स्वाति बरनवाल की कविताएँ


 

स्वाति बरनवाल का लेखकीय दखल कविता, कहानी एवं आलोचना के क्षेत्र में है। वह हिंदी साहित्य की गहरी अध्येता है। यह अध्ययन उनकी रचनाओं में दिखता है।  वहीं एक चित्रकार की हैसियत से वह मन में उभरते बिंबों को अपनी कूची से जीवन्त कर देती है। कलम एवं कूची का यह अद्भुत संगम उन्हें विशेष बनाता है। शीघ्र उनका पहला कविता-संग्रह हमारे बीच आनेवाला है। आइये, उस संजीदा रचनाकार की संवेदना से पगी अर्थवान कविताओं से मिलते हैं।


1. स्पर्श की भाषा

क्या रिश्ता था

जो समझ नहीं आया अबतक

खून का नहीं था

लेकिन सहज ही चला आया था जीवन में

ढूंढने नहीं गई थी।


दुख में हिम्मत, लेकिन

सुख का साथी 

नहीं कहा जा सकता 

स्वार्थी नहीं, पर 

निस्वार्थ जैसा ही कुछ था

नहीं कहा जा सकता 

विचारों में कोई मेल नहीं

मतभेद बराबर बना रहता 

उम्र और अनुभव से परे था वो

क्या था मालूम नहीं।


मीठी हँसी जो अपनी महक बिखेर देता था

मन के कच्चे प्रांगण में

स्पर्श की भाषा

मूर्त होते हुए भी अमूर्त रहा समूचा...


एक-सा नहीं होता हर दिन

लेकिन वो साथ रहा


स्मृतियाॅं बसी हुई हैं उसकी

होंठों पर नाम है 

पर बुदबुदाया नहीं जाता

यह हँसी, होंठों पर उसकी स्मृतियों की है

जो रहकर रहकर एकदम शांत और सुस्त कर देती है 

एक क्षण को।


समझने की कोशिश 

बेकार जाती है बार-बार।


वो निश्छल आकाश-सा 

नील में सनी, उसकी कमीज

वो सफेद कॉलर 

हर तरह के रंग घुल सकते थे उसपर

क्या कुछ बाकी था ?

संदेह है मुझे इस पर।


बंधना चाहती थी उससे

चाहता तो वो रुक भी सकता था 

मगर जाते-जाते 

तमाम वर्जनाओं को तोड़ने का वादा लेकर गया मुझसे।


2. अनारक्षित कमरा


ये हमारा अनारक्षित कमरा है 

जिसकी खातिर दिनों दिन बढ़ती जा रही है प्रतिस्पर्धाएं 

कामचलाऊ घड़ी और

दीवारों की सीलन से 

जिसकी छत अब मकड़ियों के जाल में कैद है। 


हवा का स्पर्श पर्दे की कान गुदगुदाता 

तो कभी गौरैया की चहचहाहट से

धूप खिल-खिलाकर हॅंसती है 

पाँवपोश की जमीं पर।


अलमारी की किताबों के 

आड़ में रखी 

सल्फास और फिनायल की गोलियां 

बचा लेती है उन्हें 

दीमकों के 

संगी-साथियों के अत्याचार से।


इस कमरे की ईंटे 

मेरे पिता की पसीने से जुड़ी है

मैंने उनकी संपत्ति का नमक चखा है


स्वाद के एक टुकड़े में

आरक्षित कमरे की संभावना है 

जो बार-बार, लौट आने को विवश करता रहेगा।


3. ईशान कोण


उनकी दाल हमेशा गलती रही

और वे मथते रहे समूचा व्यक्तित्व 

निंदा की मथानी से।


उनके साथ साथ ही चली आई थी 

कोई अज्ञात पीड़ा...


जाने वाले हमेशा

अतिथि की तरह आते हैं 

जिनकी कपड़े हमेशा टंगे रहते हैं हैंगर पर

उनकी ट्रेनें हमेशा निर्धारित तिथि पर 

खड़ी रहती है 

किसी घुमावदार मोड़ पर।


उनके चले जाने पर कोई हर्ज नहीं 

शोक नहीं।


उसी ट्रेन की सीढ़ियों से हौले से

उतरता है एक अमुक व्यक्ति 

बंद गले का पैरहन 

और दाएं हाथ में सूटकेस लिए

कलाई पर बंधी घड़ी भी 

इसी बेतरतीबी से देखता है कि अपनी नियत समय पर ही 

अपने गंतव्य को आ पहुॅंचा हो।


एक अनजाना और अनचाही प्यास लिए

बढ़ाने लगता है हमारे साथ

कदम दर कदम

और सदा-सदा को वास कर लेता है

ईशान कोण में 

जिनकी विदा की कल्पना भर से लगता है 

दिल के देवता कूच कर गए।


4. मँझधार में फंसी एक नाव


गहराती मन की मिट्टी-जल में 

जो अचानक अँखुआ उठे थे कुँईं के बीज 

आज धुंधलाती सी बिखरी पड़ी हैं 

चहुॅंओर।


गमकते स्वप्न से टकराती जा रही धूप की राक्षसी हँसी 

या उम्मीदों का पुलिंदा फट जाने पर

पंखे की रिरियाते हवाबाज़ी से

मछलियाॅं करती रहीं कलह

कि आखिर कब तक ये द्वंद पानी तक सीमित रह सकता है।


स्वप्नलोक से जैसे अभी अभी उठाकर फेंक दी गई हो सड़क की गर्म देह पर


प्राणहीनता का बोध 

भींगाती है स्मृतियों की बौछार से 

संवेदना के श्वेत रंग पर आ चिपकता है राख, बालू, मिट्टी का बोझ...


असहनीय है 

अंगूठे के पोर से चींटियों की दौड़।


सिरहाने पड़ी हुई 

किताब और 

उसके अंदर पड़ी हुई है उसके लिखे खत

जिसमें वादों का एक अंबार-सा झड़ रहा है दिनौंधी हुए 

आँखों में उग आए स्मृति पटल पर।


कलम नहीं चलती 

थककर, रुकने का इरादा तय कर चुकी है 

कि अब और नहीं

हो चुका जो नहीं होना था 

जो होना है वो कैसे भी हो जायेगा

कहकर कराहती है 

जैसे नदी के मँझधार में फंसी 

एक नाव।


5. दीवार की परछाइयाँ


चाॅंद की दूधिया अंजोरिया में

हम दोनों कितने पास होंगे

कि देर रात ढूॅंढते रहेंगे 

एक के बाद 

बार-बार आँखो में उतरने के बहाने।


टूटते उल्कापिंडों से माॅंगते रहेंगे मन्नतें कि 

सदा घटती रहे ऐसी घटनाएं...


आसमान के बैंजनी एकांत तले

तुम टाॅंक देना 

एक सितारा माथे पर

फिर टिका कर अपना माथा 

एक दूसरे के कंधे पर

सुनते रहेंगे 

ध्रुव तारा और सप्तऋषियों की स्नेहवर्षा में

जुगनुओं की बातें...

कि एकांत में ऐसा क्या कहते है पेड़

जो भूकभूकाती रहती है

सिहरती शाखाओं पर!


रातरानी की राग 

जो बिछड़ने नहीं देती 

झुरमुटों को अपने आलिंगन पाश से

जिसकी धुन पर थिरकती रहती है 

दीवार की परछाईयाॅं 

जो एक-दूसरे में बसे है एक-दूसरे से अधिक।


6. प्रेम का डायनेमो


जब भी हम साथ होते हैं 

दुकेले नहीं होते

गहराती रात में भी नहीं,

हमारी समीपता में कोई तीसरा, चौथा और पाॅंचवां होता है

संगीत, सुगंध और उत्सव के रूप में।


हमारा साथ समाज के 

तय मापदंडों पर निर्भर नहीं करता

वे परिवार के अनन्य सदस्य जैसे ही

वे आकाश में तैरते हैं 

चाॅंद, तारे और जुगनुओं की नाव बनकर


काॅंच की चूड़ियाॅं‍ और पायल की खनखनाहट 

एकांत में संगीत मालूम पड़ते हैं


हमारे भीतर के उजाले में 

संयोग, तुरपाई करता है

मौन लिपि में उधेड़बुन की 


आम, महुआ और इमली

की मादकता, 

चीख-चीखकर बतलाते हैं

सुनो!

जीवन की सारी बातें

अनावश्यक हैं इस क्षण के आगे


हमारी हथेलियों की आधी-अधूरी रेखाओं से उगा चाॅंद आशाऍं सॅंजोता।


हम दोनों का साथ 

हमारा सामर्थ्य गढ़ता है 

और सामर्थ्य, प्रेम का डायनेमो है।


7. तेरे स्वप्न बड़े हों


उन दिनों एक अज्ञात डर में,

बाल नोचती रोज़-रोज़,

थोड़ी-थोड़ी करके अपनी गुंथी चोटियाँ काटती,

चिल्ला-चिल्लाकर रोने को होती, तब तक नींद खुल जाती।


नास्तिक नहीं हूँ, मगर सीताराम-सुमिरन नहीं भाता,

लंबे बाल खूब पसंद हैं, लेकिन छोटे बाल संतुष्टि देते हैं।


एक समय बाद

जीवन में पसंद नहीं, जरूरत मायने रखता है।


मुझे घिन आती है उन यादों से,

जो गुजरकर भी चिपका रहता है जोंक की तरह छाती पर।


भावनाएं भी बर्फ की तरह पिघलती,

तो कभी बाढ़ के पानी की तरह तट का सीना चीर दृष्टा को मिटा देना चाहती।


जो एक स्वप्न की तासीर देकर डकैत बन चुके,

जो कभी कहते थे, "जा, तेरे स्वप्न बड़े हों।"


8. अनिवार्यता


वे विरक्ति के दिन थे

जहां पक्की उदासी घर में पैर जमाएं बैठी थी


वे कच्ची भावनाओं की पक्की सिलाई 

उघड़ने के दिन थे 

जरा सा 

स्पर्श पाते ही जाती रहती थी 

मन से मलिनता।


खुद को व्यस्त रखने की कोशिश में

हर दिन नये- नये प्रयोगों से 

कमरे की दीवारें सजी होतीं और किताबें बुक सेल्फ में सुसज्जित न होकर 

बिखरी रहती थी 

चटाई पर, मेज पर और बिछावन पर।


विवशता और विरक्ति की घनी उदासी में 

हम टकराये

जहाॅं सबसे अधिक जरूरत थी हमें 

एक-दूसरे की।


सुन्दर भविष्य के लिए तमाम रंग संजोए, 

ख़्वाब बुने कि हमारे जीवन में 

एक-दूसरे की उपस्थिति 

पाॅंचवीं कक्षा से दसवीं कक्षा की सिलेबस जैसी है 

जिससे ऊबकर भी 

टूटकर और डूबकर सहेजे रखना जीवन की पहली अनिवार्यता होगी।


9. ओ मेरी अच्छी आत्मा


अगर सच कहूॅं तो 

क्या तुम मानोगी कि अक्टूबर की आख़िरी  

सपनीली

रात की पहली बारिश में 

बंद खिड़की को प्रवेश-द्वार बनाती 

पेड़ों से बेख़ौफ़ इत्र चुराती 

इठलाती, इतराती, चिकमिकाती 

हवा का स्पर्श ही तुम्हारा स्पर्श है 

जो छू कर तुम्हें अभी अभी मेरे सिरहाने लौट आया है

सस्नेह!


सुनती हो!

तुम्हें जब भी मेरी याद आए तो 

लौट आना चाहे अमावस की काली रात हो या पूर्णिमा की।


तुम आना 

तुम लौट आना

मेले से घेवड़, जलेबी और बताशे देने के खातिर 

कि तुम अकेली अन्न का एक दाना नहीं चखती 

तुम लौट आना कब्रिस्तान से बाबा की अस्थियां लेकर 

कि अकेली नहीं जा सकती गंगा में बहाने 

कॉलेज की किताबों में जिल्द लगवाने या अस्पताल के कोने में पड़ी बीमार, अपाहिज बुढ़िया के लिए एक वक्त की रोटी के लेने के बहाने।


अनाथालय से किसी अनाथ बच्चे को पुचकारते लौट आना

कि हमसे बेहतर नहीं हो सकता कोई 

वालिदैन 

नहीं दे सकता इतनी अच्छी परवरिश

नहीं दे सकता इतना लाड़-दुलार जिसमें बिगड़ने से ज्यादा संभावना हो बेहतर मनुष्य बनने की।


ओ मेरी अच्छी आत्मा!


पारे से छितराते जीवन को सहेजने के लिए ही सही

तुम लौट आओ मुझमें।


इस बार सच में लौट आना आकाश की धवल चादर ओढ़े 

जिनकी दीवारें पुत सकती है

पिछली सालों की साथ की हर 

काली-कमियाॅं से लीपकर 

प्रेम के हर रंग से सराबोर।


तुम्हारे लौट आने को मैं तुम्हारा आना समझूॅंगा मेरी जान।


10. जतन


धरती के गर्भ में अँखुवाते 

रिश्ते नहीं जानते कि

आसरा पायेंगे या

घुल जायेंगे मिट्टी-जल-कण में


फिर भी वे उग आते हैं

जैसे आती है टहनियों पर

चुप्पी साधे कोमल पत्ते, रंग-बिरंगे फूल और कच्चे फल


हम कच्चे उम्र के साथी 

जानते हैं चुप्पी की घूँट घोंटकर

एक साथ खिलना, पकना और झरना


उम्र कपास की फाहे की तरह 

नित उड़-उड़ रही है

धूप, दीप, फूल, गंध में

या हो चुके अवकाश में


लेकिन हर बार का तुम्हारा

मौत के मुॅंह से मुझे खींच लाना 

चौड़े और ऊॅंचे कंधे देकर

वक्त जरूरत के बीच 

पिता की तरह जतन कर लेना 

स्त्री-मन की बंजर भूमि को थोड़ी अधिक आर्द्र और नर्म बनाने की कला है।


लेखक परिचय :


बिहार के पश्चिमी चंपारण जिले के गाँव कठिया मठिया में 15 मार्च 2001 को जन्मी स्वाति बरनवाल ने एम. ए. (हिंदी) तक शिक्षा प्राप्त की है। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में उनकी कविताऍं और आवरण चित्र प्रकाशित होते रहे हैं। साथ ही कई पुस्तकों के आवरण पर उनके चित्र उनकी कला को अर्थवत्ता प्रदान करते हैं।


संपर्क: 

ईमेल: barnwalswati63@gmail.com

साझी विरासत के नाम


हर अन्याय, शोषण तथा वर्चस्व, चाहे वह सामाजिक, सांस्कृतिक या राजनीतिक हो, उसके प्रतिपक्ष का विचार ही प्रतिरोध है। यह प्रतिरोध किसी भी व्यवस्था, जो समाज को नियंत्रित करता हो या किसी खास वर्ग समूह का समर्थन करता हो, का प्रतिकार करते हुए उसका विकल्प ढूंढने की कोशिश करता है। इसी वैकल्पिक संस्कृति की ऐतिहासिक धारा का प्रवाह ही प्रतिरोध की संस्कृति है। मौजूदा समय में समाज की रूढ़िवादी विचारधारा एवं सरकार की तानाशाही प्रवृत्ति प्रतिरोध की शक्तियों का दमन कर रही है और सत्ता के खिलाफ उठती आवाज पर अघोषित सेंसरशिप लगाया जा रहा है।

       वर्तमान समय में "प्रतिरोध की संस्कृति" पर विचार–विर्मश हेतु  दिनांक 7 जुलाई 2024  को गया में 'साझी विरासत के नाम' से एक साहित्यिक आयोजन किया गया। इस अयोजन को वैचारिक सत्र, शीर्षक‘प्रतिरोध की संस्कृति और लेखक’, एवं काव्य गोष्ठी के रूप में  संपन्न किया गया। वैचारिक सत्र की अध्यक्षता 'हंस' पत्रिका के संपादक और कहानीकार संजय सहाय, कृष्णचन्द्र चौधरी, यादवेंद्र ने किया। संयोजक की भूमिका में प्रत्यूष चंद्र मिश्रा, चाहत अन्वी एवं वरिष्ठ कवि सत्येन्द्र कुमार रहे। वक्ताओं में अली इमाम, अंचित, महेश कुमार, उर्दू के लेखक सगीर अहमद आदि शामिल थे। पहले सत्र का संचालन युवा कवयित्री चाहत अन्वी  ने किया।

       प्रतिरोध की संस्कृति का लंबा बौद्धिक इतिहास रहा है। इसी पर विचार करते हुए वक्ताओं ने उसमें प्रतिरोध के विभिन्न स्वरूपों की चर्चा की। वक्ताओं ने विभिन्न मोर्चों पर चल रहे प्रतिरोध के उदाहरण दिए। 

       कवि अंचित ने लेखकों के मूल दायित्व पर बात करते हुए तथ्यों के दस्तावेजीकरण करने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि स्मृति का ह्रास हमारे समय में जितना हुआ उतना कभी नहीं हुआ। जो चीज जितनी जल्दी चर्चा में आती है, उतनी ही जल्दी चली भी जाती है। हमारे पास भाषा का हथियार है जिससे हम हर हमलावर के खिलाफ प्रतिरोध कर सकते हैं। अंचित ने शेक्सपियर के नाटकों के उदाहरण देते हुए समझाया की उनकी रचनाओं में उपनिवेशवाद के प्रति विरोध खुल कर सामने आता है। उन्होंने ब्रिटिश भारतीय लेखक सलमान रुश्दी की आत्मकथात्मक पुस्तक, नाइफ: मेडिटेशन आफ्टर एन अटेम्प्टेड मर्डर का उदाहरण भी देते हुए कहा कि अगर उनके हाथ में हथियार है, तो हमारी भाषा ही हमारी सबसे बड़ी ताकत है। आगे वो फैज़ की दृष्टि को समझाते हुए कहते हैं कि फैज़ के हिसाब से क्रांति का तात्पर्य लेखनी में प्रेम, और व्यवस्था के बदलाव से है और तमाम साहित्य कहीं कहीं इसी के इर्द गिर्द घूमता है। 

        अंचित ने प्रतिरोध के लक्ष्य और उद्देश्य पर जोर देते हुए कहा कि अगर इसकी व्यवस्था में सुधार में भूमिका न हो तो प्रतिरोध का कोई महत्व नहीं है। उन्होंने कहा की यह विभाजनों से लड़ने का समय है नहीं तो हमारे भीतर हिंसा कैसे पनपती जायेगी उसका आभास हमें खुद भी नहीं हो पाएगा। सबसे पहले हमें अपने दायित्व को समझना होगा, मध्यवर्गीय संभ्रांतता के खिलाफ सत्ता और पूंजी के बनाए भ्रम को तोड़ना होगा, और सबसे महत्वपूर्ण पढ़ने की संस्कृति विकसित करनी होगी।

       युवा आलोचक महेश कुमार अच्छे अध्येयता और चर्चित वक्ता के रूप में जाने जाते हैं। उनके हिसाब से लोग सेलेक्टिव प्रतिरोध करते हैं, अपने अपने गुटों में बंध के रह जाते हैं, एकजुट होकर सामने नहीं पाते। हम लड़ाई व्यक्ति के रूप में तो लड़ लेते हैं लेकिन संगठन के रूप में नहीं लड़ पाते। महेश कहते हैं कि अगर हम खेमे में बॅंट कर काम करेंगे तो कभी मजबूत प्रतिरोध की संस्कृति खड़ी नहीं कर पाएंगे। इनकी दूसरी चिंता इस रूप में है कि जो जमीनी समस्या है वह बौद्धिक वर्गों के पास नहीं पहुंच पा रही और ही बौद्धिकों का चिंतन आम जनता तक सही रूप में घुल मिल पाता है। हम अकादेमिक रूप से तो गोष्ठियों, संगठनों का आयोजन तो करते हैं लेकिन हक की लड़ाई में सड़क पर नहीं उतर पाते। इन्होंने कहा कि बेहतर हो हम अपने अंतर्विरोधों को समझें, अपनी कमियों को जानें और आंतरिक आलोचना करते हुए साझे तरीके से अपनी लड़ाई लड़ें।   

         लेखक यादवेंद्र ने दुनियाभर के प्रतिरोध के स्वरूपों पर बातचीत करते हुए अमेरिका में लेखकों का प्रतिरोध, ईरानी और फिलिस्तीनी कविताओं और संस्मरणों को केंद्र में रखा। खासकर उन्होंने वहां सत्ता किस तरह काम कर रही है और महिलाओं की भूमिका किस रूप में रही है, इसे विस्तार से समझाया। अली इमाम ने अल्पसंख्यक समूहों के मुद्दों पर बात करते हुए कहा कि वे वर्ग जिनका सबसे ज्यादा तुष्टिकरण किया गया उनकी हालत सबसे खराब है। उन्होंने कहा कि सांप्रदायिकता एक बड़ा मुद्दा है, इस पर भी विचार किया जाना चहिए। अहमद सगीर ने दुःख प्रकट करते हुए कहा की बहुत कम लोग अब मुखर रूप से प्रतिरोध में शमिल हो रहे हैं। उन्होंने हिन्दी–उर्दू लेखकों को जोड़ने और एकजुट होने की राय दी। जलेस जिला के अध्यक्ष कृष्णचंद्र चौधरी ने साझी संस्कृति पर विस्तार से अपनी बात रखी और इसे सहेजने पर जोर दिया। प्रलेस गया के सचिव परमाणु कुमार की राय थी की छोटे स्तरों पर भी बड़े प्रयास किए जा सकते हैं। प्रतिरोध की संस्कृति का निर्वाह न केवल लेखकगण बल्कि पूरे समाज का है, देश की जनता का है।

        हंस के संपादक संजय सहाय ने अध्यक्षीय वक्तव्य देते हुए कहा कि लेखक की विज्ञान और इतिहास पर पैनी दृष्टि होनी चाहिए। प्रतिकार अपने लोगों का भी करना चाहिए और भटकते कदम को सही रास्ते पर लाना चाहिए।  लेखन में बहस होनी चाहिए और आत्मलोचना के लिए भी तैयार होना चाहिए अगर ऐसा नहीं होता है तो वह लेखन नहीं कीर्तन है। साहित्य मूल रुप से चिंतन का विषय है। यह हमारी विरासत है। लेकिन लेखकीय संगठनों में नई  पीढ़ी सम्मिलित नही हो पा रही है। युवाओं को मौका देना चाहिए ताकि प्रतिरोध का स्वर जीवित रहे।



दूसरा सत्र कवि गोष्ठी का था। इस सत्र संचालन कवि प्रत्यूष चंद्र मिश्रा ने किया। इसमें श्रीधर करुणानिधि, अंचित, अरविंद पासवान, वरिष्ठ कवि सत्येन्द्र कुमार, चाहत अन्वी, बालमुकुंद, सत्येन्द्र कुमार आदि शमिल थे। गया कॉलेज के सहायक प्रोफ़ेसर श्रीधर करुणानिधि ने जल-जंगल-जमीन की लूट पर अपनी कविताएँ पढ़ी। कवि अरविंद पासवान  ने पूंजीवाद के विकृत स्वरूप और अंबेडकर के महत्व पर लयात्मक कविताएँ पढ़ी। कवि-अनुवादक अंचित  नेप्रेमिका का भाईकविता के बहाने मध्यवर्ग के पुरुषों की मानसिकता को उघाड़ते हैं प्रलेस के जिला सचिव परमाणु कुमार  ने जनसरोकार से लैस कविताएँ पढ़ी। उन्होंने बराबरी और जनता के मुद्दों से जुड़ी कविताओं के महत्व को रेखांकित किया। गया की लेखिका और कवयित्री, कलाकार  टि्वंकल रक्षिता  नेरंडियाँकविता के माध्यम से स्त्रियों की दुर्दशा और दैहिक विमर्श को मार्मिकता से प्रस्तुत  किया। बालमुकुंद  ने ‘एहि नव भारत में’ और ‘भास’ शीर्षक की दो  बेहद खूबसूरत मैथिली कविताएँ पढ़ी जिसमें युवाओं की मनःस्थिति, अंधभक्ति, अनैतिक , नेताओं की स्थिति व देश की बदलती परिस्थितियों पर गम्भीर चिंतन शामिल था। कवयित्री चाहत अन्वी ने अपनी कविताओं में बच्चों की दुनिया की भयावहता को रेखांकित किया। उन्होंनेफूलजानकविता से वंचित समुदाय के बच्चों की चिंताओं को स्वर दिया। कवि, लोक गीतकार , कवि, अभिनेता सत्येन्द्र कुमार ने अपनी मगही कविताओं के माध्यम से महँगाई, पेपर लीक, कालाबाजारी इत्यादि पर महत्वपूर्ण कविताबतरहवा बैंगनपढ़ी। वरिष्ठ कवि सत्येन्द्र कुमार  और प्रत्यूषचंद्र मिश्रा की कविताओं को सुनने का भी हमें मौका मिला। इनकी कविताओं में आमजन की चिंता, बदलते सरोकारों की अभिव्यक्ति मुखर रूप से विद्यामान है।

          प्रतिरोध हर स्थानीयता से उठती आवाज होती है। गया शहर में प्रतिरोध की गोष्ठी एक महत्वपूर्ण पहल है। ‘साझी विरासत के नाम ‘ से आयोजित एकदिवसीय संगोष्ठी में वर्तमान समय की राजनीतिक एवं सामाजिक जटिलताओं पर मंचन किया गया। प्रतिरोध की संस्कृति के निर्माण में लेखकों के वैचारिक एवं व्यावहारिक दायित्व पर गंभीरतापूर्वक विचार किया गया। ऐसे समय में जब लेखकीय दायित्व एवं नैतिकता व्यक्तिगत होती जा रही है, समाज में वैचारिक और संवेदनात्मक संघर्ष जारी रहना चहिए।  हमें हमारे भीतर कोमलता, दया, एकजुटता और मनुष्यता बचाए रखना चाहिए और हमारी अस्मिता पर उठते हर वार का डटकर प्रतिरोध करना चाहिए। एक चींटी हाथी के नाक में दम कर सकती है, दीमक सत्ता की कुर्सी चट कर सकता है, और एक व्यक्ति के आवाज की बुलंदी क्रांति ला सकती है। 

दुष्यंत कुमार कहते हैं

"वे मुतमइन हैं की पत्थर पिघल नहीं सकता, 

मैं बेकरार हूं आवाज में असर के लिए।"

रिपोर्टिंग :

स्मृति कुमारी

शोधार्थी , भारतीय भाषा विभाग 

दक्षिण बिहार केन्द्रीय विश्वविद्यालय, गया 

Email: smritijha1608@gmail.com