गीताश्री की कहानी ‘नजरा गईली गुईंयां’



गीताश्री ऐसी गद्यकार हैं जिनकी रचनाओं की अपनी एक जमीन है। उनकी कहानियों एवं आलेखों में वर्जनाएं टूट रही होती हैं तो कभी जीवन के नये प्रतिमान जुड़ते हुए दिखते हैं। इंडिया टूडे की साहित्य वार्षिकी में उनकी कहानी ‘नजरा गइली गुइयां’ अपनी अंतर्वस्तु एवं उसके ट्रीटमेंट के लिहाज़ से पाठकों के बीच मुक्तकंठ से सराही गयी है। इस कहानी में कई लेयर्स हैं। पितृसत्ता एक स्त्री से उसके चयन का विवेक छिनती है तो दूसरी तरफ सामंती हठ जाति के आधार पर किसी व्यक्ति को अपात्र घोषित कर देती है।


कहानी एक स्त्री की है जिसका मौन विद्रोह धीरे-धीरे मुखर होता जाता है जिसे वह अपनी पुत्री को स्थानांतरित करती है। वह अपनी शर्तों पर मरते दम तक जीती है… जिसमें शामिल है उसकी वह ज़िद कि वह समाज में अपने बालसखा पमपम तिवारी (हंकपड़वा) के अस्मिता की पुनर्प्रतिष्ठा करके रहेगी जिसे वह नैहर से ससुराल तक ठोकर खाते हुए देखती आयी थी। क्या उसकी यह ज़िद अपने मुक़ाम तक पहुँच पाती है? ... तो आप पढ़िए गीताश्री की यह कहानी जिसका शिल्प और भाषा का प्रवाह आपको अंत तक कहानी से जोड़े रखेगा।


नजरा गईली गुईंयां : गीताश्री

बाबू सर्दी के भोरे भोरे औंघाते हुए, ऊबासी लेते हुए, पतली ऊनी चादर देह से लपेटते हुए बरामदे पर चले आ रहे थे। कोई उनके नाम का हांक दे रहा था। कौन हो सकता है जो उन्हें पूरे नाम से पुकारे....यह सधी हुई पुकार थी, देसी नहीं।
“पमपम तिवारी...पमपम तिवारी जी...”
घर में कोई और हो तो न हांक सुन कर बाहर जाए। अकेली जान और उनकी देख रेख करने वाला टुअर ललुआ । जाने कौन जन्म का संबंध निबाह रहा है। आया तो था, शागिर्द बनने, सेवक बन कर रह गया। न वे सिखा सके, न वो सीख सका। उनके बेटे, बहू छोड़ कर चले गए, पिता के पेशे से बैर जो ठहरा। ललुआ न जा सका। उनका हमदम, हमराज और बचेखुचे खपरैल मकान का मालिक। खेतों में कमाता और दोनों का खर्च चलाता। मस्त रहता और पमपम बाबू से पुराने दिनों के किस्से सुनता। यही उसका एकमात्र मनोरंजन का साधन था।
अजनबी हांक सुन कर पमपम बाबू बाहर निकले। ललुआ पोखरी की तरफ निकल गया होगा। बहुत दिनों से कोई पूरा नाम लेकर नहीं पुकारा था। अपने टोले में पमपम बाबू के नाम से जाने जाते थे।
“अवइछी...अवइत हती...” सुर में गाते हुए वे बाहर आए। आंखें मींचते हुए एक अनजान युवक पर नजर पड़ी।
“इस देस का तो नहीं लग रहा प्राणी...” उनींदी आंखें फक से खुल गईं।  
“आप ही हैं न, पमपम बाबू, इस इलाके के सबसे मशहूर हकपड़वा। मैं मुजफ्फरपुर से आया हूं, आपको मेरे साथ चलना है, वहां आपकी कला की हमें जरुरत है। आपकी जो डिमांड हो, बता दीजिए...”
सामने खड़े युवक को पमपम बाबू ने अजीब नजरों से घूरा। ललुआ हाथ में बांस का दतुअन और लोटा भर पानी लेकर खड़ा हो गया था।
“कौन भेजा आपको यहां ?” वो बताया नहीं कि हम ये काम छोड़ दिए हैं, और किसी को जरुरत भी नहीं हमारी,  हमारा बुढ़ापा आ गया है, हमसे नहीं होता है ये सब, हम नहीं जाएंगे कहीं, माफ करिए.”
दोनों हाथ जोड़ कर वे पलट गए थे। गले में रेत-सा फंसता हुआ महसूस हुआ।
“आखिरी बार चलिए...आपके बिना संभव नहीं । कल ही तेरहवीं है, और कल ही आपकी जरुरत है।“
“ललुआ बोल दे उनको, हम नहीं करते ये काम...”
“मालिक नहीं जाएंगे, आप लौट जाइए...कैसे पता चला आपको...कौन भेजा...ईहां तो किसी को पता नहीं कि हमारा पुश्तैनी धंधा क्या था?”
ललुआ हैरान हुआ।
युवक ने अपनी जेब से एक पर्ची निकाली और ललुआ को बोला- “अपने मालिक को पढ़वा दीजिए।“
ललुआ हैरान होता हुआ पर्ची लिया खुद तो पढ़ न सका। पढ़ता कैसे, एलएलपीपी यानी लिख लोढ़ा पढ़ पत्थर जो था। सीधे पमपम बाबू के आगे जाकर पर्ची थमा दिया।  
पर्ची पढ़ते ही उनके चेहरे का रंग उड़ गया। गोरा चेहरा तपने लगा था। चेहरे की झुर्रिया कांपने लगी थीं। वे मुट्ठी में उस कागज को दबाए दबाए आंगन की तरफ चले गए। ललुआ ने नोटिस किया, पैरों में जान नहीं बची थी। चलते हुए लहरा रहे थे। अपने आपे में नहीं थे। बाहर खड़ा युवक प्लास्टिक वाली कुर्सी खींच कर इत्मीनान से बैठ गया था। उसे उम्मीद थी कि यहां से वह विफल हो कर नहीं लौटेगा।
......


फरवरी का पहला सप्ताह था जिसमें ठंढ़क अभी तक टिकी हुई थी। रिया को दिन भर नामालूम-सी बेचैनियां रहीं, शाम को भतीजे ने आई सी यू से एक 50 सेंकेंड का विडीयो क्लिपिंग भेजा। गहन चिकित्सा कक्ष में मां अंतिम सांसे ले रही थीं। पटना जाने वाली फ्लाइट सुबह ही मिलती। सबसे पहली फ्लाइट बुक की। अंतिम समय में मां के पास होना चाहती थी। एयरपोर्ट पर बैठे बैठे बार बार वीडियों क्लिपिंग देखती और रोती जाती। किसी तरह मां से एक बार जीते जी मिल ले। डेढ़ घंटे बाद जब पटना एयरपोर्ट पर उतरी तो कहानी बदल चुकी थी। अनगिनत फोन कॉल्स और मैसेज से मोबाइल भरा हुआ था।
मां नही रही...
पिता के जाने के बाद मां ही उसका घर थीं। सबसे छोटी और इकलौती बेटी होने के नाते मां का उस पर खासा दुलार था। मां अपने हर फैसले के लिए रिया पर निर्भर थीं। रिया को लेकर बदनाम थीं कि उससे पूछे बिना कोई काम नहीं करतीं। न ही अपनी चीजों को किसी को हाथ लगाने देती। बहुत गोपनीयता बरतने वाली स्त्री थी मां। हर चीज सहेज कर, संभाल कर, सबकी पहुंच से दूर रखतीं। रिया ने कभी उन चीजों में दिलचस्पी नहीं ली। मां का सिरहाना तो पूरा बक्सा जैसा था। सारी चीजें रखतीं, कागज पत्र, चाबियां, बीड़ी, माचिस जाने क्या क्या...। शहर में रहने के वाबजूद मां की आदते नहीं बदली थीं. उनके आंचल में रुपये, सिक्के जरुर बंधे मिलते। रिया उन्हें खोलती और मजे मजे में वे पैसे लूट लेती। रिया के अलावा कोई और नहीं कर सकता था ऐसा। वे पूरे परिवार से एक दूरी बनाकर जीती थीं। उन तक पहुंचने का उचित माध्यम रिया थी। मुजफ्फरपुर से कोसो दूर, अपनी एकल जिंदगी में मस्त। दोनों भाईयों के सामंती रवैया से तंग आकर विद्रोह बन जाने वाली रिया ने सिर्फ मां से बातचीत रखी और भाइयों से बोलचाल बंद। भाभियां कभी कभार मुस्कुरा देतीं। रिया बदले में आत्मीय मुस्कान दे देती, ये जानते हुए कि गुलाम आत्माओं का कोई कसूर नहीं होता। पराधीनता में सिर्फ मुस्कुरा पड़ना ही सबसे आसान क्रिया है। मां ने भी कभी दबाव नहीं डाला। वे सुख चैन चाहती थीं। रिया को पूरा समर्थन देती थीं और दोनों बेटो के परिवार से अलग घर की ऊपरी मंजिल पर रहती थीं। पिता के जाने के बाद मां ने पहली मंजिल पर अपना ठिकाना बना लिया था। जिसे मिलना हो, कुछ चाहिए, वो आए उपर। गठिया की वजह से बिस्तर पकड़ चुकी थी। देखरेख के लिए गुलिया चौबीसो घंटे उनके पास रहती थी। रिया एकदम निश्चिंत थी मां की तरफ से। मां भी निश्चिंत थीं बेटी के फैसले से। रिया पर पूरा भरोसा था और ये भी इत्मीनान था कि अपनी जिंदगी के फैसले बेहतर करेगी। चाहे शादी करे न करे, वो शादी थोपे जाने के खिलाफ थीं। रिया से फोन पर पूछती रहती थीं- “कोई पसंद आया...तेरी इज्जत करेगा ना, साथ देगा न...तुझ पर शासन तो नहीं करेगा..? .देख लेना..ठोक बजा कर...पहले कागज पर लिखवा लेना...”
“अरे मां...ऐसे कहीं प्यार होता है जिसमें कंडीशन अप्लाई हो...बोलो....अभी मेरा मन नहीं...क्या उम्र मेरी, 36 साल की तो हूं...हो जाएगी..होनी होगी तो...ना हो तो भी हम कौन सा मरे जा रहे...अकेली लाइफ ज्यादा मस्त...न कोई रोकने वाला, न टोकने वाला...जह जहां मन हो, उठ कर चल देती हूं...किसी को जवाब नहीं देना पड़ता मां...यहां कोई मेरी जिंदगी में नहीं झांकता...”   
“अच्छा मां, एक बात बताओ...तुम भी टिपिकल मदर की तरह मेरी शादी का सपना देखती हो क्या...?”
रिया मां को कुरेदती।
“भक्क...हम ऐसा सपना देखते तो तुम आज वहां से हमसे मजाक कर रही होती का..दो तीन बच्चा-खच्चा लेकर किचकिचा रही होती...हम वैसी मां नहीं, हम तो तुमको पैर पर खड़ा होते देखने का सपना देखते रहे, खुदमुख्तार बनने का सपना...मेरी तरह नहीं बनाना चाहती थी कि दिन भर टेटियाती रहो- “ऐ जी...सुनते हैं, हमको सौ रुपया दीजिए...हमको चूड़ी खरीदना है...”
मां एक्टिंग करतीं, आवाज बदल लेतीं...और फिर दोनों मां बेटी फोन पर हंसती रहती देर तक। मां का यही अगाध विश्वास उसकी पूंजी था जिसके सहारे वह भाइयों का बंधन काट कर दिल्ली पहुंच गई थी। जहां अपनी दुनिया का विस्तार कर रही थी और अपना समाज बना रही थी।
मां के नहीं रहने की खबर ने उसे बुरी तरह झकझोर दिया था। वह सचमुच तन्हा हो गई थी। घर के बाहर भारी भीड़, रिश्तेदारों का खोखला विलाप और मां की ठंडी देह ने उसे भीतर से तोड़ दिया। भाभियों ने उसे संभाला। नहीं तो मां की देह पर भरभरा कर गिर गई होती। इस शहर से नाता हमेशा के लिए टूट गया था। एक कड़ी थी मां, जो टूट गई। तेरह दिन बाद सदा के लिए इस शहर को अलविदा कह देना है। मुड़ कर न देखना है। मां को लोग मंजिल की तरफ ले गए थे। द्वार पर सन्नाटा छा गया था।
मां के बेड पर जाकर गिर पड़ी। बाहों में चादर भींज कर लोटती रही देर तक। भाभियों से पूछती रही- “मां ने कुछ कहा क्या..अंतिम समय क्या बोलीं...मेरे लिए कुछ कहा...मेरा नाम लिया..कैसे हुआ.”
बड़ी भाभी चुपचाप उठ कर चली गईं। छोटी भाभी ने हौले से कहा- “उन्होंने मौका ही कहा दिया, ब्रेन हेमरेज हुआ तो जल्दी होस्पीटलाइज कराना पड़ा। सबलोग उसी में लग गए, कोई उनसे बात नहीं कर सका, वो कुछ कहना चाहती थीं, मगर आईसी यू में बात नहीं करने देता है न, उनके ए टी एम का पासवर्ड तक न पूछ पाए, अभी कामकाज में पैसा लगेगा, निकालना पड़ेगा, किसी को कुछ बताती थोड़े थीं ”
भाभी के लहजे में उदासी कम, शिकायत ज्यादा थी।
“मां जी आपसे तो ज्यादा बात करती थीं, आपको पता होगा ? आपसे बताई होंगी अपनी इच्छा ”
भाभी के स्वर में उलाहना था। रिया चुपचाप सुबकती रही। मां के तकिया पर सिर रख कर सो गई। भाभी कब उठ कर चली गई, पता न चला। देर रात सब मंजिल से लौटे, घर में विधि विधान होता रहा, रिया को किसी ने नहीं जगाया। गुलिया पलंग के नीचे सो गई थी।
सुबह कुछ बदली हुई थी। भाइयों के चेहरे पर अवसाद की जगह थकान की छाया थी। भाभियां काम करके हलकान हो गई थीं और बड़ी भाभी का बड़बड़ाना शुरु था। गांव के कुछ रिश्तेदार डेरा डाल चुके थे। कुछ तो तेरह दिन तक हिलने वाले नहीं थे। छोटा भाई कर्ता बना था, इसलिए वह एक कमरे में शांत पड़ा था। बड़े भइया बहुत एक्टिव थे। सारा उन्हें संभालना था। रिया से दोनों भाइयों का अबोला-सा था।
द्वार पर सब बैठे थे, रिया को बड़ी भाभी ने ही टोका-
“आप मां के पैसों के बारे में जानती हैं। जमीन का कागज पत्तर कहां रखा है, ये भी हम लोगो को नहीं मालूम, आपको तो जरुर बताई होंगी..”
“पैसा निकालना है, आज से तेरह दिन काम ही काम, दो दिन का भोज होगा और मांगने वाले भी आएंगे...दान भी करना पड़ेगा...खर्चा तो बहुत होगा...बजट बनाना होगा..पहले पैसे का पता चले, फिर उसी हिसाब से तय होगा।“
बड़े भैया की आवाज में गहरी चिंता थी। दुख का साया कहीं नहीं दिखा। रिया को सारा माजरा समझ में आ गया था। उसका मन हुआ, तेरह दिन न रुके, मां तो चली गई, तेरह दिन की क्रिया बेमानी है, इसे क्यों करना, भोज भी न हो।
उसने अपनी इच्छा जाहिर कर दी। सुनते ही घर में बम फटा। बड़े बैया जोर से चिल्लाये- “हमारी समाज में कोई इज्जत है कि नहीं, हम कंगले हैं क्या ? हम जो दूसरो का भोज खाते रहते है, हम उनको क्या कहेंगे, समाज को क्या मुंह दिखाएंगे। हम जो इतना चुमावन (रुपये) दिए हैं शहर भर में, उसको वसूलने का समय अब आया है, हम कैसे छोड़ दे। तुमको तो दिल्ली चले जाना है। हम लोगो को इसी समाज में रहना है. जिसको जाना हो जाए, हम लोग कर लेंगे सब काम. कल ही बैंक से बात करेंगे. बाबू जी का पेंशन मां के अकाउंट में जमा होता था, चार पांच लाख होगा उसमें. इतना खर्च तो होगा ही.”
रिया उठी और चुपचाप पहली मंजिल पर मां के कमरे में चली गई। भाई के फट पड़ने के बाद  उनका संकेत समझ गई थी कि वे नहीं चाहते थे रिया यहां रुके या कोई दखल दे। मां का पैसा किसी तरह रिया उन्हें सौंप दे। बड़ी भाभी सिरहाने आकर खड़ी हो गई थीं।
“मां का बक्सा काहे नहीं चेक करती हैं ? .रुम में ही रखा होगा न कहीं, आराम से ढूंढिए, मिल जाएगा. वैसे भी मां का रुम , आप ही चेक करिए, हम लोग नहीं छुएंगे कुछ, कलंक लग जाएगा.”
रिया ने गीली आंखों से भाभी को घूरा। घरेलू काम में घिसी हुई, उंनीदी वह एक लाचार औरत थी जो घर के मालिक का हुकुम बजा रही थी।
वह लेटी रही, सुबकती रही। दिल्ली वापसी का प्लान करती रही।
जोर से प्यास की तलब महसूस हुई। गुलिया चौखट पर बैठी थी। वह बड़बड़ा रही थी- “अब हम गांव लौट जाएंगे, इन लोगो के साथ नहीं रहेंगे.”
रिया ने गुलिया को पुकारा।
“दीदी..सिरहाने में देखो...ए टी एम कार्ड वहीं रखा होगा...दे दो उनको। आप मत रुकिए। तेरह दिन में आपकी तेरह किसिम की दुर्गति कर देंगे। आप मुक्ति पाओ, सब दे दो इनको”
“तुमको मां कुछ बताई थी. तुम रात दिन साथ रहती थी न...क्या बोलती थी...?”
रिया का दर्द सुनकर गुलिया का कलेजा कांप उठा था।
“हमको क्या बोलेंगी मलकिनी, आपके बारे में बहुत बात करती थीं। मरने के बारे में कभी बात करती नहीं थीं। एतना जरुर बोलती थीं कि अपने नाम की जमीन बेटों को नहीं देंगी, दादा की संपत्ति में ले हिस्सा, अपने नाम का नहीं देंगी “- ऐसा बोलती थीं जब कभी गुस्सा होती थीं। आपको लेकर दोनों भइया मलकिनी को बहुत कोसते थे। कहते थे कि आपके बाद उसको यहां टपने नहीं देंगे “
रिया को सुन कर हैरानी नहीं हुई। मां का स्वभाव जानती थी। जिद्दी थीं, ठान लिया सो ठान लिया। वह डरी, कहीं मां ने वह जमीन उसके नाम तो नहीं कर दिया। नहीं, नहीं, कदापि न लेगी जमीन, उसे कौन सा गांव में रहना है। अबकि गई तो वापस न लौटेगी। क्या करना जमीन लेकर...मां ने उसके नाम कर दिया होगा तो भी वो भाइयों के नाम कर जाएगी...कुछ नहीं लेकर जाना यहां से, बस मां की एक साड़ी ले जाएगी, बतौर यादगार...और कुछ हाथ नहीं लगाएगी..
लेटे लेटे उसने मां के सिरहाने में हाथ लगाया- हाथ ज्यों ज्यों अंदर करती गई, कई चीजें टकराने लगीं। कुछ ठोस, कुछ पेपर, कुछ सिक्के...चिंहुक कर उठी।
“गुलिया, दरवाजा बंद कर...”
गुलिया ने दौड़ कर दरवाजा बंद किया। रिया ने पूरा गद्दा उठा कर नीचे फेंक दिया। सिरहाने का स्रामाज्य खुल गया था। कुछ जंग लगी चाबियां, कुछ सिक्के, मुड़े-तुड़े रुपये, कुछ खुली बीड़ियां, कुछ कतरनें, चार तह किया हुआ मर्दाना ऊनी शॉल...और एक पतली-सी फाइल। गुलिया और रिया दोनों अचंभे की तरह सिरहाने के इस साम्राज्य को देख रही थीं। इन सामानो को कौन हाथ लगाए। कंपकंपाते हाथों से रिया ने सामान उठाना शुरु किया। गुलिया ने बीड़ियां उठाईं। सबसे पहले फाइल उठाई। स्टांप पेपर थे। रिया की आंखों में इतना पानी था कि पेपर पढ़ नहीं पा रही थी। धुंधली आंखों ने जो पढ़ा, उसके पैरो तले से जमीन खिसक गई। मां के हाथ लिखा छोटा-सा खत उसके नाम था। एक श्वेत श्याम मर्द की घिसी हुई तस्वीर थी, घनी ढाढी, तीखे नैन नक्श। एक पेपर पर कवितानुमा कुछ लिखा था।  जिस पर पहेली जैसा कुछ लिखा था, नीचे लेखक का नाम पता भी लिखा था।
“लोमा लाठी/शान भथाहीं/धन तिसिऔता/ममला गेल महिसौर
मिरजा नगर के ललना हे जानकी/ सुंदर सुशील सिरमौर”
पहली दो पंक्तियां पढ़ कर रिया कांप गई। मिरजा नगर तो उसका ननिहाल है...ननिहाल वर्षो पहले छूट चुका था। पिता ने कभी जाने नहीं दिया। न मां को न किसी भाई बहन को। शायद किसी से झगड़ा हो गया था, तब से आवाजाही बंद थी। रो धो के मां भी भी मिरजा नगर को बिसरा गईं। श्वेत श्याम तस्वीर उठा कर देखा- ऐसा लगा, चेहरा जाना पहचाना सा है...कहीं देखा है..बचपन में...
स्मृतियां साफ नहीं हो रहीं। मां का बिलखना, बाबूजी की दहाड़ याद है।
उसने स्टाम्प पेपर को देखा...जमीन का कागज था। मां का साइन था। अंगूठे का चिन्ह। ऊपर नाम पमपम तिवारी, ग्राम-मिरजा नगर, जिला-वैशाली.
अंदर से मां के अनगढ़ अक्षरों में एक खत निकला रिया के नाम जिसमें अपनी अंतिम इच्छा  दर्ज कर गईं। वे जानती थी कि सिर्फ बेटी ही सबसे लड़ कर उनकी ख्वाहिश पूरी कर पाएगी।
रिया, मेरी बाबू,
पता नहीं, ये चिट्ठी तुम तक किस हालत में पहुंचेगी या कब पहुंचेगी। पहुंचेगी भी या नहीं, पता नहीं। अगर तुम चिट्ठी पढ़ रही हो तो मेरी एक ख्वाहिश पूरी कर देना। करोगी न?
फाइल में जमीन के पेपर है, वो मुझे तुम्हारे नाना जी ने दिया था। जिसे मैंने छिपा कर रखा, ये जमीन तुम मेरे बाल सखा, पमपम तिवारी को दे देना। मैने उनके नाम कर दिया है। मुझे उनसे गहरा अनुराग था। बस उनका कसूर ये था कि उनका धंधा तुम्हारे नाना को पसंद नहीं था। एक तो हम एक ही गांव के, दूसरे उनका खानदानी धंधा हंकपड़वा का। द्वारे द्वारे नगरी नगरी श्राद्ध का भोज खाना, मृतक का प्रशस्ति-गान, स्वांग करना, उछल-कूद करना, मांगना-चांगना, बिल्कुल शान के खिलाफ।
मेरी इच्छा है कि बिना अपने भाइयों को बताए, पमपम को इज्जत से बुलाओ, यहां से बेइज्जत करके निकाला गया है, तुम इज्जत देना उसको। वह भिखारी नहीं, कलाकार है, तुरत-फुरत कविता बनाता है और गाता है। बहुत ओज है उसकी वाणी में। पूरे तिरहुत प्रमंडल में उसका डंका बजता था। सौ गांव के लोग उसको बुलाते थे। पता चला है कि वो ये धंधा छोड़ चुका है और यह प्रथा भी खत्म हो गई है। फिर भी तुम उसको बुलाना, वो जरुर आएगा, उसने वादा किया था, छोटी-सी पर्ची उसके पास भिजवा देना...बस।
कहा कम, ज्यादा समझना।
तुम्हारे लिए हम कुछ नहीं छोड़े जा रहे, सिवाए मुक्ति के। ये हम जीते जी तुमको दे चुके, संभाले रखना। अपनी मर्जी का जीवन, अपने मान-सम्मान के साथ जीना। बेसी रोना मत...मेरी आत्मा को कष्ट होगा।
तुम्हारी मां
जानकी देवी
चिट्ठी खत्म होते होते रिया का रोना बंद हो चुका था। चेहरे पर वही सख्ती लौट आई जैसी दिल्ली जाते हुए अख्तियार की थी।
उसने बचपन के साथी प्रभात को फोन किया। रिया को तेरह दिन तक रुकना था। उसे किसी का इंतजार जो करना था।  
गुलिया बीड़ियां अपनी हथेलियों पर लेकर रिया के सामने आ खड़ी हुई। रिया ने माचिस मांग कर बीड़ी सुलगाई और चिट्टी के अंत में लिखी गीत की दो पंक्तियां गुनगुनाने लगी-
“पटना से बैदा बुलाई दअ...नजरा गईंली गुईंयां...”
गुलिया अपनी हिचकी न रोक सकी। मां का कमरा सैलाब में डूब गया था जहां दो आत्माएं टापू की तरह तैर रही थीं, अपना ओर छोर ढूंढती हुई।  


.....


हो बुढ़िया के रोटी /पुतोहिया के भात
बुढ़िया बोले त / ठोठे पर हाथ
हे...जयजयकार रहईया/बिजरौली वाला जजमान के गांड फटइया
हे...
वाह वाह रे जमाना / बड़का भाई के कलकत्ता में कारखाना
बड़का भाई के मोंछ / जैसे बरछी के नोंक
छोटका भाई के मोंछ / जैसे बकरी के पोंछ
हो....
जय जानकी जगदंबा /हाथ गोर लंबा
उरदी के खेत में / रहरी के खंबा
हो....
जानकी सिंगार / जैसे चंदा उतार
जानकी के गान / जैसे देवी स्थान
जानकी बसान / जैसे स्वर्ग में बिहान
दुष्ट बेटवन के नरक में स्थान
हो....
दोनों भाइयों की भृकुटी तन गई थी। उसे देखते ही दोनों चौंक गए। ये कहां से आ गया ? किसने बुलाया ? जिसे दरवाजे से वर्षो पहले अपमानित करके बाबूजी लौटा चुके थे, उसकी यहां आने की हिम्मत कैसे हुई। अपने दरवाजे पर कोई हंकपड़वा नहीं चाहते थे। हंकपड़वा गान में ही सबका माखौल उड़ता था, सबके भेद खोलता था और अंत में गुणगान करके माहौल गमगीन कर देता था। जाते जाते बहुत कुछ ठग के ले जाता था। दोनों भाई उसके लिए तैयार न थे। वे क्रुद्ध निगाहों से रिया को देख रहे थे। मां की इच्छा पूरी होते देख कर रिया मुस्कुरा उठी। वह भाईयों का रिएक्शन देखने को आतुर थी। कैसा लगेगा जब जुल्मो सितम का पर्दाफाश होगा। मन में दर्द और सुकून की लहर कांपी। जिस आग को लेकर एक विलक्षण स्त्री इतने वर्षो तक जीती रही, इतना दर्द समेटे, इतनी क्रूरताओं को झेलती रही, उसकी छोटी-सी ख्वाहिश पूरी होने जा रही थी।  
पंडाल में रिश्तेदारों और मेहमानों के बीच हंकपड़वा का गान और हुंकार जारी थी। सफेद धोती, कत्थई रंग का मुरेठा सिर पर बांधे, लाल लाल मतवारी आंखें, काला जूता सब मिला कर अनोखी छटा थी। वह देह झटक, पैर पटक, शॉल लहरा लहरा कर , ताली बजा बजा कर समां बांध रहा था। बड़े भइया ने कुछ रुपये निकाले, हंकपड़वा को चुप रहने का इशारा किया, रुपये उसकी तरफ बढ़ाए। उसने घृणा से हाथ झटक दिया। उसने रिया को पास बुलाया, पतली-सी फाइल रिया ने उनकी तरफ बढ़ा दी। गोरे गोरे हाथों से पीली , मरियल-सी फाइल हाथ में लेकर अचंभे से देखा, खोला , थोड़ी देर तक सन्न रहा।
“अब तो खुश हो गए तिवारी जी...लगता है, मोटा माल मिला है आपको, अब यहां से निकलिए...”
बड़का भैया ने व्यंग्य वाण छोड़ा। तिवारी जी ने अपनी लाल अंगार जैसी, भस्म कर देने वाली आंखों से उन्हें घूरा और तत्क्षण रिया की तरफ पलटे। फाइल चार टुकड़ों में फाड़ी और रिया को थमा कर ललुआ का हाथ पकड़ा- “बउआ, ई हमारा सालों बाद आखिरी हांक थी। हम भांट भांटिन नहीं हैं कि सिर्फ प्रशंसा गाएं। तुम जानती हो कि हम किसका अनुराग खींच लाया, किसकी खातिर हम कसम तोड़े हैं...सदा सुखी रहो...तुम जानकी जैसी ही सुन्नर हो, चांद का टुकड़ा..”
उसके माथे पर हाथ फेरा, गोरी, बूढ़ी कलाई बेहद आत्मीय थी। चाहती थी, माथे पर देर तक वो कलाई पड़ी रहे, या उससे लिपट कर जार जार रो ले। वो तूफानी हवा थे, रुकते कहां। पूरे वेग से झपटते हुए कॉलोनी के गेट से बाहर। उनका गान रुदन में बदल चुका था। उनका रुदन-गान सुन सकती थी-
“नजरा गईंली गुईंयां...”
बूढ़ी फुआ बोल पड़ी- “बड़े भाग वाले के काम में हंकपड़वा आते हैं। अब त अइसे भी गांव ज्वार में ढूंढे नहीं मिलते। इनके चरण जहां पड़ते हैं, वहां का समय बदल जाता है। इनका आदर करना चाहिए था...ये ठीक न हुआ।“     
   …….

परिचय ◆

गीताश्री
कथाकार एवं पत्रकार
कृतियाँ -

प्रार्थना के बाहर और अन्य कहानियां ( कहानी संग्रह, वाणी प्रकाशन)
स्वप्न, साजिश और स्त्री ( कहानी संग्रह, सामयिक प्रकाशन)
डाउनलोड होते हैं सपने ( कहानी संग्रह, शिल्पायन प्रकाशन)
लेडीज़ सर्कल ( कहानी संग्रह) राजपाल एंड संज
हसीनाबाद ( उपन्यास, वाणी प्रकाशन)
औरत की बोली ( स्त्री विमर्श, सामयिक प्रकाशन)
स्त्री आकांक्षा के मानचित्र ( स्त्री विमर्श, सामयिक प्रकाशन)
सपनों की मंडी ( आदिवासी लड़कियों की तस्करी पर आधारित शोध, वाणी प्रकाशन)

संपादित कृतियाँ -

नागपाश में स्त्री ( स्त्री विमर्श)
कल के क़लमकार ( बाल कथा)
स्त्री को पुकारते हैं स्वप्न ( कहानी संग्रह )
हिंदी सिनेमा: दुनिया से अलग दुनिया ( सिनेमा)
कथा रंगपूर्वी ( कहानी संग्रह)
तेईस लेखिकाएँ और राजेन्द्र यादव( व्यक्तित्व)
रेखाएँ बोलती हैं ( रेखा चित्र), शिवना प्रकाशन

पुरस्कार एवं सम्मान -

वर्ष 2008-09 में पत्रकारिता का सर्वोच्च पुरस्कार रामनाथ गोयनका, बेस्ट हिंदी जर्नलिस्ट ऑफ द इयर समेत अनेक प्रतिष्ठित पुरस्कार प्राप्त.
राष्ट्रीय स्तर के पांच मीडिया फैलोशिप और उसके तहत विभिन्न सामाजिक सांस्कृतिक विषयो पर गहन शोध.
कथा साहित्य के लिए इला त्रिवेणी सम्मान-2013
सृजनगाथा अंतराष्ट्रीय सम्मान
भारतेंदु हरिश्चंद्र सम्मान, सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार
साहित्य के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए बिहार सरकार की तरफ से बिहार गौरव सम्मान-2015
सीनियर फेलोशिप - वर्ष - 2016-2017, संस्कृति मंत्रालय , भारत सरकार

23 सालों तक सक्रिय पत्रकारिता के बाद फ़िलहाल स्वतंत्र पत्रकारिता और साहित्य लेखन !

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श्रद्धा थवाईत की कहानी ‘पगडंडी’



श्रद्धा थवाईत की कहानी ‘पगडंडी’ 2018 की बहुपठित कहानियों में से एक है। स्त्री के अतीत की पीड़ा, वर्तमान का संघर्ष और भविष्य के लिए उम्मीद सबकुछ इस कहानी में आप पाएंगे। पहले ही पैराग्राफ़ में पाठक कहानी से जुड़ जाता है। उनकी भाषा का स्नेहिल स्पर्श कथा के प्रवाह को बनाए रखता है। अपने पहले कथा-संग्रह ‘हवा में फड़फड़ाती चिट्ठी’ के बाद वे लगातार अपनी सार्थकता सिद्ध कर रही हैं। आप भी पढ़िए यह कहानी।


पगडंडी : श्रद्धा थवाईत

किसी घर का जंगल की छाँव में होना, छोटे से गाँव में होना, कितनी समस्याएं लाता है ये कोई फूलो से पूछे. फूलो का घर है- सुदूर बस्तर के पठार की गोद में बसा. गाँव में जीवन की आधारभूत सुविधाओं के नाम पर कुछ नहीं है- न सड़क है, न बिजली, न पानी. पानी की सुविधा के लिये लगभग पांच किलोमीटर दूर बहती एक नदी है. रोशनी के लिये ढिबरी, जिसके लिये मिट्टी का तेल लेने बीस किलोमीटर दूर कस्बे में जाना होता है. सड़क के नाम पर घने जंगल से गुजरती एक पगडण्डी है, जो गाँव को उस कस्बे की ओर जाती सड़क से जोड़ती है. इस कस्बे में एक प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र है. जो इन दिनों, दिन रात फूलों के सपनों में आने वाली जगह बनी हुई है.  
    माँ नहीं है फूलो, पर माँ हो रही है. उसके माँ होने के घड़े में बूँद-बूँद कर मातृत्व भर रहा है. उसे इंतजार है, उस दिन का, जब पेट में हलचल से महसूस होता बच्चा, उसकी गोद में होगा. यूँ भी नौवां महीना तो इंतजार का ही महीना होता है. एक बार और फूलो इसी इंतजार में थी, पर वह इंतजार... इंतजार ही रह गया. कोई और माने न माने फूलो तो इसका जिम्मेदार उस सीटी सी आवाज में चीखने वाली गायतीन(दाई) को ही मानती है. इस बार वह अपनी जचकी किसी डॉक्टर से कराने के लिए ही कृतसंकल्पित है.
  उसका मायका भी जंगल की छाँव में ही है, एक गाँव में ही है, लेकिन वह एक कस्बे के पास है, उससे पक्की सड़क से जुड़ा हुआ है. सड़क जिंदगी में कितने परिवर्तन लाती है यह फूलो को अच्छे से पता है. उसने अपने घर में सबकी जचकी अस्पताल में ही होते देखी है, पर यहाँ उसकी ससुराल में मानते हैं कि जो काम घर-द्वार में रहते हो जाता है, उसके लिए मीलों दूर अस्पताल जाकर रुपये खर्च करना चोंचला है. फूलो यह जानकर तो अवाक् ही रह गई थी कि  यहाँ अस्पताल जाना मतलब मौत का संदेसा ही होता है. यहाँ से किसी को अस्पताल ले जाना हो तो मरीज को डोला डंडी या चारपाई में बांध कर, मीलों ढोते हुए ले जाना होता है इसीलिए लोग जब तक जान पर ना बन आये अस्पताल जाते ही नहीं फिर बच्चा पैदा करने के लिए इतनी दूर न डोला-डंडी में जाना संभव है ना ही पैदल.
  इन नौ महीनों में फूलो एक बार भी अस्पताल नहीं गई लेकिन उसने पूरे समय अस्पताल में जचकी के लिए अपनी जिद बनाये रखी है. कुछ महिलाएं बाहरी चुप्पी के साथ अन्दर से उसके साथ हैं, तो बड़ी-बूढी भयंकर विरोध में. फूलो ने पिछली बार भी अस्पताल में जचकी कराने के लिए घर में कहा था. तब उसे घर में जचकी के समर्थन में कई किस्से सुनाये गए थे. वही किस्से इस बार उसे फिर-फिर सुनाये गए. सास ने कहा कि वह तो लकड़ी लेने जंगल गई हुई थी- जब उसका बेटा हुआ, कुल्हाड़ी से नाल काटी और बेटे को अपनी साड़ी से गोद में बांधे, सिर पर बटोरी लकड़ियों का बोझ रखे घर चली आई. आजी सास ने कहा कि वह तो मड़िया काटने गई हुई थी. वहीँ खेत में फूलो के ससुर हुए. दरांती से नाल काटी और सीने से बांध कर बेटे को घर ले आई. लोग बाद में जाकर फूल नाल लेकर घर आये.
   पिछली बार फूलो की जचगी के समय उसे घर से लगी, एक नयी बनी झोंपड़ी में भेज दिया गया और कहा गया कि, जब दर्द हो तो वह कमरे में रखे, गर्म पानी से नहाये और खुद ही ताकत लगाये, जब बच्चा हो जाये तो आवाज दे दे, जिससे गायतीन जाकर नाल-फूल काटे, बच्चे को नहल- धुला कर पोंछ ले. पिछली बार अपने बच्चे को खो कर फूलो इस बार फिर घर में जचकी का खतरा नहीं उठाना चाहती.
   फूलो की कोख में लगा फल पक चुका है. कभी भी डाल से अलग हो सकता है. आज शाम से ही फूलो को रह-रह कर मीठा मीठा सा दर्द भी हो रहा है. फूलो परेशान है, यूँ शाम को दर्द शुरू होने से. सुबह दर्द होता, तो वह अस्पताल जा भी सकती थी, लेकिन शाम को तो अस्पताल जाना संभव ही नहीं. उसने इस मीठे दर्द को अपने अंतस में थाम लिया. वह जानती है कि यदि उसने दर्द के बारे में बताया तो उस पर नजर रखी जाने लगेगी. अंततः उसे उसी गायतीन से जचकी करानी पड़ेगी. मीठा दर्द सहन करते हुए वह अपने सारे काम निपटाती रही और फिर ढिबरी बुझा कर झोंपड़ी में सोने चली गई. इस आस में कि सुबह तक यह दर्द मीठा-मीठा सा ही रहे.. मज़बूरी ने आस का चोला पहन लिया.
...०...
   यह झोंपड़ी वही है जिस झोंपड़ी में वह पिछले प्रसव के समय तड़प रही थी. अभी इस मीठे दर्द में, तीखे दर्द के जल्दी ना आने की मन्नत में, उसे वे पल शिद्दत से याद आने लगे, जब झोंपड़ी के अन्दर दर्द अपना नुकीला खंजर रह-रह कर उसके शरीर में भोंक रहा था. उन पलों में वह चीखती रही थी; पर कोई अन्दर न आया, बाहर घर के पुरुष चावल लेकर पुकारते हुए, देव को बुला रहे थे. उसकी चीखें उनकी सम्मिलित आवाजों से भी तेज थी. उसकी सास अन्दर आना चाहती थी. उसने गायतीन को कहा भी, कि बहूबाई अकेले नहीं कर पाएगी, उसने कभी ऐसा देखा नहीं है, लेकिन गायतीन ने अपनी सीटी सी आवाज में चिल्ला कर चुप करा दिया.
   चुप हो जाने से होनी तो नहीं टलती, वही हुआ जिसका फूलो को डर था. जब उसकी चीखें हल्की पड़ने लगीं और शरीर शिथिल तो आखिर उसकी सास और गायतीन अन्दर आये, लेकिन तब तक देर हो चुकी थी. आधी बेहोशी में उसने अपने बच्चे को देखा. वह नीला पड़ चुका था किसी चट्टान के टुकड़े सा. उसी पल उसने अपने जाये को पहली और आखिरी बार देखा, फिर मानों लांदा के नशे में हो ऐसे बेसुध हो गई.
   उसकी गोद सूनी रह गई. लेकिन दो-चार दिन बाद ही सुबह वह लकड़ी लेने जंगल जा रही थी, साल बीज बीन रही थी, बकरियां चरा रही थी, चिरौंजी फोड़ रही थी, घर- आँगन बुहार रही थी. हवा की तरह दुःख उसे घेरे हुए था, दुःख से भूख का दावानल नहीं बुझ सकता. भूख लगनी ही है, तो जीवन चलना ही है. उसके जीवन से दुःख झरता रहा लेकिन इसे अंजुरी में भरना भी उसके लिए विलासिता थी. जिंदगी जीने की जद्दोजहद में दुःख के काँटों में पग-पग चलना उसकी विवशता थी. यूँ चलते-चलते आज वह फिर उसी मुहाने पर आ पहुंची है.
   मीठे दर्द के साथ सोने की कोशिश में अलटते-पलटते हुए उसने बूढ़ादेव से मन्नत मांगी कि इस बार तो उसे जचकी से पहले अस्पताल पहुंचा ही दें. वह पहाड़ सा नीला टुकड़ा उसके दिल में धंस गया है. वही हर जगह उसे दिखता है- नीले पहाड़ में, नीले आसमान में, नीले पानी में. वही उसे बार-बार सपने में आता है. महीनों उसका दूध और आँखें बहती रही थी. अब वह इन नीली यादों से छुटकारा चाहती है. बच्चे को अपने गोद में लेना चाहती है, छाती से चिपटा कर दूध पिलाना चाहती है. उसकी नन्हीं उँगलियों की पकड़ महसूस करना चाहती है. उसमें खुद का होना महसूस करना चाहती है.
   यह मीठा दर्द रात भर मीठा ही बना रहे, इस आस में, और बढ़े नहीं इस डर के साथ वह पिछली यादों में डूबती-उतराती रही. डर था फिर से खो देने का. पिछली बार जब उसे कुछ-कुछ होश आया तो वह अन्दर कमरे में छिंद की चटाई पर पड़ी थी. पास ही आग जल रही थी. जिसमें हिरवा पानी खदक रहा था. भीतर खोली में कोसम गड्ढा खोद रहा था. जिसमें उसके विदा ले चुके अंश से जुड़े नाल और फूल गाड़े जा रहे थे. वही कोसम के फूल और नाल भी गड़े हुए थे. दर्द का तूफ़ान तबाही मचा कर जा चुका था. बस अवशेष साथ रहने थे. अब भी साथ हैं उसके फूल और नाल, उसकी नीली यादों में.
    उसकी आया (माँ) भी पिछले साल जमीन के अन्दर सुला दी गई थी. अपनी पूरी गर्भावस्था में फूलो आया का सपना देखती रही थी. सपने में आया कहती थी कि मैं आ रही हूँ तेरे पास. पिछली बार फूलों सिर्फ अपने बच्चे ही नहीं अपनी आया के भी इन्तजार में थी, लेकिन फूलो फिर से अनाथ हो गई. बचपन से उसके पास कोई अपना कहने को था, तो आया थी. बूबा तो बस ताड़ी, सल्फी, लांदा के नशे में डूबे रहते थे फिर जल्दी ही इस दुनिया से ही चले गए. बूबा की याद के नाम पर फूलो को माँ के साथ बूबा के मेनहीर(बस्तर क्षेत्र में मृतकों की स्मृति में बनाए पाषाण या काष्ठ स्तम्भ) के पास जा बैठना ही ज्यादा याद है. माँ धीरे-धीरे बूबा की प्रिय चीजों के इस पाषण स्तम्भ में उकेरे अक्सों – सल्फी रखने वाला तुम्बा, सायकिल, अक्सर साथ रहने वाली टंगिया, तमाखू की डिबिया को छूती रहती, फिर एक लम्बी साँस भर उठ आती. फूलो रात के अँधेरे में झींगुरों की तेज आवाज, पेड़ों के पत्तों की सांय-सांय, बांस के झुरमुट से आती हवा की हूँ...हूँ...हूँ... आवाज में भूत-प्रेत का अस्तित्व पाती. उनसे डरती, तो आया ही उसे अपने छाती से चिपटाये सुलाती. महुए सी खुशबू आती थी आया की देह से. रात आया की खुशबू, नीली याद, और  दर्द के साथ मिल कर फूलो के जेहन में सल्फी के सुरूर के जैसे संकल्प पूरा करने का सुरूर भरती रही.
   जिस रात आया उसे छोड़ कर गयी, वह रात अक्सर उसके सामने पतझड़ के पत्तों सी बिछ जाती है. फूलो को जिन पर न चाहते हुए भी चलना ही पड़ता है. चरमराते पत्तों सा उसका दिल चूर-चूर होता रहता है. रात के अँधेरे में दर्द और संकल्प की लड़ाई लड़ते हुए फूलों आया की यादों के जंगल में विचरने लगी. उस रात पूरे घर में रंग-गुलाल के छींटे पड़े हुए थे. नगाड़ा, ढोल, तुड़मुड़ी, तुरही की आवाज गाँव पार कर आसपास के गाँव में भी मृत्यु का सन्देश देती तैर रही थी. गाँव-घर के लोग आँगन में इकट्ठे हो गए थे. रात उनके नाच-गाने से झूमने लगी थी. सबकी सांसों में महकती सल्फी, लांदा की खुशबू घर-आँगन को भी महकाए हुए थी. आया को आँगन में कटे ठूंठ की तरह लिटा दिया गया था. सिर्फ फूलो ही आया के पास बैठी हुई थी. आया का बर्फ सा ठंडा हाथ पकड़े हुए, बाकी सब रंग-गुलाल से होली खेलने... नाचने-गाने में रमे हुए थे. वे उसे भी नचाना चाहते थे लेकिन फूलो का मन ही नहीं था; बूबा के पास से उठने का.   
  सुबह होते ही आया को गीले कपडे से पोंछ कर सिन्दूर लगा, बिंदी, टिकली लगा कर तैयार कर दिया गया. लोग एक के बाद एक आकर उन्हें कपड़े ओढ़ाते जा रहे थे. आया कपड़ों के ढेर के नीचे छुप गई. तभी किसी को याद आया कि चिन्हा तो दिया नहीं है. फूलो सबसे पास खड़ी थी. उसे ही कहा गया कि वह काजल से आया के शरीर में एक चिन्हा रख दे. जिससे जब आया वापस घर में नया जन्म लेकर आये तो पता चल जाये कि आया आई है. उसने अपनी दो उँगलियों में काजल लिया और आया के कमर में टीका लगा दिया. एक हूक उठी फूलो के दिल में. उसे पूरा विश्वास है कि उसके नीले बेटे के कमर में वही काला निशान रहा होगा और वही निशान इस आने वाले बच्चे के कमर में भी होगा.
   तभी दर्द की थोड़ी तेज लहर आई. फूलो ने उठने की कोशिश की लेकिन सामने वही रात का अँधेरा छा गया. वह फिर आंधी में टूटी पेड़ की डाल सी चटाई में पसर गई. बाहर आंधी चलने लगी है. पेड़ टूटने और बचे रहने के बीच हवा में डोल रहे हैं. फूलो भी नींद और दर्द के असमंजस में डोल रही है. आया उसे सपने में आवाज दे रही है. मीठा दर्द अब मीठा नहीं रहा. दर्द के बढ़ने के डर से राहत के लिए फूलो ने आया के साथ की गर्माहट अपनी यादों में खोजनी चाही लेकिन मिली बर्फ सी ठंडी आया की स्मृति. वह सिहर उठी. वह दुनिया में सबसे ज्यादा प्यार आया को करती थी. उसे डूमादेव याद आये.
...०...
   उस रात की सुबह आया को लेकर फूलो और घर के बाकी सब स्त्री-पुरुष जंगल की ओर चल पड़े थे. फूलो रो रही थी. हलकी बारिश हो रही थी, आसमान रो रहा था. पत्तों से पानी की बड़ी-बड़ी बूंदें टपक रही थी, जंगल भी रो रहा था. आया को जमीन में गड़ा दिया गया, ऊपर से आठ-दस बड़े-बड़े पत्थर रख दिए गए. इन भारी पत्थरों से भी भारी मन से, वह बाकी सब के साथ नदी किनारे पहुंची. नदी समय सी बही जा रही थी. नदी में पांव डालने से पानी की ठंडक मन तक पहुंची और गर्म तवे में पड़े पानी की बूंद सी भाप बन गई. यह भाप आँखों में संघनित होकर आँसुओं के रूप में बरस पड़ी. रास्ते से करंज की डंडी तोड़ ली थी बुआ ने. सबने करंज की दातून घस कर नदी में ही फेंक दी. बुआ ने सबके सर में नदी किनारे की मिट्टी लगा दी. सिर घस-घस कर धो दिया. अब डूमादेव पकड़ने की बारी थी.
    सब नदी के किनारे मेंढक, मछली पकड़ने की कोशिश करने लगे. बुआ सबको उचका भी रही थी, यह कह-कह कर कि, जिसको डूमादेव मिलेंगे, उसको ही भाभी सबसे ज्यादा प्यार करती थी. सब नदी किनारे चिखला में, पत्थर के नीचे, कटाव में हाथ डाल रहे थे. एक मेंढक को पकड़ने अक्का ने हाथ बढ़ाया, मेंढक की पिछली टांग पकड़ में आई लेकिन उँगलियाँ लसलसी चिकनी टांग पर फिसल गई. मेंढक ने छलांग मारी. सामने पत्थर के नीचे टटोलती फूलो थी. मेंढक सीधे फूलो के सर में बैठ गया. फूलो का हाथ अगले ही पल प्रतिक्रिया में अपने सिर पर था. डूमादेव पकड़ने फूलो को मेहनत नहीं करनी पड़ी थी. उसके हाथ में डूमादेव खुद आ विराजे थे. उस दिन वह बहुतों के लिए जलन का कारण बन गई थी, कि आया सबसे ज्यादा उसे ही प्यार करती थी और इतना प्यार करती थी कि डूमादेव खुद उस के पास आ गए. डूमादेव को सम्हाल के सरई पान के दो दोनों के बीच रख लिया गया. सब नदी में सात डुबकी मार निकल आये.
    नदी में डुबकी लगाते हुए जो पानी था वह डुबकी मार के निकलते वक्त नहीं रह गया था. घर भी बदल गया था. घर पर अब आया नहीं थी. उस दिन नदी में डूमादेव का फूलो को मिलना, फिर आया का सपने में आना, बार-बार आना. विश्वास बरगद सा घना हो कर उसकी मन की जमीन में विशाल जड़ों सा समा गया था, कि उसकी संतान उसकी माँ ही होगी. ऐसी प्रतीक्षित संतान को घर पर जचकी करने की जिद ने छीन लिया, उस सीटी सी आवाज वाली गायतीन ने उससे छीन लिया. इसी लिए फूलो इस बार कोई खतरा मोल नहीं लेना चाहती.
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   क्या करे वह? अभी तो पूरब के पंछी ने भी अपनी उड़ान नहीं भरी है. चहुँओर अँधेरा छाया है, लेकिन परिंदे चहचहाने लगे हैं. वह उठी, बिना किसी को बताये गाँव की उस पगडण्डी पर बढ़ गई, जो उसे कस्बे की ओर जाती सड़क से जोड़ती थी. पगडण्डी लोगों के चलने से बनती है यदि लोगों ने उस पर चलना छोड़ा तो पगडण्डी का अस्तित्व भी नहीं रह जाता. पिछली बार गाँव की महिलाओं ने उसे भाग्यशाली करार दिया था, वो बच जो गई थी वरना गाँव में एक घर नहीं, जहाँ से कोई नार बीज से फल बनने के दौर में खोई न हो. फूलो के इन बढ़ते कदमों से गाँव की दूसरी माताओं के लिये एक नयी पगडण्डी तैयार हो सकती है,या बरसों के लिए बंद भी हो सकती है.  फूलो को दोनों बात का अहसास नहीं. वह तो सिर्फ यह चाहती है कि उसकी जचकी अस्पताल में हो.
   वह नंगे पाँव बढ़ती गई,दर्द भी बढ़ता गया. वह बढ़ती रही- चलते, रुकते, दर्द से दोहरे होते, पेड़ों का सहारा लेते, चट्टानों पर बैठते. पगडण्डी के ऊँचे-नीचे रास्तों से होते, बड़ी-बड़ी चट्टानों से घूम कर जाते, छोटी-छोटी चट्टानों को रौंदते कि आगे बढ़ना ही सपने से मिलना है, माँ से मिलना है. उसे चलते जाना है करीब पंद्रह किलोमीटर, आधे से कुछ अधिक रास्ता पार कर वह तब थम गई. जब उसके सामने पहाड़ी बरसाती नदी गरजते तूफ़ान सी बहती मिली. आमतौर पर शांत सी यह नदी कल शाम के आंधी-पानी से बौराई दिखी. जैसे पैर रखते ही किसी फुंकारते नाग की तरह लपक कर उसे डस लेगी. उसे अपनी आया की, सास की बात याद आने लगी कि पेट में बच्चा लिए नदी पार नहीं करते.
    जब यह बंधन उसके संकल्प की राह में बाधा बन कर खड़ा हो गया तो सफल जचकी की आशा ने इस बाधा को भी पंख बना दिया. कुछ ही पलों में वह हरहराती नदी की धारा में एक लकड़ी के साथ बहती हुई, उसे काटने लगी. कई जगहों में आसान प्रसव के लिए तैरने अच्छा माना जाता है, लेकिन यहाँ फूलो के लिये ‘तैरना’ सुरक्षित प्रसव की ‘संभावना’ की, अस्पताल तक पहुँचने की ‘संभावना‘ की अनिवार्य शर्त है. उसे कोसम की शिद्दत से याद आई. अभी यदि साथ होता, तो उसे यूँ धारा से जूझना नहीं पड़ता. उसे तो बस साथ बहते जाना होता, लेकिन उसकी सही मांग में भी तो, कोसम साथ नहीं बहा. अब क्या उसका सहारा याद करना...नदी को काटने की कोशिश करते वह नदी के साथ बहती रही, नदी को काटती रही.
   नदी पार करते ही सामने सीधी खड़ी चट्टानें मिलीं, वो जगह जहाँ से सब कस्बे तक जाने के लिये नदी पार करते हैं, पीछे छूट चुकी है. कमजोर को दुनिया धकेलती है. नदी भी तो दुनिया का ही अंग है. दर्द में तैरना कितना मुश्किल होता है; ये कोई अभी फूलो से पूछे. बढ़ी दूरी, साधन का अभाव, दर्द का बढ़ना, राह में अकेले में प्रसव की आशंका... उसे भी अपना संकल्प, अब एक जिद के रूप में दिखने लगा. अब वापस जाना भी संभव नहीं. शायद अब तक घर में उसकी ढूंढ होने लगी हो. वापस ले जाये जाने के डर को थामे हुए, वह पीछे जाने की जगह चट्टानों से लड़ गई. फूला हुआ पेट संतुलन बनाने के लिये झुकने से रोकने लगा... साथ ही दर्द से कमर दोहरी होने लगी... थकान से हाथ पैर कांपने लगे... पर जंगल का जीवन इन सब कठिनाइयों से जूझना ही तो है.
  अंततः वह चट्टान के ऊपर पहुंची तो सामने चमकता सूरज दिखा. वह मुंह अँधेरे चली थी, अब यह सुनहरा सूरज देख फूलो ने तुरंत पीछे मुड़ कर देखा. कोई समझे न समझे कोसम तो जरुर समझ गया होगा. न सिर्फ समझ गया होगा, बल्कि कस्बे के लिए निकल भी गया होगा. कोसम उस तक पहुंचे उसके पहले ही उसे अस्पताल पहुँच जाना है. फूलो जैसे-तैसे कर चट्टान की उतराई पार करने लगी. उसे अपनी  मंजिल साफ़ दिखने लगी तो एक आशंका उभर आई. एक डर उसकी सवारी करने लगा कि उसने इतना बड़ा कदम उठा तो लिया है, लेकिन यदि अस्पताल में कोई नहीं मिला तो क्या होगा? गाँव में कहते हैं, कि कुछ साल पहले किसी की जचकी के लिए अस्पताल गए थे, लेकिन वहां कोई मिला नहीं. उस बहुबाई ने वापसी की राह में ही दम तोड़ दिया. सब कहते हैं कि उसने कुलदेवी पर भरोसा न कर अस्पताल पर भरोसा किया, इसी का देवी ने दंड दिया. तब से गाँव के किसी ने जचगी के लिए अस्पताल जाने की हिम्मत ही नहीं की. एक वही है जो यूँ अकेले ही निकल आई है. जाने क्या होगा.
   नदी पार कर लगभग एक घंटे और चलने के बाद उसे कच्ची सड़क मिल गई और तुरंत ही बड़े भाग्य से कस्बे को जाती एक जीप भी मिल गई. यूँ भी ड्राईवर आधा बाहर लटक कर ही गाड़ी चला रहा था लेकिन उसकी हालत को देखते हुए ठूंस-ठूंस कर भरी जीप में भी जगह बन ही गई. फूलो के चेहरे में दर्द हर कुछ देर में, किसी नुकीले पत्थर की खरोच सा उभरने लगा. जीप में बैठे लोगों की प्रश्न भरी नजरें, तरस खाती नजरें, अपनत्व भरी पूछ-ताछ, उसे अकेले देख खुसुर-पुसुर, उसे नुकीले पत्थर बन खोदने लगीं. उसके जवाब उनकी आँखें फाड़ दी. ऐसा दुस्साहस! दर्द की तीव्रता में बढ़ोतरी, आवृत्ति के समय में कमी, लोगों की प्रतिक्रिया और उसके खाली बैठने ने तेजी से चलती जीप को पैदल चलने से भी धीमा बना दिया. चौथाई दूरी उसे मीलों लम्बी लगने लगी.
  किसी तरह बूढ़ा देव को याद करते, वह कस्बे तक पहुंची. ड्राईवर ने प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र के सामने ही गाड़ी रोकी. मंजिल तक पहुँचने का अहसास न सिर्फ चैन बल्कि थकन भी साथ लेकर आता है. दर्द से पस्त होते हुए भी उसे राहत हुई कि अब वह अस्पताल पहुँच चुकी है. अब उसका बच्चा सुरक्षित रहेगा. अब उसने अपने बच्चे को, अपनी माँ को पाने की सारी बाधाएं दूर कर ली हैं. स्वास्थ्य केंद्र नीम की छांह में खड़ा उसे पुकारता लगा.
 नीम फूलों की खुशबू लिए आस की सुहानी हवा उसके होठों के दर्दीले स्मित हास में, उसके अश्रु विगलित नयन के कोरों में, उसके चेहरे के समंदर में बहने लगी. वह अपनी सारी शक्ति अपने पैरों में बटोर, आगे बढ़ी. तभी एक ताला उसकी आशाओं पर पाला सा पड़ गया. उसने देखा की अस्पताल के दरवाजे पर ताला जड़ा हुआ है. अब तक समेट कर रखी हिम्मत, जर्रा-जर्रा बिखर गई. वह स्वास्थ्य केंद्र की सीढ़ियों पर दर्द से दोहरी हो लेट गई. अब तक अन्दर ही अन्दर जज्ब होती, उसकी दर्द भरी चीखें उस प्राथमिक स्वास्थ केंद्र की दीवारों को कंपाने लगीं. इन चीखों में दर्द था – शरीर में उठती लहरों का, दर्द था डर का- खो देने का डर, दर्द था घरवालों से नजरें न मिला पाने का, गलत साबित हो जाने का.
   उसके आसपास भीड़ जुटने लगी. अकेली महिला को तड़पती देख लोग पहले तो एक-दूसरे को ही प्रश्नों भरी नज़रों से तौलने लगे, प्रश्न पूछने लगे, फिर अजनबियत, हिचकिचाहट की बाधा पार कर इंसानियत की लहर उठी, तो कुछ सहृदय महिलायें आगे बढ़ी.
  फूलो की दर्द से भींचती आँखों ने लोगों की ओर देखा. उसके दिल में घरवालों के विरोध की लहर परिस्थिति से टकरा कर छिन्न-भिन्न हो गई. उसने बुढादेव को दिल के भीत्तर से याद किया... मनाया कि उसका बच्चा उसके गोद में आ जाये. उसकी आँखों में डर ही डर उभर आया. कोई शुरुवात न कर सकने का डर, स्वतंन्त्र निर्णय न ले सकने का डर. फूलो के कदमों से गाँव की दूसरी माताओं के लिये खुलती एक नयी पगडण्डी कुछ तथाकथित सेवकों की कर्तव्यविमुखता से कोसों दूर चली गई कि स्वास्थ्य सेवा की जमीन ही चेतना के अंकुर का साथ ना दे तो अकेला अंकुर वृक्ष नहीं बन सकता. जाने कितने बरसों में कोई फूलो इतनी हिम्मत कर सकेगी. तब तक जाने कितनी और कोखें उजड़ेंगी.
पीछे नेपथ्य में प्रश्न- उत्तर के तलवारों के वार से गूँजते रहे...
कोन हे?
अकेल्ला हे?
कइसे अकेल्ला आइस हे?...
अस्पताल कतना बजे खुलथे?
अभी तो ग्याराहेच बजे हे.
डाकटर तो बहिरेई रहथे, नरस, कंपाउंडर कभी कभार खोल थें.
अरे... अरे अस्पताल तभी बने खुल्थे जब कोनो साहब या मंतरी दौरा आथें.
अरे नहीं... आजई बंद हवे... वो नरस के घर शाइद मेहमान आये हावे.
कोनो ला भेजा... बुला दिही नरस ला... पासइ घर हवे... बलाए ले आ जाही.
ना...अभी इस पगडण्डी का खुलना भविष्य की कोख में जरुर चला गया है लेकिन आशा मटियामेट नहीं हुई है. फूलो की चीखें अब लहरों की तरह आने लगी. उसे घेरे महिलाओं की पंक्ति से टकराने लगी. किसी ने अस्पताल का ताला तोड़ दिया. शायद अस्पताल का ही कोई है. लोगों ने फूलों को उठने के लिए सहारा दिया. उसने अस्पताल के अन्दर कदम धरा. बिन देवी के गुड़ी में कदम रखने सा अहसास हुआ उसे. अब वह अस्पताल के टेबल में है. जहाँ वो आना चाहती थी; अब वह वहीँ है. लेकिन डॉक्टर नहीं है. तभी पास खड़ी महिलाओं ने किसी के लिए जगह खाली कर दी.. माहौल में राहत की खुशबू समां गई. एक सुकून तारी हो गया उस पर.  महिलाएं और नर्स उसे जोर लगाने कह रही हैं. इस सुकून की शक्ति को उसने जोर लगाने के लिए बटोर लिया.
   उवां... उवां... उवां... अगले ही पल ने फूलो के बैसाख की सूखी जमीन से तपते मन में मानसून की बारिश कर दी. वहां सब के मन में ख़ुशी कदमताल करने लगी. बाहर पहुँच चुके कोसम के दिल में इस आवाज से, आशंकाओं, शिकायतों की जगह ख़ुशी के अंकुर उगने लगे. फूलो की प्रतीक्षित संतान की उवां... उवां... उवां... की आवाज, कोसम की लाख भर की बंधी मुट्ठी के साथ, उसके गाँव के साथ, सुदूर के कई गाँव तक उछलते कूदते पहुँचने लगी. मानों जंगल की घास से भरी जिस जमीन पर फूलों ने नौ माह पहले अपने कदम धर दिए थे, अब उस पर पीछे आने वालों के कदमों से जंगल में एक नयी पगडंडी का आभास होने लगा है. बस कही-कही जमीन को अब भी यह समझना बाकी है, कि वही इस पगडंडी का आधार है.


परिचय :
नाम- श्रद्धा थवाईत
जन्म स्थान- जांजगीर
वर्तमान निवास- रायपुर
साहित्य के क्षेत्र में उपलब्धियां विभिन्न प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में कहानियाँ प्रकाशित, भारतीय ज्ञानपीठ नवलेखन पुरस्कार २०१६ प्राप्त एवं साहित्य अमृत युवा हिंदी कहानीकार प्रतियोगिता २०१५ में प्रथम स्थान प्राप्त.
पता- श्रद्धा थवाईत
एफ-5, पंकज विक्रम अपार्टमेंट
शैलेन्द्र नगर, रायपुर, छत्तीसगढ़
पिन कोड- 492001
मोबाइल नं.- 09424202798