स्मरण

जिन्होंने मुझे
जाना नहीं
उनके सहारे
जानने चले हो

भावमुक्त होकर
मेरी रचनाएं
जोर-जोर से
पढ़ते हो
कि तुम्हें भी
अपनी यश गाथा
सुनानी है
मेरे ही शब्दों में

और...
मेरे शब्द
हल्के होकर
गायब हो रहे है

अधूरेपन की आवाज

किस्तों में रचो
अपना अधूरापन
किस्तों में ही
पाये तूने
सारे सुख और दुख
फिर रुके क्यूँ ?
किया क्यों इंकार ?
आवाज क्यों मंद पड़ी ?
क्या हुआ
जो रच न पाए
श्रेष्ठ महाकाव्य
मुक्तकों में अभी
जान बाकी है
अपनी ताकत समेट
फिर देख..!
छोटी पारियां भी
जिंदगी का रुख
बदल जाती हैं