब के लगभग पारदर्शी चित्रण में, इस ‘अदृश्य’ का हस्तक्षेप निरंतर प्रतिध्वनित होता है। इन प्रतिध्वनियों का स्वर उपन्यास के चरित्र की छोटी-बड़ी भूमिका के अनुरूप पूरी तरह संयमित और अनुशासित है। इसलिए पूरी तरह गरिमामय और विश्वसनीय भी। पहली बार उपन्यास को पढ़ते हुए मैं विस्मित था कि आखिर मृत्यु के हाशिए से मृत्यु तक मेहरा साहब की लंबी, थकान भरी यात्रा अपने ‘अंतिम प्रभाव’ में इतनी गरिमामय और विश्वसनीय कैसे बन जाती है! उपन्यास को दुबारा पढ़ते हुए मुझे अनायास ही अमेरिकन उपन्यासकार अर्नेस्ट हेमिंग्वे की वे पंक्तियां याद हो आईं जिनमें उन्होंने कहा था कि आइसबर्ग के बहाव की गरिमा इस बात में निहित होती है कि उसका आठवां हिस्सा ही सतह के ऊपर दिखाई देता है।

शायद यही कारण है कि कोई भी उत्कृष्ट कृति वास्तविक जीवन के फ्रेम से बड़ी दिखती है– लार्जर दैन लाइफ। दिखती है, वास्तव में वैसी है नहीं। ऐसा इसलिए दिखती है कि जीवन के वे अदृश्य हिस्से भी कला में, किसी-न-किसी रूप में उद्घाटित होते रहते हैं, जो वास्तविक जीवन में सामान्यतः दिखाई नहीं पड़ते।

मृत्यु के हाशिए से लेकर मृत्यु तक की मेहरा साहब की यात्रा (बहाव) अपने अंतिम प्रभाव में इसलिए इतनी गरिमामय और विश्वसनीय बन पड़ी हैं कि लेखक ने मेहरा साहब के व्यक्तित्व के बाहर के आठवें हिस्से के साथ-साथ सतह के भीतर के अधिकांश अदृश्य हिस्सों के अदम्य अस्तित्व का अहसास बड़ी ही सावधानीपूर्वक कराया है।

सतह के भीतर की दुनियाओं की संवेदनात्मक भावभूमि को समझने के लिए इस उपन्यास के शिल्प में जो अंतर्दृष्टियां सूक्तियों की तरह बुनी गई हैं वे समकालीन साहित्य में प्रायः दुर्लभ हैं। इसलिए, ऐसा भी नहीं है कि ‘अंतिम अरण्य’ बूढ़ों का एक अपना अलग संसार रचती है। दरअसल, यह संसार बहुसंख्यक युवाओं को ‘अपनी’ जिंदगी जीने, समझने-परखने के लिए कई-कई खिड़कियां-दरवाजे खोलता है कि कोई ‘विराट उन्माद, व्यसन और अंतर्दृष्टियां’ उनसे मिलने उनके घर आएं तो उनके दरवाजे पर उन्हें ‘आउट’ की तख्तियां लगी न मिलें।

परिचय :

योगेंद्र कृष्णा

जन्म : 1 जनवरी, 1955 ( मुंगेर, बिहार )

शिक्षा : अंग्रेजी साहित्य में स्नातकोत्तर

लेखन : हिंदी और अंग्रेजी दोनों ही भाषाओं में रचनारत। पहली रचना श्रीपत राय संपादित पत्रिका कहानी में प्रकाशित।
पहल, हंस, कथादेश, वागर्थ, नया ज्ञानोदय, साक्षात्कार, पूर्वग्रह, अक्षरपर्व, परिकथा, पल प्रतिपल, आजकल, लमही, इंडिया टुडे, आउटलुक, शुक्रवार, समयांतर, समावर्तन, लोकमत समाचार, जनपथ समेत देश की लगभग सभी स्तरीय पत्र-पत्रिकाओं में कविताएं तथा अन्य विधाओं में रचनाएं प्रकाशित। पटना दूरदर्शन एवं आकाशवाणी से समय-समय पर रचनाएं प्रसारित।

प्रकाशित कृतियां :

  • खोई दुनिया का सुराग ( कविता संग्रह )
  • बीत चुके शहर में ( कविता संग्रह )
  • कविता के विरुद्ध ( कविता संग्रह )
  • गैस चैंबर के लिए कृपया इस तरफ : नाज़ी यातना शिविर की कहानियां (तादयुष बोरोवस्की की कहानियों का हिंदी अनुवाद)
  • संस्मृतियों में तोलस्तोय ( हिंदी अनुवाद )
  • तीसरी कोई आवाज़ नहीं ( कविता संग्रह प्रकाशनाधीन )

संप्रति : बिहार विधान के प्रकाशन विभाग की जिम्मेदारियों से मुक्त होकर अब पूर्णकालिक स्वतंत्र लेखन।

संपर्क : 2 / 800, शास्त्री नगर, पटना : 800023
मो. 09835070164

ईमेल : yogendrakrishna@yahoo.com

पत्थर और बहता पानी : निर्मल वर्मा

निर्मल वर्मा हिंदी कथा–साहित्य एवं कथेत्तर गद्य के अद्भुत सर्जक हैं। उन्होंने गद्य की सभी विधाओं में लिखा। वरिष्ठ आलोचक नामवर सिंह उनकी कहानी 'परिन्दे' को पहली 'नई कहानी' की संज्ञा देते हैं। उनकी कहानियों में परिवेश एवं परिस्थितियों से प्रभावित मनुष्य की संवेदना बहुत गहरे जाकर व्यक्त होती है। अवसाद में टूटते हुए...कभी–कभी प्रतीक्षारत होते हुए भी आत्मसंतुष्टि का भाव लिए पात्र इनकी रचनाओं में नजर आते हैं जिनसे हम अनायास ही जुड़ते चले जाते हैं। उनकी जादुई भाषा–शैली पाठकों को सम्मोहित कर जाती है। उनके कई निबंध–संग्रह हैं जिनमें हम उनकी भाषा, विचार एवं दर्शन का अद्भुत संगम देखते हैं। उनके संग्रह 'शब्द और स्मृति' से एक निबंध 'पत्थर और बहता पानी' का अंश आपके लिए प्रस्तुत है।


                       # आउटलुक से साभार

सोचता हूं कि वे शहर कितने दुर्भागे हैं, जिनके अपने कोई खंडहर नहीं। उनमें रहना उतना ही भयानक अनुभव हो सकता है, जैसे किसी ऐसे व्यक्ति से मिलना, जो अपनी स्मृति खो चुका है, जिसका कोई अतीत नहीं। अगर मुझसे कोई नरक की परिभाषा पूछे, तो वह है, हमेशा वर्तमान में रहना, एक अंतहीन रोशनी, जहां कोई छाया नहीं, जहां आदमी हमेशा आंखें खोले रहता है—नींद और स्वप्न और अंधेरे को भूल कर। जहां वर्तमान शाश्वत है, वहां शाश्वत भी अपना मूल्य खो देता है, क्योंकि जो चीज शाश्वत को आयाम देती है—समय—वह खुद कोई मूल्य नहीं रखता।

इसलिए जब वर्तमान का बोझ असह्य हो जाता है, मैं अपना घर छोड़कर शहर के दूसरे 'घरों' चला जाता हूं— जहां अब कोई लोग नहीं रहते— सदियों पुराने मकबरे, महल, मदरसे—जहां अंधेरा होते ही चिमगादड़ उड़ते हैं। ये हमारे शहर के खंडहर हैं— शहर की स्मृतियां और स्वप्न। दिल्ली में इन इमारतों की कोई कमी नहीं। वे हर जगह बिखरी हैं। सिर्फ आधा घंटा में मैं एक दुनिया को छोड़कर दूसरी दुनिया में जा सकता हूं— एक समय से उठकर बिल्कुल दूसरे समय में प्रवेश कर लेता हूं— बिना कोई टिकट खरीदे, बिना 'क्यू' में खड़े हुए। वहां न पत्थर रास्ता रोकते हैं, न मृतात्माएं धक्का देती हैं।

किन्तु ऐसा भी युग था, जब न शहर थे, न खंडहर— आदमी अपना अतीत खुद अपने भीतर लेकर चलता था— या यूं कहें कि स्मृति अभी तक इतिहास नहीं बनी थी, जिसे स्मारकों और पोथियों द्वारा ढोना पड़ता है। आदिम युग का व्यक्ति अतीत और वर्तमान दोनों को साथ लेकर चलता था और जब चाहे उनसे छुटकारा भी पा लेता था। यज्ञ, आहुति और बलि के क्षणों में वह एक ऐसे बिन्दु पर पहुंच जाता था, जहां समय शुरू होता है, आदि-क्षण का आलोक, जहां वह एकदम स्वच्छ हो जाता था, न केवल अपने पापों, बल्कि उनकी स्मृति से भी मुक्ति पा लेता था। जिस तरह हम आधुनिक शहर को छोड़कर खंडहरों में जाते हैं— वह भी उतनी ही सुलभता से 'सांसारिक समय' से उठकर 'आदि समय' में चला जाता था। समय की इस गंगोत्री पर उसके लिए जन्म और मृत्यु, शुरू और अन्त, नश्वर और शाश्वत का भेद घुल जाता था। एक शब्द में वह सृष्टि के आरंभ होने से पहले के 'मिथक-काल' में पहुंच जाता था और वहां से दुबारा मुड़ता था— हल्का और मुक्त, ताकि अपने को नए सिरे से शुरू कर सके।

क्या हम इतिहास से त्रस्त, आधुनिक शहरों में रहनेवाले प्राणी— ऐसे क्षण को जी सकते हैं, ऐसे अनुभव को भोग सकते हैं? या उसे हमने हमेशा के लिए खो दिया है? खंडहरों के बीच घूमते हुए मुझे कभी-कभी लगता है कि वैसा अनुभव आज भी असम्भव नहीं है। हमारे बीच दो चीजें ऐसी हैं जिनके सामने, जिन्हें छूकर हम अपने साधारण क्षणों में भी इतिहास की चिरन्तनता और प्रकृति- जो शाश्वत है—उसकी ऐतिहासिकता—दोनों को एक समय में अनुभव कर सकते हैं। अजीब बात यह है, ये दोनों चीजें अपने स्वभाव में एक-दूसरे से बिल्कुल उल्टी हैं— एक ठोस और स्थायी, दूसरी सतत प्रवाहमान, हमेशा बहने वाली— पत्थर और पानी। किन्तु दोनों एक सिक्के के दो पहलू हैं- दोनों के सामने हम सहसा अपने से परे चले जाते हैं, हम एक ऐसे काल-खंड में पहुंच जाते हैं, जब हम नहीं थे (खंडहरों के सामने), जहां हम खत्म हो जाएंगे (बहते पानी को छूते हुए)। पत्थर और पानी दोनों के सम्मुख यह अनुभव होता है कि हम उनके गवाह नहीं हैं— वे हमारे गवाह हैं। हम उनके अस्तित्व को नहीं देख रहे, वे हमारे बीतने को देख रहे हैं।

यह अनुभव हमारे उस आधुनिक बोध को कितना धक्का देता है, जहां हम संसार के साक्षी होने का दम्भ भरते हैं, जबकि हम स्वयं इतिहास से त्रस्त हैं! एक त्रस्त गवाह की गवाही कैसी? वह न इतिहास रच सकता है, न इतिहास का अतिक्रमण कर सकता है, जिससे कविता जन्म लेती है। इसीलिए रिल्के ने एक युवा कवि को सलाह दी थी, 'आपको प्रकृति की तरफ जाना होगा। दुनिया के आदिपुरुष के समान आपको वह सब कहने की कोशिश करनी होगी, जो आप देखते हैं, अनुभव करते हैं, प्रेम करते हैं, खो देते हैं।'
किन्तु समय की एक सीमा के बाद, जिसे हम इतिहास मानते आए थे वह प्रकृति का ही हिस्सा जान पड़ता है। इसका एहसास जितना पुराने खंडहरों में घूमते हुए होता है, शायद कहीं और नहीं। दिल्ली के पुराने किले में पत्थरों के ढूह, आधी टूटी हुई मीनारें, दीवारों के भग्न झरोखे इतने चिरन्तन, समय की आपा-धापी से इतना दूर जान पड़ते हैं, कि यह प्रश्न बिल्कुल अर्थहीन जान पड़ता है कि उसे पांडवों ने बनाया था, या हुमायूं ने। वे ढूह उतने ही शाश्वत, उतने ही 'प्राकृतिक' जान पड़ते हैं, जितने शिमला के पहाड़, पहाड़ों के बीच लेटी हुई घाटियां। इसलिए साहिर लुधियानवी का यह क्षोभ कुछ बेमानी-सा लगता है कि ताज को एक बादशाह ने नहीं, मजदूरों ने बनाया था, जिन्हें हम याद नहीं करते। सत्य यह है कि हम किसी को याद नहीं करते; न गुलाम को याद करते हैं, न साहब को, न बेचारी बीवी को, जिनकी स्मृति में उसका निर्माण हुआ था। समय बीतने के साथ ताज की ऐतिहासिक स्मृति एक ऐसे 'मिथक क्षण' में घुल मिल गई है, जहां सिर्फ 'देखना, अनुभव करना, प्रेम करना, और खो देना' ही बाकी रह जाता है।

जिस तरह इतिहास कभी कभी प्रकृति में बदल जाता है, उसी तरह प्रकृति भी इतिहास में बदल जाती है। क्या गंगा एक भारतीय के लिए महज बहता पानी है? वह हमारी सबसे गहन स्मृतियों को—जिन्हें हम 'संस्कार' कहते हैं—जगाती है, हमें इतिहास के उस मिथक-क्षण में ले जाती है, जब थके-मांदे आर्यों ने पहली बार उसकी मुक्त सपाट धारा को देखा होगा। कितना अजीब विरोधाभास है कि एक समय बाद आदमियों द्वारा बनाई गई इमारतें 'प्रकृति' में बदल जाती हैं— शाम की धूप में कालातीत, इतिहास से मुक्त, जबकि पीढ़ी-दर-पीढ़ी नहाते यात्रियों ने गंगा की शाश्वत धारा को अपनी स्मृतियों में पिरो दिया है—जहां इतिहास और प्रकृति एक-दूसरे से मिल जाते हैं।

और मैं तब अपने से पूछता हूं कि 'बहते पानी' के साथ हिन्दू-मानस का इतना घना लगाव क्या इसीलिए तो नहीं है कि उसमें मिथक और इतिहास का सम्पूर्ण भेद छिपा है? और इस 'भेद' में सिर्फ रहस्य का ही आशय नहीं है, बल्कि अलगाव का भी। हम इतिहास के प्रति सचेत नहीं थे, यह सही नहीं है। सही यह है कि हम इतिहास के प्रति सचेत होते हुए भी उसके बिम्बों का निर्माण निरर्थक समझते थे। इसलिए हम परम्परा को भी उतना महत्व नहीं देते थे, जितना दूसरे देशों के लोग, क्योंकि हम उसे बीते हुए समय का अंश नहीं मानते थे, जिसे वर्तमान में ढोना है। हमें अपनी परम्परा का उतना ही अनुभव होता है, जितना 'अतीत' हम अपने भीतर लेकर चलते हैं- बाकी सब खंडहर है, पत्थर और पोथियां—जो परम्परा नहीं, अतीत के स्मारक हैं। शायद यही कारण है कि रोमन खंडहरों या पुराने मुस्लिम मकबरों के बीच घूमते हुए एक अजीब गहरी-सी उदासी घिर आती है— जैसे कोई हिचकी, कोई सांस, कोई चीख इनके बीच फंसी रह गई हो—जो न अतीत से छूटकारा पा सकती हो, न वर्तमान में जज्ब हो पाती हो।
किन्तु इस उदासी के नीचे एक और गहरी उदासी दबी है... और वह उनके लिए नहीं है, जो एक जमाने में जीवित थे, और अब नहीं हैं— वह बहुत कुछ अपने लिए है, जो एक दिन इन खंडहरों को देखने के लिए नहीं बचे रहेंगे।

पुराने स्मारक और खंडहर हमें उस मृत्यु का बोध कराते हैं, जो हम अपने भीतर लेकर चलते हैं। बहता पानी उस जीवन का बोध कराता है, जो मृत्यु के बावजूद वर्तमान है, गतिशील है, अन्तहीन है। जब कोई हिन्दू अपने सगे-सम्बन्धी की अस्थियां हरिद्वार की गंगा में बहाता है, तो न केवल मृतात्मा को उसकी देह से मुक्त कराता है, बल्कि वह स्वयं अपनी पीड़ा से भी छुटकारा पा लेता है। 'कैथार्सिस' की सम्पूर्ति, जो यूनानी दर्शक नाटक के अन्त में अनुभव करता था, हम उसे बहते पानी के छोर पर पा लेते थे। आज यह अनुभव दुर्लभ लगता है।
आज यह इसलिए दुर्लभ लगता है, कि हम इतिहास और मिथक— समय और शाश्वत— को बांटने के इतने आदी हो गए हैं कि यह नहीं सोच पाते कि एक ही समय में मनुष्य को दोनों का अनुभव होता रहा है। आज का ऐतिहासिक व्यक्ति अपने भीतर 'पौराणिक क्षणों' को उसी तरह जीता है, जिस तरह मिथक-काल का व्यक्ति इतिहास को भोगता है। यदि आज हम 'ऐतिहासिक' काल में रहते हैं, तो भी हमारे भीतर उस खोए हुए स्वप्न को पाने की भूखी आकांक्षा आंख खोले रहती है, जब हम खंडित नहीं थे, प्रकृति से सम्पृक्त थे, सम्पूर्ण थे। माना, यह मिथक काल की वास्तविकता नहीं थी, किन्तु इससे न तो स्वप्न झूठा हो जाता है, न आकांक्षा की तीव्रता मन्द हो जाती है।

वह स्वप्न हम खो चुके हैं, इसकी पीड़ा का एहसास भी रिल्के को उतना ही था, जितना आदिकवि व्यास को रहा होगा। दरअसल समूचा काव्य इस खोने के आतंक को समझने का प्रयास है और इस 'समझ' के लिए भी हर कवि को 'प्रकृति के पास जाना पड़ा था।'

किन्तु यदि प्रकृति के पास जाने का मतलब है, अपने अलगाव और अकेलेपन से मुक्ति पाना; अपने छिछोरे, ठिठुरते अहम का अतिक्रमण करके, अनवरत समय की कड़ी में अपने को पिरो पाना, तो यह बोध पुराने खंडहरों के बीच भी होता है। यह विचित्र अनुभव है। ठहरे हुए पत्थरों के सामने बहते समय को देख पाना। पहली बार इतिहास का अनुभव—किताबों और तिथियों से न होकर—पत्थरों के बीच उगती घास, छतों पर चिपटे चिमगादड़ों, गुम्बदों पर गमगीन, ऊंघती धूप द्वारा होता है। सहसा यह बोध होता है कि कविता, संगीत, चित्र— कोई भी कला-कृति उस मौन को भेदने की कोशिश है, जो इन पत्थरों के बीच उतनी ही शाश्वत है, जितनी प्रकृति के भीतर; कोई भी चीज नहीं मरती, यदि वह अपने से उठकर किसी अन्य से अपने को जोड़ लेती है।

# 'शब्द और स्मृति' से साभार