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शैडोग्राफ़ : दिव्या विजय

 

दिव्या विजय की लेखनी उस मुक़ाम तक आ पहुंची है कि हम उसे हिंदी साहित्य की समृद्ध परंपरा से जोड़कर देखते हुए उसकी जाँच–पड़ताल कर सकते हैं। उनकी दृष्टि, अनुभूति एवं विचार–चिंतन का परिचय हिंदी गद्य में कहानी, निबंध, संस्मरण आदि रूपों में मिल चुका है। उन्हें पढ़ते हुए हम समृद्ध होते हैं। उनकी रचनाएँ पढ़ते हुए कई बार नए शब्दों से परिचय होता है। ऐसा नहीं कि वे हमारे आस–पास नहीं थे। वे थे। उनकी अर्थवत्ता नहीं थी हमारे पास। जैसे नेक चंद ने चंडीगढ़ के रॉक गार्डेन में कचरे में फेंके गये टूटी–फूटी पुरानी चीजों को संयोजित कर उन्हें अलग अर्थवत्ता प्रदान की। उनके यात्रा–संस्मरण सरस होते हैं। यात्रा–संस्मरण लिखते हुए वह मोहन राकेश तथा निर्मल वर्मा के करीब होती हैं। वे पाठक का हाथ थामे साथ रखती हैं। संधान की सारी प्रक्रिया को पारदर्शी रखते हुए आपसे ही पूछ बैठेंगी – आप बताइए? यात्रा–संस्मरण लिखते हुए वे जैसे अपने मन के परदे पर व्यक्तियों के मन–मस्तिष्क की छाप लेती रहती हैं। तभी तो इस संस्मरण को उन्होंने नाम दिया है – शैडोग्राफ़। आप भी पढ़कर देखिए।

शैडोग्राफ़ 

जब मैं यात्रा पर होती हूँ, सिर्फ़ मैं ही यात्रा पर नहीं होती हूँ अपितु मेरे प्रियजनों की स्मृतियाँ भी संग होती हैं। एक से दूसरे स्थान पर वे स्थानांतरित होती हैं, ज्यों हवा से उड़ कर आ ठहरी पत्तियाँ, बालों में उलझ कर साथ चली आती हैं। पिछले बहुत समय से नरेंद्र जी से किया एक वायदा साथ है कि जब भी यात्रा संस्मरण लिखूँगी, उन्हें भेजूँगी। हर यात्रा पर यह बात मुझे याद आती है किंतु मैं उस जगह को मन भर देखने के बाद भी ऐसा कुछ नहीं पाती जिसे दर्ज किया जा सके। ऐसी कितनी ही यात्राएँ मेरे जीवन में आकर बीत गयीं। इस दौरान तस्वीरों की संख्या बढ़ती गयी और शब्द कहीं पीछे रह गए। इन दिनों कैसा तो मन हो चला है कि वहाँ कुछ ठहरता नहीं, सब फिसल-फिसल जाता है। यह बढ़ती उम्र के साथ मिले अनुभवों का परिणाम है कि अब हर बात चमत्कृत नहीं करती। जीवन प्रतीक्षा में बीता जाता है और लीक से हटकर कुछ घटित नहीं होता। एक-सी जगहें, एक-से लोग। चाह कर भी मैं उन्हें अलगा नहीं पाती।

फिर अचानक कुछ घटता है, साधारण ही। किंतु हम पाते हैं वह असाधारण की तरह हमारे जीवन में प्रवेश पा गया है और उसी को व्यक्त करने के लिए हम लालायित हो उठते हैं। व्यक्ति कितना भी एकांत प्रिय क्यों न हो, किसी से जुड़ने की ख़्वाहिश हमेशा बनी रहती है। किसी के होने, किसी को बिलॉन्ग करने की ज़रूरत कभी ख़त्म नहीं होती। क्या यही ज़रूरत लोगों को दुनिया के एक कोने से दूसरे कोने तक ले जाती है? क्या इसीलिए वे आख़िरी दम तक उम्मीद लगाए रहते हैं, तब भी जब सब ख़त्म होने की कगार पर होता है? कल ही आलोक से मैंने पूछा था यह ज़रूरत बाकी ज़रूरतों की तुलना में उनके लिए कितनी बड़ी है। उन्होंने कहा था, “सबसे बड़ी। बाकी हर ज़रूरत से बड़ी।” यह कहकर वे मेरे परिचित चुनिंदा पुरुषों में शुमार हुए जिन्होंने अपनी भावनात्मक ज़रूरत को बाकी ज़रूरतों से बड़ा बताया। बहुधा पुरुषों को मैंने सम्पत्ति की, सामाजिक प्रतिष्ठा की, प्रसिद्धि की महत्ता कहते-सुनते ही पाया है। 

इन दिनों जिस दुनिया में मैं हूँ, वहाँ ये बातें और ज़रूरतें बेमानी हैं। भौतिकता को तरजीह देने वाली, चकाचौंध में गुम यह दुनिया कनेक्ट बनाना चाहती है किंतु ओहदा और रुतबा देखकर। सारी क़वायद अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचने की, उन्हें अपने दायरे में ले आने की है। मन के स्तर पर जुड़ना यहाँ ओल्ड फ़ैशंड माना जाता है। यहाँ अपने आप को बचाए रखना एक टास्क है। ऐसे में किसी से मिलना जिसमें अपना अक्स देख सकें, सुकूनदेह होता है। 

यह किसी शहर का नहीं, किसी स्थान का नहीं, एक व्यक्ति के साथ बिताए समय का संस्मरण है। करना था मुझे अपनी यात्रा को दर्ज किंतु क्या मेरी प्राथमिकताएँ बदल गयी हैं? मैं अपरिचित लोगों की कहानियाँ सुनना चाहने लगी हूँ। उनके जीवन को जानना चाहने लगी हूँ। उनकी चमकती आँखें मुझे आकर्षित करती हैं, कभी उन की उदासी की धुँधलके के पार मैं देखना चाहती हूँ। प्रवेश अब भी नहीं चाहती हूँ, न उनका मेरे जीवन में, न मेरा उनके जीवन में। Bonds are made to be broken. किंतु जहाँ कुछ जुड़ा नहीं, वहाँ टूटने की गुंजाइश नहीं रहेगी। बस कुछ क्षणों का साथ और अनंत काल की स्मृतियाँ। 

किसी के सपने का साझीदार होना कैसा सुंदर होता है। हम यहाँ पहुँचे तो सूर्य दूसरे पहर की गलबहियाँ किए आगे बढ़ रहा था। यहाँ माने चानताबुरी, आगे की यात्रा का पहला पड़ाव जहाँ एक रात के लिए ठहरना तय किया था। अप्रैल थाईलैंड का सबसे गर्म महीना होता है लेकिन यहाँ का हरा, गर्मी के लिए सोख्ते का काम कर रहा था। गर्मी ज्यों नंगे पाँव चहलक़दमी कर रही थी। 

नदी किनारे बसा यह घर पाक और पोंग का है। स्वप्न उनका। शहर की बड़ी इमारतों और ट्रैफ़िक से ख़ौफ़ खाने वाले दो लोगों का। छिपकलियों की एक पूरी जमात के बीच बैठ कर पसंद का सिनेमा देखने वाले दो किरदारों का। हम यहाँ आए तब पोंग घर पर नहीं था, पाक अकेली थी। सरल मुस्कान के साथ हमारे स्वागत को अधीर। आते ही जिस तरह उसने मुझे बाँहों में भरा, ख़ुशी उसकी बाँहों से होते हुए मेरे भीतर भर गयी। अपरिचितों से ऐसा आलिंगन मैंने इस से पहले कब पाया था, स्मृति में नहीं। मैंने उसे ध्यान से देखा। पतली-दुबली देह, तिकोना चेहरा, छोटी पलकों वाली बड़ी आँखें और माथे पर छितरे बाल। आँखों के कोनों पर हल्की झुर्रियाँ नुमायाँ हो रही थीं। तिस पर रह-रहकर उसके होंठों पर उग आती मुस्कुराहट, कुछ कहने, न कहने के बीच झूलती हुई। 

मैं उस से बातें करना चाह रही थी पर उसे नाम मात्र की अंग्रेज़ी भी नहीं आती थी। फिर भी हम अपनी-अपनी भाषा में कुछ कहते रहे जिसे हम दोनों ही नहीं समझ पा रहे थे किंतु दो अपरिचित भाषाएँ, जो सम्भवतः किसी और समय हमारे लिए आवाज़ें मात्र होतीं, वे अभी संगीत से कम नहीं लग रही थीं। कुछ देर बाद वह अपने काम में मशगूल हो गयी। छुट्टियों पर मैं थी, वह तो नहीं। काम भी कितने सारे। झाड़ू लगाने से लेकर नदी किनारे उगी घास काटने तक। बीच-बीच में वह भावों और संकेतों से अपनी दिनचर्या के बारे में बताती जाती जिसमें शामिल थे छः मुर्गे और दो बिल्लियाँ। उसके घर को देखती-परखती मैं उल्लसित थी। काश मेरी रसोई भी ठीक ऐसी हो जहाँ से दिखाई पड़े, घर का हाथ पकड़े नदी, नदी के साथ धमाचौकड़ी करता जंगल, पानी में डेरा डाले जलकुंभी और उनके बीचोंबीच खिलखिलाती जल कुमुदिनी। 

आगे एक बोर्ड रखा था जिस पर मेरे नाम के साथ वेलकम लिखा था। मैंने पाक को उसी की भाषा में शुक्रिया कहा तो उसने बताया, यह पोंग ने लिखा है। मैंने दोबारा देखा। अभ्यास न होने पर लिखावट में जो संकोच होता है, वह वहाँ था। लिखने में की गयी मेहनत के स्पष्ट निशान थे। आगे बढ़ी तो किताबों की एक अलमारी थी। सब थाई भाषा में। किताबें जहाँ हों, वह जगह आप ही खुशरंग हो जाती है। मैं किताबें उलट-पलट कर देख ही रही थी कि पाक ने बताया ये भी पोंग की हैं। किताब पढ़ने वाले व्यक्ति के चुप्पे एकांत और मनचीती निष्ठा में सम्मोहन होता है। मैं उस से मिलने को उत्सुक हो उठी। पोंग वहाँ नहीं था पर पूरे घर पर उसकी छाप थी। ढेर सारे वाद्य यंत्र, तारों के उलझाव के बीच रखे बड़े-बड़े म्यूज़िक सिस्टम। गिटार पर उँगलियाँ फिराने का मोह मैं नहीं छोड़ पायी। कुछ देर गिटार के तारों के साथ छेड़छाड़ करती रही। गिटार बजाना न जानने पर भी मोहक स्वर वातावरण में छितरा गए। अपना स्वभाव भला कौन छोड़ता है। 

फिर पाक के साथ बैठ कर दोपहर का भोजन किया। मैं एक वक़्त का खाना घर से पैक कर ले आयी थी। खाते हुए उसने बताया, मिर्च-मसालेदार भारतीय भोजन उसे प्रिय है। यू-ट्यूब पर देखकर वह बहुत कुछ बना लेती है। लेकिन लाल मिर्च की बजाय काली मिर्च उसे ज़्यादा पसंद है। यहाँ हम दोनों के लिए अनुवादक का काम रोशन कर रहे थे। वह बता रही थी उसके खेत में काली मिर्च के पौधे हैं। मैंने देखने की इच्छा ज़ाहिर की तो उसने कहा शाम को चलेंगे। कहते हुए वह मिनट भर के लिए ग़ायब हुई। लौटी तो उसके हाथ में काली मिर्च का एक पैकेट था जिसे उसने मुझे थमाते हुए चूम लिया। अपनी नयी सखी की इस निश्छल उदारता से मैं गदगद थी। ख़ूब मन से खाने के बाद, हम वहीं पसर गए। 

नदी का स्पर्श पाकर हवा स्नेहिल हो रही थी। कमरे ऊपरी तले पर थे और निचला तला क्या था, चारों ओर से खुला एक बड़ा बरामदा, जहाँ प्रकृति बेरोकटोक घूम रही थी। यहाँ तक कि मुख्य दरवाज़ा भी नहीं। क्या इन्हें भय नहीं होता होगा! तालों और दरवाज़ों से हीन ऐसा निधड़क और उन्मुक्त घर मैंने पहले नहीं देखा था। मन आह्लादित था, विरल को पा लेने के आश्वासन से भरा हुआ। 

पाक लेटे हुए थाई भाषा में कोई गीत गुनगुना रही थी। उसकी आवाज़ मुझे सहलाते हुए, सफ़र की सारी थकन पोंछ रही थी कि अचानक वह उठ बैठी। भरी गर्मी में अचानक बिजली गुल होने पर पंखा बंद हो जाए, उसी आकुल भाव से मैंने उसकी ओर देखा। उसकी दृष्टि के पीछे गयी तो वहाँ वह खड़ा था, पोंग। पाक उठ कर उस से बैग लेकर उसे पानी का गिलास थमा चुकी थी। वह थका हुआ, आस्तीन से पसीने पोंछते हुए पानी पी रहा था कि अचानक गिलास छोड़कर वह गिटार की ओर भागा। दीवार से उतार कर उसने उसके तारों को चेक किया। सब ठीक था। उसे कैसे पता चला कि उसका गिटार किसी ने छुआ है। सिक्स्थ सेन्स या गिटार की बदली हुई जगह। या शायद अपनी कला से प्रेम और जुड़ाव। मैं सोच ही रही थी कि मैंने उसकी आँखें अपने ऊपर महसूस की। शायद पाक ने बताया हो कि गिटार मैंने छेड़ा था। क्या वह नाराज़ है? मैं उसकी मेहमान हूँ, क्या इतना भी ख़याल उसे नहीं! मैंने अंदाज़ा लगाने की कोशिश की लेकिन कुछ समझ न आया तो मैं झूले पर जा लेटी। पाक दोबारा अपने काम में गुम हो चुकी थी। झूले की हल्की पेंगों ने मुझे नींद की ओर धकेल दिया। आँख खुली गिटार पर बजती मीठी धुन से। पोंग गिटार बजा रहा था। क्रोध की छाया उसके चेहरे से मिट चुकी थी। वह मुझे देख कर मुस्कुराया और धीरे से बोला,

“मैं क्लब में गिटार बजाता हूँ और गीत लिखता हूँ। आप?”

“मैं भी लिखती हूँ, लेकिन कहानियाँ।”

सुनकर वह पहले अचंभित था। फिर जब उसे मालूम हुआ मैंने दो किताबें लिखी हैं वह भाव-विभोर हो गया। उसने कहा लेखकों के लिए उसके मन में बहुत सम्मान है। वह पहली बार किसी लेखक से रू-ब-रू है। बचपन में वह सोचता था कि बड़े होकर ख़ूब सारी किताबें लिखेगा लेकिन किताब लिखने की प्रेरणा वह कहीं से अभी तक नहीं पा सका है। 

थाईलैंड आने के बाद मेरा अनुभव रहा है कि यहाँ बसे अधिकांश भारतीयों का पढ़ने-लिखने से कोई सरोकार नहीं है। मेरा लिखना-पढ़ना उन्हें किसी दूसरी दुनिया की बात लगती है। यह जानकर कि मैं लेखक हूँ उनकी प्रतिक्रिया विचित्र होती है। और यह जानकर कि मैं हिंदी में लिखती हूँ, वे मुझे कौतुक से देखते हैं। कुछ सलाह दे देते हैं कि मुझे अंग्रेज़ी में लिखना चाहिए और कुछ पूछ लेते हैं कि फ़िल्म/ सिरीज़ आदि क्यों नहीं लिखती! मैं दुःख से भर जाती हूँ कि साहित्य का इनकी नज़रों में कोई मोल नहीं। कितने ही हँस कर कह देते हैं कि किताबें पढ़ना उनके बस की बात नहीं और जो कोई भूले-भटके मेरी किताबों तक पहुँच भी जाए तो यह कहते हुए लौटा देता है कि उन्हें यह सब समझ नहीं आता। मालूम नहीं कि इस बात के लिए किसको दोष दिया जाए कि अपनी ही भाषा में लिखी बातें वे नहीं समझ पाते, किताबों को लेकर उनमें कोई उत्सुकता नहीं। शिक्षा-प्रणाली को अथवा जीवन शैली को। (हाँ, नयी पीढ़ी के कुछ बच्चे अवश्य अंग्रेज़ी साहित्य की ओर उन्मुख हैं।) जबकि दूसरे देशों के जितने लोगों से मैं मिली, अव्वल तो सबके हाथ में या बैग में कोई किताब मैंने पायी जिसे वे वक़्त निकालकर/पाकर पढ़ते हैं। यह जानकर कि मैं लेखक हूँ उनकी आँखों में आदर उतर आता है। वे अपनी पसंद की किताबों की चर्चा मुझसे करते हैं। मुझसे मेरी प्रिय किताबों और लेखकों पर बात करना चाहते हैं, मेरी लेखन पद्धति जानना चाहते हैं। मुझे लगभग सभी विदेशी लोगों ने कहा कि उनके सिरहाने कोई न कोई किताब अवश्य रहती है। रात में वे कुछ पढ़ने के बाद ही सोते हैं जबकि भारतीय घरों में किताबों का कोई कोना नहीं दिखायी देता। यह अंतर मुझे आहत करता है। 

पोंग देर तक मेरी किताबों पर, कहानियों पर बात करता रहा। उसे अंग्रेज़ी आती थी पर सीमित। उसी सीमित भाषा के सेतु पर हम विचरते रहे। मेरे पूछने पर कि इन दिनों वह क्या पढ़ रहा है, भाग कर होमोसेपियन्स ले आया। किताब खोल कर देखी तो जगह-जगह मार्क की हुई पंक्तियाँ और जहाँ-तहाँ लिखे हुए नोट्स। ऐसी किताबों में आह्लाद बसता है, जहाँ व्यक्ति स्वयं को रख देता है। मैंने किताब मेज पर रखी तो पोंग ने झट किताब उठा कर उसे अपनी क़मीज़ से पोंछा और तुरंत किताब उसकी जगह पर रखने चला गया। उसे जाते देख, मुझे मेरी याद आयी। अपनी संग्रहित किताबें किसी को देना कितना मुश्किल होता है मेरे लिए, भले ही नयी किताब ख़रीद कर दे दूँ। मेरे लिए, किताब देने का अर्थ अपना एक अंश सौंप देना। फिर भी कुछ लोग हुए जो हक़ से मेरी बुक शेल्फ से किताब निकाल कर ले जा सकते थे या जानते हुए भी कि वे किताब नहीं लौटाएँगे, मैं उन्हें किताब देती थी। एक हाथ की उँगलियों जितनी उनकी गिनती। वे किताबें मुझे बहुत याद आती हैं, वे लोग भी। 

मैं नदी के पास रखी कुर्सियों पर जा बैठी। धूप ललछौंही पड़ गयी थी। पानी का रंग बदलने लगा था। शाम उतरने के साथ ज्यों एक स्मित हवा में तैर रहा था जिसकी छाया में सब मुस्कुराता प्रतीत हो रहा था। पोंग किताब रख कर आया तो उसके हाथ में दो गिलास थे। कोई स्थानीय शर्बत था, पाक की अपनी विधि। मैंने पहला घूँट भरा। अपरिचित मगर मन को रुचने वाला स्वाद। मुझे अपनी कहानी ‘मगरिबी अँधेरे’ याद आयी। क्या यहाँ कोई जादू घटने वाला है! हाँ, यह सब जादू ही है। जो दैनिक जीवन में न घटता हो, उसका घटना ही तो जादू है। या कभी न सोचा हो उसका घटना, या जैसा सोचा ठीक वैसा ही हो जाना भी तो जादू है।

“क्या तुम्हें यह जगह किसी और जगह की याद दिला रही है?” पोंग के प्रश्न ने मेरी विचार-श्रृंखला में विघ्न उत्पन्न किया। मैं चौंकी कि किसी और की उपस्थिति मैं क्षण भर के लिए भूल गयी थी। मैंने एक और घूँट भरा और अपने आसपास एक बार फिर भली प्रकार देखा। हाँ, यह जगह मुझे कुमारकम के बैक वॉटर्ज़ की याद दिला रही है। ऐसी ही हरीतिमा, इसी रंग का पानी, पानी में तैरते पौधे और ऐसी ही कुर्सियाँ। जैसे वह स्थान और वह दिन रीक्रियेट किया जा रहा हो पर यह मैंने उसे नहीं कहा। 

“क्या ऐसा मेरे साथ ही होता है कि किसी एक जगह में दूसरी जगह घुलमिल जाती है? एक की याद औचक ही दूसरी जगह धर लेती है?” उसने फिर पूछा। 

“नहीं, ऐसा मेरे साथ भी होता है। सबके साथ होता होगा। शायद हम अपनी यादें भी सिमेट्रिकल चाहते हैं इसीलिए तारतम्यता खोजते हैं। यहाँ आने के बाद मैं लगभग हर कोने-कूचे को भारत की यादों से जोड़ चुकी हूँ। कभी-कभी कोई दिन भी ऐसे आ खड़ा हो जाता है जैसे कभी गया ही नहीं। जैसे किसी दिन पहाड़ों पर बितायी छुट्टियों में, पेड़ से लटकती विंड चाइम का स्वर याद आता है। कभी किसी ख़ास जगह जाने की चाह में मीलों चलते जाना याद आता है। कभी धूप का टुकड़ा ही मन प्रसन्न कर जाता है कि उसकी आकृति मेरे घर की खिड़की से छन आती धूप से मिलती है। हो सकता है यह सर्वाइवल की कोई तकनीक होती हो जिसे हमारा सबकॉनशियस अपनाता हो।” 

उसने समझने वाले भाव में गर्दन हिलायी। “मैं बहुत ज़्यादा नहीं घूमा। मेरी अधिकतर यादें एक-दूसरे की फ़ोटोकॉपी है। मेरी दुनिया सीमित है।”  

“मगर तुम्हारी कल्पनाएँ नहीं।” मेरे ऐसा कहने पर वह मुस्कुराया। “जो तुम्हारे पास है वह बहुतों के पास नहीं है और जो बाकी लोगों के पास है, हो सकता है वह तुम्हारे काम का ही न हो। हमारे पास चुनने का अधिकार भले ही हो किंतु चुनने के साधन सदा उपलब्ध हों, आवश्यक नहीं। जो है, उसी को अदल-बदल कर बरतना पड़ता है। सुनकर वह शून्य में खो गया। उसके चेहरे के भाव, दबे पाँव आते अँधेरे में घुल-मिल गए। उस चुप्पी को हम दोनों में से किसी ने नहीं तोड़ा। अचानक वह चिहुंका, 

“वहाँ देखो, वह नीली गर्दन वाला पक्षी। तुम लकी हो जो इसे देख पायी। यह आसानी से नहीं दिखाई पड़ता।” मेरी निगाहें धुँधलके का एक्स-रे कर सामने एक पत्ते पर टिके उस पक्षी पर गयी जो अपनी गर्दन मोड़ कर हमारी ओर देख रहा था। 

“इसका नाम?”

“नाम नहीं मालूम पर मैं इसे ‘ब्लू जेम’ कहता हूँ। जिस दिन यह दिखाई पड़ता है उस दिन ज़रूर कुछ अच्छा होता है। जैसे मेरा अधूरी लिरिक्स पूरी हो जाती हैं या उस रात मुझे गाने के लिए बहुत तारीफ़ मिलती है या मेरे जाल में बड़ी मछली फँस जाती है।” अब मैं उससे इत्मीनान से मुख़ातिब थी जहाँ पहुँचने के लिए उसे ख़ास तरकीब नहीं लगानी पड़ती। 

“मछली कहाँ पकड़ने जाते हो?”

“यहीं सामने। यह नाव है न इसी में बैठकर।” पानी में डुलती, छोटी-सी नीली नाव को मैंने हज़ारवीं बार देखा। 

“क्या तुम इसमें सैर करना चाहोगी?” मेरी इच्छा को भाँपते हुए उसने पूछा।

“अभी?” मेरा डर सतह पर तिर आया।

“पानी से दोस्ती हो तो समय के रंग से फ़र्क़ नहीं पड़ता।”

“दोनों ओर से चाहने पर भी कई दफ़ा दोस्ती पनप नहीं पाती। लेकिन फिर भी मैं कल सुबह कोशिश करूँगी, इस वक़्त नहीं।” इस स्वप्निल जगह पर मैं शायद अपने डर के बंध ढीले करने को तैयार थी।

“कुछ दूरी पर लताओं की कैनपी है। जाओगी तो देख सकोगी।” 

“ठीक, अब चलती हूँ। सब मेरा इंतज़ार कर रहे होंगे।” उसने कुछ नहीं कहा। मैंने विदा लेने के लिए हाथ बढ़ाया तो वह धीरे से बोला, “आय एम फ़ीलिंग ब्लेस्ड दैट आय मेट यू।” उसके चेहरे पर तरलता थी। अजाने ही हम लोगों के जीवन में बदलाव रख देते हैं और लोग हमारे जीवन में। कुछ जुड़ता है, कुछ घटता है और उन बदलावों की परिधि पर हम चक्कर काटते जाते हैं। 

“कल तुम जा रही हो। फिर कभी इस शहर आओगी तो यहाँ रुकोगी?” उसकी आवाज़ थरथरायी हुई थी। मैंने पलट कर देखा। जिस हाथ को मैंने छुआ था वह हाथ थामे वह कह रहा था, “यह स्पर्श मैं सदा सम्भाले रखूँगा।” मैं हतप्रभ थी। वह किसी क्षणांश में, व्यक्ति से पुरुष में बदल रहा था। 

क्या हम जेंडर से परे जाकर व्यक्ति मात्र नहीं रह सकते। क्या हमारी दूसरी पहचान हम पर इतनी हावी रहती है कि व्यक्ति होना सेकंडेरी हो जाता है। इसी कारण कितनी मित्रताएँ खोयी हैं। मधुर हो सकने वाले कितने सम्बंध समय से पहले चुक गए हैं। नहीं, मैं किसी प्रकार की कटु स्मृति साथ नहीं ले जाना चाहती। जो शाम दो लोगों ने साथ बितायी है, उसकी नैसर्गिकता को मैं किसी और बात से आच्छादित नहीं करना चाहती। उसकी भावनाओं को लेबल न करने का निर्णय लेते हुए मैंने उसे देखा और ‘न’ कहकर आगे बढ़ गयी। 

परिचय :

नाम - दिव्या विजय, जन्म - 20 नवम्बर, 1984, जन्म स्थान – अलवर, राजस्थान, शिक्षा - बायोटेक्नोलॉजी से स्नातक, सेल्स एंड मार्केटिंग में एम.बी.ए., ड्रामेटिक्स से स्नातकोत्तर

विधाएँ - कहानी, लेख, स्तंभ।

‘अलगोज़े की धुन पर’ एवं ‘सगबग मन’ कहानी-संग्रह प्रकाशित। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं जैसे नवभारत टाइम्स, कथादेश, इंद्रप्रस्थ भारती, पूर्वग्रह, जनपथ, नया ज्ञानोदय, परिकथा, सृजन सरोकार आदि में नियमित प्रकाशन। इंटरनेट पर हिन्दी की अग्रणी वेबसाइट्स पर अद्यतन विषयों पर लेख। रविवार डाइजेस्ट में नियमित स्तंभ।

अभिनय : अंधा युग, नटी बिनोदिनी, किंग लियर, सारी रात, वीकेंड आदि नाटकों में अभिनय। रेडियो नाटकों में स्वर अभिनय। 

सम्मान - मैन्यूस्क्रिप्ट कॉन्टेस्ट विनर, मुंबई लिट-ओ-फ़ैस्ट 2017 

सम्प्रति - स्वंतत्र लेखन, वॉयस ओवर आर्टिस्ट

ईमेल- divya_vijay2011@yahoo.com

नैनीताल : ठहरा हुआ समय – दिव्या विजय


दिव्या विजय के यात्रा-संस्मरण का पहला भाग–‘रामनगर : एक निंदासा शहर’ हम सबने करीब छह महीने पहले पढ़ा था। यह संस्मरण उसकी ही अगली कड़ी है। अबकी यात्रा है नैनीताल की। दिव्या विजय की यायावरी का वृतांत पढ़ते हुए आप जगहों को देखते हुए... छोड़ते हुए आगे नहीं बढ़ते हैं, बल्कि उनके साथ ठहरते हैं। वे एक गंभीर पाठिका हैं, इस कारण उनकी घुमक्कड़ी के वर्णन में साहित्यिक सन्दर्भ आपको मिलते रहेंगे। ... और उनकी भाषा का स्नेहिल स्पर्श तो हमेशा की तरह आपको संवेदित करेगा ही। तो आइए, आगे बढ़ते है... यायावर के साथ, वह चाहे जिधर ले चले।

अगली सुबह हमें नैनीताल के लिए निकलना था. नैनीताल...जहाँ हमारे लिए ओस की बूँदों के भार से गिर गए नरगिसी फूल-सी सुबहें प्रतीक्षारत थीं. नैनीताल के लिए मन में बहुत उत्सुकता थी. आठ साल पहले जब वहाँ जाना हुआ था तब पहाड़ों पर घूमने का अधिक अनुभव नहीं था. अचानक तय हुए कार्यक्रम में रेल के रिजर्वेशन के लिए समय नहीं बचा था. दिल्ली से जो पहली बस मिली उसी में बैठकर रात भर के सफ़र के बाद नैनीताल के बस अड्डे पर दो नितांत औघड़ युवा अपने सामान के साथ खड़े थे जिन्हें नहीं पता था आगे कहाँ जाना है. टैक्सी वाला जहाँ ले जाता उसके पीछे वहीं चले जाते. हर जगह प्राकृतिक सुन्दरता से अधिक लोगों की भीड़ मिली और मिली चिल्ल-पों. लेकिन सच कहूँ तो वो उम्र ही ऐसी थी कि यह सब भी अच्छा लगता था. जिसने दुनिया न देखी हो उसे अपनी चार-दीवारी की हद के बाहर हर जगह लुभाएगी. लगभग यही हाल हमारा था. पर्यटकों की तरह घूम-घूम कर हम थक गए थे पर मन उछाह से भरा था. सात तालों में से एक ताल भी देखने से छूट न जाए इसी की चिंता थी. कहाँ नाव पर बैठे और कहाँ नहीं ध्यान बस इसी ओर था. इस ओर ध्यान ही नहीं गया था कि खाने-पीने की दुकानों पर मिलने वाले सामान के साथ नावों का रूप-रंग और नाविकों की बातों तक सब एक जैसा है. तीन दिन इन एक जैसी बातों को दोहराने की बजाय हमें नयी चीज़ों को देखना-खोजना चाहिए था. यह समझ बाद में आई और जब आई तब कितने ही स्थान नए होकर हमसे मिले. 




इस बार यात्री के रूप में हम परिपक्व थे. अपनी पसंद-नापसंद का हमें था और हम जानते थे हमें किस ओर जाना है. जहाँ नहीं मालूम था वहाँ भी भटकने का अलग आनंद था. हम इस बार ज़िम्मेदार भी अधिक थे कि बच्चे अब साथ होते हैं. हर शहर का एक फील होता है. यह अदृश्य रस्सी के समान होता है जिसे पकड़कर संतुलन साध कर हमें आगे बढ़ना होता है. सही सिरा पकड़-समझ लेने पर शहर आपके सामने वह पेश करेगा जो वह अक्सर छिपा ले जाता है. लोग आते हैं और सतह छू कर लौट जाते हैं. 




बीते सालों में कितने ही पहाड़ देख डाले हैं. पहाड़ी स्थान देखने में एक-से लगते हैं. कुछ हद तक वे एक जैसे होते भी हैं. पहाड़ों के झुरमुट में बसा एक छोटा-सा गाँव जो प्रसिद्ध होने पर शहर-सा कलेवर धारण कर लेता है लेकिन शहर होता नहीं है. वहाँ चहल-पहल होगी, भीड़ होगी, खेल-तमाशे होंगे, बड़े ब्रांड होंगे, कुछ-एक जगह मॉल भी मिलेंगे लेकिन फिर भी पहाड़ों का भोलापन बचा रहता है. यही खासियत है पहाड़ों की कि उन पर नयी चीज़ों का कितना भी बोझ लाद दिया जाए वे सब संभाल लेते हैं. उनकी रीढ़ इतनी मज़बूत होती है कि बदलाव की बड़ी से बड़ी बयार उनकी आत्मा को चोट नहीं पहुँचाती. तभी आठ साल बाद वहाँ जाने पर शहर में कुछ बदलाव भले ही आप महसूस करें पर वहाँ की हवा उतनी ही मीठी लगती है. 





पहाड़ी जगहों का कैसा जादू होता है कि घुमावदार रास्ते कहीं भी पहुँचा देते हैं. अयरपट्टा की पहाड़ियों पर स्थित ‘नैनी रिट्रीट’ का प्रवेश द्वार काफी ऊँचाई पर जाकर था. नैनी रिट्रीट जो किसी ज़माने में पीलीभीत के महाराजा का महल था..जिसे रिसोर्ट में तब्दील कर दिया गया. २००० मीटर की ऊँचाई पर स्थित यह रिसोर्ट झील का, सामने की पहाड़ियों का एक सुन्दर दृश्य प्रस्तुत करता था. घंटों यहाँ बैठ कर इस सुन्दर दृश्य को देखा जा सकता था. एक रास्ता गाड़ी के लिए था और माल रोड से वहाँ पहुँचने में लगभग पंद्रह मिनट लगते थे. वहीं होटल के दूसरी ओर से एक गोल-घुमावदार पैदल रास्ता जाता था जो पाँच मिनट में माल रोड पर ला छोड़ता था. जाते वक़्त यूँ लगता फिसलते हुए नीचे पहुँच गए. आते वक़्त मालूम होता कि हम कितनी दूर आ गए हैं. आदत न होने के कारण साँस भर जाती और टकटकी लगाये ऊपर देखते कि कितना रास्ता और बचा है. रास्तों का जाल इतना सुन्दर था कि होटल के कई गलियारे उस रास्ते आ पहुँचते. जिस दिन हम पहुँचे उस रोज़ जगह-जगह बोर्ड लगे थे...पर्यटन दिवस के. उसी उपलक्ष्य में कार्यक्रम चल रहा था फ्लैट्स में. अब मुझमें उत्सुकता जागी कि जब आ ही पहुँचे हैं तो क्यों न देखा जाए. लेकिन ये फ्लैट्स किस ओर होंगे. सब ओर ढूँढ कर, कुछ लोगों से पूछ कर, जो शायद मेरी ही तरह अनजान होंगे, भी जब पता नहीं कर पाए तो स्टेडियम में चल रहे एक उत्सव में शामिल हो गए. वहाँ पहुँच कर पता लगा कि जिसे स्टेडियम कहते रहे हैं वही फ्लैट्स हैं. वहाँ दो-तीन घंटे बिताने के बाद भी उठने का मन नहीं किया. अलग-अलग राज्यों के नर्तक अपने-अपने राज्य के नृत्यों की प्रस्तुति दे रहे थे. शुरुआत उत्तराखंड के नाच से हुई थी. शब्दों का अर्थ समझ न आने के बावजूद चेहरे के भावों ने मन मोह लिया. लड़की किसी बात पर रूठी हुयी और लड़का मान-मनौव्वल करता हुआ. पहाड़ी कपड़ों में लिपटे, पहाड़ी धुन पर थिरकते स्त्री-पुरुषों पर से आँख हटाने का मन नहीं था. एक-एक कर हरियाणा, पंजाब, राजस्थान से होते हुए सारा देश नाप लिया. हरीतिमा के बीच रंगों का मेल लाजवाब था. ऊँचे-ऊँचे साल, ओक, पाइन के वृक्षों से घिरे फ्लैट्स में तेज़ धुनों पर लोकगीतों पर नाच देखना सुखद अनुभव था. अधिकतर लोग वहीं के निवासी थे. रेलिंग से सट कर कुछ सैलानी भी खड़े थे जो पाँच-सात मिनट रुक कर आगे बढ़ जाते. सैलानियों के पास कहाँ वक़्त होता है कि ठहर कर कहीं शामिल हो सकें. उन्हें भागते हुए हर वो चीज़ देखनी होती है जिसके लिए वह स्थान प्रसिद्ध है. उन्हें चिंता रहती है कि कुछ देखने से रह न जाए. यात्राएँ नए स्थानों से परिचय के साथ अपने दैनंदिन जीवन को नया सुन्दर कलेवर पहनाने का निमित्त भी बनती हैं. चिंता की गठरी बाहर आकर भी नहीं उतारी तो यात्रा का अर्थ क्या? हजारों रूपये खर्च कर आया व्यक्ति भूल जाता है कि किसी भी स्थान का निवास निर्जीव जगहों से अधिक वहाँ के लोगों में, वहाँ की कला में होता है. 




संगीत अनायास ही थम गया था. भीड़ तितर-बितर हो रही थी. उनमें से कुछ अपने घर की ओर बढ़ रहे थे, कुछ झील की ओर और कुछ दुकानों की ओर. चाट के ठेलों पर अचानक गहमा-गहमी बढ़ गयी थी. बावजूद कि वहाँ की चाट खाने लायक नहीं थी. उसमें प्रयुक्त होने वाला तेल-मसाला निहायत ही निम्न स्तर का था. लेकिन स्वास्थ्य के प्रति सचेत न खाने वाले हैं न खिलाने वाले. ख़ासकर पर्यटन स्थलों पर यह बहुतायत में देखने को मिलता है. दीवाली के आस-पास के दिन थे तो लोग अपेक्षाकृत कम थे और रोशनियाँ ज़्यादा. शहर जगमगा रहा था और चमकते जुगनुओं की परछाईं झील में दिपदिप कर रही थी. रात घिर आने पर धीरे-धीरे चढ़ाई चढ़ कर लौटना न जाने क्यों उदास कर रहा था. शहर अचानक थमा हुआ प्रतीत हुआ. शोर-शराबे, हंगामे से दूर रात्रि की नीरवता मन पर हावी हो रही थी. लौटना सदा कठिन होता है...बाहर से भीतर की ओर, प्रेम से उदासीनता की ओर और जीवन से मृत्यु की ओर. दिन में पहाड़ दिखते हैं, झील दिखती है, आसमान दिखाई देता है और रात में सिर्फ एक रंग. वह एक रंग हर रंग को ढक लेता है. उसके नीचे कितना कुछ खो जाता होगा. वह कुछ जो हम जान भी नहीं पाते. ‘नैनी रिट्रीट’ तक पहुँचते-पहुँचते कुत्तों का भूंकना सुनाई देने लगा था. ये वही कुत्ते होंगे जिन्हें सुबह देखा था. वे किसी के पालतू कुत्ते थे. बहुत मोटे, कद्दावर कुत्ते जिन्हें देखते ही भय से भर उठें. लेकिन इस समय दूर से आती उनकी आवाजें संबल प्रदान कर रही थीं कि सब कुछ थमा नहीं है. बहुत कुछ जागा हुआ है...हमारे मन की तरह. 

मौसम बेतहाशा ठंडा हो चला था. खाने के बाद सब दुबक जाना चाहते थे. कमरे की ओर बढ़ने लगे तो ‘बार’ के पास एक गायक गाते हुए दिखा. उसी ओर बढ़ चले. रात बहुत गहरी थी. छोटा-सा फ्रेंच स्टाइल का गार्डन रंग-बिरंगे छोटे लट्टुओं से जगमग कर रहा था. ठीक वहीं ‘बार’ था जहाँ से सारी घाटी दीख पड़ रही थी. बारिश के छींटे उन खिडकियों पर कुछ निशान छोड़ गए थे जो रात में भीतर से आती मद्धम रोशनी में जान-बूझकर बनाया गया पैटर्न लग रहे थे. बार खाली था. बार के बाहर बैठे उस गायक को सुनने वाला भी कोई नहीं था. चूँकि यह उसके काम का हिस्सा था वह अकेले ही पूरे मनोयोग से गाये जा रहा था. टोपी लगाकर देवानंद की तरह सर हिलाकर वह गा रहा था, 

“पल भर के लिए कोई हमें प्यार कर ले, झूठा ही सही.”

हम वहीं सामने लगी कुर्सियों पर बैठ गए. सारा होटल हरी-नीली रोशनियों से जगमगा रहा था. छोटे-छोटे लट्टुओं से जगमगाते पेड़ और सामने दूर तक फैली घाटी में कोहरे के बीच जड़ी छोटी, पीली रोशनियाँ. जैकेट पहने होने के बावजूद हवा की तेज़ी नश्तर चुभो रही थी. ऐसा महसूस हो रहा था ज्यों पिघली हुई बर्फ किसी ने भीतर भर दी हो. जो अलाव उस ओर जला रखा था, वह यहाँ क्यों नहीं जलाया. सोचते हुए हमें कुछ देर बाद भीतर जाना ही पड़ा लेकिन वह गाता रहा. अपने इकलौते दर्शक के चले जाने के बाद भी.

कोई सामने न हो तो क्या किसी की कल्पना उसे प्रेरणा देती होगी? अकेली, बर्फीली रात में बिना रुके गीत गाते जाना क्या कुछ और अकेलापन न बुन बैठता होगा. देर रात तक उसकी आवाज़ भीतर आती रही और हम गर्म कमरे में लेटे हुए बाहर की ठण्ड में वह किस तरह गा रहा होगा इसकी कल्पना करते रहे. वह बहुत सुरीला नहीं था पर नैनीताल की ठंडी रात में अस्सी के दशक के गानों के बीच माहौल रूमानी हो गया था. अगले दिन उसके चेहरे पर कुछ पढ़ने का प्रयत्न किया था पर उसका चेहरा सपाट था. उसके चेहरे का सपाटपन ही शायद हर प्रश्न का उत्तर था. बाद में मैंने जाना था कि वह शौकिया गाता है. उस रोज़ थोड़ी देर की बातचीत के बाद गीत गाते हुए उसके चेहरे पर मुस्कराहट थी. और हाँ, उसका नाम तेजिंदर है.

नैनीताल में देखने के लिए क्या है? वह नहीं जो पिछली बार देखा था या जहाँ लोग जाते हैं. मुझसे एक मित्र ने आग्रह किया था कि किलबरी ज़रूर जाना. मैंने उसकी बात मान ली थी. जाने क्यों उस जगह का नाम सुन कर टैक्सी वाले अनमने हो रहे थे. हमें बहलाने की कोशिश कर रहे थे कि वहाँ कुछ नहीं है और हमें कम कीमतों पर दूसरे पैकेज देने की चेष्टा कर रहे थे. या वहाँ जाने के इतने पैसे माँग रहे थे कि सुन कर हम खुद ही मना कर दें. किसी तरह वहाँ जाने के लिए एक टैक्सी वाले को तैयार किया. पौन घंटे की ड्राइव के बाद हम वहाँ पहुँचे तो कुछ क्षण निशब्द रह गए. वहाँ तो वाकई कुछ नहीं था. दूर तक पसरी नीरवता जिसे गाहे-बगाहे कुछ पक्षी तोड़ रहे थे. वहाँ प्रकृति थी...अपने निर्मल रूप में, रत्ती भर मिलावट नहीं. जंगल इतना घना कि दोपहर में भी सूरज को यहाँ पहुँचने के लिए मशक्कत करनी पड़ रही थी. नीचे के शोरगुल के ठीक उलट यह स्थल सिर्फ पेड़ों की सरसराहट और पक्षियों की कलरव से गुन्जायमान था. यह निर्जन स्थान थोड़ी देर को हमारी हँसी से भर गया था. 




ठण्ड इतनी कि बैग में रखी जैकेट और शॉल निकाल लेने पड़े. हम धूप का एक टुकड़ा खोज वहाँ बैठ गए. किरणें जैसे किसी प्रिज़्म से होते हुए अलग-अलग रंगों की छटा बिखेरते हुए ज़मीन चूम ले रही थी. यह आम पर्यटन-स्थलों जैसा नहीं था. यहाँ न दुकानें थीं, न पर्यटकों से कुछ खरीद लेने का आग्रह करते दुकानदार. गंदगी लेशमात्र भी नहीं. यहाँ सिर्फ वन विभाग का एक रेस्ट हाउस था जो आज़ादी के पहले से वहाँ है. उन दिनों अंग्रेज़ वहाँ ठहरा करते थे. उन लोगों ने अपनी आरामगाह के रूप में एक से एक सुन्दर जगहों का चुनाव किया है. बीहड़ वन में आकर रहने वाले वे निर्भीक लोग प्रकृति-प्रेमी भी रहे होंगें. उनके पास रोमांचक किस्सों का भी अम्बार होगा. जब हम भीतर गए तो वह बिलकुल खाली था. गार्ड रहता होगा पर उस समय नहीं था. वहाँ आने वाले पशुओं की सूची देख हमें रोमांच हो आया. एक से एक खतरनाक जीव वहाँ घूमने आते थे. उनकी तस्वीरें हम उत्सुकता से देखते रहे. तभी जैसे हवा रुक गयी. पक्षियों का कलरव भी थम गया. एक आहट, जो अभी तक हुई आहटों से भिन्न थी हमारी पीठ पीछे सरसरायी. एक झटके में पीछे मुड़ कर देखा तो कुछ नहीं था. लेकिन सामने वाली झाड़ियाँ काँप रही थीं. हमने एक-दूसरे को देखा और आँखों ही आँखों में बाहर जाने का निश्चय कर लिया. दबे पाँव हम बाहर निकल आये. बाहर आते ही ऐसा महसूस हुआ जैसे पलक झपकते ही किसी ने रिमोट कंट्रोल से दृश्य बदल दिया. जैसे किसी दूसरी दुनिया से अपनी दुनिया में लौट आये हों. कुछ क्षण पहले का डर, रहस्य सब बाहर की हवा के साथ बह गया. बाहर थीं हवा के साथ नाचती पेड़ों की शाखें और वही...छन-छन कर आती धूप. जितनी देर हम वहाँ बैठे रहे, समय रुका रहा. समय के सरकने का भान तब हुआ जब अचानक धूप के टुकड़े सरकते-सरकते इतनी दूर जा पहुँचे कि उन तक पहुँचना हमारे लिए संभव नहीं रह गया. तब भी उस जगह का मोह ख़त्म नहीं हुआ और हमने ड्राईवर से कहा कि वो मुख्य सड़क पर हमारी प्रतीक्षा करे. हम वहाँ तक पैदल चल कर पहुँचेंगे. सूखे पत्तों को चरमर की आवाज़ से भरते हुए हम देर तक वहाँ टहलकदमी करते रहे. धूप को दूर, हमसे बहुत दूर फिसलते देखते रहे. मुख्य सड़क पर पहुँच कर दृश्य फिर बदल गया था. इस बार अपनी दुनिया से उस दुनिया में लौट आना पड़ा था जहाँ होना हमारी नियति है. 

वापसी में हम माल रोड पर उतर गए. माल रोड पर किताबों की दो दुकानें दिखाई दे रही थीं. उसी मित्र का प्रेम भरा हठ था कि मैं हिमांशु जोशी का उपन्यास ‘तुम्हारे लिए’ खरीदूँ और नैनीताल में रहते हुए ही पढूँ. इस उपन्यास का अधिक भाग नैनीताल में ही घटता है. किसी स्थान को बैकग्राउंड बना कर लिखी गयी रचनाओं की सुन्दरता होती है कि वह स्थान उनमें एक मज़बूत चरित्र की तरह उभर कर आता है. लेखक ने उस स्थान को कैसे जिया-समझा-ग्रहण किया यह तो मालूम होता ही है. कई बार कुछ अनसुने स्थान भी मालूम पड़ते हैं जहाँ जाया जा सकता है. जैसे प्राग सुनकर सिर्फ निर्मल वर्मा याद आते हैं या कसप का ज़िक्र हो तो नैनीताल खुद ब खुद चला आता है. दोनों दुकानें छान मारीं पर यह किताब नहीं मिली. पता लगा कि यह किताब स्टॉक में ख़त्म हो गयी है. दुकानदार से पूछने पर उन्होंने बताया कि लोगों में पढ़ने के प्रति रूचि है और लोग खरीद कर पढ़ने के प्रति उदासीन नहीं हैं. जब मैं वहाँ थी तब भी दोनों दुकानें लोगों से भरी हुई थीं. लगभग सभी साहित्यिक पत्रिकाओं के नवीनतम अंक वहाँ चमक रहे थे. मैंने उन्हीं में से एक-दो लेकर चली आई. नैनी झील से लगती हुई है लाइब्रेरी. सोचा था वापसी में कुछ समय वहीं बैठेंगे. झील को खिड़की से तकते हुए किसी किताब में डूबे रहने का सुख वर्णनातीत होगा. पर वह लाइब्रेरी खस्ताहाल हो चुकी थी और बंद थी. किसी ने बताया जल्द ही इसकी मरम्मत की जायेगी. शायद अगली बार वह ठीक हालत में मिले. 






हम नैनी झील के किनारे-किनारे चलते रहे. सुबह तय किया था कि शाम को बोटिंग करेंगे पर अब मन नहीं रह गया था. लौटते हुए ड्राईवर ने बताया था कि हाल ही में बहुत से लोगों की मृत्यु इसमें डूबने के कारण हो गयी है. दो दिन पहले ही एक लाश निकाली गयी है. कुछ और लाशों की खोजबीन चल रही है. न, मृत्यु से डर नहीं पर मृत लोगों की देह पर उल्लास मनाना क्या निष्ठुरता नहीं होगी..बस यही सोचकर. चलते-चलते पिछली बार के शहतूत याद आये. पिछली बार झुकी कमर वाला एक वृद्ध कितनी प्रसन्नता से शहतूत पर नमक लगाकर बेच रहा था. हम दिन भर घूमने के करण थक कर बैठ गए थे और वह रात को खाना खा सकने के लिए दिन भर से खड़ा था. उस से बहुत-सी बातें हुई थीं. लेकिन इस बार कोई नमक लगाकर शहतूत खिलाने वाला नहीं मिला. आँखें उसको जानी-पहचानी राहों पर तलाशती रही थीं.




पिछली बार हर रात माल रोड पर टहलते हुए मशीन वाली कॉफ़ी पीते थे. पर अब कैसे तो उस कॉफ़ी में वो स्वाद नहीं रहा था. अब तो खैर नैनीताल में कैफ़े कॉफ़ी डे भी खुल गया है. युवाओं का जमघट वहीं लगता है. सीढियाँ चढ़ कर वहाँ पहुँचे तो झील के सुन्दर दृश्य ने फिर बाँध लिया. डूबते सूरज का प्रतिबिम्ब झील में था और सामने कोहरे में धुंधलाते पहाड़ थे. झील में बस एक-दो नाव बची थीं और थोड़ी ही देर में झील अकेली हो जाने वाली थी. हम वहीं बाहर बैठ गए. बैठते ही नज़र पड़ी लड़कियों के एक झुण्ड पर. वे किसी की ओर इशारा करती जाती थीं और हँसती जाती थीं. हँसी उनकी...कच्ची, रसपगी, उनकी उम्र-सी, हवा में तैरते हुए सब पर बिखर गयी. उनकी हँसी का स्रोत नीचे था. लड़कों की एक टोली नीचे से गुज़र रही थी. उन्हीं में एक लड़का था, किसी नायक-सा. सड़क पर भी सबकी नज़रें उस पर से हो गुज़र रही थीं. जीन्स-टीशर्ट और ढलती धूप में भी धूप का चश्मा लगाये वह लड़का जंगल की खुशबू लिए फिर रहा था. उसने भी लड़कियों को देख लिया था सो चाल ज़रा और सध गयी थी. अहा, इस उम्र का आकर्षण किसी भी युग में नहीं बदल सकता. यह उम्र लौटती नहीं है पर जीवन भर के लिए स्मृतियाँ दे जाती है. लड़के अब बार-बार पलट कर माल रोड का चक्कर लगा रहे थे और लडकियों के दल से हर बार उत्तेजना में सनी, हँसी मिली चीख सबके कानों तक पहुँचती. अपने दिनों की याद शायद वहाँ उपस्थित सभी लोगों के चेहरों पर मुस्कान ले आई थी. हमारी कॉफ़ी आ गयी थी और उन लोगों की अठखेलियों पर से ध्यान हटा हम अपनी कॉफ़ी में डूब चुके थे. सूरज झील में उतर चुका था और अचानक उस जगह का मिज़ाज पूरी तरह बदल गया. दिन भर गले में मफलर के तरह स्वेटर टाँगे रहे लोग अब उन्हें पहन कर बटन बंद करने की कवायद में लगे थे. रिक्शे वाले दिन के संभवतः आखिरी ग्राहक के साथ मोल-भाव में लगे थे. कम कीमत में उन्हें आस-पास घुमाने का प्रलोभन दे रहे थे. दिन भर घूम-फिर कर लौटे लोग अब माल रोड पर इकट्ठे हो रहे थे. वहाँ के रेस्तराओं में भीड़ अचानक बढ़ गयी थी. थोड़ी देर यहाँ रौनक रहेगी और फिर यह शहर नीरवता ओढ़ लेगा.




अभी हमें कहीं और भी जाना था...नैना देवी मंदिर. मंदिर की घंटियों का निरभ्र शब्द हम तक आ रहा था. ईश्वर को मानें न मानें यहाँ का वातावरण चित्त को शांत कर देता है. घंटियों का पावन स्वर, लहरों की उमड़-घुमड़ में मिल कर दूर तक जाता है. मंदिर के प्रांगण में एक पीपल का वृक्ष है जिसके नीचे बैठकर सुस्ता लेने का सुख त्याज्य नहीं है. सती ने शिव के अपमान पश्चात् अपने प्राण त्याग दिए थे. सती की निष्प्राण देह को शोकाकुल शिव लिए जा रहे थे. सती के अंग एक-एक कर गिरते गए. जहाँ-जहाँ उनके अंग गिरे वे स्थान शक्तिपीठ हुए. यहाँ गिरी थीं सती की आँखें. यहीं बना नैना देवी का मंदिर...नैनी झील के एक छोर पर. इक्यावन शक्तिपीठों में से एक. यहाँ देवी अपने सम्पूर्ण रूप में नहीं विराजतीं. उनके नेत्र ही यहाँ स्थापित हैं. पंद्रहवीं शताब्दी में बना यह मंदिर 1842 में भू-स्खलन के कारण उजड़ गया था जिसे स्थानीय निवासियों ने तीन साल के भीतर फिर खड़ा कर दिया. नैना देवी के प्रति अटूट विश्वास और श्रद्धा है यहाँ के लोगों में. इसी के पास ठंडी सड़क है जहाँ तापमान नैनीताल की बाकी जगहों से हमेशा कम रहता है. नैनी झील के दूसरी ओर देवदार और शाहबलूत के वृक्षों से घिरा यह रास्ता सूरज की किरणों से वंचित रहता है और इसीलिए ठंडा रहता है. यहाँ वाहन नहीं आ सकते. शहर के बीचोंबीच लेकिन शहर के कोलाहल से दूर...प्रकृति की घनी चादर से लिपटा यह रास्ता पैदल चलने वालों के लिए स्वर्ग है. 




अगली सुबह पाँच बजे उठ कर सैर पर जाना था. नींद छोड़कर उठना सबके लिए दुष्कर कार्य था इसलिए सभी आनाकानी कर रहे थे. लेकिन मैं अड़ गयी थी कि कोई नहीं जाएगा तो मैं अकेली जाऊँगी. सुबह जब मैं जागी तो वाकई सब गहरी नींद में थे. मेरे उठाने पर कमरे में कुनमुनाहट का स्वर पसर गया. देखते-देखते मेरा उत्साह सब तक पहुँच गया और धीरे-धीरे सब अपने-अपने जूतों के तस्मे कसने लगे. हम जाने लगे तो हमारे साथ होटल वालों ने एक युवक को कर दिया. उसके साथ होने से निश्चिन्तता ही थी. किसी जगह को वहाँ रहने वाले की दृष्टि से देखना अपने आप में एक अनुभव है. इस से शहर का मनोविज्ञान समझने में मदद मिलती है. वह वैसा ही था जैसे आम तौर पर पहाड़ी लोग होते हैं. सरल और निश्छल. सारे रास्ते हमारे पूछे गए प्रश्नों का उत्तर वह बिना खीजे देता रहा. अपने बारे में बताता रहा कि नैनीताल के एक कॉलेज से एम बी ए कर रहा है. फिर लॉ करने कहीं बाहर जाएगा. यहाँ रोज़गार के अधिक अवसर नहीं हैं तो नौकरी भी बाहर ही लगेगी. अंततः पहाड़ छूट जायेंगे. उसकी आवाज़ तरल हो आई. पहाड़ों से राग मैं सहज ही समझ सकती हूँ. उनके प्रति अनुराग कभी ख़त्म नहीं होता. उनसे अलग होना सरल नहीं है. दूर रह्कर भी पहाड़ मन में बसते हैं. यह लिखते हुए एक व्यक्ति याद आ रहा है. वह खुद को पहाड़ों का आदमी कहता है जबकि वह पहाड़ों में नहीं रहता. हाँ, अक्सर पहाड़ों पर जाता ज़रूर है. सैलानियों की तरह नहीं बल्कि पहाड़ों का सहोदर होकर. दूर-दराज़ कहीं गुफा खोजकर वहीं बसेरा करता है. दिन में आबादी वाले क्षेत्र में जाता है और ज़रुरत भर के काम कर लौट आता है. चाँदनी रात में किसी नदी के ऊपर चमकते चाँद की नीली तस्वीरें उसने अक्सर बाँटी हैं. रातें उसकी बाँसुरी की धुन पर बहती हैं. वह कहता है कि उसका जीवट, फौलादी मन सब पहाड़ों की देन है. 




जिस रास्ते पर वह हमें ले गया, वह रास्ता अभी अधसोया था. एक ओर ऊँचा जंगल था. दूसरी ओर शहर और झील दिखाई पड़ रहे थे. हम शहर के सामानांतर चलते रहे. जंगल हमारे समानांतर. हम तीनों के बीच अलक्ष्य दौड़ थी कि दिन पूरी तरह उगने से पहले कौन कहाँ तक पहुँचता है. शहर और जंगल हमारी तुलना में अनंत थे..समय के उस क्षण. उनका कोई गंतव्य नहीं था. शहर सोते से जाग रहा था..हलचल इतनी ऊपर से भी दिखाई दे रही थी. जंगल की खुसुर-फुसुर हमारे कानों तक पहुँच रही थी. कीट-पतंगों की आवाज़ें, पक्षियों का गान, रात भर होती रही बारिश अब भी पत्तों पर ठहरी थी..उन बूँदों का हवा से छू कर गिर जाने का शब्द जंगल वाली दिशा से आकर हमारे ऊपर गिर रहा था. यह आवाजें इतनी कोमल होती हैं कि इनको सुनना चित्त को शांत कर जाता है. आजकल ध्यान करते समय इन आवाज़ों का उपयोग किया जाता है. बाज़ार में इनकी सीडी बिकती हैं. नेट पर इन आवाज़ों के हजारों संस्करण हैं. पर असल की कितनी ही नक़ल कर लें, वह असल तो नहीं हो सकता. 



बच्चे उस रास्ते पर बिना किसी भय के दौड़ लगा रहे थे. रास्ते में जिम कॉर्बेट का बंगला दिखा...गर्नी हाउस. 1881 में निर्मित इस बंगले को आज़ादी के बाद उनकी बहन बेच कर केन्या चली गयी थी. इस बंगले का निर्माण एल्मा हिल्स में स्थित उनके पुराने बंगले के अवशेषों से किया गया था. यह इमारत ऐतिहासिक महत्त्व की है. यहाँ की अधिकतर इमारतों की तरह यह बंगला भी ‘ओल्ड वर्ल्ड चार्म’ से भरपूर है. दिन में वहाँ रहने वालों से अपॉइंटमेंट लेकर भीतर जाया जा सकता है पर अभी इतनी सुबह वह बंद था. बच्चों को पानी पीना था पर उस पूरे रास्ते में कोई दुकान नहीं थी. किसी तरह उन्हें बहला कर राजभवन के पास पुलिस कैंटीन तक ले गए. पैसे वाला पर्स जल्दबाज़ी में होटल छूट गया था. परेशानी भाँप साथ आये लड़के ने झट पैसे दे दिए. वहीं था एक छोटा सा शिव मंदिर था और ढेर सारे बंदरों की फ़ौज. लड़का बच्चों को बंदरों के पास ले गया और हाथ मिलावाया. डरते हुए बच्चे बंदरों से दोस्ती हो जाने पर खुश थे. अब बच्चों के पास एक नयी बात थी जो उन्हें लड़के ने बताई थी. यही कि कैसे बन्दर, बन्दर नहीं होते बल्कि हनुमान जी होते हैं. 

हम चलते-चलते राजभवन तक आ गए थे. बादल छोटे-छोटे गुच्छों में राजभवन की ऊँची मेहराबों पर टंगे थे ज्यों किसी ने छतरी तानी हो. फर, पांगर, काठ-कुमकुम, देवदार, सुरई और न जाने कितनी प्रजातियों के ऊँचे पेड़ राजभवन की शोभा बढ़ा रहे थे. राजभवन...उत्तराखंड के राज्यपाल का सरकारी निवास. २०५ एकड़ क्षेत्र में फैला राजभवन कला का बेहतरीन नमूना है. राजभवन का गॉथिक शिल्प उसे किसी महल-सा प्रारूप देता है. सुन्दरता में बेजोड़ और भव्यता में बेमिसाल. कहते हैं यह बकिंघम पैलेस की प्रतिकृति है. कहाँ-कहाँ से कारीगर नहीं बुलाये गए. पत्थर के काम के लिए आगरा के संगतराश आये तो लकड़ी के काम के लिए पंजाब से बढ़ई आये थे. टीक, शीशम, साल से लेकर सरू की लकड़ी तक की बुनावट है भीतर. काँच, टाइलें, तांबे की फिटिंग, लोहे के पाइप मंगवाए गए इंग्लैंड से. बाकी के साज़ो-सामान का ज़िम्मा संभाला कलकत्ता और लन्दन की कंपनी ने. विक्टोरियाई शैली में बनाया गया यह भवन, तब का गवर्नमेंट हाउस, जब तैयार हुआ तो लोग अश-अश कर उठे थे. यहाँ का विंटेज गोल्फ कोर्स दुनिया के सबसे चुनौतीपूर्ण गोल्फ कोर्स में से एक है. . यहाँ कदम-कदम पर ऐसा महसूस होता जैसे किसी और काल में आ गए हों. एक जनकथा के अनुसार राजभवन में मौजूद एक सुरंग विगत में सुल्ताना डाकू की शरणस्थली बनी थी. 

लौटते में क्राइस्ट चर्च देखा. चर्च भी ठीक इसी तरह के..मेहराबें और उन्हें धारण किये ऊँचे सुन्दर खम्भे. वापसी में सारा रास्ता बंदरों से भर गया. दोनों ओर बन्दर पंक्ति में बैठे इस तरह दिखाई दे रहे थे जैसे किसी वी आई पी की स्वागत-पाँत हो. होटल वापस पहुँच कर लडके ने हमें एक आत्मीय मुस्कराहट के साथ विदा किया. 

फिर आधा दिन साड़ियाँ देखते गुज़र गया. यह बात यहाँ लिखना इसलिए ज़रूरी लगा कि वे साड़ियाँ महज़ तन ढकने का कपड़ा भर नहीं थीं. वे कला का सुन्दर नमूना थीं. उन्हें बनाने का तरीका न सिर्फ अलग था बल्कि उन पर उकेरे गए चित्र भी लाजवाब थे. वे गुलाब, बाँस, गन्ने के तंतुओं से बनी साड़ियाँ थीं जो अपने चटक रंगों के कारण और लुभावनी हो उठी थीं. कितनी कहानियाँ उन साड़ियों पर उकेरी गयी थीं. धार्मिक आख्यानों से लेकर लोक-कथाएँ तक उन साड़ियों पर थीं. कला के सरंक्षण का यह कारगर तरीका हो सकता है. 

वापसी में टैक्सी-ड्राईवर अपनी कहानी सुनाता रहा. वह मुसलमान था. हिन्दू लड़की से विवाह किया था. घर वालों ने दोनों को घर से निकाल दिया. बड़ा व्यवसाय था लेकिन घर से मदद नहीं मिली तो टैक्सी चलाने लगा. शुरू में अजीब लगता था पर अब अच्छा लगता है. कहता था सारा नैनीताल उनकी कहानी जानता है. उनकी प्रेम कहानी तलवारों और बंदूकों के बीच से रास्ता खोज कर निकली है. घर-परिवार का कोई व्यक्ति उनसे बात नहीं करता लेकिन वे एक-दूसरे के लिए काफी हैं. 

“अब वही सब कुछ है मेरी.” उसकी बातों सुनकर मैं कहीं दूर निकल जाती हूँ...प्रेम की अनचीन्ही गलियों में. ऐसे ही लोगों के लिए फैज़ ने कहा होगा,

सभी कुछ है तेरा दिया हुआ, सभी राहतें, सभी कुल्फतें

कभी सोहबतें, कभी फुर्कतें, कभी दूरियाँ, कभी कुर्बतें

हम अपनी मंजिल तक पहुँच गए थे. पैसे लेते हुए उसने कहा,

“दो लडकियाँ हैं मेरी भी..रुखसार और गुलनार. उन्हें पढ़ा लिखा कर कुछ बनाऊंगा. वे अपनी मर्ज़ी से शादी करेंगीं तो भी हम उन्हें प्यार करेंगे.” मैं मुस्कुरा उठी.

अब इतने समय बाद नैनीताल के ज़िक्र से एक बात याद आती है, 

“आपने मल्लीताल में बाल-मिठाई नहीं खाई न? फिर क्या फायदा वहाँ जाने का. कोई बात नहीं...कभी मैं खिलाऊँगा आपको वहाँ की बाल-मिठाई..भर दोना.” 

कुछ शब्द, कुछ इच्छाएँ समय के विस्तार में खो जाते हैं. 




झील के पास वाली सड़क पर बहुत-सी बेंच हैं. पिछली दफ़ा हम देर रात तक यहाँ बैठकर मॉल रोड की रौनक देखा करते. मैं उस बेंच पर फिर कुछ वक़्त गुजारना चाहती थी लेकिन जब भी हम उस तरफ गए वहाँ कोई न कोई बैठा मिलता और मेरी इच्छा टलती जाती. कहते हैं लौट कर फिर कहीं जाने की इच्छा हो तो वहाँ अपनी कोई चीज़ छोड़ आनी चाहिए. आखिरी दिन मुझे यह बेंच खाली दिखाई दी लेकिन चाहने पर भी मैं सड़क पार कर वहाँ तक न जा सकी. बेंच पर बैठने की चाहना मैं वहीं छोड़ आई हूँ कि मैं एक बार फिर लौट कर वहाँ जा सकूँ. एक ही बार में सब कुछ ले लेने के लालच की बजाय धीरे-धीरे, कई बार में उस जगह को आत्मसात करूँगी. जब बड़ी-सी बिंदी लगाये किसी फौजी की बीवी खिलौने की दुकान पर मोल-भाव करेगी तो मैं मुस्कुराते हुए उसे एक बार फिर देख सकूँगी.


परिचय :


नाम - दिव्या विजय, जन्म - 20 नवम्बर, 1984, जन्म स्थान – अलवर, राजस्थान, शिक्षा -  बायोटेक्नोलॉजी से स्नातक, सेल्स एंड मार्केटिंग में एम.बी.ए., ड्रामेटिक्स से स्नातकोत्तर
विधाएँ - कहानी, लेख, स्तंभ

‘अलगोज़े की धुन पर’ कहानियों की पहली किताब। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं जैसे नवभारत टाइम्स, कथादेश, इंद्रप्रस्थ भारती, पूर्वग्रह, जनपथ, नया ज्ञानोदय आदि में नियमित प्रकाशन। इंटरनेट पर हिन्दी की अग्रणी वेबसाइट्स पर अद्यतन विषयों पर लेख। रविवार डाइजेस्ट में नियमित स्तंभ।

अभिनय : अंधा युग, नटी बिनोदिनी, किंग लियर, सारी रात, वीकेंड आदि नाटकों में अभिनय। रेडियो नाटकों में स्वर अभिनय। 

सम्मान - मैन्यूस्क्रिप्ट कॉन्टेस्ट विनर, मुंबई लिट-ओ-फ़ैस्ट 2017 
सम्प्रति - स्वंतत्र लेखन,  वॉयस ओवर आर्टिस्ट 
ईमेल- divya_vijay2011@yahoo.com

सियाहत : विनीता परमार की नज़र में



नक्शा बिछाकर और फिर उसपर अंकित स्थानों को अपने पैसे और गाड़ियों की सहायता से नापने का नाम ‘घुमक्कड़ी’ नहीं है। यह मानव को परंपरा से मिली हुई प्रवृत्ति है जिसके लिए उसका सहृदय होना अनिवार्य है। वह किसी स्थान पर ठिठकता है तो उसकी भौगोलिकता में ही नहीं, बल्कि उसके अतीत में भी वह भ्रमण कर रहा होता है… उसकी संस्कृति को आत्मसात कर रहा होता है। फिर जब वह यायावर लिखने बैठ जाता है या राह में ही उसे दर्ज करता जाता है तो पाठक को उस प्रदेश की बोलती चीजें ही नहीं अपने में मौन खड़े शिला, द्रुम या अन्य चीजों को अभिव्यक्ति का पता चलने लगता है… तब यह घुमक्कड़ी की प्रवृत्ति कला का रूप ले लेती है। पिछले साल कथेत्तर गद्य की श्रेणी में ज्ञानपीठ का नवलेखन पुरस्कार ऐसे ही यायावर आलोक रंजन को मिला। उनकी कृति का नाम है – सियाहत। अभी तक इन पंक्तियों का लेखक उसका आस्वादन नहीं कर पाया है, पर उसका मन ललच रहा है। विनीता परमार शिक्षिका हैं और खुद एक रचनाकार भी। उन्होंने एक घुमक्कड़ की सहृदयता को उसी तरह पढ़ा भी है। चलिए, हम भी उनके पाठकनामा से रूबरू होते हैं।

आलोक रंजन  की ‘सियाहत’ मेरे पास पिछले दो महीनों से आई थी लेकिन घर पर नहीं रहने के कारण मैं इसे पढ़ नहीं पा रही थी । जन्माष्टमी की छुट्टियों में घर आई हूं और मैंने उस किताब को पढ़ने की ठान ली। बड़े ही सहज शैली में लिखी इस किताब ने ऐसा बांधा जैसे मैं खुद एक रोमांचक यात्रा में हूं। इस पुस्तक की सबसे बड़ी खासियत रही है यात्रा संस्मरण, डायरी, रिपोर्ट... किसी शैली में लिखने के बावजूद लेखक ने भारत के आम जीवन की समस्याओं भाषायी अंतर  को बड़े ही सहज तरीके से लिख डाला है। इस पुस्तक में सहज ढंग से पर्यावरणीय समस्याओं और सरकारी योजनाओं की ओर ध्यान आकृष्ट किया है। हमारे देश की योजनाएं जमीन पर आते ही दम तोड़ देती हैं । जीवन-दर्शन को बताती पंक्तियां अनायास ही सोचने को मजबूर कर रही हैं। पूरी पुस्तक पढ़ने के बाद मुझ जैसे एक आम पाठक को शब्दकोश देखने की आवश्यकता नहीं महसूस हुई। लेखक घटनाओं और उदाहरणों के माध्यम से देश की व्यवस्था पर बड़ा ही सहज कटाक्ष कर रहा है। रोज की बातों की तुलना करते हुए देश के विभिन्न भागों को जानने के लिए नया आयाम खोल रहा है। इस समूची यात्रा में लेखक कई जगह अपनी जान जोखिम में भी डालता है। यह साहस और रोमांच लेखक के जुनून को बताता है ।
आलोक ने अपनी यात्रा को सियाहत के जरिए एक मीठी और स्वप्न वाली कहानी बनायी है। आलोक के शब्दों में "क्या कभी कोई यात्रा समाप्त होगी "? सच पाने की यह सुखद यात्रा का जो वर्णन उन्होंने किया है… लगता है कुछ छोटे झरने के छींटे हमें भी छू कर चले गए। रोज की भागदौड़ में हमारा मन थकता जरूर है लेकिन ऐसी सुखद यात्रा कभी किसी का मन थकाने वाली नहीं है। "जहां से मन थक जाएगा वहां से लौट आएंगे" मैंने भी  पढ़ते समय यही सोचा लेकिन सियाहत में ऐसे डूबती गई… मन थका ही नहीं ।
आलोक के शब्दों में - "पानी का टुकड़ा देखकर हँस रहा होगा" रोमांचित कर रहा है। दिनाकरन के खेतों का वर्णन… "कोको और इलायची का साक्षात अनुभव… काली मिर्च की लताएं होती हैं । मुझे इसी किताब से पता चला "पदीमुखम" की छाल के साथ पानी को उबालने से पानी शुद्ध हो जाता है। अगर इसकी जानकारी सभी लोगों को हो तो निश्चय ही केंट,एक्वागार्ड जैसे पानी-शोधन के उपकरणों को घरों में लगाने की जरूरत नहीं होगी ।
आलोक के दक्खिन पवन का वर्णन पढ़ते हुए लगता है जैसे किसी कहानी से गुजर रही हूं। "दिन कितना भी गर्म क्यों न हो शाम किसी भी अवसाद की गिरफ्त में आने नहीं देती।” हवा, मन और शाम में से किसी को उसकी परवाह नहीं। लेखक के साथ सारा की मुलाकात और यहूदियों के प्रति जिज्ञासा मुझे भी उस ओर प्रेरित करती है कि मैं भी उन इजरायलियों और फिलिस्तीनियों के इतिहास को जानूं। सिनेगॉग की परिकल्पना मुझे भी गूगल पर ही सही उसकी खोज खबर लेने के लिए प्रेरित करती है।
लेखक के शब्दों में " रविवार का दिन मिलना कल्पना का ही दिन है। किसी महान कवि के बारे में कहा जा सकता है कि उसका सारा जीवन एक रविवार ही होता होगा"। ऐसी बातें करते हुए ओ. एम. वी. को सच्ची श्रद्धांजलि दी है। उन्होंने जानना चाहा कि कोई कवि कैसे लोकप्रिय होता है तो यह बात दिल को छू गई जब एक सामान्य व्यक्ति ने कहा " विकोज ही वाज पो यट ऑफ आर्डिनरी मैन वीद आर्डिनरी आइडियाज"। एक लेखक या कवि तभी लोकप्रिय होता है जब वह लोगों के दिल की पुकार सुन लेता है। मुन्नार के अनछुए जगहों का वर्णन करते हुए यह बताना नहीं भूले हैं कि उदास मन कहीं भी सुकून नहीं प्राप्त कर पाता। राप्ती एक्सप्रेस की घटना मुझे अपने हॉकी टीम की लड़कियों के साथ पुणे जाने की घटना से मिलती-जुलती नजर आई ।
लेपाक्षी का वह खंभा आकर्षित करता है। हवा-हवाई यात्रा वाली लड़की अलग हो सकती है। वीरान हो चुकी जगह अक्सर हमें आकर्षित करती है। बचे हुए खंडहरों में प्रवेश कर उसके अतीत की कल्पना करना रोमांचक तो होता है… ऐसी बातों से धनुषकोटि के बारे में बड़ी ही सहजता से लिखी गई है। 1964 के इस दर्दनाक हादसे को आज ही केंपटी फॉल मसूरी में हुए विस्फोट से जोड़ने लगी।
मुतुवान के आदिवासियों के बीच जाना… भावना की भाषा को समझना बड़ा ही रोमांचित करने वाला है। जंगल के बारे में जानना… धनुष बाण से मछलियों का शिकार करना… माडम का दृश्य आंखों के सामने फादर जो के द्वारा बनाए गए हैं… ट्री हाउस की याद दिलाने लगा। आदिवासियों के साथ किया जाने वाला नृत्य धरती की लय और धुन को छूती नज़र आ रही थी। इतिहास की किताबों में विजयनगर बहमनी साम्राज्य के युद्ध, साम्राज्य विस्तार मुझे कभी अच्छा नहीं लगा। लेकिन आलोक, आयलिस, इयान और साइमन के साथ मैंने बड़ी आसानी से बीजापुर, एहोल, बादामी का दर्शन कर लिया । कुल मिलाकर इस पुस्तक ने दक्षिण भारत, उत्तर भारत, जर्मनी, इज़रायल, फिलिस्तीन सबके विविध संस्कृति को जानने के लिए प्रेरित किया है ।
परिचय :






नाम – डॉ विनीता परमार
जन्म-स्थान- बिहार के पूर्वी चंपारण जिले में
शिक्षा – पीएचडी (पर्यावरण विज्ञान) ,शिक्षा में परास्नातक
व्यवसाय – शिक्षण
पद – केन्द्रीय विद्यालय रामगढ़ कैंट (झारखंड) में शिक्षिका के पद पर कार्यरत
विशेष–बया, आजकल, कादम्बिनी एवम चर्चित ब्लॉग पर कविता प्रकाशित, आलेख, लेख, निबंध, कहानी लेखन, जीवनमूल्य परक साहित्य, अध्ययन व लेखन ।

दूब से मरहम (काव्य- संग्रह) ,खनक - आखर का संयुक्त काव्य संग्रह, पत्र–पत्रिकाओं, समाचार पत्रों में कवितायें प्रकाशित। शोध पत्र एवं पर्यावरण विज्ञान की किताबें सृजन प्रकाशन, नई दिल्ली से प्रकाशित ।

रामनगर - एक निंदासा शहर : दिव्या विजय



‘यात्रा’ शब्द से ही अनवरतता का बोध होता है। यह यात्रा जीवन की हो सकती है या जीवन के ही अन्य क्षेत्रों की। कभी भीतर से बाहर की ओर होती है तो कभी बाहर से भीतर की ओर। इसी क्रम में हम देश-दुनिया घूम आते हैं, वहां के समाज, संस्कृति, संवेदना आदि को सहेज लेते हैं। दृष्टि और मन एकमेव होकर हमें इन जगहों से जोड़ते हैं। यह जुड़ाव काल के साथ होते हुए भी हमें काल-निरपेक्ष बना सकती है। किसी प्राकृतिक परिवेश, प्रतिमा, स्मारक, नदी, महल देख हम उनके समय में प्रवेश करने लग जाते हैं और सदियों पीछे की यात्रा कर आते हैं। यात्रा-वृतांत इसी तरह पाठकों को रचनाकार के साथ उनकी घुमक्कड़ी में साथ कर लेता है। तो आइए, हम गद्यकार दिव्या विजय के आत्मिक यात्रा-संस्मरण में उनके साथ हो लेते हैं।





रामनगर : एक निंदासा शहर
सुबह के झुटपुटे में दूरबीन आँखों से सटाए जंगल के गहन में आँखें गड़ाए लोग पत्तों की चरमर पर चौंक कर सजग हो उठते. थोड़े-थोड़े अन्तराल पर कोई जिप्सी गाड़ी पेड़ के नीचे शांति से प्रतीक्षा करती मिलती. छोटे बच्चे भी दम साधे चुप बैठे थे. आत्म-नियंत्रण का यह बेमेल उदाहरण था. जिम कॉर्बेट के जंगलों का यह क्षेत्र बिजरानी था और वर्षा ऋतु के ख़त्म होने के बाद पर्यटकों के लिए खुलने का पहला दिन. रोमांच सबके चेहरे पर दिखाई दे रहा था. सुबह के छः बजे वन विभाग के अफसर मुख्य दरवाज़े को फूल मालाओं से सजा कर अगरबत्ती घुमाने में व्यस्त थे. नारियल फोड़ा गया और प्रार्थना की गयी. एक पंक्ति में खड़ी गाड़ियों के ड्राईवर मना रहे थे कि पहले दिन शेर दीख पड़ जाए.  हमारे ड्राईवर ने बताया सुबह पाँच बजे हमें लेने आने से पहले वह हनुमान जी के दर्शन करने गया था. धर्म हमारे जीवन में कितना गहरा पैठा है.   


उनकी मान्यता है कि सीज़न के पहले दिन बाघ का दीख पड़ना शुभ होता है. अपनी इसी मान्यता के चलते बाघ को ट्रैक करने में उसने कोई कसर नहीं छोड़ी. वे रास्ते जिन पर अमूमन गाड़ियाँ नहीं जातीं उन रास्तों पर भी उसने जिप्सी दौडाई. बाघ के पैरों के निशान हम देर तक फॉलो करते रहे. एक मरा हुआ हिरण अपने सुन्दर देह के अवशेष लिए कच्चे रास्ते पर मिला. ज़रूर बाघ उसे खींच कर ले आया होगा. अधखाया शरीर सड़न की ओर अग्रसर था. कैसा सुन्दर शरीर, कैसी निश्छल आँखें, कैसी निर्दोष प्रवृत्ति....लेकिन विनाश भी तो प्रकृति का ही नियम है. विनाश के बगैर नया कैसे सिरजा जायेगा.


पक्षियों का एक झुण्ड हमारे सर पर से चीं-चीं करता गुज़र गया और सामने खड़े एक वृक्ष पर छितरा गया. पतझड़ की मार से ठूँठ हुए वृक्ष की शाख पर वे पक्षी पत्तों की भांति विराजमान थे. क्या वे जानते थे कैसा अद्भुत दृश्य वे प्रस्तुत कर रहे हैं...जैसे किसी चितेरे ने रेखाचित्र उकेर दिया हो...हमारी आँखों की परिधि में परन्तु हमारी पहुँच से बहुत दूर. काश जिप्सी से नीचे उतरा जा सकता. पर जंगल में आकर्षण ही नहीं एक भिन्न प्रकार का आतंक भी पैर जमाये रहता है... अजाने का आतंक. यह आतंक जंगल में विचरते हुए आप महसूस कर सकते हैं. एक सन्नाटा हमारे आगे रहता है जिसे भेदते हुए हम नहीं जानते कि कितनी जोड़ी आँखों के घेरे में हम हैं. यहाँ आप घंटों बाघ की प्रतीक्षा करते रहें, वह नहीं आएगा पर किस क्षण वो यकायक आपके सामने आ जाए और आपकी जिप्सी पर पंजे गड़ा कर खड़ा हो जाए, कुछ कहा नहीं जा सकता. ऐसी कितनी कहानियाँ साथ आये गाइड के पास थी जब बाघ उनके ठीक सामने था और भागने का कोई रास्ता नहीं था. वे फिर भी भागे. जब कोई रास्ता न बचा हो तब भी जीवन उम्मीद को आखिरी दम तक थामे रखता है.


बिजरानी का यह इलाका बिलकुल अनछुआ था...अपने कच्चेपन से बाँध लेने वाला. साल, हल्दू, पीपल, आम के वृक्षों से भरा यह पर्णपाती वन अभी बहुत हरा था. ऊँची-ऊँची घास होने के कारण पशुओं का दीख पड़ जाना लगभग नामुमकिन ही था लेकिन वन को महसूस करने के लिए यह वक़्त बिलकुल मुफीद था. अपने सुन्दर लैंडस्केप के लिए जाना जाने वाला यह क्षेत्र अभी उन्मादी हवाओं और मीठी गंध से लदा था. जैसे-जैसे भीतर की ओर बढ़ते जा रहे थे, वन का घनत्व बढ़ता जा रहा था और उसी अनुपात में बढ़ रही थी गंध की रागिनी.


आड़े-तिरछे सींगों वाले, अलग-अलग प्रजातियों के हिरण कुलाँचे मारते हुए खूब दिखे. आपस में सींग उलझाये चीतलों को देख मैंने रुकने को कहा. साथ आये गाइड ने बताया कि ये झगड़ा नहीं कर रहे वरन खेल रहे हैं. मैं सोच में पड़ गयी कि क्या जानवर भी ऊब से भर जाते होंगे और क्या उसी ऊब को मिटाने के लिए नए-नए खेल रच लेते होंगे. जैसे जंगल को काट कर हमने सभ्यता विकसित की और अब उसी विकास से ऊब कर हम जंगल, पहाड़ों और प्रकृति के बीच आश्रय लेते हैं. ऊंची मचान पर चढ़े तो नीचे झूल आयी दशकों पुराने वृक्ष की शाखों पर बन्दर झूला झूलते मिले परन्तु वे बन्दर न हम पर झपटे और न हमें डराने का कोई उपक्रम उन्होंने किया. परन्तु बंदरों की फ़ौज को देख एक नैसर्गिक भय का संचार हुआ क्योंकि हम उनके क्षेत्र में थे परन्तु वे हम मनुष्यों से अधिक सहृदयी थे. हमें देख उनके मुख पर कौतूहल कौंधा था परन्तु वे तुरंत ही अपने खेल में लीन हो गए. वन्य जीव मनुष्यों के बीच पले-बढ़े जानवरों से भिन्न होते हैं. वे छीना-झपटी जैसी अवधारणाओं से अनभिज्ञ होते हैं.


शाम की सफारी में लौटते हुए अँधेरा हो चला था. एक जानवर तेज़ी से गाड़ी के आगे से भागता हुआ निकल गया. अँधेरे में उसकी आकृति से उसे पहचानने की कोशिश की लेकिन चमकती हुई एक जोड़ी आँखों के सिवा कुछ न दिखा.  प्रवेश द्वार के पास कई हाथी ज़ंजीरों में बंधे हुए थे. गाइड ने बताया ये हाथी वन के भीतर पेट्रोलिंग में काम आते हैं. यही एक जानवर है जिस से बाघ भी दूर रहते हैं परन्तु मनुष्य ने उसे साध लिया है.


यात्राएँ रोज़मर्रा के एकरस जीवन में एनर्जी-टॉनिक सी होती हैं...झट ऊर्जा से भर देने वाली. किसी यात्रा पर निकलने से पहले जिज्ञासा, उत्साह और एक किस्म का अधैर्य भी लपेटे में ले लेता है. जिज्ञासा नए स्थान को जान लेने की और अधीरता उस स्थान पर जा पहुँचने की. कहीं जाने से पहले ऐसी प्रसन्नता-मिश्रित उत्तेजना का संचार होता है...किंचित यूफोरिया सा. अनगिनत लोगों के पूर्वागमन का लेखा-जोखा रखे और आने वाली पीढ़ियों की प्रतीक्षा में रत स्थानों को जान लेने, छू लेने से अधिक सुख भला और कहाँ प्राप्त होता होगा.
दीपावली की छुट्टियों में बाहर निकलने का यह पहला अवसर था. कंडीशनिंग ऐसी है कि दीपावली पर घर छोड़कर जाना सबके लिए अचरज का विषय हो चला था फिर भी हमने यही वक़्त चुना क्योंकि कहीं जाने के लिए मन छटपटा रहा था और मौसम के लिहाज़ से भी यह समय उचित था. यूँ भी घर चार-दीवारियों से अधिक हृदय में बसता है तो अपने घर को हृदय में समेटे हम निकल चले थे. अलस्सुबह रामनगर में कदम रखते ही ठंडी हवाओं ने सिहरा दिया था. छोटा मगर खूबसूरत स्टेशन उस समय यूँ निंदासा पड़ा था जैसे किसी को कच्ची नींद में उठा तो दिया गया हो पर नींद ने दामन न छोड़ा हो. अलसाए स्टेशन को थपक कर हम कार में सवार हुए तो खिड़की से नज़र आते दृश्य ने सफ़र की थकन क्षण भर में मिटा दी. पेड़ों की पाँत थी कि ख़त्म होने का नाम नहीं ले रही थी...रास्ते ने जैसे हरे की चादर ओढ़ ली हो. सर्दियों की पहली दस्तक और हवा इतनी शुद्ध कि जैसे साँस के साथ हवा नहीं जीवन प्रवेश कर रहा हो. कोई बिरला ही होगा जिसका मन प्रकृति के बीच आकर हर्षा न जाता हो.
कॉटेज भी ऐसा ही...एकदम जंगली. एंटीक फर्नीचर से भरा जिसकी बड़ी-बड़ी आदमकद खिड़कियों से हिम-चंपा के फूल भीतर झरकर अपनी खुशबू से कमरा तर कर देते. दूर तक फैला जंगल रात को शोर करता खिड़कियों से भीतर चला आता. साथ आती झींगुर और टिड्डों की आवाजें,  पत्तों की सरसराहट. नक्काशीदार आईनों में सुनाई देती अतीत की फुसफुसाहट. दीवार पर टंगे थे आदमखोर शेर और उनके शिकार की कहानियाँ. फूलों और लतरों  से लदा बगीचा जहाँ घंटों चुप बैठ कर पीछे बहती नदी का स्वर आत्मसात किया जा सके. तितलियों की ढेरों अनदेखी, मनमोहक प्रजातियाँ ज्यों  फूल-फूल जाकर रंगों को पी रही थीं जिनके पंखों को लाख चाहने पर भी हम छू नहीं पाए.


रिसोर्ट के पीछे बहती कोसी का फेनिल स्पर्श...मन हुआ नदी में अब तक का जिया हुआ सब बहा दूँ. निरंतर बहती नदियाँ सब समेट लेती हैं और ले जाती हैं अपने साथ अनंत यात्रा पर. जिया हुआ सब बहा देने पर मैं नयी-नकोर हो उठूँगी. नदी मेरे मन की बात जान कर मेरे कान में गुनगुना उठी...अपनी नदी स्वयं बनना. नदी के उस पार सफ़ेद रेत थी. गोल-चिकने पत्थरों के बीहड़ से गुज़र कर जंगल की हदबंदी थी. कितनी देर तक तकती रही. एक घोड़े वाला वहां से गुज़रा. वह अपने घोड़े को घास खिलाने नदी किनारे आया था और यहाँ से निकल कर जाना था वहाँ जहाँ घोड़े की सवारी करने सैलानी आते थे. मुझे वहाँ बैठ नदी को तकता देख उसने पूछा,
“दीदी, नदी के पार जाओगे? उस पार यहाँ से भी सुन्दर है. आपको जंगल के बीचोंबीच उतार देंगे. हमें बहुत-सी ऐसी जगह मालूम हैं जो किसी को नहीं पता.”
पता नहीं वो मेरा मन पढ़ रहा था कि आँखें. मैंने उसे बोर्ड दिखाया जिस पर चेतावनी थी कि नदी में न उतरें. तारों के पार जाने की अनुमति भी नहीं थी. उसकी आँखें ज़रा बुझ कर फिर जल उठीं,
“हम यहीं पले-बढे हैं..इन्हीं के बीच. ये भी हमें उतना ही जानते हैं जितना हम इन्हें.”
मैंने उसे मुस्कुरा कर देखा और और न में गर्दन हिला किताब में रम गयी. एक पत्थर को मेज बनाकर मोहन राकेश की अँधेरे बंद कमरे पढ़ने लगी. मैं पन्ना नंबर अड़तीस पर थी. वह पन्ना स्मृतियों में गुंथ गया है. किताबें मात्र शब्द नहीं होतीं, अनुभव होती हैं. बाह्य अनुभव जब आंतरिक अनुभव से टकराते हैं तो नयी स्मृतियों को जन्म देते हैं.  मोहन राकेश कह रहे थे,
‘कभी-कभी तो मुझे लगता है कि रास्ता चाहे कितना भी सुनसान हो, उस पर गुज़रे हुए कदमों की आहट हर समय मौजूद रहती है और कोई भी व्यक्ति , किसी भी रास्ते पर कभी अकेला नहीं होता.’
वह सच ही तो कह रहे थे. हम सचमुच कभी अकेले नहीं होते, तब भी नहीं जब हम अकेले होना चाहते हैं और तब भी नहीं जब हम अकेला महसूस करते हैं. कितनी बातें, कितने लोग, कितने क्षण हमारे साथ होते हैं.
धूप तीखी हुई तो एक पेड़ के नीचे जा लेटी. पत्ते धीरे-से चूम कर ठहर जा रहे थे.  गिरती धूप के टुकड़े इकट्ठे करते शाम होने को आई थी. आस-पास कोई नहीं था. बाहर आकर लोग कैसे भीतर रह लेते हैं.  उस सुनसान में टिमटिमाता पीला बल्ब रात को यूँ पुकार रहा था ज्यों प्रिय अपनी प्रियतमा का आह्वान कर रहा हो. रात आई और तारे आसमान पर खिलते गए. दो लड़के गिटार पर गाना बजाने लगे. उनकी आवाज़ उदास थी...किसी स्त्री के मन की हूक लिए. तार पर उनके सधे हुए हाथ फिसलते रहे और नदी सुर की गति के साथ बहती गयी.


थोड़ी देर बाद उनके स्थान पर राजस्थान के लोक-कलाकार आ बैठे. गुलाम अली, मेहदी हसन को लोक के रंगों में रंग कर उन्होंने समां बाँध दिया. थोड़ी देर पहले जो नदी उदास लग रही थी वह भी वाचाल हो उठी. गयी रात तक उनको सुनते रहने के बाद जब रात फिर अकेली रह गयी तब एक तितली मेरे कंधे पर आ बैठी. मैं निशब्द रह गयी. सारा दिन जिसे छूने के लिए हम प्रयासरत रहे उसने सारा प्रेम एक क्षण में उंडेल दिया. बच्चे यह देखकर किलक उठे. अहा! जीवन यही तो है. कब कौन सी घटना विस्मय से भर जीवन में प्रसन्नता का समावेश कर दे कौन जानता है. 







परिचय :


नाम - दिव्या विजय, जन्म - 20 नवम्बर, 1984, जन्म स्थान – अलवर, राजस्थान, शिक्षा -  बायोटेक्नोलॉजी से स्नातक, सेल्स एंड मार्केटिंग में एम.बी.ए., ड्रामेटिक्स से स्नातकोत्तर
विधाएँ - कहानी, लेख, स्तंभ

‘अलगोज़े की धुन पर’ कहानियों की पहली किताब। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं जैसे नवभारत टाइम्स, कथादेश, इंद्रप्रस्थ भारती, पूर्वग्रह, जनपथ, नया ज्ञानोदय आदि में नियमित प्रकाशन। इंटरनेट पर हिन्दी की अग्रणी वेबसाइट्स पर अद्यतन विषयों पर लेख। रविवार डाइजेस्ट में नियमित स्तंभ।

अभिनय : अंधा युग, नटी बिनोदिनी, किंग लियर, सारी रात, वीकेंड आदि नाटकों में अभिनय। रेडियो नाटकों में स्वर अभिनय। 

सम्मान - मैन्यूस्क्रिप्ट कॉन्टेस्ट विनर, मुंबई लिट-ओ-फ़ैस्ट 2017 
सम्प्रति - स्वंतत्र लेखन,  वॉयस ओवर आर्टिस्ट 
ईमेल- divya_vijay2011@yahoo.com