इंतजार

शहर के कोलाहल से दूर
एकांत वृद्धाश्रम में
माँ की साँसों के धागे उलझ रहे
गोता लगाने को तैयार

उम्मीद की कोई किरण नहीं
पर आँखें दरवाजे पर जमीं
शायद अभी भी है इंतजार
किसी चिंतित, परेशान चेहरे की

हिसाब

रक्त–बंध टूटता हुआ,
हर अपना छूटता हुआ।

शीत युद्ध कब तक,
जिंदा हैं दोनों जब तक।

अब एक को कोई मारे,
या निज ही उसे संहारे।

दूसरा तब राज करेगा,
कुछ ऐसा काज करेगा।

खंडहरों को भी ध्वस्त कर
अपना हिसाब करेगा।