ललन चतुर्वेदी की कविताएँ



ललन चतुर्वेदी का साहित्यिक दखल कविता एवं व्यंग्य के क्षेत्र में है। इस तरह उनकी यात्रा गद्य और पद्य की राह से होकर चलती रहती है। उनकी कविताओं में रोजमर्रा के साधारण दृश्य अपने वैशिष्ट्य के साथ प्रकट होते हैं। संवेदना के पुष्पों से सजी ये कविताएँ अपनी प्रगतिशील विचारों की सुगंध के साथ विचरती रहती हैं। आइये, उनकी कविताओं का आस्वाद लिया जाए।


1. मैं कांटे गिनता रहा


मन का क्या है

तमाम दुश्वारियों के बीच दुनिया अच्छी लगने लगती है

लगता है कि इतने अच्छे लोग हैं दुनिया में

बहुत-से अच्छे काम कर रहे हैं

मैं ही तो पीछे रह गया हूं

शिकायतों का पुलिंदा लेकर

भला यह भी मिलने का कोई सलीका है कि

मिले भी बहुत दिनों के बाद तो खाली हाथ

यह जानते हुए कि  खाली हाथ तो आदमी एक ही बार लौटता है

कम से कम रूठी हुई प्रेयसी के लिए एक गुलाब तो ले लेते

और गिरते हुए रुपये पर विचार करते हुए मंदिर के पास बैठे भिखारी की कटोरी में डाल देते दस रुपए का एक सिक्का

यह कहां संभव हो सका

मैंने तो 'आगे बढ़ो' कहकर ले ली छुट्टी


मन तो इतना कृपण निकला कि

स्कूल जाते बच्चों ने जब हाथ हिलाकर किया टाटा

हम उजबक की तरह मुंह सी कर देखते रहें

वह अकेला बूढ़ा जो बैठकर कर रहा था किसी का इंतजार

कि उम्र के इस पड़ाव पर कोई उससे भी बोले-बतियाए

उसको नजर‌अंदाज कर उड़ गए बाइक पर


ये चौबीस घंटे क्या मेरा बिलकुल निजी समय है

यह जानते हुए भी कि प्यार के दो पल बहुत हैं

हम अपने में लिथड़े रहें


और अंत में सद्बुद्धि के सात्विक पलों में जब शुरु किया स्वयं का आकलन

बहुत शर्मिन्दा हुआ

इतने सारे फूलों के बीच

मैं केवल कांटे गिनता रहा। 


2. पिता की तस्वीर


उस दिन‌ बड़ी बहन ने पिता की तस्वीर दिखाई

पासपोर्ट साइज में वह विराजमान थे मां के साथ


वे दोनों किसकी ओर देख रहे थे

यह प्रश्न अचानक मन में आया


वह तस्वीर आधी थी

बहुत जतन से बहन ने उसे फ्रेम करवाया था


मेरे पास पिता की कोई तस्वीर नहीं है

मैंने बनवाने की कोई कोशिश भी नहीं की


बचपन में देखी थी उनकी एक तस्वीर

जो उन्होंने काॅपरेटिव सोसाइटी से लोन लेने के लिए खिंचवाई थी

वह भी कहीं गुम हो गई जमीन के कागजात की फाइलों में

हो सकता है वह पीली पड़ ग‌ई हो या सड़-गल गई हो

मैं पिता की तस्वीरों के प्रति कभी संजीदा नहीं रहा


बहन आज भी पिता की तस्वीर को सभी भाई-बहनों को दिखाती है

पिता की तस्वीर देखते हुए

मैं मौन हो जाता हूं।


3. सुखाड़


सूख रही हैं नदियां

लुप्त हो रहीं हैं पौधों की प्रजातियां

किसान अपने ही उपजाए हुए अन्न से हो रहे हैं विमुख

खैरात का उत्सव मना रहे हैं


खरीद रहे हैं बाजार से निर्मित बेस्वाद अनाज

सुविधाओं से हार रहा है श्रम


भ्रम में जीने की सदी है हमारे सामने

देखते-देखते कितना कुछ बदल गया

अब कुछ भी नहीं चीन्हा रहा है


उम्मीद नहीं थी कि इतना जल्द बच्चे हो जायेंगे जवान

वे हमें पहचान ही नहीं पायेंगे

दोस्त केवल फेसबुक पर ही मिलेंगे

सब कुछ ऑनलाइन हो जाएगा

मिलना-जुलना, झगड़े-फसाद सब आभासी दुनिया की चीजें हो जायेंगी


ओह, आंखें भी सूख ग‌ईं हैं

यह कैसा सुखाड़ है कि सब कुछ कुम्हला गया है

एक हरी टिक की बाट जोहते

कितना बेचैन हो रहा है मन

कब से रिंग हो रहा है

क्यों मोबाइल नहीं उठा रहा है बेटा

जो पुकारते ही दौड़ कर पकड़ लेता था मां का आंचल। 


4. स्त्री शाम की प्रतीक्षा करती है


खिड़की से बाट जोह रही है एक जोड़ी आंखें

इसमें प्रेयसी वाली प्रतीक्षा का चुलबुलापन नहीं है

वह‌ बिलकुल एकटक देख रही है सड़क की ओर

जो उसके घर की तरफ आती है


दिन भर की थकन के बाद वह सुस्ताने के लिए नहीं बैठी है

वह इसलिए बैठी है कि साथ में बैठकर पिए एक कप चाय

वह जानती है उस पुरुष की थकान

जो लौट रहा है दिन भर झेलकर तमाम तरह के झंझावात


जैसे ही मुड़ते हैं उस पुरुष के पांव‌

उसके मन की आंखें मुस्करा उठती हैं

खोलकर झट से किवाड़

नज़रें उठाए बिना

वह सीधे करती है रसोई का रुख़

छू मंतर  हो जाती है

दिन भर की उसकी थकान

प्रतीक्षा की पावनता में वह इस तरह मेज पर रखती है चाय

जैसे गंगा से निकली हो कोई सद्यस्नाता।


5. साइकिल की चेन


यह साइकिल की चेन

वर्षों से वजन ढोते-ढोते लमर गई है

हर दस क़दम पर उतर जाती है

कभी-कभी तो फंस जाती है बुरी तरह से

इसे चढ़ाते हुए छूट जाता है पसीना

कालिख से पुत जाते हैं दोनों हाथ

ऐन मौके पर जब कहीं पहुंचना हो जरूरी

इसका बार-बार उतरना भयानक यातना है


कितनी बार तो टूटी भी है

जिसे मिस्त्री ने ताकीद  देते हुए आखिरी बार

जोड़ दिया है अपने हुनर से


मैंने खेलावन को यह दर्द झेलते हुए देखा है

जो गांव-गांव घूमकर खरीदता था अनाज

और ढोता था उसे अपनी  खटारा  साइकिल पर

उसे देखते ही मोहल्ले भर के लड़के एक सुर में गाने लगते-

घंटी ना ब्रेक जनता एक्सप्रेस


आज भी जब कभी किसी की साइकिल की चेन उतर जाती है

सहसा खेलावन की याद आ जाती है

दुआ करता हूं बीच सफर में किसी की साइकिल की चेन नहीं उतरे

इसके बिना असहाय से थिर दिखते हैं पहिए।


6. सब लौटता है


जैसे रात के बाद लौटता है दिन

रवि के बाद सोम, आषाढ़ के बाद सावन

दुःख के बाद सुख या सुख के बाद दु:ख

वैसे नहीं लौटता है मान, अपमान

मान लौटता है मान की शक्ल में

अपमान लौटता है बनकर और वीभत्स


मृत्यु अमंगल नहीं है

यह लौटती है जीवन बनकर

मत समझो कि कोई चल जाता है

सदा-सर्वदा के लिए

जो गया है, वह निश्चित रूप से लौटेगा

यह दीगर बात है कि वह तुम्हें पहचान नहीं पाएगा

और तुम भी नहीं पहचान पाओगे उसे। 


7. आखिर,उसकी गलती क्या है?


पता चला

सोलह तारीख को वह सगुन का चूल्हा उठाएगी

करेगी सोलहों श्रृंगार

सत्रह को कराएगी रुद्राभिषेक

अठारह को मेंहदी रचाएगी

उन्नीस को करेगी पूजा मटकोर

हल्दी-संगीत भी करवाएगी धूमधाम से


वह नहीं मानेगी किसी की सलाह

दुल्हे के गले में डालेगी जयमाल

सोने की अंगूठी पहनाएगी

बोलती है ससुराल में यदि मारेगा कोई ताना

तो धरेगी लक्ष्मीबाई का बाना

सबको खिलवाएगी जेल का खाना


कहती है - नहीं पढ़ाओ मुझे सादगी का पाठ

अपनी मेहनत की कमाई पर करती हूं ठाठ

मां-बाप के मरने से सपने नहीं मरते

अनाथ हूं तो क्या रोती रहूं माथ पर रख हाथ

गांव की औरतें मुंहामुंही करतीं हैं एक ही बात

इतना मुंहजोर किसी को बेटी न दे भोलानाथ !


8. बहुत देर तक


बहुत देर तक नहीं पढ़ी जा सकती किताबें

ब्रेक में आंखें ख्वाब देखना चाहती हैं


तीन घंटे  की फिल्म देखते हुए बोरियत बहुत हुई

बीच-बीच में क‌ई बार तुम्हारी हथेलियों को हाथ में लिया

इच्छा तो चुंबन तक की हो रही थी

लेकिन बीच में कितनी दीवारें खड़ी थीं


बहुत देर तक कमरे में बैठना तकलीफदेह लगा

बाहर निकल कर निहारता रहा आकाश को

चांद उस दिन बेहद खूबसूरत नज़र आ रहा था

इतना कि असंख्य तारे उसे अपलक निहार रहे थे

इस बीच मैं भूल ही गया कि तुम इंतजार कर रही थी अकेले कमरे में

और मैं केवल चांद ही नहीं निहार रहा था

मेरी आंखों में कुछ पूर्व प्रेमिकाएं उतर ग‌ईं थी


यह सब सोचते हुए बिस्तर पर न जाने कब लग गई आंखें

सुबह मां ने दरवाज़ा पीटते हुए जगाया

कब तक सोए रहोगे, छूट जाएगी ट्रेन

आज ही है न तुम्हारी परीक्षा !

कब तक बैठे रहोगे बाप के कपार पर ?


9. डरो


आदमी!

डरो, पानी से

डरो, हवा से

डरो, धरती से


जिस दिन खराब हो जाएगी पानी की प्रकृति

घूंट भर पानी के बिना मर जाओगे

हो सकता है इसके गुस्से में आ जाए सुनामी


जिस दिन हो जाएगी हवा विपरीत, विषैली

एक पल में सदा-सर्वदा के लिए सो जाओगे


जिस दिन फट जाएगी धरती

निगल लेगा आकाश


डरो

डरना जरूरी है

जिस तरह ज़रूरी है प्रेम करना


डरो

आदमी से नहीं

धरती, पवन, पानी से।


10. चुप होने का मतलब


चुप होने का मतलब

सब कुछ आंखें मूंद कर स्वीकार करना नहीं है

चुप होने में छुपी होती है अस्वीकृति की ध्वनि

जिसे लोग सुन नहीं पाते हैं


चुप होने के बावजूद

चुप नहीं रह पातीं आंखें

वह अस्वीकृति को जब्त कर लेती हैं

और ऐन मौके पर एक दिन

जब आंखें बोलने लगती हैं

सब चुप हो जाते हैं

सुनकर चश्मदीद का बयान । 


11. अनुपस्थिति


ऐसा बहुत से लोग नहीं मानते कि

वह आदमी काबिलेगौर है

और एक दिन वह बन गया काबिलेतारीफ


अनुपस्थिति व्यापक स्वीकार्यता भी देती है

यह सिद्ध हुआ उसके जाने के बाद ।  


लेखक परिचय :

ललन चतुर्वेदी (मूल नाम-ललन कुमार चौबे)

जन्म तिथि : 10 मई, 1966

मुजफ्फरपुर (बिहार) के पश्चिमी इलाके में नारायणी नदी के तट पर स्थित बैजलपुर ग्राम में

शिक्षा: एम.ए.(हिन्दी), बी एड., विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की नेट जेआरएफ परीक्षा उत्तीर्ण

प्रकाशित कृतियाँ : प्रश्नकाल का दौर, बुद्धिजीवी और गधे (दो व्यंग्य संकलन), ईश्वर की डायरी, यह देवताओं का सोने का समय है एवं आवाज घर (तीन कविता संग्रह) तथा साहित्य की स्तरीय पत्रिकाओं तथा प्रतिष्ठित वेब पोर्टलों पर कविताएं एवं व्यंग्य प्रकाशित।

संपर्क:

ललन चतुर्वेदी

202,असीमलता अपार्टमेंट

मानसरोवर एन्क्लेव,हटिया

रांची-834003

मोबाइल न. 9431582801

ईमेल: lalancsb@gmail.com

स्वाति बरनवाल की कविताएँ


 

स्वाति बरनवाल का लेखकीय दखल कविता, कहानी एवं आलोचना के क्षेत्र में है। वह हिंदी साहित्य की गहरी अध्येता है। यह अध्ययन उनकी रचनाओं में दिखता है।  वहीं एक चित्रकार की हैसियत से वह मन में उभरते बिंबों को अपनी कूची से जीवन्त कर देती है। कलम एवं कूची का यह अद्भुत संगम उन्हें विशेष बनाता है। शीघ्र उनका पहला कविता-संग्रह हमारे बीच आनेवाला है। आइये, उस संजीदा रचनाकार की संवेदना से पगी अर्थवान कविताओं से मिलते हैं।


1. स्पर्श की भाषा

क्या रिश्ता था

जो समझ नहीं आया अबतक

खून का नहीं था

लेकिन सहज ही चला आया था जीवन में

ढूंढने नहीं गई थी।


दुख में हिम्मत, लेकिन

सुख का साथी 

नहीं कहा जा सकता 

स्वार्थी नहीं, पर 

निस्वार्थ जैसा ही कुछ था

नहीं कहा जा सकता 

विचारों में कोई मेल नहीं

मतभेद बराबर बना रहता 

उम्र और अनुभव से परे था वो

क्या था मालूम नहीं।


मीठी हँसी जो अपनी महक बिखेर देता था

मन के कच्चे प्रांगण में

स्पर्श की भाषा

मूर्त होते हुए भी अमूर्त रहा समूचा...


एक-सा नहीं होता हर दिन

लेकिन वो साथ रहा


स्मृतियाॅं बसी हुई हैं उसकी

होंठों पर नाम है 

पर बुदबुदाया नहीं जाता

यह हँसी, होंठों पर उसकी स्मृतियों की है

जो रहकर रहकर एकदम शांत और सुस्त कर देती है 

एक क्षण को।


समझने की कोशिश 

बेकार जाती है बार-बार।


वो निश्छल आकाश-सा 

नील में सनी, उसकी कमीज

वो सफेद कॉलर 

हर तरह के रंग घुल सकते थे उसपर

क्या कुछ बाकी था ?

संदेह है मुझे इस पर।


बंधना चाहती थी उससे

चाहता तो वो रुक भी सकता था 

मगर जाते-जाते 

तमाम वर्जनाओं को तोड़ने का वादा लेकर गया मुझसे।


2. अनारक्षित कमरा


ये हमारा अनारक्षित कमरा है 

जिसकी खातिर दिनों दिन बढ़ती जा रही है प्रतिस्पर्धाएं 

कामचलाऊ घड़ी और

दीवारों की सीलन से 

जिसकी छत अब मकड़ियों के जाल में कैद है। 


हवा का स्पर्श पर्दे की कान गुदगुदाता 

तो कभी गौरैया की चहचहाहट से

धूप खिल-खिलाकर हॅंसती है 

पाँवपोश की जमीं पर।


अलमारी की किताबों के 

आड़ में रखी 

सल्फास और फिनायल की गोलियां 

बचा लेती है उन्हें 

दीमकों के 

संगी-साथियों के अत्याचार से।


इस कमरे की ईंटे 

मेरे पिता की पसीने से जुड़ी है

मैंने उनकी संपत्ति का नमक चखा है


स्वाद के एक टुकड़े में

आरक्षित कमरे की संभावना है 

जो बार-बार, लौट आने को विवश करता रहेगा।


3. ईशान कोण


उनकी दाल हमेशा गलती रही

और वे मथते रहे समूचा व्यक्तित्व 

निंदा की मथानी से।


उनके साथ साथ ही चली आई थी 

कोई अज्ञात पीड़ा...


जाने वाले हमेशा

अतिथि की तरह आते हैं 

जिनकी कपड़े हमेशा टंगे रहते हैं हैंगर पर

उनकी ट्रेनें हमेशा निर्धारित तिथि पर 

खड़ी रहती है 

किसी घुमावदार मोड़ पर।


उनके चले जाने पर कोई हर्ज नहीं 

शोक नहीं।


उसी ट्रेन की सीढ़ियों से हौले से

उतरता है एक अमुक व्यक्ति 

बंद गले का पैरहन 

और दाएं हाथ में सूटकेस लिए

कलाई पर बंधी घड़ी भी 

इसी बेतरतीबी से देखता है कि अपनी नियत समय पर ही 

अपने गंतव्य को आ पहुॅंचा हो।


एक अनजाना और अनचाही प्यास लिए

बढ़ाने लगता है हमारे साथ

कदम दर कदम

और सदा-सदा को वास कर लेता है

ईशान कोण में 

जिनकी विदा की कल्पना भर से लगता है 

दिल के देवता कूच कर गए।


4. मँझधार में फंसी एक नाव


गहराती मन की मिट्टी-जल में 

जो अचानक अँखुआ उठे थे कुँईं के बीज 

आज धुंधलाती सी बिखरी पड़ी हैं 

चहुॅंओर।


गमकते स्वप्न से टकराती जा रही धूप की राक्षसी हँसी 

या उम्मीदों का पुलिंदा फट जाने पर

पंखे की रिरियाते हवाबाज़ी से

मछलियाॅं करती रहीं कलह

कि आखिर कब तक ये द्वंद पानी तक सीमित रह सकता है।


स्वप्नलोक से जैसे अभी अभी उठाकर फेंक दी गई हो सड़क की गर्म देह पर


प्राणहीनता का बोध 

भींगाती है स्मृतियों की बौछार से 

संवेदना के श्वेत रंग पर आ चिपकता है राख, बालू, मिट्टी का बोझ...


असहनीय है 

अंगूठे के पोर से चींटियों की दौड़।


सिरहाने पड़ी हुई 

किताब और 

उसके अंदर पड़ी हुई है उसके लिखे खत

जिसमें वादों का एक अंबार-सा झड़ रहा है दिनौंधी हुए 

आँखों में उग आए स्मृति पटल पर।


कलम नहीं चलती 

थककर, रुकने का इरादा तय कर चुकी है 

कि अब और नहीं

हो चुका जो नहीं होना था 

जो होना है वो कैसे भी हो जायेगा

कहकर कराहती है 

जैसे नदी के मँझधार में फंसी 

एक नाव।


5. दीवार की परछाइयाँ


चाॅंद की दूधिया अंजोरिया में

हम दोनों कितने पास होंगे

कि देर रात ढूॅंढते रहेंगे 

एक के बाद 

बार-बार आँखो में उतरने के बहाने।


टूटते उल्कापिंडों से माॅंगते रहेंगे मन्नतें कि 

सदा घटती रहे ऐसी घटनाएं...


आसमान के बैंजनी एकांत तले

तुम टाॅंक देना 

एक सितारा माथे पर

फिर टिका कर अपना माथा 

एक दूसरे के कंधे पर

सुनते रहेंगे 

ध्रुव तारा और सप्तऋषियों की स्नेहवर्षा में

जुगनुओं की बातें...

कि एकांत में ऐसा क्या कहते है पेड़

जो भूकभूकाती रहती है

सिहरती शाखाओं पर!


रातरानी की राग 

जो बिछड़ने नहीं देती 

झुरमुटों को अपने आलिंगन पाश से

जिसकी धुन पर थिरकती रहती है 

दीवार की परछाईयाॅं 

जो एक-दूसरे में बसे है एक-दूसरे से अधिक।


6. प्रेम का डायनेमो


जब भी हम साथ होते हैं 

दुकेले नहीं होते

गहराती रात में भी नहीं,

हमारी समीपता में कोई तीसरा, चौथा और पाॅंचवां होता है

संगीत, सुगंध और उत्सव के रूप में।


हमारा साथ समाज के 

तय मापदंडों पर निर्भर नहीं करता

वे परिवार के अनन्य सदस्य जैसे ही

वे आकाश में तैरते हैं 

चाॅंद, तारे और जुगनुओं की नाव बनकर


काॅंच की चूड़ियाॅं‍ और पायल की खनखनाहट 

एकांत में संगीत मालूम पड़ते हैं


हमारे भीतर के उजाले में 

संयोग, तुरपाई करता है

मौन लिपि में उधेड़बुन की 


आम, महुआ और इमली

की मादकता, 

चीख-चीखकर बतलाते हैं

सुनो!

जीवन की सारी बातें

अनावश्यक हैं इस क्षण के आगे


हमारी हथेलियों की आधी-अधूरी रेखाओं से उगा चाॅंद आशाऍं सॅंजोता।


हम दोनों का साथ 

हमारा सामर्थ्य गढ़ता है 

और सामर्थ्य, प्रेम का डायनेमो है।


7. तेरे स्वप्न बड़े हों


उन दिनों एक अज्ञात डर में,

बाल नोचती रोज़-रोज़,

थोड़ी-थोड़ी करके अपनी गुंथी चोटियाँ काटती,

चिल्ला-चिल्लाकर रोने को होती, तब तक नींद खुल जाती।


नास्तिक नहीं हूँ, मगर सीताराम-सुमिरन नहीं भाता,

लंबे बाल खूब पसंद हैं, लेकिन छोटे बाल संतुष्टि देते हैं।


एक समय बाद

जीवन में पसंद नहीं, जरूरत मायने रखता है।


मुझे घिन आती है उन यादों से,

जो गुजरकर भी चिपका रहता है जोंक की तरह छाती पर।


भावनाएं भी बर्फ की तरह पिघलती,

तो कभी बाढ़ के पानी की तरह तट का सीना चीर दृष्टा को मिटा देना चाहती।


जो एक स्वप्न की तासीर देकर डकैत बन चुके,

जो कभी कहते थे, "जा, तेरे स्वप्न बड़े हों।"


8. अनिवार्यता


वे विरक्ति के दिन थे

जहां पक्की उदासी घर में पैर जमाएं बैठी थी


वे कच्ची भावनाओं की पक्की सिलाई 

उघड़ने के दिन थे 

जरा सा 

स्पर्श पाते ही जाती रहती थी 

मन से मलिनता।


खुद को व्यस्त रखने की कोशिश में

हर दिन नये- नये प्रयोगों से 

कमरे की दीवारें सजी होतीं और किताबें बुक सेल्फ में सुसज्जित न होकर 

बिखरी रहती थी 

चटाई पर, मेज पर और बिछावन पर।


विवशता और विरक्ति की घनी उदासी में 

हम टकराये

जहाॅं सबसे अधिक जरूरत थी हमें 

एक-दूसरे की।


सुन्दर भविष्य के लिए तमाम रंग संजोए, 

ख़्वाब बुने कि हमारे जीवन में 

एक-दूसरे की उपस्थिति 

पाॅंचवीं कक्षा से दसवीं कक्षा की सिलेबस जैसी है 

जिससे ऊबकर भी 

टूटकर और डूबकर सहेजे रखना जीवन की पहली अनिवार्यता होगी।


9. ओ मेरी अच्छी आत्मा


अगर सच कहूॅं तो 

क्या तुम मानोगी कि अक्टूबर की आख़िरी  

सपनीली

रात की पहली बारिश में 

बंद खिड़की को प्रवेश-द्वार बनाती 

पेड़ों से बेख़ौफ़ इत्र चुराती 

इठलाती, इतराती, चिकमिकाती 

हवा का स्पर्श ही तुम्हारा स्पर्श है 

जो छू कर तुम्हें अभी अभी मेरे सिरहाने लौट आया है

सस्नेह!


सुनती हो!

तुम्हें जब भी मेरी याद आए तो 

लौट आना चाहे अमावस की काली रात हो या पूर्णिमा की।


तुम आना 

तुम लौट आना

मेले से घेवड़, जलेबी और बताशे देने के खातिर 

कि तुम अकेली अन्न का एक दाना नहीं चखती 

तुम लौट आना कब्रिस्तान से बाबा की अस्थियां लेकर 

कि अकेली नहीं जा सकती गंगा में बहाने 

कॉलेज की किताबों में जिल्द लगवाने या अस्पताल के कोने में पड़ी बीमार, अपाहिज बुढ़िया के लिए एक वक्त की रोटी के लेने के बहाने।


अनाथालय से किसी अनाथ बच्चे को पुचकारते लौट आना

कि हमसे बेहतर नहीं हो सकता कोई 

वालिदैन 

नहीं दे सकता इतनी अच्छी परवरिश

नहीं दे सकता इतना लाड़-दुलार जिसमें बिगड़ने से ज्यादा संभावना हो बेहतर मनुष्य बनने की।


ओ मेरी अच्छी आत्मा!


पारे से छितराते जीवन को सहेजने के लिए ही सही

तुम लौट आओ मुझमें।


इस बार सच में लौट आना आकाश की धवल चादर ओढ़े 

जिनकी दीवारें पुत सकती है

पिछली सालों की साथ की हर 

काली-कमियाॅं से लीपकर 

प्रेम के हर रंग से सराबोर।


तुम्हारे लौट आने को मैं तुम्हारा आना समझूॅंगा मेरी जान।


10. जतन


धरती के गर्भ में अँखुवाते 

रिश्ते नहीं जानते कि

आसरा पायेंगे या

घुल जायेंगे मिट्टी-जल-कण में


फिर भी वे उग आते हैं

जैसे आती है टहनियों पर

चुप्पी साधे कोमल पत्ते, रंग-बिरंगे फूल और कच्चे फल


हम कच्चे उम्र के साथी 

जानते हैं चुप्पी की घूँट घोंटकर

एक साथ खिलना, पकना और झरना


उम्र कपास की फाहे की तरह 

नित उड़-उड़ रही है

धूप, दीप, फूल, गंध में

या हो चुके अवकाश में


लेकिन हर बार का तुम्हारा

मौत के मुॅंह से मुझे खींच लाना 

चौड़े और ऊॅंचे कंधे देकर

वक्त जरूरत के बीच 

पिता की तरह जतन कर लेना 

स्त्री-मन की बंजर भूमि को थोड़ी अधिक आर्द्र और नर्म बनाने की कला है।


लेखक परिचय :


बिहार के पश्चिमी चंपारण जिले के गाँव कठिया मठिया में 15 मार्च 2001 को जन्मी स्वाति बरनवाल ने एम. ए. (हिंदी) तक शिक्षा प्राप्त की है। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में उनकी कविताऍं और आवरण चित्र प्रकाशित होते रहे हैं। साथ ही कई पुस्तकों के आवरण पर उनके चित्र उनकी कला को अर्थवत्ता प्रदान करते हैं।


संपर्क: 

ईमेल: barnwalswati63@gmail.com