कोट का सफ़र : स्वाति बरनवाल


स्वाति बरनवाल का कविता-संग्रह ‛आगे बढ़ने के क्रम में’ पाठकों के बीच अपनी उपस्थिति दर्ज करा चुका है। उनकी कविताओं एवं उनकी खूबसूरत पेंटिग्स से हम सभी वाकिफ़ हैं। लेकिन इन सबसे हटकर मेरा ध्यान उनकी गद्य-शैली पर गया। क्या प्रवाहमय गद्य है ! पढ़ते चले जाइये, समय का पता ही नहीं चलता। इस क्रम में उनकी कुछ कहानियां मैंने पढ़ी है। कहानियों पर उनसे बातें होती हैं तो अपने पाठकीय दायित्व भी निभाता चलता हूँ। वह फिर से नई ऊर्जा के साथ आ जुटती है। इन सबका ही परिणाम है, यह कहानी। पहली बार इसे पढ़ते हुए लगा कि एक संभावित कथाकार अपनी उपस्थिति दर्ज कराने को बेताब है। हम सबने दूधनाथ सिंह की कहानी ‛नपनी’ पढ़ा है। लड़की देखने जाने की इसी प्रथा पर स्वाति ने आज के समय एवं समाज की रीतियों-कुरीतियों के मँझधार बीच फँसी एक लड़की की सशक्त उपस्थिति को अपनी कहानी ‛कोट का सफ़र’ में दिखाया है। आइए, इस नयी कथाकार का स्वागत कीजिए। 

"क्या हुआ, सो गई है क्या? उसे उठाकर कह दो जल्दी से चेहरा धोकर तैयार हो जाए। वे लोग आ गए हैं।" भैया जल्दबाजी में बोलते हुए कमरे से निकल गए। मैं उठी, बाथरूम गई और  फेसवॉश से चेहरा धो कर आईने में देखने लगी कि कहीं झाग रह तो नहीं गया। फेसवॉश से चेहरा कितना सॉफ्ट हो जाता है, एकदम मलाई की तरह।


“जल्दी-जल्दी साड़ी पहनो वरना देर होगी।” मम्मी ट्रॉली बैग से साड़ी और गहनों का डिब्बा निकालते हुए कहने लगी। 


“माँ, लेकिन पहनूॅंगी कहाँ? यहॉं तो पूरा कमरा मिठाइयों के डिब्बों और पानी की बोतलों से भरा पड़ा है।” 


कितनी सारी मिठाईयों के किस्म आज आये हैं। शादी के लिए हाँ न कहती तो इतनी मिठाइयाँ देखने को मिलती क्या? मान लो! मिल भी गई तो एक साथ इतनी सारी मिठाइयाँ चखने को तो नहीं ही मिलती। रेस्टोरेंट में जाओ तो एक ही किस्म की मिठाई खिलाते हैं पापा। हमारे लिए कुछ नहीं और इन ‘रजवाड़ों’ के लिए दुकान खड़ी कर दी गई है। काजू कतली, रसगुल्ले, गुलाब-जामुन, रसमलाई, राजभोग, क्रीम लगी चमचम और इतनी प्रकार की नमकीनें। मैंने तो नाम भी नहीं सुना। आज तक तो बीकानेरी भुजिया ही आती रही घर में। इसका क्या नाम है? अच्छा ज़रा इसका नाम पढूॅं? पैकेट कितना बढ़िया है, कंपनी का ‘लोगो’ तो देखो कितना बढ़िया है। अच्छा! पैकेट खोलकर देखती हूॅं, कैसे- कैसे डिजाइंस के नमकीन है। अरे! ये फाफड़ा है और ये चकली। डिजाइन तो देखो लग रहा ‘गेंडूआर’ है। बचपन में कैसे इसको ज़रा सा छूने पर ‘सिक्का’ जैसा ऐंठ जाता था और फिर उठाकर किसी को डराने का बहाना मिल जाता था, हम बच्चें तो डर के मारे दूर भाग खड़े होते थे। सबसे ज्यादा तो मैं ही डरती थी। मैं जितना डरती, बच्चे उतना ही डराते थे। कितना बदला है समय! आज भी तो हम वहीं हैं, जितना डरते हैं लोग उतना ही डराते हैं। नहीं! नहीं डरना चाहिए हमें! बिल्कुल भी नहीं! आख़िर क्यों डरे? किस बात की डर? हुॅंह! अच्छा ये क्या है...? अच्छा रतलामी सेव! मैंने तो इसे चखा तक नहीं कभी, पर नाम बहुत सुना है। पैकेट खोलकर चख लेती हूॅं। किसी को क्या ही पता चलेगा... और चलेगा तो चलेगा। क्या ही करेंगे जानकार! कह दूॅंगी, थोड़ा- सा तो चखी थी। अरे वाह! गजब टेस्टी है! आज तक चखे न होंगे, आज ये भी गदहे का जन्म छुड़ा ले। ये पुदीना सेव! पुदीना नाम सुनते ही मेरा जी मिचलाने लगा। कितनी बेकार लगती है पुदीने की चटनी। ये तो भला स्वादिष्ट दिख रहा है। रंगों का सुंदर संयोजन है! और ये...ये मसाला चकरी है। अरे बाप रे! बारह बज गया! बारह बजने के साथ-साथ मेरे चेहरे पर भी ‘बारह’ बज गया। अबतक क्यों नहीं आई मम्मी। कैसे तैयार होऊंगी? यहाँ पूरा का पूरा सत्यानाश हुआ पड़ा है कमरे का। मिठाइयों, फलों और उसके डब्बों से। दूसरे कमरे में चली जाऊॅं क्या? आख़िर वो तो खाली ही है। लेकिन इतना बड़ा आईना नहीं है उस कमरे में। इसमें भी तो नहीं था, भैया के कहने पर होटल के मालिक ने बड़ा सा आईना दीवाल में सेट करा दिया। वो कमरा तो खाली है और पैसों की बर्बादी भी है; जो पापा ने तीन कमरे बुक कर दिए। आखिर दो कमरे में भी काम चलाया जा सकता था। शायद कुछ सोचकर ही तीन कमरा बुक किए होंगे। बुद्धू थोड़ी ही हैं मेरी तरह! 


“दरवाज़ा खोलो! दरवाजे पे कोई है।”

“कौन है! मैं हूॅं!” 

“खोलो दरवाज़ा!" 

“मम्मी! आ गई मम्मी!” मैंने दरवाज़ा खोला। उनके आते ही मैं उतावली हो गई साड़ी पहनने को लेकर। 


“क्यों उतावली हो रही हो? सब कर देती हूॅं, सांस तो लेने दो। इतनी बड़ी हो गई हो लेकिन धैर्य नहीं है। एकदम अपने ‘बाप’ पर गई है…बोलती है तो चुप होने का नाम ही नहीं लेती।”


“मैं कहाँ तैयार होऊंगी मम्मी? कमरा भरा पड़ा है। बेड पर चढ़कर तैयार होऊॅंगी तो आईना नहीं दिखेगा और आईने के पास खड़ी होकर तैयार होऊॅंगी तो साड़ी गंदी हो जायेगी।” मैंने उनकी डांट को नजर-अंदाज करके अपनी परेशानी बतानी शुरू की।


"अच्छा सुनो, पहले नाश्ते के लिए मिठाई और फल ट्रे में सजा दो, फिर तैयार होना" मम्मी कहने लगी। 


मुझे पता है! मेरी जैसी कलाकारी मम्मी को नहीं आती है। मुझे सलाद और फलों को सजाने के दस तरीके मालूम है। सब यूट्यूब का कमाल है।


"मम्मी पहले नाश्ता नहीं जायेगा, पहले ‘कोल्ड ड्रिंक’ जायेगा। लाओ! दो मुझे ‘पियो-फेंको’ ग्लास का बंडल और कोल्ड ड्रिंक का बॉटल।" कमरे में आते ही भैया इतना कहकर बेड पर बैठ गए और मेरी साड़ी और गहनों को उठाकर देखने लगे। “ये पहनोगी तुम? एक तो पतली हो ऊपर से साड़ी…? जब भी पहनती हो लगता है जैसे बांस में खोंस दी गई है साड़ी। जैसे तोते की नज़र से मक्के के दानों को बचाने के लिए सूखे  बांस को एक शर्ट पहनाकर उसके ऊपर घड़ा और घड़े पर कोयले से आँखें बनाकर काजल करके खेतों में टांग दिया जाता है वैसी ही दिखती हो।”  ही.. ही.. ही…! 


“मार दूॅंगी मैं! उसी घड़े से तुम्हारा सिर भी फोड दूॅंगी। खुद को जाकर देखो आईने में! कैसे दिखते हो! बड़े आये! हुॅंह!” 


"सुनो! सुनती हो, वे लोग आ गए लेकिन लड़का नहीं आया है।" ये चिंता का स्वर पापा का था। 


"क्या?? क्यों नहीं आया लड़का? हो सकता है पीछे से अपनी बाइक लेकर आये या कहीं ट्रैफिक में फंस गया होगा।" मम्मी कुछ सोचते हुए बोली। 


"नहीं… मैंने पूछा है लड़के के पिताजी से। वे कह रहे थे लड़का नहीं आया है। यह भी कह रहे थे कि हमारे यहाँ पहली बार ‘लड़की’ को देखने लड़का नहीं जाता। हमारे यहाँ का प्रचलन नहीं है। हमारे खानदान में बड़े बुजुर्ग और घरवालों की पसंद ही सर्वोपरी होता है।" पापा कहकर चुप हो गए। 


"लेकिन क्यों? कल शाम बात तो हुई थी और कल शाम तक तो लड़के की मम्मी कह रही थी कि हमारा लड़का भी जायेगा। फिर अचानक ऐसा कह रहे हैं। चलन नहीं है तो झूठ नहीं न कहना चाहिए।" मम्मी भी स्पष्टीकरण करते हुए चुप हो गई। 


"हाँ! लेकिन क्या कर सकती हो? दोमुॅंहे लोग हैं। मुझे तो पहले से ही शक था, जब कुंडली और बायोडाटा देने की बात हुई थी और जिसे देने में आना-कानी कर रहे थे। उसपर से बायोडाटा में कितनी सारी बातें झूठी थी। शुक्र मनाओ कि जाकर देखने पर सब पता चल गया। झूठ की चादर कितनी भी फैला दो सच को नहीं ढँक सकता। आख़िर!  शक ऐसे ही तो नहीं होता है न। ‘यथार्थ और कल्पना’ दोनों के मिलन से पनपता है।" पापा अपनी शंका जाहिर करते हुए दरवाज़े से बाहर निकल गए। 


"अब क्या होगा? तुम जाकर पापा को बुला लाओ" मम्मी चिंतित स्वर में भैया से बोली। भैया गया और आधे रास्ते से लौट आया पापा के साथ ही। "क्यों जी! क्या किया जाय? इनकी मंशा ठीक नहीं लग रही है। कैसे लोग हैं, हमको तो समझ नहीं आ रहा है कि क्या करे। क्या भरोसा, जब आज ही ऐसे कर रहे हैं तो हो सकता है कल को बेटी के साथ भी यही करें।" मम्मी घबराते हुए पापा से कहने लगीं। 


"हाॅं! हमें भी कुछ ठीक नहीं लग रहा है, ये परिवार। हटाओ, हम तो पहले से ही कह रहे थे परिवार ठीक नहीं है। लेकिन माई के जोर-जबरदस्ती से गए।” 


'माई' यानी मेरी प्यारी दादी। जिनको मुझसे ज्यादा अपने बेटे की फ़िक्र है कि उसे आसानी से दामाद मिल जाए। बाकी मेरी पोती तो सबको देख ही लेगी। उसे भी कोई सता पायेगा क्या…? इसकी कल्पना भी नहीं कर सकती थी दादी। “माघ के लइका बाघ होला” उनके ज़ुबान से मैं हमेशा सुनती आई थी। क्योंकि मेरा जन्म ‘माघ मास’ में पूर्णिमा के दिन हुआ था। बचपन से ही इस बात से मैं भी खुद पर गर्व करती थी कि हाँ बहादुर तो हूॅं ही। जैसा होगा, अकेले निपट सकती हूॅं, जैसे होगा देख लूॅंगी। मेरी दादी हमेशा कहती कि “लड़कियों को ‘मुॅंहचोर नहीं मुॅंहजोर होना चाहिए।” सारी फ़साद की जड़ उनकी यह सहनशीलता ही होती है। घोर सहनशीलता! मुॅंहजोर लड़कियाँ अपने लिए स्टैंड लेती हैं। इस वजह से ससुराल में ज्यादा ज्यादती नहीं कर पाते हैं लोग उनके साथ। लेकिन ये बात परिस्थिति और समय देखकर लागू करना पड़ता है। हर समय मुॅंहजोरी भी ठीक नहीं और मुॅंहचोरी भी। दादी के साथ जितनी भी ज्यादतियां हुईं, सब सहनशीलता के कारण हुई थी। वरना किसकी क्या बिसात? खैर…! 


“अब क्या किया जाए? सोचना ये है कि किया क्या जाय! नाश्ता कराकर कह देते हैं कि हमलोग लड़की नहीं दिखाएंगे। वापिस भेज देंगे तब अक्ल ठिकाने आएगी। आगे फिर ऐसा करने से पहले सौ दफ़े सोचेंगे। हम बोल देते हैं, लड़के को लेकर जब आइएगा तो लड़की को दिखायेंगे।" पापा अपना फैसला सुनाते हुए सुस्ताने लगे। सारी बातों को सुनकर और मम्मी की तिलमिलाहट देखकर चाचाजी बड़ी शांत और विनम्रता से बस इतना भर कहे कि “लड़का इतना भी खराब नहीं है, मुझ पर विश्वास रखिए, लड़की को दुख नहीं होगा; सुख-चैन से ही रहेगी।” 


“क्या? इतना भी खराब नहीं है?  कह रहे हैं, यानी लड़के में खराबी तो है। हम हरगिज़ अपनी बेटी का ब्याह नहीं करेंगे, जहाँ जरा-सा भी लड़के में खराबी हो या कमी हो। हम देखेंगे, हमारी बेटी देखेगी फिर पसंद आयेगा तभी हम दोनों राज़ी होंगे और बात आगे बढ़ेगी। बाबा-आदम का ज़माना नहीं रहा जो कैसे भी लड़के और घर-परिवार को बेटी सौंप दिए और गंगा नहा लिए। बेटी बोझ नहीं, ज़िम्मेदारी है। हम अपनी ज़िम्मेदारी से भागेंगे नहीं। हरगिज़ नहीं! उसे अच्छी तरह निभायेंगे” मम्मी कहने लगी।


“देखिए! लोग-बाग क्या कहेगा कि लड़की देखने गए थे, लेकिन लड़की पक्ष ने नाश्ता कराकर ही लौटा दिया। कितनी इज़्ज़त जायेगी, उसकी फिक्र नहीं आपको।” चाचाजी ने समझाते हुए कहा।


 "जाये तो जाये! मैं ऐसे घर में कतई नहीं करूॅंगी अपनी बेटी का ब्याह। जहाँ के लोगों से सोच नहीं मिलती होगी हमारी। झूठ फरेब पर रिश्ता जोड़ते हैं। आप ही बताइये? वैसा रिश्ता कब तक टिकता है?" मम्मी, चाचाजी के चेहरे के आगे प्रश्नसूचक चिह्न लगा दी। 


मैं इन सारी बातों को सुनकर निराश हो चुकी थी। मुझे तो कल शाम ही उनकी हरकतें समझ जाना चाहिए था। जब वे बता नहीं रहे थे कि कितने लोग आयेंगे मुझे देखने। लेकिन पता नहीं क्या हुआ था मुझे। पता नहीं क्यों! मुझे तो सब मालूम है ही। लड़का सरकारी नौकरी में है। अगर कल को मेरी नौकरी नहीं भी लगती है तो भी लाइफ ‘वेल सेटल्ड’ रहेगा। हाँ! पापा को दिक्कत थी कि समाज के चार लोग क्या कहेंगे कि पीएचडी कर रही बेटी के लिए उसके योग्य और सुशिक्षित लड़का न ढूॅंढ पाए। लेकिन मैं जानती हूॅं नौकरी इतनी सस्ती नहीं है। लड़का ग्रेजुएट ही है, तो क्या हुआ…? आखिर ‘मिनिस्ट्री ऑफ लेबर’ में पोस्टेड है। कम थोड़ी ही है। सैलरी भी अच्छी खासी है। लेकिन सिर्फ नौकरी से तो जीवन सुखी नहीं हो सकता है न। लड़का भी तो अच्छा होना चाहिए। छोटी बहन के लाख कहने पर भी कि दीदी, “मैंने सामने से देखा है! लड़का जितना अच्छा फोटो में दिख रहा है, सामने से एकदम ‘भोंदू टाइप’ दिखता है। आपको पसंद नहीं आयेगा।” फिर भी मैं उसे ये कहकर समझा दी कि शक्ल-सूरत मेरे लिए उतना मायने नहीं रखता। असल बात है ‘वेल सेटल्ड’ होना। इस बात पर मैं कितनी उदार हूॅं, मैं ही जानती हूॅं कि ये सारी बातें कहने भर की होती है। रूप और गुण में किसी एक चुनना हो तो मैं गुण को प्राथमिकता दूंगी मगर गुण के साथ रूप भी मिले तो सोने पर सुहागा। वर्तमान समय में ‘वेल एजुकेटेड’ होना अलग बात है और ‘वेल सेटल्ड’ होना जरूरी चीज़। मुझे भी फोटो देखकर लड़का कुछ खास पसंद नहीं आया था। लंबा और गोरा रहते हुए भी माथे पर वो तेज़ नहीं दिखा, जो मैं असल में चाहती थी। आँखों में हल्का पीलापन और चेहरा भी थोबड़े की तरह और होंठ, मानो खैनी खाने से लटक आया हो। ‘ड्रेसिंग सेंस’ भी कुछ खास नहीं। फोटो में कोट-पैंट पहने हुए था। टाई भी लगाया था लेकिन कॉलर के पास वाले बटन को बंद नहीं किया था। जिससे बंधी हुई टाई में कसाव नहीं और वो नीचे लटक आया था। खैर! मैं उसे सब सीखा दूॅंगी। डोंट वरी! ना-नुकूर करने के बाद भी राजी हो गई थी मैं। अभी क्या समय बिगड़ा है। कह देती हूॅं पापा से कि लौटा दे उन्हें। नहीं मिलना मुझे उनसे। लेकिन अचानक मन में आया। जल्दबाजी में लिया गया फैसला सही नहीं होता। होटल का बिल, खाने का ऑर्डर, इतनी सारी मिठाइयाँ सब बेकार हो जायेगी। बात आगे बढ़ी और अगर ये दुबारा लड़के को लेकर आते हैं तो??? फिर सौ तरह की तैयारियाॅं। और मेरी साड़ी... उसका क्या... जो पहनने वाली थी। नए कपड़े देखकर मुझे बहुत खुशी होती और बहाने तलाशती हूॅं कि कब पहनूॅं। और इस साड़ी के लिए तो कई महीनों से इंतज़ार कर रही थी कि कब मौका मिले और मैं उसको पहनूॅं। लाल रंग की साड़ी और हरे रंग का बॉर्डर। कितने सुन्दर खिलते हैं दोनों एक साथ। तिसपर उसका कॉलर वाला ब्लाउज़। कितना सुन्दर है! 'लंबी बाँह और कॉलर वाला ब्लाउज़' पहनने से मुझे इंटरव्यू वाली फिलिंग आती है। होता यूं है कि मेरा आत्मविश्वास बढ़ जाता है और फिर मैं कितनी सुंदर और सादी दिखती हूॅं साड़ी में। मुझे साड़ी बहुत पसंद है। भर फाल कपड़ा जिससे पूरा देह ढँक जाता हो, मुझे वैसी ही कपड़े पसंद हैं। हाँ! जरूरत और समय के हिसाब से ये पसंद कई बार बदल भी देती हूॅं और आगे भी बदलती रहूॅंगी वो अलग बात है। लेकिन बिना लड़के से मिले, मैं कन्फर्म कैसे होऊॅंगी कि शादी इसी से करनी है और यही लड़का मेरे लिए अच्छा होगा। ये सोचकर ही मन रुआँसा हो गया। अब हम सबको भी घर लौट जाना होगा इनके जाने के बाद। सोची थी साड़ी पहनूॅंगी तो खूब सारी अच्छी-अच्छी फोटोज लूॅंगी। बैकग्राउंड अच्छा हो तो 'इमेज' अपने आप बढ़िया हो जाता है। यही बात इंसान पर भी लागू होता है। उसके लिए उसकी अगली पीढ़ी को पैर न घिसने होते है। खैर! मैंने सोच समझकर कहा, "पापा! मत लौटाईये उन्हें। फिर बात बढ़ी तो आगे दिक्कत होगी। सारी तैयारियाँ हो चुकी है वो सब बेकार हो जायेगा। शांत मन से सोचिए, फिर फैसला लीजिए।" मेरे इतना भर कहने से दमघोंटू माहौल ताज़ा हो गया। मम्मी-पापा दोनों नॉर्मल हो गए और चाचाजी आश्वस्त। सबका गुस्सा थोड़े देर के लिए शांत हो गया। 


"ठीक है फिर! नाश्ता करवा कर बैठने को कहते हैं। तबतक अक्षरा भी तैयार हो जायेगी।" पापा आश्वस्त होकर निकल गए कमरे से। 


मैं भी तैयार होने के लिए सारा सामान लेकर दूसरे कमरे में चली गई। बनारसी साड़ी, उसकी सेट लगी ‘मेटल’ की चूड़ियाँ जो बार-बार मेरा ध्यान खींच रही थी। व्हाइट टोन फेस क्रीम, मॉइश्चराइजर, बॉडी लोशन, लिपस्टिक, काजल, बिंदी, आईलाइनर, मेरा डिजिटल घड़ी जो भईया ने हाल ही में गिफ्ट किया था मुझे। सब बेड पर बिखरे पड़े थे। मैंने घर से ही आयरन करके साड़ी को सेट कर लिया था ताकि प्लेट्स बिठाने में दिक्कत न हो। मैं साड़ी को अच्छे से सेट करके पहन ली। और बाल संवारने लगी। उफ्फ! ये बाल क्यों नहीं सुलझ रहे, ये भी उलझे हुए है मेरी तरह। सोचती हूँ कुछ, हो कुछ और जाता है। सोची थी लड़का आयेगा तो सारे डाउट्स क्लियर हो जाएंगे। खैर! क्या कर सकती हूॅं। बालों में तो आज ही ‘हेयर कंडीशनर’ लगाई थी। अब ‘लिवोन’ लगाकर भी देख लेती हूॅं। जैसे-तैसे बालों को सेट कर ली। अब मेकअप की बारी आई। वो भी खुद से थोड़ा-बहुत कर ली। बहुत ज्यादा मेकअप मुझपर सूट नहीं करता तो आदतन मैंने थोड़ा ही कर लिया। डार्क लिपस्टिक लगाने से मुझे शर्म आती है। किसी के सामने लगाकर जाने में तो ऑंधी आती है। खासकर चाचाजी के सामने। पता नहीं इस इंसान से मुझे इतना डर क्यों लगता है। जो कि इतने सभ्य और शांत हैं। बचपन से लेकर आज तक जिन्होंने कभी डाॅंटा तक नहीं मुझे। मैंने आईने में जाकर देखा! मैं पहले से ज्यादा साॅंवली दिख रही थी। शायद ! मेकअप की वजह से। मैं मेकअप लगाने से गोरी तो नहीं हो पाती, साॅंवली जरूर दिखने लगती। मैं कहाँ गोरी-साॅंवली में वक्त बर्बाद करने लगी। जबकि ये रंग कितना पसंद है मुझे। मुझे मेरा रंग बेहद पसंद है! एक हाथ में मेटल्स की चूड़ियाँ और दूसरे में घड़ी। अब सब सही लग रहा। मैं थोड़ा आराम करनी चाही, ताकि नॉर्मल हो जाऊॅं। मेकअप भी चेहरे पर अच्छे से सेट हो जाये तो सेल्फी लूॅंगी। तब तक दरवाज़े से भैया की आवाज आई, "हो गया तुम्हारा? चलो भी अब! उसी समय से तैयार हो रही हो।" मैं दरवाजा खोलकर बोली, 


"देखो तो भैया! मैं कैसी लग रही हूॅं? मैं ज्यादा साॅंवली तो नहीं दिख रही?" 

भैया बिना मेरी ओर देखे ही बोला "बहुत सुन्दर लग रही हो! अब चलो भी, जल्दी से! उसी समय से इंतज़ार हो रहा है तुम्हारा।" 

“ऐसे-कैसे, बिना मेरी ओर देखे ही बता दिये। मेरी ओर देखकर बताओ न भैया! वरना…!”


भैया मेरी ओर देखा और कहा, "बहुत सुंदर दिख रही हो। सच में आज बहुत सुंदर दिख रही हो।‌ तुम शायद साड़ी की वजह से ज्यादा सुंदर दिख रही हो।" वरना मैं तो जैसे सुंदर दिखती ही नहीं हूॅं! हूॅंह! मैंने मुॅंह बिचकाया और हम दोनों भाई-बहन खिल-खिलाकर हँसने लगे। 


"हो गया तुम लोगों का तो चलो भी अब। और ये ट्रे लेकर चलो तुम। मेहमानों के सामने वाले टेबल पर रख देना और सिर झुका कर प्रणाम कर लेना।"  मम्मी ने आदेश देते हुए बताया।


‘पंच-मेवा’ से भरी ट्रे को मैं जैसे ही मम्मी के हाथ से लेने गई, भैया मुझसे पहले ही अपनी हाथों में ले लिया। चलो दरवाज़े के पास फिर तुम ले लेना। अभी साड़ी सम्भाल कर चलो, वरना साड़ी पैर में फंसी तो गिर जाओगी। मैंने ट्रे से दो काजू उठाकर मुॅंह में रख लिया। उसने मेरी ओर देखा, लेकिन डाॅंटा नहीं। हम दोनों भाई-बहन बीस कदम की दूरी नापते दरवाज़े के पास पहुॅंचे। 

भैया ने कहा, "तुम रुको मैं दरवाज़ा खोलता हूॅं। साड़ी ठीक कर लो, फिर तुम ट्रे लेकर अंदर आ जाना धीरे-धीरे और सबको प्रणाम कर लेना। जैसा मम्मी ने बताया सेम टू सेम वैसा ही।" दरवाज़ा खुला! पहले भैया गया फिर मैं। मम्मी के आदेशानुसार मैंने ट्रे को टेबल पर रखकर सीधी खड़ी हुई। प्रणाम किसे करूं? मैंने नज़र उठाकर देखा तो सारे लोग अस्त- व्यस्त थे। कुछ तो सोफे पर बैठे मोबाइल से तेज आवाज़ पर गीत सुन रहे थे। दो औरतें बेड पर एक दूसरे के तरफ़ चेहरे किए जाने क्या बातें कर रही थी। एक बूढ़े व्यक्ति थे, शायद लड़के के पिताजी थे। मैं उन्हें फेसबुक पर देखी थी लेकिन कन्फर्म नहीं थी कि यही हैं। हो सकता है किसी रिश्तेदार ने उनकी शादी की सालगिरह पर फोटो डाला होगा जो मेरे भी फ्रेंड लिस्ट में हो। 


वे मेरी ओर देखकर मुस्कुराये तो मैंने भी मुस्कुरा कर अपनी निग़ाहें नीची कर ली। और झुक कर प्रणाम कर ली जैसा मम्मी ने कहा था। और कुछ देर खड़ी रही कि ये लोग शायद मुझे बैठने को कहें। लड़के के पिताजी ही कह दें कि बैठ जाओ। लेकिन किसी ने न मेरी ओर देखा और न ही बैठने को कहा। मैं खुद से कोने में पड़ी कुर्सी पर बैठ गई। सारे के सारे अपनी मोबाइल में व्यस्त थे। ओह ! कैसे लोग हैं! ज़रा भी तमीज नहीं इन्हें। ये लड़की देखने आए हैं? शुरू से ही लड़के वाले लड़की देखने आते हैं। कोई मिलने क्यों नहीं आता? क्या देखकर बतलाया जा सकता है कि लड़की अच्छी है या नहीं? घर के लिए यही लड़की सही है? शुरू से ही लोग रूप देखने आते है और बाद में कहते है कि लड़की बुरी निकल गई। अरे भैया! जब रूप देखकर शादी करोगे तो यही होगा। तुम ऐसा करते कि लड़की का रूप और गुण दोनों देखते। लेकिन क्या देखने से पता चल जायेगा?  उसके लिए मिलना होगा। एक बार नहीं बार-बार। तब भी पता नहीं चलेगा क्योंकि समय और परिस्थितियों के अनुसार इंसान बदलते रहता है। कल जो थी, मैं आज नहीं हूॅं, आज जो हूॅं, हो सकता है कल नहीं रहूॅंगी। जीवन परिवर्तनशील है और परिवर्तनशीलता ही जीवन का सार। अब मुझे इस तनावपूर्ण माहौल में घुटन- सी होने लगी। तब तक लड़के के बड़े भैया बाथरूम से बाहर आए। उनके ही कहने पर सभी व्यवस्थित होकर बैठे। उन्होंने मुझे कहा कि मैं सामने वाले सोफे पर बैठ जाऊँ, ताकि सबकी नज़र मुझपर पड़ सके। मैं उनके कहे अनुसार सोफे पर बैठ गई। थोड़ी देर के बाद उन्होंने अपनी चुप्पी तोड़ी। 


"आपका नाम क्या है?" लड़के के भैया बातचीत शुरू करने की कोशिश करते हुए।

"जी! मेरा नाम अक्षरा है।" मैंने अपनी आवाज़ स्थिर रखते हुए कहा।

वे पहले से मेरा बायोडाटा तो पढ़े ही होंगे, शायद उन्हें मुझसे ही मेरा नाम सुनना था। फिर उन्होंने मेरी प्रारंभिक शिक्षा, गाँव-घर और परिवार के बारे में पूछा। वो पूछते गये, मैं बताती गयी। 


"आप कविताएँ भी लिखती हैं?" लड़के के भैया जिज्ञासा भरी आवाज में पूछे। 

"जी! मैं कविताएँ लिखती हूॅं।" अपनी कविताओं के प्रति गर्व महसूस करते हुए मैंने भी बताया ।


लड़के के भैया ने अपनी डायरी मेरी ओर बढ़ाते हुए कहा, "अक्षरा, क्या आप अपनी एक छोटी-सी कविता लिख सकती हैं?"


मैंने डायरी लेते हुए कहा, "जी! मैं लिख दूॅंगी।” और मैंने अपनी सबसे सुंदर और छोटी कविता लिख दिया। जो ‘स्त्री विमर्श’ और 'स्त्री अस्मिता’ पर केंद्रित थी।


उन्होंने लिया और एक- दो बार पढ़ कर अपने पिताजी की ओर बढ़ा दी। उन्होंने पढ़कर अपनी छोटी बेटी को। मेरी कविता सबकी ओर घूम फिरकर डायरी में बंद हो गई। मुझे लगा इन्हें कविता कुछ खास नहीं लगी या फिर उसका सार नहीं समझ आया। मैंने निराश होकर अपना सिर झुका लिया। 


बातचीत के दौरान ही मेरी फोटो ली जाने लगी। कभी साइड से तो कभी आगे से। कभी हाथ की तो कभी पैर की। मेरी नज़र खुद ब खुद नीची होती जाती। मैं सोचती ये कह तो दे एक बार कि फोटो लेनी है, अपना चेहरा ठीक से दिखाओ। लेकिन नहीं। इनकी ज़बान सिली हुई है इस वक्त। ज़रा भी तमीज ही नहीं है इन्हें। अन्दर ही अन्दर खुन्नस तो बहुत हुई लेकिन क्या करूॅं? कोई चारा नहीं सिवाय चुप्पी साधने के। मेरे घरवाले भी चुप बैठे हैं, मना नहीं कर सकते हैं? उन्हें देखकर मैं भी चुप रह गयी।


सवालों के घेरे से मैं अभी निकली नहीं थी अभी इम्तिहान बाकी था। लड़के की भौजाई इस दौरान तीन बार कह चुकी थी कि गीत गाकर सुनाओ। और मैं बस 'ना' में सिर हिला देती कि नहीं मन नहीं है। अब लड़के की छोटी बहन की बारी थी। वे लाइन में सबसे पीछे लगी थी शायद छोटी होने के कारण। "आप खाना बना लेती हैं?" उन्होंने अपने चेहरे पर एक संक्षिप्त मुस्कान लिए पूछा।


"जी! मुझे खाना बनाना पसंद है”

“क्या क्या बना लेती हैं?”

“मैं हर तरह का डिशेज बना सकती हूॅं, इंडियन डिशेज और चाइनीज डिशेज भी, कुछ यूट्यूब से भी सीखा है मैंने।”

"सबसे अच्छा क्या बनाती हैं?" उन्होंने पूछा।

"जी! सबसे बढ़िया डोसा बनाती हूॅं।" मैंने कहा।


"अगर बच्चे तुरंत फास्ट फूड बनाने के लिए जिद करें, तो क्या बनाकर खिलायेंगी आप?" उन्होंने जिज्ञासा वश पूछा होगा शायद लेकिन ये मेरी भूल थी।


"मैगी या सैंडविच या फिर जो उन्हें पसंद होगा!" मैंने बताया क्योंकि मैं आज बड़ी होकर भी जल्दबाजी में यही बनाकर खाती हूॅं और छोटे भाई-बहन को भी खिलाती हूॅं। मैंने खुद से पता लगाया कि बच्चों को ये सब कितना पसंद होता है।


"कुशल गृहणी के क्या लक्षण है?" लड़के की छोटी बहन फिर एक बार अपने सवालों के घेरे में मुझे घेरते हुए पूछी। 


थोड़ी देर सोचने के बाद मैंने बोलना शुरू किया, "जी! मुझे इसके बारे में ज्यादा तो जानकारी नहीं है, लेकिन मुझे लगता है कि संगठित और अनुशासित, समय प्रबंधन में कुशल, स्वच्छता और व्यवस्था में कुशल, भोजन और पोषण में कुशल, वित्तीय प्रबंधन में कुशल, परिवार के सदस्यों की देखभाल में रुचि, कुशल गृहणी के लक्षण हो सकते हैं।” मैंने एक सांस में ही अपनी सारी बातें कह दी हालांकि मन ही मन सोच रही थी ये ‘कुशल गृहणी’ के नहीं आधुनिक मशीन के लक्षण है लेकिन ये जवाब मेरे घरवालों को बर्दाश्त नहीं होता। आख़िर में वो जवाब क्या ही होता, वो तो सच्चाई होती। एक तीखी सच्चाई! मुझे अच्छे से मालूम है। जब कोई सच्चाई को हज़म नहीं कर पाता तो उस सच्चाई को जवाब वाली बोरिया में रख देता है।


"क्यों सास-ससुर की सेवा नहीं?"  उन्होंने अपनी संदेह भरी निग़ाहों से फिर प्रश्न किया।

"परिवार में सब लोग आते हैं।" मैंने खीजते हुए कहा।

जाने कब ये सेशन ख़त्म होगा और जान छूटेगी इससे। मुझे इस फॉर्मलिटी से अब ऊब होने लगी थी। 

"आपको सबसे ज्यादा पसंद गाँव है या शहर?" लड़की के चुप होने पर लड़के के भैया फिर पूछना शुरू किये।

"शहर!" मैंने खुद को संयत करते हुए बताया।

"क्यों?"


"एक्चुअली! मैं बचपन से गाँव में पली-बढ़ी हूॅं। गाँव अच्छा लगता है लेकिन मुझे शहर पसंद है। कारण है कि गाँव की तुलना में शिक्षा के अवसर, चिकित्सा सुविधाएं, रोजगार के अवसर, परिवहन सुविधाएं, मनोरंजन के अवसर, आधुनिक सुविधाएं इत्यादि शहर में अधिक है। जो गाँव की अपेक्षा शहर को विशेष बनाते है।" मैंने अपनी बातों को रखने की कोशिश की।


"लेकिन आजकल ज्यादातर सेलिब्रिटी तो गाँव में ही जाना चाहते हैं। वो सुदूर पहाड़ी इलाकों में फॉर्म हाउस बना रहे हैं और छुट्टियों में अधिक समय वहीं बीता रहे हैं।" उन्होंने कहा।


"वो अवसर और मनोरंजन की दृष्टि से कुछ दिनों के लिए जाते हैं।" मैंने अपनी बात रखी।‌ 

"तो फिर! आपने तो कहा कि मनोरंजन के साधन केवल शहरों में है।" उन्होंने मेरी बातों में, मुझे उलझाते हुए कहा। 


मैं बोलना चाहती थी लेकिन चुप रही क्योंकि मुझसे पहले ही कहा गया था कुछ प्रश्न गूगली बॉल की तरह आते है और जाते है। उधर ध्यान नहीं देना है। इसलिए मैं थोड़ी देर चुप रही।‌


 उन्होंने फिर कहा, “बताइये, खाना-खाकर नहीं आई हैं, जो आवाज़ नहीं निकल रही है।" एक व्यंग्यात्मक हँसी उनके चेहरे पर मुझे दिखी। 


“भैया! पर्सनली पूछिए तो मुझे शहर ही पसंद है। चूॅंकि मुझसे मेरी पसंद पूछी गयी है तो मैं शहर को ही वरीयता दूॅंगी। गाॅंव के कष्टों को मैंने पास से देखा है और भोगा है। आज भी कॉलेज, शहर में होने के कारण मुझे काफ़ी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है।" न चाहते हुए भी बोलना मेरी मजबूरी बनी।


"सिर्फ कॉलेज की डिग्री ले लेने से क्या होता है।" चेहरे पर व्यंग्यात्मक हँसी के साथ उन्होंने फिर कहा। ये हँसी मेरे कलेजे में चुभी। मैं बताना चाहती थी लेकिन फिर भी चुप रही। क्या था जो मुझे चुप रहने पर विवश कर देता था। सबके चुप होने से माहौल भी शांत हो गया एक पल को। तभी फोन की घंटी बजी “जिस भजन में राम का नाम न हो उस भजन को गाना नहीं चाहिए… चाहे बेटी कितनी प्यारी हो उसे घर-घर घूमाना नहीं चाहिए” अभी पूरा गीत सुनाई देता, उससे पहले कॉल रिसीव करते हुए; हाँ! हेलो…! हेलो… हेलो…! शायद नेटवर्क प्रॉब्लम है, मैं इधर से करती हूॅं। मैं अपनी नज़र तिरछी करके देखी तो किसी का वीडियो कॉल था। मैंने झाँक कर देखा भी लेकिन पता नहीं चला वीडियो कॉल किसका था। उन्होंने कैमरा ऑन कर दिया मेरी ओर। मैंने अपना सिर एक बार फिर नीचे झुका लिया और साड़ी के पल्लू से अपने हाथ ढँक लिए। पैरो को पीछे की ओर खींच लिया ताकि अंगूठा तक न दिखे इन्हें। जिसने भी वीडियो कॉल किया होगा उसे मेरी साड़ी दिखी होगी या फिर मेरी हाथों की उंगलियाँ, सोने की अंगूठी और नेलपेंट लगे नाखून। मैंने अपना चेहरा और हाथ लगभग ढँक लिया था। ज्यादा से ज्यादा दिखता भी तो केवल मेरी हाथ की चूड़ियाँ और डिजिटल घड़ी। मैं चाहती थी मैं मना कर दूँ लेकिन ये शायद मेरी धैर्य की परीक्षा थी। मेरे घरवाले भी देखते रहे। किसी ने कुछ नहीं कहा। सब चुप थे इसलिए मैं भी चुप रही। मुझे लग रहा था मेरे कानों में अभी भी "सिर्फ कॉलेज की डिग्री ले लेने से क्या होता है।" गूॅंज रहा था।


लड़के वाले आपस में बातचीत करने लगे एकदम धीमी आवाज़ में। ये शायद उनकी आपस की बात थी। चूॅंकि ये उनकी निजता का सवाल था सो मेरे घरवाले कमरे से बाहर चले गए। उन्होंने मना भी किया, अरे बैठिए न! हमलोग ही बाहर जाते हैं, थोड़ी देर के लिए। और वे चले गए। थोड़ी देर दरवाज़े के पास आपस में थोड़ी बहुत बातचीत की और आकर मेरे हाथों में साड़ी, मिठाइयों के डिब्बे और प्लास्टिक में कुछ फल और ऊपर से पाँच सौ के चार नोट रख गए जो शायद घर से ही तैयार करके लाए थे। इतने भार से मेरा हाथ झुका जा रहा था। तभी भैया उसे उठाकर ‘टी टेबल’ पर रख दिया। मम्मी ने कहा कि सबके पैर छू लो। उनके कहे अनुसार मैंने पैर छू लिए। मम्मी मुझे साड़ी का पल्लू ओढ़ाते हुए कमरे से बुला ले आई। मेरे मन में जो खीझ और गुस्सा था वो कपड़े और मिठाइयों को देखकर थोड़ी देर के लिए शांत हो गया। सबने एक साथ खाना खाया। मुझे भी साथ खाने को कहा गया। पहले तो मैं मना कर दी लेकिन मम्मी की ज़िद पर चली गयी। सबके साथ‌ खाना खायी। पहले टेबल पर पुरुष और दूसरे टेबल पर हम चार स्त्रियाॅं बैठीं। बैरा पहले पानी का ग्लास लगाया, उसके बाद सलाद। हम सब चावल और रोटी के इंतजार में कुछ देर बैठे रहे। लो! पहले रोटी ही आ गई! रोटी, दाल-मखानी, शाही पनीर और परवल की भाजी। हम सबने खाना शुरू किया। फिर धीरे-धीरे चावल, बैंगन का भर्ता, आलू-मटर की रसदार सब्जी, दही, राजभोग और पापड़ भी मिलता गया। सब खाने लगे तो अचानक ही लड़के की छोटी बहन मेरी ओर देखी। मैं किनारे बैठी थी। उन्होंने मुझसे कहा, “अक्षरा! खाने के साथ एक ग्रुप सेल्फी ले लो। तुम साइड में हो, वरना मैं ही ले लेती।” 


‘साइड क्लिक’ से फोटो अच्छी आती है। उन्होंने पासवर्ड खोलकर मेरी ओर अपना मोबाइल बढ़ाया तो मैंने दो-चार सेल्फीज ले ली। सब आपस में बातचीत करने लगे। कुछ बाते मैंने भी की। मम्मी मुझे इशारों में ही कहती रही, चुप रहो तुम ज्यादा मत बोलो। मैंने भी मम्मी से इशारों में ही बता दिया कि ये बातें औपचारिक है। सवालों और जवाबों के लय-ताल में नहीं। इस बीच उन सबकी निग़ाहें मेरे खाने और खाने के तरीकों पर टिकी रही। लेकिन मैं उनके तरफ़ बिना ध्यान दिये निश्चिंत होकर भर पेट खाना खायी। खाना खाने के बाद पापा और चाचाजी दुकान जाकर पैंट-शर्ट का कपड़ा, साड़ी और उसके साथ जो भी सामान देने थे जैसे चूड़ी, सिंदूर, बिंदी, रुमाल, तौलिया, गंजी इत्यादि खरीद लायें उन्हें देने के लिए। उन्हें सुनाते हुए मम्मी कहने लगी थी कपड़े खरीदने जा रहे हैं तो जल्दी से लौट आइयेगा। शायद! सबने सुना भी लेकिन कपड़े खरीद कर आने के बाद वे लेने से साफ इन्कार कर दिए। “अरे! क्या कर रहे हैं! हम पहली बार में लेन-देन नहीं करते हैं। नहीं! हमारा मतलब है कि लड़की को देते है आशीर्वाद के रूप में कुछ न कुछ लेकिन क्षमा चाहते हैं, हम कुछ ले नहीं पायेंगे।” उन्होंने हाथ जोड़ लिया। पापा भी एक-दो बार रिक्वेस्ट करके चुप हो गए। हाथ जोड़कर उन्होंने विदा लिया। उनके साथ ही भैया और चाचाजी भी बाइक से निकल गए। सबके जाने के बाद हमने भी अपनी सारी बिखरी पड़ी समानों की पैकिंग की। “बची हुई मिठाइयों को फ्रिज में रख दिया जायेगा तो दो चार दिन तक ख़त्म न हुआ तो भी ख़राब नहीं होगा। और सेव और नमकीन स्टील वाले डब्बे में रखकर बंद कर देना याद से।” मम्मी मुझसे कहती रही। पानी का बॉटल इतना आ गया कि आधे से अधिक बच गया। देखकर लाना चाहिए था। अब घर ढोकर भी ले जाने में भी दिक्कत होगी। कौन ढोयेगा इसे, इसलिए यहीं छोड़ देते है। लेकिन है तो मिनरल वाटर। घर जायेगा तो पीने के काम आयेगा। यहाँ छोड़ने से क्या फ़ायदा! ले चलते हैं, हाँ! थोड़ी-सी दिक्कत होगी लेकिन कोई बड़ा मसला नहीं है। गहनो के डिब्बों को ठीक से पैक करके रख लेना मम्मी‌। वरना छूट जायेगा तो एक अलग मुसीबत सिर पर आ पड़ेगी। अभी अभी तो एक मुसीबत से निकली हूॅं, दूसरी मुसीबत कौन मोल ले। हुॅंह! बला टली सिर से। कहते कहते दरवाज़े को लॉक करके हम तीनों नीचें रेस्टोरेंट में आकर एक सोफे पर बैठ गए। तुम दोनों यहीं बैठो बेंच पर। भैया और चाचाजी तो अबतक घर पहुॅंच कर आराम फरमा रहे होंगे। 

“हाॅं! मैं जाते-जाते फोन कर लेता हूॅं” पापा कहते हुए, ऑटो लेने चले गये। पता नहीं कब सुबह से शाम हो गई। होटल के रेस्टोरेंट में हमलोग काफ़ी देर बैठे रहे। तब तक पापा दिखाई दिए। पीले रंग की चमचमाती ऑटो में जिसपर मधुबनी पेटिंग के तर्ज़ पर ‘मछली और मोर’ बनाई गई थी। हवा का झोंका झटके से आता और उसके पर्दे को हटा जाता। जब पर्दा हटता तो पापा का चेहरा स्पष्ट नहीं दिखता मगर उनके चश्मे के लाल फ्रेम के कारण उन्हें पहचान सकी मैं। "जल्दी चलो मम्मी! ऑटो आ गया!" मैं उठ खड़ी हुई और मेरे साथ मम्मी भी। एक बैग को कंधे से लटकाए मैं, और बची ट्रॉली बैग को लिए हम दोनों ऑटो में जा बैठें।  पापा की मदद से ट्रॉली बैग को ड्राइवर ने ऑटो के ऊपर रख दिया। ये छोटा वाला बैग हमारे पास ही रहेगा के लहज़े में मम्मी अपनी गोद में रख ली। 


“तुम दोनों के लिए कुछ लाऊं? खाओगी समोसा, कुरकुरे या चॉकलेट या जो भी कहो खाने को।” पापा थोड़ी देर ऑटो के पास खड़े रहे। 

“नहीं, मन नहीं है।” मैं एक लाइन बोलकर चुप हो गई।

“आप भी बैठ जाइए घर पहुॅंचकर आराम किया जायेगा।” मम्मी बोली।


“खाने का कोई चक्कर नहीं है। निश्चिंत रहो तुमलोग कोई झंझट नहीं होगा खाना बनाने का। सबका पेट भरा होगा या जिसे भूख लगेगी बची हुई मिठाइयों और फलों से काम चला लेगा। उससे भी न हुआ तो दही चूड़ा तो है ही। बस…! चलकर सो जाना है।” पापा कहने लगे तो हम दोनों भी आश्वस्त हो गए। क्योंकि हम दोनो ही थके हुए थें। मेहनत तो कुछ किया नहीं लेकिन ये अजीब-सी थकावट कैसी थी। हम तीनों ही समझ रहे थे। मम्मी शांत, संयत बैठी शायद परिणाम के बारे में सोच रही थी। 'परिपक्वता और उदारता' उनके चेहरे पर आकर उन्हें सुंदर बना रहा था। कितनी सौम्य और शांत! पापा को तो देखने से ही लग रहा था जैसे अभी ये बोल उठेंगे, ये घर भी गया। दूसरे रिश्तें की तलाश में जाने कितना भटकना होगा, बेटी नाम की जिम्मेदारी पूरी करने में। इस रिश्ते के लिए जाने कितनी मेहनत की गई। पता नहीं क्या होगा! जो भी हो ईश्वर की मर्जी के आगे किसकी चलती है। घर जाकर वापिस उन्हें फोन करना होगा कि ठीक से पहुॅंचे या नहीं। नहीं! नहीं! नहीं होगा इधर से कोई फोन। शायद परिणाम और भविष्य की कल्पना पापा के सामने तैर गया। थोड़ी देर के बाद उनका मन नहीं माना तो कहने लगे आख़िर हमारे यहाँ मेहमान बनकर आये थे। पूछना फ़र्ज़ बनता है हमारा। पापा कॉल किए लेकिन रिसीव नहीं हुआ, एक बार और ट्राई हुआ। लेकिन इस बार भी रिसीव नहीं हुआ, तब तक उधर से कॉल आया। जी, आपलोग अच्छे से पहुॅंच गए न! उधर से क्या आवाज़ आई पता नहीं। वो दम साधे सीट पर अपना सिर टीकाकर सुस्त हो गये कि बेटी की शादी इतनी आसानी से नहीं होती है। बैठे-बैठे ही नींद उनकी थकी आँखों में उतर आई धीरे-धीरे। ये नींद थकावट की थी। दिन भर‌ भाग-दौड़ करने से सड़क पर उड़ने वाली ‘धूल’ उनकी आइब्रो और आगे के बालों पर आ चिपकी थी। अजीब-सी उदासी और उसके रंगों के निशान माथे पर 'त्रिपुंड' बना रहा था। मम्मी भी बैग का हैंडल पकड़े सो गई। उनके बाल हवा में उड़ने लगे। पल्लू भी माथे से सरक कर कंधे पर आ गया। ठंड लगने के कारण साड़ी के आँचल को सॉल जैसा लपेट रखा है। मुझे भी अब ठंड लगने लगी। मैंने बैग से अपनी ‘कोट’ निकाली और पहन ली। बिना परवाह किए कि ज़रा सी भी हलचल हुई तो ये दोनों की नींद टूट जाएगी; जो कई रातों से सो नहीं पाये थे। मैं‌ आहिस्ते-आहिस्ते ही निकाली। प्लास्टिक की ‘कुरकुराहट’ दोनों को नहीं जगा पाया। मैंने आहिस्ते से बैग का चैन भी बंद कर दिया। अब मुझे ठंड का ज़रा भी अहसास नहीं। हवा चलती है, चलती रहे। मैंने ऑटो में आगे लगे छोटे शीशे में झाँक कर देखा। लाल साड़ी पर काला कोट जॅंच रहा था। पछतावा एक पल के आत्मविश्वास से ढक गया। चेहरे का मेकअप धूल गया था, लिपस्टिक का रंग धुंधलका हो गया था, बिंदी भी पानी पड़ने से कहीं गिर गई थी लेकिन आँखों में काजल अपनी पकड़ बनाई हुई थी। खुले बालों को समेटकर मैंने जुड़ा बनाकर क्लचर लगा दिया। छोटे बाल बहुत जल्दी खुल जाते हैं और चेहरे को गुदगुदाते रहते हैं तब मुझे बड़ा आनंद आता। लेकिन इस समय मैं ऐसा नहीं चाहती। मैंने फिर शीशे में झाँका। अब मैं कितनी सुंदर और सादी दिख रही हूॅं। एकदम सच के करीब। यह ‘कोट’ पापा पिछले दिसंबर में मुंबई से लाये थे मेरे लिए। जब “राजस्थान पब्लिक सर्विस कमीशन” के तहत ‘असिस्टेंट प्रोफेसर’ की वैकेंसी आउट हुई थी। ये सोचते हुए कि इंटरव्यू में पहन कर जायेगी मेरी बेटी। लेकिन मुझे मौका नहीं मिला। नये कपड़ों की शौकीन होने के साथ - साथ सुबह- शाम ठंड लगने वाले इस मौसम के कारण उस कोट को साड़ी के साथ पैक कर ली थी। अंदर एक शोर था, जो बाहर के ट्रैफिक शोर को मद्धिम कर देता। बाहर का शोर मुझे सुनाई नहीं दे रहा था। स्ट्रीट रोड की लाइट जल चुकी थी। इस लाइट में मेरी सोई इच्छा जागकर कोट में समा रही थी। अब मैं सोना चाहती थी मगर नींद आस-पास कहीं नहीं थी। मैंने कई बहाने बनाये उसे ढूॅंढने में। यहाँ तक कि उसे रात के अंधेरे में टटोलने भी लगी लेकिन कुछ फायदा नहीं। देर तक खुद को भ्रमित करती रही लेकिन वो कहीं दिखाई नहीं दी। आख़िर तंग आकर मैं आकाश की ओर देखने लगी। ऑटो सरपट भागे जा रहा था और उसके पीछे-पीछे मेरी हज़ारों इच्छाएँ दौड़ती हुई। मेरे साथ मेरा 'कोट' सफ़र कर रहा था। कोट का सफ़र अनिश्चित था और ऊॅंचाई असीमित।


लेखक परिचय :











बिहार के पश्चिमी चंपारण जिले के गाँव कठिया मठिया की स्वाति बरनवाल ने एम. ए. (हिंदी) तक शिक्षा प्राप्त की है। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में उनकी कविताऍं, कहानियाँ और आवरण चित्र प्रकाशित होते रहे हैं। साथ ही कई पुस्तकों के आवरण पर उनके चित्र उनकी कला को अर्थवत्ता प्रदान करते हैं। हाल ही में उनका पहला काव्य-संग्रह ‛आगे बढ़ने के क्रम में’ प्रकाशित हुआ है।

संपर्क: 

ईमेल: barnwalswati63@gmail.com


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