तुम्हारा शहर

घर से निकला आदमी
देहरी के बाहर
पाँव रखते ही
खो जाता हो
भीड़ में

गाड़ियों में
आगे निकलने की
सोची-समझी होड़ हो

घरों की नालियां
बाहर निकल
मिल जाती हों
बड़े नाले में
बनने को नहर

क्या तुम्हारा शहर भी
कुछ ऐसा ही है

विरासत

जानता हूँ
तुम्हारे यहाँ
महफिलें नहीं सज रही
बचे हैं बस
टेंट के टूटे खंभे
फटे टाट और
कुछ कनस्तर

पता है
तुम कभी भी
घोषित कर सकते हो
इसे राष्ट्रीय विरासत

पट्टिकाओं पर
तुम होगे
तुम्हारे पुरखे भी
ठहाकों की चर्चा
सब चाव से सुनेंगे
पसीने की गंध
कहीं नहीं होगी