तम और संघर्ष के क्षणों में दीए की लौ : सुरेन्द्र स्निग्ध



तम और संघर्ष के क्षणों में दीए की लौ – विद्या भूषण (पटना विश्वविद्यालय)

(जनकवि सुरेन्द्र स्निग्ध की स्मृति को समर्पित)

हृषिकेष मुखर्जी निर्देशित बेहद कलात्मक फिल्म आनंद (1970) का एक काव्यात्मक संवाद है-
  
  ’’मौत! तू  एक कविता है
    मुझसे कविता का वादा है, मिलेगी मुझको
    डूबती नब्जों में जब दर्द को नींद आने लगे
    जर्द सा चेहरा लिए चाँद उफक तक पहुँचे
    दिन अभी पानी में हो, रात किनारे के करीब
    न अंधेरा न उजाला हो, न अभी रात न दिन
    जिस्म जब खत्म हो और रूह को जब साँस आए
    मुझसे कविता का वादा है मिलेगी मुझको।‘‘



जीवन की तरह मृत्यु में भी कविता की तलाश या मृत्यु को भी एक भावप्रवण कविता की तरह वरण करने की चाह कोई कद्दावर व्यक्तित्व, कोई बड़ा किरदार ही कर सकता है। रंग-रूप-रस और जीवन राग से संपृक्त सुरेन्द्र स्निग्ध ऐसे ही आजाद मिजाज के एक बड़े किरदार थे। उनका पूरा जीवन एक लम्बी कविता की तरह था। कविता के लिए समर्पित था।



    “अभी तो चलना है बहुत दूर मेरे मित्र
    बहुत दूर
    इन अनजानी अनपहचानी सड़कों पर
    इस भरी पूरी चाँदनी में
    तुम्हारे जैसे मित्रों के साथ
    चुप-चाप”1

जीवन की तरह मृत्यु को लेकर भी उन्होंने उतने ही खूबसूरत बिम्ब गढ़े थे। वे स्वयं कहते हैं- ’’मेरी कविताओं में मृत्यु अब मुझे डराती नहीं बल्कि वह अधिक ऊर्जा प्रदान करती है।‘‘2

    “हमें लगता है विमल
    (सही कह रहा हूँ-क्यों तो ऐसा बार-बार लगता है।)
    कभी पूरे चाँद की रात में ही
    मरूँगा मैं
    छोड़ जाऊँगा सारी पृथ्वी
    इतनी ही खूबसूरत और सुगंध भरी।’’3

अस्थमा और मधुमेह से पीड़ित देह और काव्यात्मक संवेदनाओं से झंकृत मन के साथ आखिर के दस दिनों तक इंटेंसिव केयर यूनिट में वेंटिलेटर पर ’काल तुझसे होड़ है मेरी‘ की जिजीविषा लिए अपनी उखड़ी हुई साँसों के साथ संघर्ष करते हुए अंततः 18 दिसंबर की सर्द शाम में जर्द सा चेहरा लिए ’लाल चिरैया‘ की तरह कहीं दूर, बहुत दूर उड़ गए।
   
ऐसे संक्रांत समय में जब सच को पूरी निडरता और बेलौसपन के साथ अभिव्यक्त करनेवालों की संख्या घटती जा रही है या वे रूढ़िग्रस्त शक्तियों के प्रहार और आक्षेप से खामोश कर दिए जा रहे हैं, उनका यूँ अचानक चले जाना किसी हादसे से कम नहीं है। सर्वेश्वर ने ठीक ही कहा है-
  
  “तुम्हारी मृत्यु में
    प्रतिबिम्बित है हम सबकी मृत्यु
    कवि कहीं अकेला मरता है!”4

सुरेन्द्र स्निग्ध के साहित्यिक-कर्म और जीवन-कर्म में कोई द्वैत न था। वे जो लिखते थे, जो वर्ग में पढ़ाते थे कमोबेश निजी जिन्दगी में वैसे ही थे। सत्य, संघर्ष और प्रेम उनके जीवन का दर्शन था और अपने साहित्य में वे इसी जीवन-दर्शन को ’रचते-गढ़ते‘ रहे।
   
सुरेन्द्र स्निग्ध ने साहित्य की कई विधाओं में यथा- उपन्यास, आलोचना, कहानी और कविता आदि में अपने इस दर्शन को शब्दबद्ध किया पर उनकी कविताओं में यह भाव प्रमुखता से उभरा है। वे मूलतः कवि ही हैं। उनके गद्य लेखन पर भी उनका कवि रूप हावी है। उनके गद्य की भाषा भी कविता के निकट की भाषा है।
   
मूलभूत सुविधाओं के अभाव में पलकर उन्होंने भावों का संसार रचना सीखा। 5 जून 1952 ई० में पूर्णिया जिले के सुदूर एक ठेठ देहात सिंघियान में एक अत्यंत निर्धन किसान परिवार में उनका जन्म हुआ। तमाम प्रकार की समस्याएँ, किल्लतें, फटेहाली और तंगी इनकी प्रतिभा को रोक न सकी। ’’अक्षरों की दुनिया का रहस्य और परिवार में मृत्यु का लम्बा सिलसिला इस बालक की रचनात्मक चादर का तानी और भरनी है।‘‘5

    ’’अत्यंत निर्धन थे हम
    घर में नहीं है किसी का फोटोग्राफ
    न माँ का    
    न पिता का
    उनमें से अब किन्हीं का चेहरा नहीं है याद
    भागती हुई रेखाएँ
    साथ लेकर भाग गईं सबकुछ‘‘6

सुरेन्द्र स्निग्ध के 6 काव्य-संग्रह प्रकाशित हुए। 1 पके धान की गंध(1993) 2 कई-कई यात्राएँ(1998) 3 अग्नि की इस लपट से कैसे बचाऊँ कोमल कविता(2005) 4 रचते-गढ़ते(2008) 5. मा कामरेड और दोस्त(2014) 6 संघर्ष के एस्ट्रोटर्फ पर(2016)
   
उनकी पहली कविता दिवंगत माँ के ऊपर थी। माँ के असामयिक निधन ने उनके बालमन पर गहरा प्रभाव छोड़ा। उस खोई हुई ममता की तलाश वे आजीवन करते रहे। इसे बाद की कई कविताओं में देखा जा सकता है-

    ’’प्रेमिकाओं के चेहरे में
    कब तलक खोजता रहूँगा
    विलुप्त हुआ माँ का चेहरा
    कब तलक सूखी रहेगी
    सपनों की नदी‘‘7

साठ के दशक में ’किशोर‘ पत्रिका में ’लाल चिरैया‘ प्रकाशित हुई थी। किशोर मन का कौतुक और उल्लास इस कविता में अभिव्यक्त हुआ है। प्रकृति के सुन्दर और सजीव चित्र इसमें पिरोए गए हैं। ’लाल चिरैया‘ का लाल रंग विशेष अर्थ को ध्वनित करता है। यह लाल रंग जो प्रकारांतर से संघर्ष, जन आंदोलन और क्रांति का प्रतीक है, आगे चलकर उनकी कविताओं में पुरजोर तरीके से चित्रित हुआ है।
   
सुरेन्द्र स्निग्ध जीवन के बड़े सरोकारों से जुड़े प्रतिबद्ध कवि हैं। उनकी कविताएँ उनकी राजनीतिक-सामाजिक प्रतिबद्धता, वैचारिकी और आत्मसंघर्ष की उपज है। उनकी रचनाओं में जो प्रगतिशीलता की धार है वह जनसंघर् से जुड़े होने के कारण लगातार तीक्ष्ण होती चली गई है। वे प्रगतिशील लेखक संघ के सक्रिय सदस्य रहे। बाद में नक्सलबाड़ी आंदोलन का उन पर गहरा प्रभाव पड़ा। सामंत विरोधी किसान आंदोलन ने उनकी दृष्टि को नया मजबूत आधार दिया। महेश्वर, नचिकेता, राणा प्रताप, जितेन्द्र राठौर आदि के साथ मिलकर उन्होंने नवजनवादी सांस्कृतिक मोर्चा, बिहार का गठन किया। उनकी यह मंडली रचनाकारों को जनसंघर्षों से जोड़ने के लिए निरंतर सक्रिय रही। जनसंस्कृति मंच से लेकर सी० पी० आई०(माले) तक से जुड़कर उनकी वामपंथी दृष्टि निरंतर व्यापक होती चली गई। उनकी प्रसिद्ध कविता ’’मा कामरेड और दोस्त‘‘ में उनकी वैचारिकी तीव्र आवेग से फूटी है। कविता में माँ अपने पु़त्र से सवाल करती है-
   
“सुनती हूँ
    सरकार इन गीतों से
    इन नाटकों से
    बहुत घबराती है
    घबराता है गाँव का जमींदार
    आखिर क्या है इनमें
    तुम क्यों गाते हो ऐसे गीत?‘‘8

सर्वहारा वर्ग के उत्थान और व्यवस्था-परिवर्तन का स्वप्न सँजोए क्रांति और संघर्ष के कठिन मार्ग पर निकल चुका पुत्र कहता है-
   
’’हम तो बनना चाहते हैं माँ
    सर्वहारा के हाथों का तेज औजार
    काटने के लिए शोषण के
    जंग लगे तंत्र
    हम तो बनना चाहते हैं
    उनकी बाँहों की माँसपेशियाँ
    ताकि मथ सकें वे
    शोषण के अथाह समुद्र‘‘9

आगे चलकर संगठन के अंतर्विरोध, गुटबाजी और अंततः मोहभंग का भी दृश्य है जहाँ नायक पुनः संगठन से दूर पुस्तकों की ओर लौट जाता है। यहाँ नायक का द्वन्द्व कहीं न कहीं कवि का अपना अंतर्द्वन्द्व है, अपनी पीड़ा है-
   
’’हे वसंत के बज्रनाद के
    खुशबूवाले फूल
   कहाँ जा रहे हो तुम
    क्या-क्या खोजना चाह रहे हो
    लौटकर
    इन किताबों में?‘‘10

शिक्षकों और शिक्षा की बेहतरी के लिए एक जन-संघर्ष के दौरान उन्होंने कारावास की यातना भी झेली। उन यातना के क्षणों में भी आँखों में भविष्य के सुनहरे सपने थे-

    ’’हमारी पत्नियाँ
    अपनी आँखो में
    उगा सकें आश्वस्ति का सूरज
    हम शिक्षा की ऐसी बल्लरियाँ
    लगा सकें कैम्पसों में
    जिन पर हमारे बच्चे
    खिल सकें फूलों की तरह
    लद सकें फलों की तरह
    रूप, रंग, गंध से भरपूर‘‘11

वे संबंधों को बनाने, बचाने और मन से निभाने वाले व्यक्ति थे। रिश्तों में गरमाहट का महत्व समझते थे। उनकी स्पष्ट मान्यता थी कि

    ’’क्या रहना ऐसी जगह
    जहाँ कोई दोस्त नहीं हो
    नहीं हो कोई
    हालचाल पूछने वाला।‘‘12

जहाँ भी उन्हें अपनत्व का स्निग्ध ताप मिलता, वे भाव-विह्वल हो उठते-

    ’’क्यों इतना प्यार
    परोस रहे हो दोस्तो
    जैसे दिन खिले फूल
    ढलते सूरज की थाली में
    पुरवैये के झोंकों के साथ
    उड़ेल देते हैं
    ढेर सारी खुशबू।‘‘13

जो जीने की लालसा बढ़ा दे, जीवन-दृष्टि का दायरा विस्तृत कर दे, जो जीने को नए मायनों से भर दे ऐसे संबंधों को वे निरन्तर तलाशते रहे-

    ’’कल की रात कविताओं में
    ढूँढता रहा अपना एक दोस्त
    एक एक्टिविस्ट
    एक कामरेड
    एक चिंतक
    एक कवि‘‘14

उनकी कविताओं का एक हिस्सा वैसे मित्रों को समर्पित है जिनसे उन्हें वैचारिक और आत्मीय संबल प्राप्त हुआ।

सुरेन्द्र स्निग्ध का काव्य जगत प्रकृति के खूबसूरत दृश्यों से जगमग है। प्रकृति के प्रति नए प्रेम-भाव और नए सौंदर्य बोध को उन्होंने शब्दबद्ध किया है। यहाँ प्रकृति को हसरत भरी निगाह से देखना भर नहीं है बल्कि उसका अविभाज्य हिस्सा बन जाना है। प्रकृति जितनी उनके बाहर है उतनी ही उनके भीतर भी। कवि की अनुभूति और दृष्टि प्रकृति की लय और ताल से एकाकार हो उठी है और यह सब एक रचनात्मक और कलात्मक प्रक्रिया में ढलकर कविता में एक नवीन सौन्दर्यानुभूति उत्पन्न करती है। गोवा के घने जंगलों से गुजरते हुए उन्होंने एक कविता लिखी थी-’थिरकता हुआ हरापन‘। जंगल के अखिल ऐश्वर्य को उसके संपूर्ण पारिस्थितिकी के साथ कवि चित्रित करता है-

    ’’झर रहा है उजला प्रपात
    चाँदनी पिघलकर
    झर रही है पतली उजली रेखा की तरह
    किसी नन्हें शिशु ने
    खींच दी है चॉक से एक लम्बी लकीर
    या, ढरक गई है
    किसी ग्वालन की गगरी से
    दूध की धार
    इस घने जंगल में
    नाच रहा है कहीं
    आदिवासियों का झुंड‘‘15

बादलों का उमड़ना-घुमड़ना उन्हें खूब भाता है। बादलों का सौन्दर्य, आँचल में समोए जीवनदायिनी पीयूष की धार, उसका गर्जन-तर्जन, सांगीतिक नृत्य, गति, चमक सब मिलकर कवि को उमंग और उल्लास से भर देता है- 
  
    ’’दूध से भरे
    भारी थन से
    या चाँदनी से लबालब कटोरे से
    छलक-छलक रहे हैं
    अगस्त के बादल’’16

सूरज की लालिमा से उनकी कविताएँ रोशन हैं। यह लाल रंग संघर्ष पथ पर गति का उत्प्रेरक है।

    ’’सूरज की चादर की लाली
    हमारे पैरों से
    चढ़ रही है ऊपर
    हमारी आत्मा की चट्टान तक
    वहाँ यह फिर फैलेगी
    फिर-फिर
    सूरज फिर झूलेगा
    बीच समुद्र में
    हवाओं की रस्सियों के झूले पर।’’17

उनके कवि-व्यक्तित्व में जो अगाध और प्रगाढ़ लहराता हुआ प्रेम है, वही फैलकर सतरंगी सौंदर्य की सृष्टि करता है। वे रंग-रूप-गंध और रस के कवि हैं। भौतिक जीवन से बेशुमार लगाव ही उन्हें स्त्री सौंदर्य की ओर ले जाता है। उनकी कविताओं में स्त्री-देह और स्त्री-मन का सौंदर्य और संगीत पूरे आवेग, पूरी ऐंद्रिकता के साथ अकुंठ भाव से प्रकट हुआ है।

    ’’तुम हो बादल
    तुम बरस रही हो
    भीग रहा है मेरा तन-मन
    भीग रही है
    नवम्बर की सर्द दोपहरी‘‘18

समर्पण, साहचर्य और विश्वास में प्रेम का शास्वत सौंदर्य किस प्रकार खिलता और खुलता है, इसका श्रेष्ठ उदाहरण है-’हमारा प्यार‘। इस कविता में मेमना और बाघ के अभिनव प्रतीकों के माध्यम से प्रेम और नारी-शक्ति के विरल चित्र खींचे गए हैं। मेमना की तरह सहमी-सकुचाई नारी, पुरूष का सच्चा स्नेह पाकर बाघ बन जाती है। अब वह प्रेम में केन्द्रीयता प्राप्त कर लेती है। अब वह प्रेम का उपकरण या साधन मात्र नहीं है। अब वह स्वयं को और प्रकारांतर से प्रेम को रच रही है, तीव्र आवेग और स्वच्छंद भावनाओं के साथ। प्रेम अब यहाँ पूर्णता प्राप्त करता है।

    ’’अब वह थी ’बाघ‘
    युगों से भूखी
    मैं था अवश
    लाचार
    बंधा हुआ मेमना
    .........................
    हमारा प्यार
    बाघ और मेमने का प्यार था।‘‘19

उनकी कविताओं में जो कामना है वह रीतिकालीन कामुकता नहीं है। वहाँ प्रेम जीवन संगीत है जिसकी स्वर-लहरियाँ कवि के हृदय में सृजन के नए बीज बोती है। जीवन के नए मायने खुलते हैं। नई अभिलाषाओें का जन्म होता है।

    ’’अपने उत्तप्त जीवन में
    मैंने पा लिया है शीतल छाँह
    बैठूँगा कुछ देर
    इसी घनी शीतल छाँह के नीचे
    कहूँगा अपनी मौत से भी
    कर ले कुछ देर प्रतीक्षा
    अपनी प्रेमिका की बाँहों से हटने की
    अभी एकदम नहीं है इच्छा।‘‘20

उन्होंने नींद पर भी कई कविताएँ लिखी हैं। श्रम, संघर्ष और तमाम प्रकार के अंतर्द्वन्द्वों से जूझता कवि ही स्वप्न, आशा, आकांक्षा और विश्राम के महत्व को समझ सकता है। पाश की एक कविता है-’सपने‘ इसमें वे कहते हैं-

’’शेल्फों में पड़े
इतिहास के ग्रंथों को सपने नहीं आते
सपनों के लिए लाजिमी है
झेलने वाले दिलों का होना
नींद की नजर होनी लाजिमी है
सपने इसलिए हर किसी को नहीं आते।‘‘21

नींद और स्वप्न का भी एक सृजनात्मक पक्ष होता है। यहाँ विश्रांति का क्षण भी निर्माण का ही क्षण है-

    ’’कितनी प्यारी है नींद
    भागते जंगलों के बीच
    लिपटी है
    मेरी आँखों से
    काट रही है
    अंधकार के जंगल।‘‘22

सुरेन्द्र स्निग्ध एक ऐसे क्षेत्र से आते हैं जहाँ के जनजीवन पर लोकगीतों, लोकगाथाओं और लोक मुहावरों का बहुत गहरा प्रभाव रहता है। वे रेणु माटी-पानी की उपज हैं। उन्होंने लोकजीवन की लय को, रंग को, प्रकृति को तमाम विशेषताओं के साथ अपनी कविताओं में उतारा है। इन गीतों और कथाओं में व्यक्त-अव्यक्त मनोभावों, आर्थिक-सामाजिक विद्रूप जीवन की सच्चाइयों को समकालीन अर्थ-संदर्भों, ध्वन्यात्मकता, प्रतीकात्मकता के साथ नए भाव-सौंदर्य को गढ़ा है। ’कोसी का कौमार्य‘ कविता में उन्होंने कोसी नदी की बाढ़ और उसकी विभीषिका को उससे जुड़ी लोकधारणा और लोकगीतों में गूंथकर स्त्री की करूणा, प्रेम, बिन-ब्याही माँ बनने की पीड़ा और ममता को बेहद कलात्मक ढंग से व्यक्त किया है-

    ’’रोएगा पालने में नन्हा शिशु
    उसके क्रंदन से
    फट जाएगी धरती की छाती
    आँसुओं की बाढ़ में
    बह जाएगी पूरी सृष्टि
    हो जाएगी जग हँसाई
    मेरे कुँवारेपन में लग जाएगा दाग।‘‘23

कोसी जनपद की पिछड़ी खासकर गाय-भैंस चराने वाली जातियों के चरित नायक बिसु राउत के संघर्ष और बलिदान की गाथा वहाँ के लोग लोक गाथाओं के रूप में गाते हैं। उन्हीं लोक गाथाओं को आधार बनाकर उन्होंने एक बेहद खूबसूरत कविता लिखी है-‘चरवाहा’। ’सुकनी की आँखों का सूरज’ कविता में कोसी जनपद का क्रूर सामाजिक यथार्थ, सामाजिक आंदोलन, प्रतिरोध और स्त्री-संघर्ष काव्य-कथा के रूप में मुखरित हुआ है।
   
ब्रेख्त ने कहा था-’’क्या जुलमतों के दौर में भी गीत गाए जाऐंगे?/हाँ! जुलमतों के दौर के ही गीत गाए जाएँगे।‘‘ सुरेन्द्र स्निग्ध की कविता ’ट्रोमा‘ ऐसे ही त्रासद इतिहास की गवाही है। 2002 ई० में गुजरात में हुए भीषण दंगों को आधार बनाकर लिखी गई यह कविता हमारी आत्मा को झकझोर देती है। दंगों में केवल लोग नहीं मरते, उनके साथ दम तोड़ती है मानवता। नफरत और हिंसा लील जाती है प्रेम और आदमीयता। नष्ट हो जाती है कई पीढ़ियाँ। इन दंगों ने हमारे अबोध मासूम नौनीहालों पर कितना जहरीला प्रभाव छोड़ा है इसको राहत-षिविर में दुबके-सहमें अनाथ बच्चों की मनःस्थिति से समझा जा सकता है। कविता में मोहम्मद यासीन कहता है-

    ’’मुझे अब नींद नहीं आती
    आँखें लगते ही
    डर से चिल्लाने लगता हूँ
    मुझे मेरी अम्मा, अब्बा
    बहन यासीन, खज्जू, अफरीम, साहिल
    सबकी याद आती है।‘‘24

कविता की अंतर्वस्तु कैसे षिल्प का निर्धारण करती है, इसका सर्वात्तम उदाहरण है-’ट्रोमा‘। रिपोर्ताज शैली में लिखी गई यह कविता नई रचना-प्रक्रिया की संभावना उपस्थित करती है।

    "जून 2002
    दुःस्वप्नों से घिरे
   गुजरात के दंगापीड़ित बच्चों की तरह मैं भी हूँ उद्विग्न
    अत्यंत कठिन है बच्चों के वक्तव्यों को
    कविता की शक्ल में ढालना।
    ये वक्तव्य
    कविता के शिल्प को बना रहे हैं निरीह
    और उसकी क्लासिकी हो जा रही है अर्थहीन
    क्रूर सच्चाइयाँ
    कविताओं की सीमाओं को करती है ध्वस्त
    ये जब ढलती हैं अंतर्वस्तु के रूप में
    समस्त काव्य-उपादान हो जाते हैं तार-तार"25

सुरेन्द्र स्निग्ध राजनीतिक-सामाजिक प्रतिबद्धता को सृजन की पहली तथा जरूरी शर्त मानते थे। उनकी कविताएँ इस बात का प्रमाण हैं।

    "मेरी कविता
    आज भी बनना चाहती है पोस्टर
    उगना चाहती है दीवारों पर
    मानव-मुक्ति की इबारत बनकर
    पैदा करना चाहती है घृणा
    उसके खिलाफ
    जिसने पूरी दुनिया को
    कर लिया है कैद
    और बो दिया है नफरत का बीज"26

सुरेन्द्र स्निग्ध की कविताएँ वास्तुशिल्पीय संरचना की दृष्टि से सुगठित हैं। यहाँ शब्दों की फिजूलखर्ची नहीं है। वे अभिजात्य काव्य मुहावरों को तोड़ते हैं। उनके लिए कविता मनोरंजन और विलासिता की चीज नहीं है। उनकी कविता सामान्य पाठक को सामाजिक दायित्व के प्रति सचेत करती हैं। उसे अंदर से परिमार्जित कर अग्रगामी सामाजिक-राजनीतिक गतिकी के लिए प्रेरित करती हैं।

उनकी कविताओं में अंतर्वस्तु को उभारने वाला सहज स्वाभाविक शिल्प दृष्टिगत होता है। कथात्मकता, नाटकीयता, सपाटबयानी, रिपोर्ताज शैली, लोकगीत तथा लोकगाथाओं का बड़ा की सुन्दर नियोजन हुआ है। उनकी भाषा में जो अंतर्लय है, जो नाद-सौष्ठव है वह उसे विषेष बनाती है। यहाँ भाषा जीवित तन्तुओं की तरह कविता के कथ्य का अविभाज्य अंग बनकर उभरी है।
   
उनकी कविताएँ दुनिया को खूबसूरत और बेहतर बनाने के सपनों से लदी हुई हैं। निश्चय ही सुरेन्द्र स्निग्ध हमारे दौर के एक महत्वपूर्ण कवि हैं। उनके काव्य-संसार का सम्यक मूल्यांकन अभी शेष है। उनकी कलात्मकता, संवेदना, वैचारिकी, प्रतिबद्धता और प्रासंगिकता को समकालीन आलोचना की कसौटियों पर नए सिरे से जाँचने-परखने की आवश्यकता है।   
   
सुरेन्द्र स्निग्ध नहीं रहे पर उनकी कविताएँ, उनकी बातें, उनकी यादें हमेशा साथ रहेंगी। तम और संघर्ष के क्षणों में हमारी पगडंडियों पर दीए की लौ बन कर। सृजनात्मकता और संवेदनाओं के साथ हमें भीतर से रचती-गढ़ती और रोशन करती हुईं। सर्वेश्वर के शब्दों में-

    "नहीं....नहीं
    जीवित हैं हम सब अभी भी
    और हम सब में जीवित हो तुम।
    ये लहरें जाने कहाँ से आती हैं
    जो हमारी पसलियों पर
    अपने को तोड़ती चली जाती हैं,
    हमें निरंतर गढ़ती जाती हैं
    तुम्हारे अनुरूप
    एक ऐसी मृत्यु में
    जो जीवन से दिव्य है।" 27



संदर्भ :

1.    चाँद की पूरी रात में कविता(अग्नि की इस लपट से कैसे बचाऊँ कोमल कविता-काव्य संग्रह, सुरेन्द्र स्निग्ध, नई संस्कृति प्रकाशन, दिल्ली) पृ० -22
2.    निर्जन शहर में मैं हूँ अकेला, आशीष कुमार मिश्र से बातचीत, जागत नींद न कीजै, सुरेन्द्र स्निग्ध, सुधा प्रकाशन, पटना, पृ०-14
3.    चाँद की पूरी रात में कविता, अग्नि की इस लपट से कैसे बचाऊँ कोमल कविता-काव्य संग्रह, सुरेन्द्र स्निग्ध, पृ०-22
4.    कवि मुक्तिबोध के निधन पर कविता, सर्वेष्वर दयाल सक्सेना-प्रतिनिधि कविताएँ, राजकमल प्रकशन, दिल्ली, पृ०-86
5.    निर्जन शहर में मैं हूँ अकेला, आषीष कुमार मिश्र से बातचीत, जागत नींद न कीजै, सुरेन्द्र स्निग्ध, सुधा प्रकाशन, पटना, पृ०-10
6.    खोज कविता(संघर्ष के एस्ट्रोटर्फ पर-कविता संग्रह, सुरेन्द्र स्निग्ध, अभिधा प्रकाशन, मुजफ्फरपुर, पृ०-145
7.    वही
8.    मा, कामरेड और दोस्त, कविता, इसी नाम के संग्रह से, सुरेन्द्र स्निग्ध, विजया बुक्स, दिल्ली, पृ०-33
9.    वही, पृ०-35
10    वही, पृ०-36
11    तुम्हारे लिए प्यार भेजता हूँ, कविता, संघर्ष के एस्ट्रोटर्फ पर, पृृ०-21
12    जहाँ कोई दोस्त नहीं हो, कविता, संघर्ष के एस्ट्रोटर्फ पर, पृ०-62
13    क्यों इतना प्यार, कविता, संघर्ष के एस्ट्रोटर्फ पर, पृ०-34
14    मजबूत पुट्ठों वाला घोड़ा, संघर्ष के एस्ट्रोटर्फ पर, पृृ०-43
15    थिरकता हुआ हरापन, कविता, संघर्ष के एस्ट्रोटर्फ पर, पृृ०-74
16    अगस्त के बादल, कविता, संघर्ष के एस्ट्रोटर्फ पर, पृृ०-79
17    कोलंगुट में सूर्यास्त, कविता, संघर्ष के एस्ट्रोटर्फ पर, पृृ०-47
18    तुम हो बादल तुम बरस रही हो, कविता, संघर्ष के एस्ट्रोटर्फ पर, पृृ०-100
19    हमारा प्यार, कविता, संघर्ष के एस्ट्रोटर्फ पर, पृृ०-109
20    कर ले मौत प्रतीक्षा, कविता, संघर्ष के एस्ट्रोटर्फ पर, पृृ०-105
21    पाश की कविता-सपने, वेब पोर्टल कविता कोष से।
22    कितनी प्यारी है नींद, कविता, रचते-गढ़ते काव्य संग्रह, सुरेन्द्र स्निग्ध, किताब महल, इलाहाबाद, पृृ०-39
23    कोसी का कौमार्य, कविता, रचते-गढ़ते काव्य संग्रह, सुरेन्द्र स्निग्ध, किताब महल, इलाहाबाद, पृृ०-15
24    ट्रोमा, कविता, मा, कामरेड और दोस्त काव्य संग्रह, सुरेन्द्र स्निग्ध, विजया बुक्स, दिल्ली, पृ०-78
25    वही, पृ०-71
26    कविता के सपने, संघर्ष के एस्ट्रोटर्फ पर-कविता संग्रह, सुरेन्द्र स्निग्ध, अभिधा प्रकाशन, मुजफ्फरपुर, पृ०-59
27    कवि मुक्तिबोध के निधन पर कविता, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना-प्रतिनिधि कविताएँ, राजकमल प्रकशन, दिल्ली, पृ०-



संपर्क-
विद्या भूषण
पर्ण कुटीर, गोकुल पथ
उत्तरी पटेल नगर, पटना-800024
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धर्मसंकट : दिव्या विजय


दिव्या विजय अपने पहले कहानी संग्रह ‘अलगोज़े की धुन पर’ के पाठकों के बीच पहुँचने के उपरांत अपने को कथाकार के तौर पर नित्य समृद्ध करती जा रही हैं। उनकी हर अगली कहानी का कथानक हमारी पहुँच एक नयी दुनिया तक बनाता है… वह दुनिया जो स्वयं ही नित्य परिवर्तनशील है। इस परिवर्तनशीलता को दर्ज करते हुए वे अपनी भाषा एवं शिल्प के प्रति सजग रहती हैं। दिव्या विजय की भाषा का प्रवाह… उसका आरोह-अवरोह पाठक को कथानक से जोड़े रहता है। तो आइए, हम पढ़ते हैं उनकी नयी कहानी जो हमें संवेदित करने के साथ ही ठहर कर सोचने को मजबूर करती है।


धर्मसंकट : दिव्या विजय
मधुसूदन जी को रिटायर हुए करीब छह महीने बीत गए हैं पर उनकी दिनचर्या में कोई अंतर नहीं आया है. उसी चुस्ती-फुर्ती से रोज़ का काम निबटाते हैं और दस बजते-बजते स्कूटर उठा कर निकल पड़ते हैं. उनका कहना है निठल्ले बैठे रहने से शरीर को जंग लग जाता है. इसलिए अपने कल-पुर्ज़े चालू रखने का इंतज़ाम उन्होंने कर लिया है.

बैंक की नौकरी से क्लर्क के ओहदे से रिटायर हुए हैं मधुसूदन बाबू. छोटा-सा शहर. कौन ऐसा है जो उन्हें नहीं जानता. उन की कर्मठता के चर्चे शहर भर में होते हैं. उन-सा ईमानदार और मेहनती इस शहर में बिरला ही होगा. लोग अपने बच्चों को उनकी मिसाल देते हैं. अपने काम में इतने माहिर कि मजाल है हिसाब में कोई गलती रह जाए. इसलिए रिटायर होते ही बहुत-से लोग उन्हें अपने यहाँ बुलाने के लिए लालायित थे. एक-दो कोचिंग इंस्टिट्यूट ने तो उन्हें अपने यहाँ एकाउंट्स पढ़ाने तक का ऑफर दे डाला. इतने अनुभवी और उद्यमी व्यक्ति की आवश्यकता सबको थी पर मधुसूदन बाबू सबको एक-सा जवाब देते, “इतने साल सरकार की चाकरी कर ली. अब कुछ हज़ार रुपल्ली की खातिर अपनी आज़ादी नहीं दूँगा. यही तो समय है अपने मन की करने का.” 

हाँ, यह बात अलग है कि यहाँ उनका और पत्नी का मन अलग पड़ गया. जहाँ पत्नी बरसों से प्रतीक्षा कर रही थी कि मधुसूदन बाबू रिटायर हो जायेंगे तो उन्हें समय देंगे. उन्होंने मंसूबे बाँध रखे थे कि अब वे सुबह की सैर पर साथ जायेंगे, रिश्तेदारों से मिलना-जुलना करेंगे, तीर्थ-स्थलों के दर्शन को निकल पड़ेंगे. इतने सालों में लाख चाहने पर भी ऐसा नहीं हो पाया था. वह देर रात तक अपनी फाइलों में उलझे रहते, सुबह उठते ही फिर वही फाइलें, दिन भर दफ्तर. बाकी कामों के लिए समय निकल ही नहीं पाता. कई बार तो खाना भी कंप्यूटर या फाइल में सर घुसाए-घुसाए खाते. रिश्तेदारों के काम हों या बच्चों के..सब बरसों-बरस वह अकेली निपटाती रहीं. वह सोच रही थीं कि जिस साथ का उन्हें इंतजार था वह अब मिलेगा पर उन पर घड़ों पानी फिर गया जब मधुसूदन बाबू ने सेवा-संगम में अपनी सेवाएँ देना तय कर लिया. सेवा-संगम एक ग़ैर सरकारी संस्था है जो बहुत-से क्षेत्रों में पिछड़े और कमज़ोर वर्ग के उत्थान के लिए काम कर रही है. मधुसूदन बाबू ने सोचा कि क्यों न यहीं काम किया जाए. पैसा तो इतने सालों में ज़रुरत भर का कमा लिया. अब कुछ समाज सेवा भी कर ली जाए. 

तो वह पहुँच गए सेवा-संगम के दफ्तर. उधर सेवा-संगम वाले भी उन्हें देखकर गदगद. हाथों-हाथ लिया गया उन्हें. इतना सत्कार पाकर मधुसूदन बाबू तो फूले न समाये. जब तक नौकरी रहती है सारा आदर-सत्कार नौकरी की बदौलत होता है. लेकिन उसके बाद जो सम्मान मिलता है वह व्यक्ति के रूप में मिलता है. उनकी इच्छा जानते ही संस्था वालों ने कहा,

“नेकी और पूछ-पूछ. हमें भी अपने अकाउंट संभालने के लिए कोई चाहिए था. आपसे बेहतर हमें कौन मिल सकता है.” 
सुनकर मधुसूदन बाबू खिल उठे.

“कहिये कब से आऊँ?”

“आपका दफ्तर है. जब चाहें आयें. न हो तो आज ही से शुरू कर दें.” कहते हुए सामने वाला व्यक्ति अपनी कुर्सी छोड़ खड़ा हो गया. 

“अरे आप क्यूँ खड़े हो गए. आप बैठिये. आज तो संभव न होगा. कल से आता हूँ.” वह भाव-विभोर थे. 

“अरे साहब, आपका जब मन हो आइये, जब मन न हो न आइये. यह तो सेवा है. मन से होगी. आप पर कोई बंदिश थोड़े ही है.” उसकी मुस्कराहट से मधुसूदन बाबू का मन हिलोरें ले रहा था. 

“लेकिन आपकी सेवा का कोई शुल्क हम नहीं दे सकेंगे.” कुर्सी वाला व्यक्ति अब झिझकते हुए कह रहा था. 

“जी, जी जानता हूँ मैं. इसीलिए यहाँ आया हूँ. सेवा का मूल्य चाहिए होता तो यहाँ कतई न आता. आप निश्चिन्त रहिये.” वह सामने वाले की झिझक ख़त्म कर देना चाहते थे. 

“तो ठीक है. कल से यह कमरा आपका हुआ.” संस्था वाले इतना योग्य व्यक्ति पाकर खुश थे. वह हाथ जोड़कर बाहर निकल आये. 

मधुसूदन बाबू मिठाई लेकर घर पहुँचे तो पत्नी सिल्क की साड़ी में लिपटी तैयार बैठी थी. 

“कहाँ लगा दी इतनी देर? कब से इंतज़ार कर रही हूँ.” उनके हाथ में मिठाई का डब्बा देखकर वह खीज गयीं. 

“यह मिठाई क्यों. अभी मुंडन-संस्कार में जाना है. मीठा तो वहाँ भी होगा.”  

उनके भांजे के बेटे का मुंडन था. मधुसूदन बाबू को उन्होंने पहले ही कह दिया था कि आज देर नहीं होनी चाहिए. उनका क्या, वह तो पुरुष हैं. औरतों के बीच बैठकर ताने तो उन्हें सुनने पड़ते हैं. यही सब सोचकर उन्हें कोफ़्त हो रही थी. ऊपर से यह मिठाई. इस उम्र में ज़्यादा मिठाई पचती नहीं. फिर बाँटते रहो धोबी और सफाई वाली में. अब रिटायर हो गए हैं. इतने खुले हाथ से खर्चा करेंगें तो कैसे चलेगा. पर ये कुछ समझें तब न. 

“अरे यह मिठाई मेरी दूसरी पारी शुरू करने की है. लो खाओ.” कहते हुए उन्होंने मिठाई पत्नी के मुँह में ठूँस दी और बेटे को फ़ोन लगा दिया. 

सारी बात सुनकर बेटे की वही प्रतिक्रिया थी जो किसी भी फरमाबरदार बेटे की होती. उधर से आवाज़ आई,

“पापा, क्यों इन चक्करों में पड़ रहे हो. घूमो-फिरो, आराम करो. कमाने के लिए मैं हूँ न.”

बेटे को इतनी चिंता करते देख मधुसूदन बाबू मन ही मन मुस्कुराये, “अरे नहीं बेटा, पैसे कमाने के लिए नहीं, स्फूर्ति रहती है मन और शरीर में. तुम चिंता मत करो.”

सुनकर पत्नी भुनभुनायी, “लेना एक न देना दो. न पैसे मिलेंगे, वक़्त जाएगा सो अलग. क्या ज़रुरत है वहाँ जाने की.”

“भई, हर काम पैसे के लिए थोड़े न होता है. कुछ काम मन की ख़ुशी के लिए भी होते हैं. और कौन सा बंध गया हूँ. तुम्हारा जब मन हो रोक लेना. नहीं जाउँगा.” कहते हुए उन्होंने मिठाई का दूसरा टुकड़ा उठा लिया.

मगर यह सिर्फ कहने की बात थी. वह दिन था और आज का दिन है. मधुसूदन बाबू को सेवा-संगम का काम ऐसा रास आया कि फिर वह किसी के रोके नहीं रुके. आँधी हो, तूफ़ान हो या ज़लज़ला ही क्यों न आ जाये वहाँ जाने से उन्हें कोई ताकत नहीं रोक पाती. तबियत खुद की ख़राब हो या पत्नी की, कहीं जाना हो या बेटा छुट्टी पर घर आया हो उनकी पहली प्राथमिकता थी सेवा-संगम. सिनेमा का कार्यक्रम बनता तो या तो टिकट बर्बाद हो जाते या उनके बगैर सबको जाना पड़ता. ख़ुदा न खास्ता कभी मेहमान आ जाएँ तो उनके इंतज़ार में ऊँघने लगते. अब तो खैर किसी ने आना ही बंद कर दिया है. होली जलाने के लिए अब कॉलोनी में उनका इंतज़ार नहीं किया जाता. चंदा इकट्ठा करने के लिए उन्हें कोई बुलाने नहीं आता. दफ्तर से लौटकर शाम को होने वाली बैठकों ने दम तोड़ दिया है. सबको पता है मधुसूदन बाबू अब व्यस्त रहते हैं. जो बात लोग समझ नहीं पाए वो ये कि मधुसूदन बाबू ऐसा क्या काम करते हैं जिसमें नौकरी से भी अधिक व्यस्तता रहती है. 

इधर सेवा-संगम से फ़ोन आए, उधर मधुसूदन बाबू झट हाज़िर. अलादीन का जिन्न हो गए हैं वह उनके लिए. “आता हूँ अभी थोड़ी देर में, बस मैं अभी आया”, सुनते-सुनते सब जान गए हैं कि इस अभी की मियाद निश्चित नहीं है. अमूमन यह उनके अंदाज़े से ज़्यादा ही निकलती है. अब मधुसूदन बाबू भी क्या करें. बतरस का जो मज़ा सेवा-संगम में है वह घर में कहाँ. घर में अकेली पत्नी, सेवा-संगम में इतने सारे लोगों का जमघट. और सिर्फ लोग ही नहीं, असल बात तो वहाँ मिलने वाले सम्मान की है. यूँ सम्मान उन्हें हमेशा मिला, सबसे मिला पर यहाँ कुछ था जो अलग था. अभी तक उनके जीवन में घटी बातों से कुछ अलग. बैंक में उन्होंने हमेशा किसी के अधीन काम किया लेकिन इस ब्रांच के तो वह सर्वेसर्वा हो चले थे. मजाल है उनसे पूछे बिना कोई काम हो जाए. सब जगह उन्हीं की पुकार, उन्हीं की हाँक. नोटों के बंडल तिजोरी में और तिजोरी की चाबी उनके पास. बैंक की चेकबुक, पासबुक सब उनके पास. कोई जलसा हो उनके हस्ताक्षर, कोई बिल पास होगा उनकी हामी पर. बाहर कहीं जाना हो तो मधुसूदन बाबू हाज़िर, अपने शहर से संस्था की नुमाइंदगी करनी हो तो वह हैं ही. वह आये तो थे एकाउंट्स सँभालने, धीरे-धीरे सब संभाल लिया. बाकी लोग भी मज़े में. न कोई काम, न गड़बड़ी होने पर उनकी ज़िम्मेदारी. वे लोग पूरी तनख्वाह उठाते और आराम करते. इधर मधुसूदन बाबू बेगार करते. मगर उनको तो यह बेगार न लगती. बदले में जो उन्हें मिल रहा था उसकी बराबरी तो दुनिया की कोई मुद्रा न कर पाती. शक्कर में पड़ी चींटियों-सी उनकी हालत थी. वह और उनका सेवा-संगम. सब मीठा-मीठा महसूस होता. 

पत्नी जी के अरमान, अरमान ही रह गए. वह मधुसूदन बाबू को देख-देख कर कुढ़ती रहतीं. उनकी ज़िन्दगी तो तब भी ऐसी, अब भी ऐसी. बस एक फेसबुक भर का बदलाव था. अब वही उनके अकेलेपन का साथी हो चला था. वह उसी से अपना मन बहलातीं. लेकिन थोड़े दिनों बाद फेसबुक जले पर नमक छिड़कने लगा. सेवा निवृत्त दूसरे लोगों को देखतीं तो तीर उनके सीने से आर-पार हो जाता. कोई अपने घर की छत को बगीचे में बदल रहा होता, कोई बीवी के साथ मंदिरों के बहाने पहाड़ की ठण्ड में, कम्बल में दुबक पुरानी बातें याद कर रहा होता. किसी घर में मियाँ-बीवी के ठहाके गूँजते तो कोई बीवी की फरमाइश पर कच्चे-पक्के चावल बना कर खिला रहा होता. लेकिन उनके पति...वह अब भी रात गए तक फाइलों में सर खपाए रहते. सुबह उठते ही फिर वही सब. जाने कैसी-कैसी फाइलों का अम्बार लग गया था घर में. श्रीमती जी का काम और बढ़ गया था. घर का काम कम था जो फाइलों को सहेजने-समेटने का काम और गले आ पड़ा. जिधर देखो उधर फाइलें.

वह चिड़चिड़ातीं, “जाने ऐसा क्या काम होता जिसके लिए यह मुई फाइलें ही चाहिए. सारी दुनिया कंप्यूटर में सिमट गयी है और एक यह हैं जो फाइल लेकर चलते हैं तो लगता है अपने लाव-लश्कर के साथ कहीं का किला फतह करने निकल रहे हों.”

लेकिन मधुसूदन जी के पास यह सब सुनने का समय कहाँ था. वह तो ये जा और वो जा. कहने वाला अपना सा मुँह लेकर देखते रह जाए. 

उम्रदराज़ होते जाना बड़ी टेढ़ी शय है...खासकर घर में प्रतीक्षारत स्त्रियों पर उम्र भारी बीतती है. अच्छे दिनों की प्रतीक्षा में झींक-झींक कर मधुसूदन बाबू की पत्नी दुबला गयी थीं. कब उन्हें जटिल रोगों ने आ जकड़ा वह जान नहीं पायीं. कभी चलते-चलते चक्कर आ जाता तो कभी घर का काम करते हुए साँस धौंकनी की तरह चलने लगती. सर अलग दर्द से फटा रहता. फिर भी मरने से पहले तक अपने कर्मों से विमुख न होने वाली भारतीय स्त्री की विशिष्टता से लैस वह अपने काम निबटाती जातीं. अगले हफ्ते बेटा आने वाला था. उस के साथ डॉक्टर के जायेंगी. बड़ी भाग्यशाली हैं. पति न सही, बेटा उनका बहुत ख़याल रखता है. पिछले हफ्ते अपने एक डॉक्टर दोस्त को भेजा था. घर पर ही चेक-अप हो गया. अस्पताल की लम्बी लाइन से छुटकारा मिला. उस ने कुछ टेस्ट लिखे थे. उसी के लिए बेटा लम्बी छुट्टी लेकर आ रहा है. कह रहा था, 

“माँ, हम एक साथ वक़्त बिताएँगे और आपके टेस्ट भी हो जायेंगे.” 

सुनकर उन्होंने उलाहने भरी दृष्टि से मधुसूदन बाबू को देखा पर वह तो प्रसन्नचित्त, बिना किसी ग्लानि के अपने काम में डूबे थे. वाहवाही का ऐसा भी क्या लोभ कि अपने जीवन-साथी का सुख-दुःख बिसरा दिया जाए. दूसरे लोगों का साथ क्या आधा अंग मानी जाने वाली पत्नी को भी विस्मृत कर देता है. पत्नी को पहले तो क्रोध आया फिर एक गहरी उदासी उनके मन पर चस्पां हो गयी. सामने बैठा पुरुष जिसे वह अपना मानती आई हैं, क्या वह सचमुच उनका अपना है. इतने सालों में आपस में उन्होंने कितने शब्द कहे होंगे? कितना समय सिर्फ एक-दूसरे के साथ बिताया होगा? वह अपलक उन्हें देखती रहीं. उनकी दृष्टि मधुसूदन बाबू के होंठों पर अटक गयी. वहाँ मंद हास था. औचक ही उनका मन नए तरह के भाव से भर गया. कैसी उत्फुल्लता है उनके चेहरे पर, अपने मन का काम कर सकने की संतुष्टि भी. वह स्वयं न सही पर मधुसूदन बाबू तो अपने मन का जीवन व्यतीत कर रहे हैं. वह क्यों रोड़ा बनें इसमें? साँझ की दहलीज़ पर आ ठहरे जीवन में किसी एक के जीवन में पुलक शेष है तो उन्हें अधिकार नहीं कि वह उसे अपनी अपेक्षाओं की भट्टी में झुलसा दें. वह एकाएक उदार हो चली थीं. हर प्रकार के द्वेष से मुक्त हो उन्होंने अपने मन में उनके लिए आशीर्वचन पढ़े. उन्होंने खुद से वादा किया कि मधुसूदन बाबू से झगड़ना एकदम बंद. वह करें अपना काम, वह कुछ नहीं कहेंगी. न बन पाए हों मधुसूदन बाबू उनके मन के साथी, वह स्वयं तो कभी अपने कर्तव्य से विमुख नहीं हुईं. यह बात उनकी संतुष्टि के लिए पर्याप्त है. सोचते हुए भीषण सरदर्द के बावजूद वह मुस्कुरा दीं. 

अगली सुबह मधुसूदन बाबू जल्दी-जल्दी अपने काम निबटा रहे थे. आज संस्था के क्षेत्र प्रमुख आने वाले हैं. वह रोज़ से अधिक उत्साह में थे. वह जल्द-से-जल्द सेवा-संगम पहुँच कर सारे इंतज़ाम परख लेना चाहते थे. वह नहीं चाहते कोई कमी रह जाए. क्षेत्र प्रमुख फ़ोन पर कह रहे थे उनकी काफी तारीफ सुनी है. वह इन तारीफों को झुठलाना नहीं चाहते. उनके आने से पहले सब अपनी आँखों से देख लेना चाहते हैं..कहीं कोई कमी-बेसी न रह जाए. कल फ़ोन पर हुई बातें उनके मन में अब तक गुदगुदी मचाये हुई हैं. वह यहीं नहीं बल्कि प्रदेश तक में प्रख्यात हो चुके हैं. उनका नाम अब अनजान नहीं रह गया है. वह बाहर से तो कुछ नहीं कह रहे पर मन बल्लियों उछल रहा है. एक सुगबुगाहट सेवा-संगम में भीतर ही भीतर पर फैला रही है जो उन तक भी पहुँच चुकी है. सब कुछ ठीक रहा तो आज उन्हें सर्वश्रेष्ठ कार्यकर्ता के ख़िताब से नवाज़ा जायेगा. एक अनूठे रस से सराबोर थे वह आज. 

वह निकलने को थे कि घर की शांति उन्हें कुछ अखरी. न बर्तनों की खटपट, न पत्नी जी की बड़बड़ाहट . आज क्या वह अभी तक जागी नहीं? कल तबियत कुछ अधिक ही ख़राब लग रही थी. उसे कह देते हैं कि खाने के लिए परेशान होने की ज़रुरत नहीं. आज उनका खाना वहीं संस्था में है. पत्नी के लिए भी वहीं से लेते आयेंगे. पत्नी को यह बात कहने कमरे तक आये तो उनके होश उड़ गए. कमरा बदबू से भरा था. बिस्तर मूत्र-पाखाने में लिथड़ा था. पत्नी चित्त पड़ी थीं. कोई हरकत उनके शरीर में नहीं दिखाई दी तो वह डरते-डरते बिस्तर तक आये और उनकी नाक के आगे हाथ लगा दिया. न, साँस नहीं थी. उन्होंने पास पड़ी कुर्सी का हत्था पकड़ लिया. कब हुआ होगा यह? कोई आवाज़, कोई आहट तक नहीं. भनक तक नहीं पड़ी. उन्हें तो आज नींद ही नहीं आई थी. सारी रात दूसरे कमरे में बैठ क्षेत्रीय प्रमुख को दिखाए जाने वाले कागजों का मिलान करते रहे थे. उन्होंने उनके चेहरा देखा. पीड़ा का कोई चिन्ह नहीं न संघर्ष का संकेत. क्या यूँ ही, रात के किसी पहर! 

लेकिन अब? अब क्या करें वह? बेटे को फ़ोन करें या किसी स्थानीय सम्बन्धी को ख़बर करे या जाकर किसी पड़ोसी को बुला लायें. वह हतबुद्धि-से मन ही मन सारे विकल्प परख रहे थे. 

तभी हवा का झोंका आया. खिड़की से होकर उन पर से गुज़रते हुए पत्नी की बगल में रखे कागज़ पर आ ठहर गया. यह नोटपैड था जिस पर वह हिसाब लिखती थीं. क्या अंतिम वक़्त भी वह हिसाब लिख रही थीं. उत्सुकतावश उन्होंने नोटपैड उठाया. जिस पन्ने पर पेन फँसा था वहाँ दो पंक्तियाँ थीं,

“मुझे कभी कुछ हो जाए तो आप पीछे मुड़ कर मत देखिएगा. जो भी काम कर रहे हों वह पूरा कर ही आइयेगा. इसे मेरी पहली और अंतिम इच्छा मानिये.”

यह क्या कह गयीं वह! उन्होंने प्रेमवश ऐसा कहा अथवा प्रतिशोध के प्रयोजन से! वह हतप्रभ खड़े उन पंक्तियों को दोहरा रहे थे. जीवन भर वह यही तो करते रहे. उनका काम ही सदा उनकी प्राथमिकता रहा. अब अंतिम समय पत्नी ने इसी की इच्छा व्यक्त कर क्या अनर्थ कर दिया? उन्होंने यही तो चाहा कि जो आज तक होता रहा, वही अब भी हो. तो क्या वह उन की मृत देह को छोड़ सेवा-संगम चले जाएँ? पत्नी की इच्छा मानते हैं तो उसका अनादर होता है, उसकी इच्छा का मान नहीं रखते तो भी उसका तिरस्कार होता है. अब मधुसूदन बाबू क्या करेंगे?


परिचय :

नाम - दिव्या विजय, जन्म - 20 नवम्बर, 1984, जन्म स्थान – अलवर, राजस्थान, शिक्षा - बायोटेक्नोलॉजी से स्नातक, सेल्स एंड मार्केटिंग में एम.बी.ए., ड्रामेटिक्स से स्नातकोत्तर
विधाएँ - कहानी, लेख, स्तंभ

‘अलगोज़े की धुन पर’ कहानियों की पहली किताब। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं जैसे नवभारत टाइम्स, कथादेश, इंद्रप्रस्थ भारती, पूर्वग्रह, जनपथ, नया ज्ञानोदय, परिकथा, सृजन सरोकार आदि में नियमित प्रकाशन। इंटरनेट पर हिन्दी की अग्रणी वेबसाइट्स पर अद्यतन विषयों पर लेख। रविवार डाइजेस्ट में नियमित स्तंभ।

अभिनय : अंधा युग, नटी बिनोदिनी, किंग लियर, सारी रात, वीकेंड आदि नाटकों में अभिनय। रेडियो नाटकों में स्वर अभिनय। 

सम्मान - मैन्यूस्क्रिप्ट कॉन्टेस्ट विनर, मुंबई लिट-ओ-फ़ैस्ट 2017 
सम्प्रति - स्वंतत्र लेखन,  वॉयस ओवर आर्टिस्ट 
ईमेल- divya_vijay2011@yahoo.com