सुशील कुमार भारद्वाज लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
सुशील कुमार भारद्वाज लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

अहम की लड़ाई है गीताश्री की कहानी ‘नजरा गईली गुईंया’ : सुशील कुमार भारद्वाज



सुशील कुमार भारद्वाज युवा कथाकार हैं और समकालीन कहानियों पर उनकी बारीक नज़र रहती है। उन्होंने गीताश्री की कहानी ‘नजरा गईली गुईंयां’ पर अपनी पाठकीय टिप्पणी दी है। 

अहम की लड़ाई है गीताश्री की कहानी ‘नजरा गईली गुईंयां’ – सुशील कुमार भारद्वाज

गीताश्री की पहचान एक ऐसे कथाकार के रूप में है जो अपनी कहानियों में स्त्रियों के विद्रोही स्वर को आवाज देती हैं। वह स्त्रियों के अंतर्मन में छिपे विचारों को उद्देलित करने की कोशिश करती हैं। वह वर्षों से पितृसत्तात्मक समाज में घर की चारदिवारी के भीतर हो रहे न्याय-अन्याय को मुखर रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश करती रही हैं। भले ही वह कहती हैं कि वह पुरूषों के खिलाफ नहीं है। पुरूषों से उनकी कोई दुश्मनी नहीं है। स्त्री-पुरूष के सहयोग और सामंजस्य से ही यह सृष्टि है। लेकिन उनकी कहानियों के पात्र अक्सर न्याय-अन्याय और स्वाभिमान के नाम पर एक दूसरे से भिड़ते नजर आते हैं। यूँ कहें कि गीताश्री अपनी कहानियों में स्त्री मन को अधिक तवज्जो देती हैं तो कोई बड़ी बात नहीं होगी।

गीताश्री की कहानी "नजरा गईली गुईंयां" भी उनके इसी विचारधारा की पोषक है। कहानी में वह स्त्री-पुरूष पात्रों के अंतर्मन को टटोलकरउसके अंदर धंसे भावनाओं को खंगाल कर उसे बड़ी ही शिद्दत से शब्दबद्ध की हैं। हम जिस घोर पूँजीवादी व्यवस्था में जी रहे हैं उसका सटीक प्रमाण या उदाहरण है गीताश्री की यह कहानी। जहाँ संवेदना तड़प-तड़प कर दम तोड़ रही है। नैतिकता अपनी पराजय के ध्वज को पकड़े रो रही है और हम कर्मकांड के नाम पर अपनी तबाही लिख रहे हैं। खोखली सामाजिक प्रतिष्ठा के नाम पर अपनी ईज्जत को सरेआम नीलाम कर रहे हैं।

प्रस्तुत कहानी "नजरा गईली गुईंयां" मुख्य रूप से एक बेटी रिया की कहानी है, जो खुद को अपने माँ के सबसे करीब पाती है। जिसे विश्वास है कि उसके हर फैसले पर उसके माँ की रजामंदी है। वह स्वतंत्र और आत्मनिर्भर ही नहीं है बल्कि हर तरीके से योग्य और हर समस्या से निपटने में भी सक्षम है। वह अपने भाईयों से टक्कर लेने की हिम्मत रखती है तो सामाजिक दबाबों को दरकिनार करने की भी। यूँ कह लें कि कहानी में रिया ही एक मात्र वास्तविक पात्र हैं शेष सभी सिर्फ उसको नायकत्व देने में सहयोगी मात्र तो, कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।

अब यदि बात करें कहानी के मुख्य बिन्दु की तो यह जितनी जमीन और धन-संपत्ति की लड़ाई है उससे रत्ती भर भी कम अहम की लड़ाई नहीं है। एक माँ है, जो एक लम्बे अरसे से अपने मायके नहीं गई है कभी हुए किसी लड़ाई-झगड़े की वजह से। और सबसे बड़ी बात कि रो-धो कर अपनी पूरी जिंदगी अपने पति और बच्चों के साथ सामंती माहौल में गुजारने के बाबजूद वह अपने बाल-सखा पमपम तिवारी को भूल नहीं पाती है। भूल नहीं पाती है कि पमपम तिवारी, जो अपनी एक गलती की वजह से अपनी संपत्ति से हाथ धो बैठा है, उसे न्याय चाहिए। और वह न्याय माँ अपनी कुछ जमीन उस पमपम तिवारी के नाम करके करना चाहती है। लेकिन सवाल उठता है कि पमपम का माँ से ऐसा क्या रिश्ता है कि वह अपनी जमीन अपने बेटे-बेटी की बजाय उसके नाम कर देती है? पमपम का परिचय भी पूरी तरह से उपेक्षित ही रह जाता है। आखिर माँ के ससुराल में वह क्यों आता है? क्यों अपमानित होकर जाता है? आखिर पति के देहांत के बाद भी पमपम क्यों नहीं उसकी खबर लेने आता है? आखिर क्यों माँ अपने मरणोपरांत ही पमपम को अपने ही घर में मान-प्रतिष्ठा दिलवाना चाहती है?

दूसरी तरफ देखा जाय तो रिया पूरी तरह से स्वतंत्र और स्वच्छंद है सारे सामाजिक दबाबों से, जिसमें माँ का समर्थन है। तो क्या यह माना जाय कि माँ अपने दबे-कुचले सपने को जी रही थी रिया के रूप में? वह खुश हो रही थी कि रिया सामाजिक बंधनों को धत्ता बताकर जीवन की एक नई शैली को जी रही थी? वह खुश हो रही थी कि रिया अपने जीवन और अस्तित्व को स्वतंत्र रूप में स्थापित कर रही थी जिससे वह चूक गई थी? यदि हाँ, तो यह सब मान्य है। इसमें कोई बुराई नहीं है। हर इंसान को अपने तरीके से जीवन जीने का हक है। देश और समाज को एक नया संदेश देने की कोशिश कर रही है। लेकिन बात यहीं खत्म कहाँ होती है? माँ का अपने बेटों के साथ कैसा संबंध है? इस पर तो पूरी रोशनी गई ही नहीं। माँ बीमार थी। अकेले ऊपरी कमरे में रह रही थी एक दाई के सहारे। अस्पताल में इलाज का खर्च भी तो शायद बेटों ने ही उठाया होगा। शायद घर-परिवार भी बेटे ही चला रहे होंगें। लेकिन इस बात पर विशेष जोर नहीं है। माँ के बैंक खाते में पिताजी का पेंशन का लाखों रूपया पड़ा है -इस पर भाईयों की कड़ी निगाह है क्योंकि माँ न तो खाते की बात बेटों को बताती है ना ही एटीएम का पिन नम्बर किसी को बताती है। दिल का शायद सारा राज बाँटने वाली बेटी से भी नहीं। आखिर क्यों? यह स्वार्थ का चरम है या आर्थिक सुरक्षा का भय? या मानसिक रूप से कुछ और...?

मुझे तो इस कहानी को पढ़ते हुए सबसे पहले प्रेमचन्द के कफन की याद आती है। जहाँ आलसी व लालची बाप-बेटा घूरे के पास से उठता नहीं कि एक उठकर झोपड़ी के अंदर दर्द में कराहते स्त्री से हाल-समाचार लेने जाएगा तो दूसरा उसके हिस्से का भी आलू चट कर जाएगा जो किसी के खेत से उखाड़ कर लाया गया था। उनका स्वार्थ और भूख एक स्त्री के पीड़ा से कहीं अधिक प्रबल था जो उनके ज़मीर को मारने के लिए काफी था। हालांकि कफन में वर्णित समाज भी अजीब था कि एक कराहती स्त्री की आवाज उन दोनों बाप-बेटों के अतिरिक्त किसी को सुनाई भी नहीं पड़ी। कोई स्त्री तक उसे देखने नहीं आई थी। ये अलग बात है कि बाद में इसी समाज के लोग कफन और क्रियाकर्म के नाम पर कुछ चंदा देते हैं जिन्हें बाप-बेटे शराब में उड़ाकर तृप्त होते हैं और वही समाज फिर से चंदा कर उस मृत शरीर का दाह-संस्कार आदि करता है। लेकिन गीताश्री की कहानी का समाज इससे अलग है। कहानी के पात्र दरिद्र या अछूत नहीं हैं। अलबत्ता वे सामंती विचारधारा के पोषक हैं। माँ का इलाज अस्पताल में होता है तो बेटी यानि रिया दिल्ली से हवाई जहाज से पटना आती है फिर मुजफ्फरपुर-वैशाली की राह पकड़ती है। बीमार माँ की पचास सेकंड की वीडियो भी मोबाइल पर चलती है। स्पष्ट है कि धन -सम्पत्ति की कोई कमी नहीं है। साथ ही वे आधुनिक भी हैं। कहानी के ही एक गीत से ही स्पष्ट होता है कि बड़े भाई के पास कोई कारखाना भी है। जबकि माँ को तो पिताजी वाला पेंशन लाखों रूपया मिला ही हुआ है। फिर भी स्वार्थ कहीं न कहीं हावी दिखता ही है। हर प्रयोजन में ही स्वार्थ की आहट है।

ऐसा नहीं है कि मौत के गम के बीच धन-संपत्ति के बँटवारे और निर्दयता के हद तक मानवता के नग्न हो जाने को लक्ष्य करके पहले कहानी नहीं लिखी गई है। लिखी गई है और अलग अलग भाषाओं में कई लिखी गई है। लेकिन चुमावन को जिस तरीके से इस कहानी में प्रस्तुत किया गया है वह जरूर कुछ अलग है। बिहार समेत देश-विदेश के विभिन्न हिस्सों में चुमावन अलग-अलग रूप में प्रचलित है। यह कहीं आशीर्वाद के रूप में तो कहीं सामाजिक रूप से आर्थिक सहयोग के रूप में विभिन्न शुभ-अशुभ अवसरों पर दिया जाने वाला एक भेंट मात्र है जो देनेवाला अपनी खुशी और क्षमता के अनुरूप गुप्त रूप में देता है। और अमूमन आयोजनों में खर्च होने वाली राशि से यह राशि कम ही होती है। हालांकि अब तो पूँजीवादी व्यवस्था में लोग इसे भी हर आयोजन में दिए जाने वाले रस्म के रूप में प्रचलित करने लगे हैं जिस पर टीका-टिप्पणी करना ही व्यर्थ है। और इस कहानी में भी उसी क्षुद्र मानसिकता को चुमावन के जरिये प्रस्तुत करने की कोशिश की गई है।

गीताश्री ने अपनी इस कहानी के महिला पात्रों के मार्फत से महिलाओं की इच्छाओं और संवेदनाओं को जगजाहिर करने की भरसककोशिश की है। कोशिश की है संपत्ति के बंटवारे को सामने लाने की। और कोशिश की है बताने की कि माता-पिता के मरने के बाद स्त्रियों का मायका कैसे छूट जाता है? कैसे भाई-भौजाई से नाता-रिश्ता दिन-प्रतिदिन कमजोर होने लगता है? और बताने की कोशिश की है कि जिस पितृसत्तात्मक समाज में हम रह रहे हैं वहां संपत्ति पर स्त्रियों का कितना हक रह जाता है? भाई कितना हक अपनी बहनों को देना चाहते हैं और उनके अंदर स्वार्थ की भावना किस हद तक जड़ जमा चुकी है? संभव है कि इन प्रसंगों में आपकी सोच लेखिका की सोच से असहमति रखती हो। लेकिन संभव यह भी है कि परिस्थिति विशेष में खास जगहों पर ऐसा होता भी हो क्योंकि कल्पना भी कहीं न कहीं सच्चाई का ही प्रतिरूप होता है।

लेकिन कहानी में यह बहुत अधिक स्पष्ट नहीं होता है कि भाइयों का अबोलापन अपनी बहन रिया के साथ सिर्फ पारंपरिक बंधनों के टूटने कीवजह से है या कुछ और भी मनमुटाव की वजहें हैं, जो नफरत की दीवार को विस्तार दिए जा रही है, क्योंकि अकारण कुछ भी हमेशा के लिए नहीं होता है। अलबत्ता कहानी में यह जरूर स्पष्ट है कि भाई के मन में बहन के लिए कोई जगह नहीं है तो बुजुर्ग मां भी एक उतरदायित्व भरे बोझ से ज्यादा कुछ नहीं थी। यूँ कह लें कि पूरी कहानी में जिन रिश्तों के बीच संवाद होना चाहिए, अपनापन होना चाहिए, वहाँ अपनत्व व ममत्व का घोर अभाव है। परिस्थितिवश ही वे लोग एकत्र हुए हैं। परिवार जैसी किसी संस्था का यहाँ घोर अभाव है। सभी एक छत के नीचे होने के बावजूद भी सभी की अपनी-अपनी दुनिया है। उसी दुनिया में वे अपनी अपनी सुविधानुसार दोस्त-दुश्मन, रिश्ते-नाते, लाभ-हानि सब तय कर रहे हैं। जो एक के लिए उचित है वही दूसरे के लिए अनुचित। फिर इस भयावह माहौल में जीवन ही जब मुश्किल है तो शांति की तलाश या बात ही बेमानी है।

संभव है कि भाई भी माँ को कुछ सामाजिक शर्म- लिहाज की वजह से अपने पास रखा हो या संभावित धन और जमीन के लालच में, जो उसके मरने के बाद भी न मिलने की वजह से बहन के प्रति गुस्से को भड़का रहा हो। लेकिन बहन भी भाई को भड़काने का कोई मौका चूकना नहीं चाही। जब वो अपनी माँ की आखिरी इच्छा के रूप में सुदूर इलाके से पमपम तिवारी को बुलवाकर न सिर्फ विलुप्त होते हंकपड़वा परम्परा को जिंदा करने की कोशिश की बल्कि वह अपने भाई के अपमानजनक स्थिति पर मुस्कुराई भी। और इसी मान-अपमान के युद्ध में पमपम तिवारी फिर से अपमानित होकर लौट गया। आखिर माँ की आखिरी इच्छा भी तो बेटी पूरा नहीं कर सकी। फिर हुई किसकी इच्छा पूरी? साफ-साफ कहें तो रिश्तों और रस्मों की आड़ में सभी सिर्फ एक-दूसरे से श्रेष्ठ दिखने की कशमकश में उलझे हुए थे जबकि सभी के सभी हमाम में नंगे थे। यदि तेरह दिन के कर्मकांड पर होने वाले खर्च के लिए भी झगड़ा ठना था तो क्या फर्क पड़ जाता यदि माँ के खाते से रूपये न निकलते? भाई के जेब से रूपये न खर्चते? बहन की भी तो कोई जिम्मेदारी थी कि नहीं? क्या वो रिया की माँ नहीं थी? रिया तो तब समाज के नजर में और ऊपर उठती जब सारे आयोजन का खर्च खुद संभाल लेती।अस्पताल आदि के कुछ खर्च आदि भी अपनी तरफ से देने की पेशकश करती यदि जो माँ की खुद से सेवा नहीं कर सकी तो। लेकिन नहीं, मान-अपमान के घिनौने खेल में शामिल होकर तो वह और भी कीचड़ के गंदे नाले में कहीं जा गिरी। और जो उसे किसी तेरह दिन के कर्मकांड में विश्वास ही नहीं था। वह प्रगतिशील सोच की थी तो पमपम तिवारी का हड़कंपवा वाला नाटक क्या था? स्पष्ट है कि किसी की भी मंशा पाकसाफ न थी। सभी एक माँ की लाश के बहाने एक दूसरे की पगड़ी उछाल रहे थे और उस घिनौने खेल का मजा ले रहे थे। प्रेम की बजाय नफरत का जहरीला बीज बोया जा रहा था। जो कि इंसानियत और मानवता के नाम पर कलंक से ज्यादा कुछ और नहीं था।

हालांकि इस कहानी में स्त्री पात्र हैं तो पुरुष पात्र भी हैं। पुरुष पात्र यदि स्वार्थी भाई के रूप में दिखाए गए हैं तो दयावान, त्यागी और स्वाभिमानी कलाप्रेमी पमपम तिवारी भी हैं। भाई के इशारे पर नाचने को मजबूर भाभियाँ हैं तो अपनी जिद्द पर अड़ी माँ, बहन और माँ की देखभाल करनेवाली सेविका भी। माँ-बहन घर में खुश नहीं हैं तो भाई लोगों की भी अपनी सीमाएं हैं।

पारिवारिक समस्याओं में उलझी यह कहानी मानसिक क्रूरता और विकृति के सिवाय वैसा कुछ नहीं दे पाती जिसे स्त्री सशक्तिकरण के रूप में देखा जा सके। जब सिर्फ अपने स्वार्थ और सुविधा की ही बात हो तब यह कैसे कह सकते हैं कि यह सशक्तिकरण समाज और देश को कोई नया संदेश दे पाएगा? हम यहां लड़ाई देखते हैं। आपसी फूट देखते हैं। कहीं से भी एकता, समग्रता और सामंजस्य का संदेश नहीं मिलता है। जब पमपम तिवारी बुजुर्ग हो चुके हैं,जमीन के कागजात को फाड़ देते हैं, वापस लौटा देते हैं तो फिर मन की शांति के सिवाय किसको क्या मिल जाता है? वह जमीन भी भाइयों के पास ही रह जाएगा और मां के साथ साथ बहन के प्रति भी एक जहर मन में ताउम्र नासूर की तरह चुभता रहेगा। कहीं से भी मानवता मनुष्यता की बात नहीं झलकती है। हां,मां की सहृदयता पमपम तिवारी के प्रति है, और वह मरणासन्न बेला में कागजात उनके नाम करती है, जबकि यदि वह जीते जी ऐसा कदमउठातीं तो कहीं ज्यादा सार्थक और सटीक होता।

इस कहानी में भाषा के स्तर पर विशेष रूप से यही कहा जा सकता है कि बज्जिका के कुछ शब्दों को प्रतिस्थापित करने की कोशिश की गई है, जो कहानी के माहौल और परिवेश के अनुकूल है। शेष कहानी की प्रस्तुति बहुत अच्छी है और लेखिका शायद अपने मंतव्य को स्पष्ट करने में सफल रही है।

संपर्क :
सुशील कुमार भारद्वाज
मो. – 8210229414
ईमेल – sushilkumarbhardwaj8@gmail.com

पोस्ट बॉक्स नं. 203 नाला सोपारा : सुशील कुमार भारद्वाज


सुशील कुमार भारद्वाज युवा कहानीकार एवं समीक्षक हैं। उनका साहित्यप्रेम उन्हें एक सजग एवं गंभीर पाठक बनाता है। वे पढ़ने के पश्चात अपनी पाठकीय राय नियमित रूप से साझा करते हैं। हाल ही में उन्होंने चित्रा मुद्गल का उपन्यास 'पोस्ट बॉक्स न० 203 नाला सोपारा' पढ़ा है। आइये, 'पाठकनामा' के सफ़र में हो लेते हैं उनके साथ।


चित्रा मुद्गल का उपन्यास 'पोस्ट बॉक्स न० 203 नाला सोपारा ' समाज से बहिष्कृत और तिरस्कृत किन्नरों की जिंदगी के विविध पहलुओं को उकेरने की एक कोशिश है। उपन्यास में लिखे सारे पत्र नायक (पात्र) विनोद के ही हैं। पत्रों के माध्यम से विनोद जहां सामान्य-सी अपनी पारिवारिक और सामाजिक रस्मों–रिवाज एवं समस्याओं को उकेरने की कोशिश करता है वहीं वह अपने अड्डे पर होने वाली घटनाओं का जिक्र कर हिजड़ों की दुनिया की एक छोटी-सी तस्वीर भी पेश करता है। कुल सत्रह पत्रों में तीन से चार बार विनोद का पता बदल जाता है एक काल-खंड विशेष में।

उपन्यास में बताने की कोशिश की गई है कि किन परिस्थितियों में एक बच्चे का जन्म होता है। वह बच्चा किस प्रकार सामान्य लोगों के बीच असामान्य होते हुए भी सहज होने की कोशिश करता है। उसके बाल-सुलभ प्रश्नों को किस प्रकार टाल दिया जाता है। पढ़ाई के प्रति उसका कितना लगाव है और किस प्रकार उसके सारे सपने एक ही झटके में टूट कर बिखर जाते हैं जब चंपाबाई उसे हिजड़ों के समुदाय में शामिल करने के लिए जबर्दस्ती ले जाती है। परिवार वाले विनोद को बचाने की हर संभव कोशिश करने के बाद प्रतिकूल परिस्थितियों के सामने नतमस्तक हो जाते हैं। घरवाले घर–परिवार की इज्जत–प्रतिष्ठा के लिए न सिर्फ अपने रिश्तेदारों और विद्यालय से विनोद की सच्चाई छिपाते हैं बल्कि मरने की भी अलग-अलग कथा गढ़ लेते हैं...घर बदल लेते हैं। लेकिन विनोद अपने नये परिवेश और दुनिया में ढलकर भी सहज नहीं हो पाता है। शारीरिक रूप से विकृत और मानसिक एवं भावनात्मक रूप से विस्थापित विनोद उर्फ बिन्नी उर्फ दीकरा या बिमली अपने नारकीय कैद जिंदगी से पलायन भी करता है लेकिन जगह बदलने के सिवाय कुछ भी नहीं बदलता है। उसकी स्वतंत्रता भी सरदार के इच्छा विरुद्ध और सीमित दायरे में है, भले ही वह सबसे अलग दिखने की भरसक कोशिश करते रहता हो, जिसमें उसका कोई दोष भी नहीं है बल्कि वह माता-पिता और समाज की क्रूरता का प्रतिफल है। होश में आने के बाद वह घरवालों की सुध लेता है लेकिन वहां भी नकार दिया जाता है...अपरिचित और अछूता बना रहता है। अपमानित होने के बाबजूद किसी अज्ञात स्वाभिमान और स्वार्थवश अपनी माँ को दुविधा में रख चोरी-छिपे घर से जुड़ाव रखता है। फोन से होने वाली असजहता के कारण पत्र ही संवाद का जरिया बनता है, लेकिन विनोद के लिखे पत्रों को भी घर का पता नसीब नहीं होता है। सारी भावनाएँ, सारी चिंताएं, सारी शुभेच्छाएं और सहानुभूति कई–कई दिन तक पोस्ट बॉक्स न० 203 नाला सोपारा में छटपटाती रहती हैं। उन पत्रों को पढ़ने और बर्बाद करने या छिपाने में जितनी सतर्कता बरती जाती उतना ही कष्टसाध्य है सबसे छिपाकर उन पत्रों का जवाब देना।

पत्रों में विनोद की भाषा यथार्थ की कम और आदर्शवाद की अधिक है, भले ही वह अपने घरेलू मसले पर व्यवहारिक बनने की कोशिश करता हो। शिक्षा के महत्त्व की बात होती है तो वैकल्पिक रोजगार की भी। गाड़ी धोने से लेकर कंप्यूटर चलाने और मोबाइल जैसे आधुनिक तकनीकों की भी चर्चाएं होती हैं।

राजनेताओं के बीच भी वह सहज नहीं रह पाता, वहां भी अपनी नई राह तलाशने की कोशिश करता है। कठपुतली बनना उसे मंजूर नहीं। वह किन्नरों के स्वाभिमान की बात करता है। आरक्षण की सीढ़ी को वह पसंद नहीं करता। समाज में उनकी वापसी की वकालत करता है। जाति–धर्म जैसी कुप्रथा से परे किन्नरों को वह फिर से उनके उन्हीं प्रचलित खांचों में स्त्री–पुरुष के रूप में रखकर आरक्षण की बात करता है।

उपन्यास का अंत निराशाजनक है। न विनोद घर वापसी कर पाता है ना ही बा यानि विनोद की माँ वसीयत को अख़बारों में छपवाकर भी अपने दीकरा को कोई सुख दे पाती है, भले ही इसे एक अच्छे कदम के रूप में देखा जाए। दोनों अपनी–अपनी विधि अकाल काल के गाल में समा जाते हैं।

भले ही किन्नरों की जिंदगी की पड़ताल करती किताबें कम लिखी गईं हों लेकिन फिल्मों के माध्यम से इनकी सामाजिक और राजनीतिक भूमिका लोगों के नज़रों के सामने खूब आईं हैं। हिजड़ा कहें या किन्नर...शब्द बदल जाने के बाबजूद न तो गाली के मायने बदल गए हैं न हीं इनके जीवन में कोई खास बदलाव आया है। जड़ समाज में जागरूकता के असर पर चुप्पी ही ज्यादा कारगर है लेकिन विभिन्न परिस्थितियों में व्यक्तिगत रूप से कुछ किन्नरों को विभिन्न व्यवसाय में लगे कमोबेश जरूर देखा जा सकता है। कोख पर माँ की स्वतंत्रता या हक की बात करना आसान है लेकिन यथार्थ कोरी–कल्पना ही है। कदम (आवाज) तो वाकई में स्वागत योग्य है लेकिन विचारणीय यह भी है कि क्या वाकई में भ्रूण हत्या के मामले में भी स्त्री अभी तक स्वतंत्र हो पाई है एक दो उदाहरण को छोड़ कर। पूरे उपन्यास में बहुत कुछ नयापन नहीं दिखता है सिवाय आरक्षण के विरुद्ध आवाज उठाने के। पढ़ने के दरम्यान यह भी खलता जरूर है कि माँ के एक भी पत्र को ज्यों का त्यों नहीं रखा गया है।

जहां तक शब्दों के चयन और भाषा की शिष्टता की बात है तो उस पर चित्रा मुद्गल का अपना अधिकार है। कहीं-कहीं वर्णन उबाऊ भी लगता है लेकिन पढ़ने में में वह कहीं भी बाधक साबित नहीं होता है। उपन्यास का अंत न सिर्फ दारुण कथा का व्याख्यान है बल्कि आपको निःशब्द कर सोचने–विचारने पर भी मजबूर कर देता है। हिन्दी या अंग्रेजी साहित्य में इस तरह का उपन्यास एक अरसे के बाद पढ़ने को मिला है।

संपर्क:-
सुशील कुमार भारद्वाज
A-18, अलकापुरी, 
पो - अनिसाबाद, थाना - गर्दनीबाग, जिला – पटना (बिहार), पिन – 800002, मोबाइल - 8581961719